बंद हो जाति-धर्म की घटिया राजनीति - Mithilesh new hindi article on religion and cast politics in India

हिंदुत्व में धर्म और मनुष्य की व्याख्या करते हुए कितनी सुन्दर और सटीक बात कही गयी है कि यह शरीर नश्वर है और आत्मा अजर अमर है और मरने के बाद व्यक्ति के कर्म और कर्मफल तक यहीं रह जाते हैं. किन्तु, यही बात हमारे राजनेताओं को कौन समझाए, जो व्यक्ति के मरने के बाद उसकी जाति-धर्म का रोना शुरू कर देते हैं. उनके आंसू तो निश्चित रूप से घड़ियाली ही होते हैं, किन्तु वह जनता को आक्रोशित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही है कि अगर किसी हादसे में किसी की जान चली जाती है तो उसे तुरंत उसकी जाति अथवा धर्म से जोड़ दिया जाता है. सिर्फ दुर्भाग्य ही नहीं, बल्कि यह शर्म का विषय है कि किसी व्यक्ति को दलित या मुसलमान बनाकर उसकी मौत का तो मजाक बनाया ही जाता है, साथ ही साथ विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्यता को गैर जरूरी रूप से बढ़ावा दिया जाता है. तमाम देशी विदेशी मीडिया इस खबर को समस्याग्रस्त करने में जुट गए हैं और उनका इस पूरी उहापोह में एक ही मंतव्य दिख रहा है कि किस प्रकार केंद्र सरकार को इसमें लपेट लिया जाय. मामला, एक केंद्रीय मंत्री से होते हुए मानव संशाधन मंत्रालय तक जाकर पहुंचा गया है. गौरतलब है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दो हफ्ते पहले हॉस्टल से बाहर निकाले गए एक 22 साल के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला के खुदकुशी किए जाने के बाद से हंगामा मचा हुआ है. इस सन्दर्भ में जो जानकारी सामने आ रही है, उसके अनुसार यह लड़का एक यूनियन से जुड़ा हुआ था और उस अंबेडकर स्‍टूडेंट्स यूनियन का आरोप है कि केंद्रीय मंत्री दत्‍तात्रेय ने ही दलित स्कॉलर्स पर कार्रवाई के लिए एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी को लेटर लिखा था.  

युनिवर्सिटी के इन छात्रों का आरोप है कि दत्तात्रेय के स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखने के बाद रोहित को कैम्पस के होस्टल और दूसरे इलाकों में जाने से रोक दिया गया था. हालाँकि, केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने ज़ोर देकर कहा है कि मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को लिखी गई उनकी चिट्ठी का हैदराबाद युनिवर्सिटी के रोहित वेमुला की खुदकुशी से कोई लेना देना नहीं है. दत्तात्रेय ने मीडिया से बातचीत में कहा 'कुछ गैर सामाजिक तत्व युनिवर्सिटी की शांति को भंग कर रहे थे और इसलिए मैंने मंत्रालय को बस उनके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कहा था. इस आत्महत्या का बीजेपी से कोई लेना देना नहीं है और जांच रिपोर्ट सब सामने ले आएगी.' जाहिर है मामले का मीडिया-ट्रायल शुरू कर दिया गया है. इस सम्बन्ध में कार्रवाई करते हुए, हादसे के बाद शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में टीम भेजी है तो वहीं जल्दबाजी में केंद्र के श्रम राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय पर केस दर्ज कर लिया गया है. यह पूरी प्रक्रिया तब विवादित की जा रही है, जब होस्टल के कमरे में मिली रोहित की लाश के पास एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें लिखा है कि मेरी खुदकुशी के पीछे कोई जिम्मेदार नहीं है. इस सम्बन्ध में जो और जानकारी सामने आ रही है, उसके अनुसार मृतक विद्यार्थी रोहित गुंटूर जिले का रहने वाला था और सोशियोलॉजी में पीएचडी कर रहा था. उसके साथ चार और स्टूडेंट्स हॉस्टल के बाहर तम्बू में रहने को मजबूर थे क्योंकि उन पर भी हॉस्टल में घुसने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था. अंबेडकर यूनियन के सदस्य इन पांचों स्कॉलर्स पर बीजेपी की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के एक कार्यकर्ता पर हमला करने के आरोप थे. इस पूरे मामले को जिस जंगल से राजनीतिक बनाने की कोशिश की जा रही है, उसके अनुसार यूनिवर्सिटी ने रोहित समेत सभी को प्राथमिक जांच में निर्दोष करार दिया था, लेकिन बाद में जब कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखी थी, तब यूनिवर्सिटी ने अपना फैसला पलट लिया था. हो सकता है कि इस मामले में कहीं राजनीतिक हस्तक्षेप भी हुआ हो, बावजूद इसके मृतक को दलित कह कर मीडिया-ट्रायल को किसी हाल में उचित नहीं ठहराया जा सकता. 

हालाँकि, असल बात जांच के बाद सामने आएगी, किन्तु कुछ दिन पहले दादरी में हुए दुर्गभाग्यपूर्ण घटना के बाद जिस प्रकार से मुस्लिम पॉलिटिक्स के आधार पर देश भर में तनाव पैदा करने की कृत्रिम कोशिश हुई थी, ठीक वैसे ही इस मामले में लक्षण पैदा किये जा रहे हैं. प्रथम दृष्टया इस मामले में कई कारण दिखते हैं, जिसमें शैक्षणिक, पारिवारिक तनाव से लेकर आर्थिक तनाव तक हो सकते हैं, जिसका इशारा इस बच्चे ने अपने सूइसाइड नोट में करते हुए मार्मिक अपील की है कि उनकी स्कालरशिप के पैसे उनके परिवार को दे दिए जाएँ! शुरूआती जानकारी के अनुसार, रोहित वेमुला खुद को मात्र दलित मानने से इनकार करते थे और वे विज्ञान-लेखक बनना चाहते थे. उन्हें पहले से दी हुई पहचानों की कैद में घुटन होती थी. वे सितारों के बीच गर्दिश करना चाहते थे तो उनकी मौत को किसी दलित की मौत कह कर मजाक उड़ाया जाना असल मुद्दे से मुंह मोड़ना ही होगा. जरूरत है समस्या की जड़ तक पहुँचने की और उस तनाव को पकड़ने की, जिससे पार ये विद्यार्थी नहीं हो पा रहे हैं! अगर कोई व्यक्तिगत दोषी है तो उसे भी सजा दी जाय, किन्तु अगर इसके लिए हमारी सामाजिक और आर्थिक संरचना दोषी नज़र आ रही है तो समाज विज्ञानी उस पर कार्य करने से मुंह न चुराएं! शायद यही रोहित को सच्ची श्रद्धांजलि होगी! और हाँ, देश का समय इस तरह की चर्चाओं में लगाने की बजाय मीडिया अगर सकारात्मक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करे तो वह कहीं ज्यादा सार्थक और समरस होगा. कहीं ऐसा न हो कि जनता बागी होकर मीडिया के खिलाफ ही मानसिकता बना ले और लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले इस संस्थान से अपना भरोसा ही ख़त्म कर ले!
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