बंद हो धर्म आधारित राजनीति

burka - Population statistics of India, hindi articleधर्म किसी भी इंसान के जीवन की बेहद आवश्यक आवश्यकता है, लेकिन समस्या तब हो जाती है जब यह धर्म और धार्मिक पहचान चारदीवारी से बाहर झाँकने लगती है. स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब धर्म को राजनीति की शतरंज पर प्यादों की तरह लुढ़काया जाने लगता है. इसकी विस्तार से चर्चा आगे करेंगे, क्योंकि इससे पहले नागरिक अधिकार और कर्तव्यों का स्मरण करना आवश्यक है. यदि कोई नागरिक किसी जिम्मेवार पद पर है तो उस पद की गरिमा रखना नागरिक का कर्त्तव्य बन जाता है, मगर हमारे देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति अपनी मर्यादाएं भूल जाते हैं. हालिया मामला उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी साहब का है. अंसारी साहब ने कहा है कि मुसलमानों की सुरक्षा औऱ पहचान के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाएं ताकि ये समुदाय सरकार के मूल उद्देश्य 'सबका साथ सबका विकास' के साथ आगे बढ़ सके. अब सवाल यह है कि बहुमत से चुनी गयी केंद्र सरकार कोई नर्सरी में पढ़ने वाली बच्ची तो है नहीं कि उसे सार्वजनिक रूप से बयानबाजी करके सलाह दी जाय और यदि वास्तव में कोई सलाह थी तो उपराष्ट्रपति अपने पद की गरिमा का ख़याल करके सरकार को आधिकारिक रूप से सन्देश दे सकते थे. वैसे, अंसारी साहब ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आखिर किन आंकड़ों के आधार पर उन्होंने यह बयानबाजी की है जिसे कई हलकों में सीधे तौर पर राजनीतिक बयान माना जा रहा है. विहिप जैसे संगठनों ने साफ़ कहा है कि उपराष्ट्रपति को अपने बयान के लिए माफ़ी मांगना चाहिए, अन्यथा अपने राजनीतिक शौक को, संवैधानिक पद से इस्तीफा देने के बाद पूरा करना चाहिए. खैर, यह एक विषय है मगर उपराष्ट्रपति महोदय को यह भी समझना चाहिए कि अगर मुस्लिमों की हालत वास्तव में किसी मानक पर चिंतनीय है तो इसके लिए एक साल की सरकार को किस प्रकार दोष दिया जा सकता है? क्या इसके लिए 60 साल से सत्ता पर काबिज़ कांग्रेस को दोष नहीं दिया जाना चाहिए था! यदि कांग्रेस को भी अपने बयान में शामिल करते तो अंसारी साहब का बयान कुछ हद तक तार्किक हो सकता था, मगर सच तो यह है कि उनके द्वारा दिया गया यह बयान न केवल गैर-जरूरी है, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच कटुता उत्पन्न करने वाला भी है.Hamid ansari statement analysis, Musalman in India, modi, Manmohan समझना आवश्यक है कि आज़ादी के बाद पहली बार एक अलग विचारधारा की सरकार सत्ता में है तो जाहिर है कि विभिन्न समस्याओं पर उसका नजरिया भी अलग होगा. ऐसी स्थिति में अगर किसी को उसके कार्यक्रमों के बारे में संदेह उत्पन्न होता है तो उसके लिए भारतीय न्याय-प्रणाली है, जो हर परिस्थिति में न्याय करने में सक्षम है. आखिर प्रत्येक सरकार और राजनीतिक दल से हम किस प्रकार उम्मीद कर सकते हैं कि वह पिछली संप्रग सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह की भांति बयान दे कि 'इस देश के संशाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है'. ठीक है, यह मनमोहन सिंह का कार्य करने का अपना तरीका था, मगर ठीक उसी तरह कार्य नरेंद्र मोदी भी करें यह मांग किस प्रकार जायज़ कही जा सकती है? अगर ऐसा होता तो लोग नरेंद्र मोदी को चुनते ही क्यों? साफ़ जाहिर है कि लोग कार्य करने की स्थितियों और नजरियों में आमूल चूल बदलाव देखना चाहते हैं. और हामिद अंसारी साहब को यह समझना चाहिए कि उस बदलाव की