जब निकल गया सांप तो... New article on DDCA Corruption and its relations with Finance Minister Jaitley by mithilesh

गाँव में मछली पकड़ने के लिए कुछ लड़के या लोग 'केंचुआ' की तलाश करते हैं और उसे कांटे में फंसाकर फिर तालाब की मछली को... खैर, यहाँ जिस कहावत को बताने की कोशिश की है, वह 'केंचुए की तलाश में सांप निकल आने से है'. अब कुछ लोग इस कहावत के एक सिरे पर अलग-अलग राय रख सकते हैं कि सीबीआई 'केंचुए' की तलाश में थी या नहीं! मगर कहावत का दूसरा हिस्सा तो सटीक बैठ ही गया है और अब न केवल सांप बाहर निकल गया है, बल्कि उसको दूध पिलाने वाले और बीन बजाकर अपना-अपना दावा ठोंकने वाले भी सामने आ गए. क्रिकेट के कर्ताधर्ता सोच रहे होंगे कि पहले ही इस पर कोई कम दाग लगे थे, जो यह डीडीसीए का मामला नए सिरे से खुल गया. जी हाँ! डेल्ही एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोशियेशन के इस मामले की तपिश आप कुछ यूं महसूस कर सकते हैं कि भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को इस मामले पर सांप सूंघ गया है तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर अपने ख़ास लोगों को यह सांत्वना देनी पड़ी कि विपक्ष के हमलों से मंत्रियों को घबराना नहीं चाहिए! मात्र एक दिन पहले तक अरविन्द केजरीवाल पर हमलावर और उनको 'हिस्टीरिया' तक का पेशेंट बताने वाले केंद्र सरकार के सर्वाधिक ताकतवर मंत्रियों में शुमार अरुण जेटली तो हाल-फिलहाल बुरी तरह बैक फुट पर दिख रहे हैं. यहाँ तक कि उनको इतनी कमजोर टिप्पणी तक करनी पड़ी, जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए इंटरव्यू में वित्तमंत्री ने बिना किसी का नाम लिए हुए यह तक कह डाला कि उनकी पार्टी के एक सांसद की सोनिया गांधी से बात हुई, जिसमें उन्हें यानी जेटली को फ़िक्स करने का बात सामने आई है. जाहिर है, अरविन्द केजरीवाल को 'हिट एंड रन' या फिर हवा में आरोप लगाने वाले का तमगा देने वाली भाजपा के ताकतवर मंत्री के मुंह से इस प्रकार की अटकलें किसी हाल में ठीक सन्देश नहीं देती हैं. यही नहीं, एक पूरे दिन चैनलों पर यह खबरें चलती रही कि डीडीसीए में भ्रष्टाचार का मुद्दा बर्षों से उठाने वाले कीर्ति आज़ाद को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की ओर से जुबान बंद रखने का सख्त निर्देश दिया गया है.  

हालाँकि, डीडीसीए में भ्रष्‍टाचार के खुलासे का दावा करते हुए भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में कह डाला कि डीडीसीए ने कई फर्जी कंपनियों से करार कर करोड़ों रुपये दिए, किराये पर लिए गए सामान पर बड़ी फिजूलखर्ची की गई, यहां तक कि डीडीसीए ने प्रिंटरों और कंप्‍यूटरों तक को भारी कीमत पर किराए पर लिया. कीर्ति आज़ाद के खुलासों की थोड़ी डिटेल में बात करें तो आजाद ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में एक वीडियो क्लिप दिखाई, जिसमें डीडीसीए में करप्‍शन के बारे में कहा गया क‍ि बीसीसीआई हर राज्‍य के क्रिकेट एसोसिएशनों को हर साल करोड़ों रुपये मैच आयोजन, स्‍टेडियमों के रखरखाव आदि के लिए देती है, लेकिन ये एसोसिएशन इन करोड़ों रुपये को कहां डकार जाती है, इसका पता नहीं चल पाता. इस बीच यह ख़बर भी आयी कि डीडीसीए ने वित्तीय अनियमितताओं की बात मान ली और अपने पुराने प्रमुख स्नेह बंसल पर आरोप लगते हुए कहा है कि उन्होंने फंड्स में घोटाला किया. हालाँकि, अब मामला स्नेह और नफरत से आगे जाकर राजनीतिक मोड़ ले चुका है और चाहे-अनचाहे भाजपा को वह सांप खूब डरा रहा है, जो अचानक ही बिल से बाहर निकल आया है! हालाँकि, एक दो लोग लट्ठ लेकर अरुण जेटली के पक्ष में जरूर खड़े हो गए हैं और 'सांप' से उनको बचाने की जद्दोजहद शुरू कर दी है. इस कड़ी में, नामी क्रिकेटर सहवाग ने जेटली के समर्थन में लगातार ट्वीट किए हैं. सहवाग ने खुद ट्वीट करने के अलावा अपने साथी क्रिकेटर गौतम गंभीर द्वारा जेटली के समर्थन में किए ट्वीट्स को भी रिट्वीट किया है.  

हालाँकि, वीरेंदर सहवाग के ट्वीट मात्र अरुण जेटली के बचाव के लिए ही हैं और उन्होंने भी इशारे-इशारों में डीडीसीए पर तीखा प्रहार किया है. सहवाग ने एक ट्वीट में साफ़ कहा है कि, 'जहां DDCA में कुछ लोगों से बात करना बुरे सपने के समान था, वहीं अरुण जेटली प्लेयर्स की किसी भी समस्या के समाधान के लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे.' चूँकि खिलाड़ी थोड़े सीधे स्वभाव के होते हैं, इसलिए वह इसमें भेद नहीं कर सके हैं कि अगर डीडीसीए दोषी और गन्दी है तो उसके चीफ के तौर पर जेटली साहब 'मनमोहन' सिंह बने बैठे थे क्या? यही सीधापन खिलाड़ी गौतम गंभीर की भी एक ट्वीट में दिखा, जब उन्होंने लिखा, 'कुछ पूर्व क्रिकेटरों द्वारा डीडीसीए में हुई गड़बड़ियों के लिए अरुण जेटली को दोषी बताना भयानक है. जबकि वो लोग अरुण के चलते ही डीडीसीए में अच्छे पदों पर बैठे हैं.' जरा गंभीर के इस ट्वीट को दो-चार बार दुहराइये, अर्थ खुद-ब-खुद सामने आ जायेगा! अरुण जेटली आखिर डीडीसीए में साल 1998 से 2013 तक रहे हैं, ऐसे में वह दोषी क्यों नहीं माने जाने चाहिए? हालाँकि, अब तक डीडीसीए की गड़बड़ियां तमाम नज़रों में आने के बावजूद रसूखदार राजनीति के कारण ही दबी रही थी और अरुण जेटली ने बेहद ख़ूबसूरती से इस पूरे मामले को सालों तक लो-प्रोफाइल बनाये रखा. लेकिन, हकीकत तो यही है कि अब सांप निकल गया तो निकल गया... उसका कोई क्या करे! वस्तुतः सच तो यही है कि लगभग अनेक राज्यों के क्रिकेट एसोसिएशन्स का कमोबेश यही हाल है और उस पर सालों तक किसी एक व्यक्ति का आधिपत्य जैसा बना रहता है. जाहिर है, यह कोई नयी बात है नहीं और ऐसी बात भी नहीं है कि कल ही यह बदल जाए! हाँ, इस अचानक निकले 'सांप' को दूध पिलाने की कोशिशों से अरुण जेटली, अमित शाह और खुद प्रधानमंत्री के माथे पर शिकन जरूर आयी होगी. आखिर, सांप तो सांप है, वह भी अगर भ्रष्टाचार का सांप हो तो उसकी फुंकार बड़ी दूर तक जाना तय ही है!

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