उम्मीद शिक्षा में है, रोजगार की संभावनाओं में है, सबके लिए समान अवसर की उपलब्धता में है, सबके लिए न्यायपूर्ण सुरक्षा में है. अब उन दिनों को पीछे छोड़ना चाहिए, जब मुसलमान और हिन्दू के नाम पर बयानबाजी करके चुनावों में वोट बटोरने की कोशिशें की जाती थीं. जहाँ तक मुसलमानों का प्रश्न है तो उसे एक संगठित धर्म के रूप में बहुत सुधारवादी क़दमों को उठाने की आवश्यकता है. क्या हामिद अंसारी साहब जैसे लोग यह कहने की हिम्मत कर सकते हैं कि मुस्लिमों को अपनी कट्टर धार्मिक पहचान को परे रखकर अपनी कौम की बेहतरी के लिए तत्पर हो जाना Hamid ansari statement analysis, Musalman in India, owaisiचाहिए. आखिर यही बात तो कई रिसर्च में सामने आयी है. हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के लिए कार्यरत एक संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की ओर से किए गए सर्वे में महिलाओं से बातचीत में 92 फीसदी मुस्लिम महिलाओं का मानना है कि तीन बार तलाक बोलने से रिश्ता खत्म होने का नियम एक तरफा है और इस पर रोक लगनी चाहिए. यहाँ, महिलाओं ने यह भी माना कि तलाक से पहले भारतीय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और इन मामलों में मध्यस्थता का प्रावधान भी होना चहिए. खुद को मुस्लिम समाज का चिंतक दिखाने वाले हामिद अंसारी साहब, ओवैसी जैसे लोग इस रिपोर्ट पर गौर करके क्या देश में 'समान आचार संहिता' में मुसलमानों को आने के लिए राजी करने की कोशिश करेंगे? यही बात सुन्नी उलेमा काउन्सिल ने भी कही है, मगर मुस्लिम शुभचिंतकों को मुस्लिम राजनीति से फुर्सत मिले तब तो कोई आगे सोचे! हामिद अंसारी साहब को यह भी बताना चाहिए कि आज़ादी के 70 साल होने को आये हैं, मगर देवबंद के दारुल उलूम को मुस्लिमों से यह अपील क्यों करनी पड़ रही है कि सभी मुसलमानों को आज़ादी के जश्न में भाग लेना चाहिए?(यह अपील 15 अगस्त 2015 के सन्दर्भ में की गयी थी.) ठीक यही बात इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक निर्णय में कहा है. अलीगढ निवासी अरुण गौड़ की जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने आदेश दिया है कि गणतंत्र दिवस पर सभी मदरसों पर तिरंगा फहराया जाना चाहिए! सवाल यह है कि क्या यह कोई कहने और बताने की बात है? क्या यह परिस्थिति भी मोदी ने ही पैदा की है? आखिर मुस्लिम समाज को इस कदर अँधेरे में क्यों रखा जा रहा है और मोदी सरकार से भी इस अंधेरगर्दी कोHamid ansari statement analysis, Musalman in India, vote bank politics बनाये रखे जाने की उम्मीद क्यों की जा रही है. बातें बहुत हैं, मगर सारांश यही है कि अपनी धार्मिक पहचान को चारदीवारी के भीतर रखकर, विकास और मानवता को आगे लाकर, देशवासियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर, महिलाओं को समान अधिकार देकर चलने से ही मुसलमानों का विकास हो सकता है न कि किसी राजनीतिक दल या सरकार द्वारा संरक्षण या आरक्षण दिए जाने से. संरक्षण, आरक्षण, विशेष दर्जा इत्यादि मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ वोट-बैंक ही बनाकर रखेंगे... हाँ! उनके नाम पर कुछ लोग जरूर विधायक, सांसद या उपराष्ट्रपति बन जायेंगे, ठीक 'क्रीमी लेयर' की तरह. 'क्रीमी लेयर, कृमि बनकर, क्रीम को चाट जाता है और आम मुसलमान के हिस्से अशिक्षा, धर्मान्धता और पिछड़ेपन को छोड़ जाता है. बेहतर यही होगा कि धर्म आधारित राजनीति पर पूर्ण विराम लगाया जाय, इसी में मुसलमान और हिंदुस्तान का हित है.
 
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