शिया नेता को मौत, मगर... New hindi article in shiya sunni equation and death penalty nimr al nimr, the shiya leader, iran reaction

सीरिया मुद्दे पर बंटे इस्लाम जगत में एक बार फिर भूचाल सा आ गया है और इस बार वजह बने हैं शिया नेता निम्र अल निम्र. सऊदी अरब में वैसे भी मौत की सजा बात-बात पर दी जाती रही है और इसी सन्दर्भ में जारी एक आंकड़े के अनुसार, इस इस्लामिक कंट्री में वर्ष 2015 में कम से कम 157 लोगों का सिर कलम कर उन्हें सजा-ए-मौत दी गई है और यह इस राजशाही सल्तनत में दो दशक में सजा-ए-मौत का सर्वाधिक आंकड़ा है. यह आंकड़ा कई मानवाधिकार समूहों का है जो विश्वभर में सजा-ए-मौत पर नजर रखते हैं. इन सजाओं में राजशाही के खिलाफ बयानबाजी, इस्लामिक कानून के उल्ल्ंघन और मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामले सर्वाधिक रहे हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने नवंबर में कहा था कि वर्ष की शुरुआत से कम से कम 63 लोगों को मादक पदार्थ संबंधी अपराधों के लिए मौत की सजा दी गई. हालाँकि, शिया नेता निम्र अल निम्र को मौत की सज़ा दिए जाने पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि सऊदी अरब को इसकी क़ीमत चुकानी होगी. ईरान शिया बहुल देश है और उसे सुन्नी बहुल सऊदी अरब का प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. ईरानी के प्रभावशाली शिया धर्मगुरु अयातुल्ला अहमद ख़ातमी ने इसे ऐसा 'अपराध' क़रार दिया, जिससे सऊदी अरब के शाही परिवार का ख़ात्मा हो जाएगा. गौरतलब है कि सऊदी अरब की राजशाही की आलोचना करने के बाद साल 2012 में निम्र अल-निम्र को हिरासत में ले लिया गया था. मौत की सजा के विरोध में लेबनान की शिया परिषद ने भी निंदा करते हुए इसे बहुत बड़ी ग़लती कहा है. सऊदी अरब में भी अल्पसंख्यक शिया समुदाय ने निम्र की गिरफ़्तारी का विरोध किया था तो निम्र अल निम्र के भाई ने कहा है कि उनका परिवार मौत की सज़ा दिए जाने की ख़बर से सदमे में है. 

इससे पहले, सऊदी अरब के आंतरिक मंत्रालय द्वारा दी गयी जानकारी में बताया गया था कि चरमपंथी अपराधोें में दोषी पाए गए 47 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, उनमें निम्र भी शामिल थे. हालाँकि, निम्र के समर्थकों का दावा है कि निम्र अल निम्र ने कभी भी हिंसा की वकालत नहीं की. जाहिर है, यह पूरी क्रिया कहीं न कहीं इस्लाम के शिया-सुन्नी विवाद से गहरी जुड़ी हुई है तो राजशाही विरासत से लोकतंत्र की टकराहट की परतें भी इस समस्या का एक पक्ष हो सकता है. इस्लाम के इन दो समुदायों में खुनी टकराहट का लम्बा इतिहास रहा है. इतिहास के ही झरोखे से देखें तो, पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के तुरंत बाद ही इस बात पर विवाद से विभाजन पैदा हो गया कि मुसलमानों का नेतृत्व कौन करेगा? बाद में इसमें, पैग़ंबर मोहम्मद के दामाद अली और उनके बेटे हुसैन और हसन द्वारा ख़लीफ़ा होने के लिए संघर्ष के दौरान मौत ने दोनों समुदायों के बीच ऐतिहासिक खाई खींच दी थी. हुसैन की मौत युद्ध क्षेत्र में हुई, जबकि माना जाता है कि हसन को ज़हर दिया गया था. इन्हीं घटनाओं के कारण शियाओं में शहादत और मातम मनाने को इतना महत्व दिया जाता है और तब से ही यह समस्या अलग-अलग रूपों में सामने आती रही है. आंकड़ों में देखा जाए तो, मुस्लिम आबादी में बहुसंख्य सुन्नी हैं और इनकी संख्या 85 से 90 प्रतिशत के बीच है. वहीं, शियाओं की संख्या मुस्लिम आबादी की 10 प्रतिशत यानी 12 करोड़ से 17 करोड़ के बीच है. ईरान, इराक़, बहरीन, अज़रबैजान और कुछ आंकड़ों के अनुसार यमन में शियाओं का बहुमत है. इसके अलावा, अफ़ग़ानिस्तान, भारत, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, क़तर, सीरिया, तुर्की, सउदी अरब और यूनाइडेट अरब ऑफ़ अमीरात में भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है. इनमें कई समानताओं के बावजूद अगर अंतर है तो सिद्धांत, परम्परा, क़ानून, धर्मशास्त्र और धार्मिक संगठन का तो उनके नेताओं में भी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती रही है. लेबनान से सीरिया और इराक़ से पाकिस्तान के अतिरिक्त भारत में भी लखनऊ और दुसरे शहरों से दोनों समुदायों के बीच टकराव की खबरें आती ही रहती है. यहाँ तक कि दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल के ऊपर भी शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड आपस में भिड़ते रहे हैं. 

जहाँ तक आपसी हिंसा के लिए जिम्मेदारी की बात आती है तो उन देशों में, जहां सुन्नियों की सरकारें है, वहाँ शिया ग़रीब आबादी में गिने जाते हैं. अक्सर वे खुद को भेदभाव और दमन के शिकार मानते हैं. कुछ चरमपंथी सुन्नी सिद्धांतों ने शियाओं के ख़िलाफ़ घृणा को लगातार बढ़ावा दिया है. इसकी प्रतिक्रियास्वरूप वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति से उग्र शिया इस्लामी एजेंडे की शुरुआत हुई थी, जिसे सुन्नी सरकारों के लिए चुनौती के रूप में माना गया, ख़ासकर खाड़ी के देशों के लिए. वर्ष 1979 से होते हुए आज 21वीं सदी के निम्र अल निम्र की फांसी तक तनाव बढ़ते ही गए हैं. हालाँकि, सऊदी अरब में राजशाही के खिलाफ किसी भी स्वर को कुचल दिया जाना आधुनिक समाज के लिए एक कलंक ही कहा जा सकता है, किन्तु विभिन्न देशों में मानवाधिकार और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले अमेरिका का इस खाड़ी देश को जबरदस्त समर्थन अपने आप में ही एक दोहरापन है. जाहिर है, कई स्तरों पर समस्याओं को सुलझाने की आवश्यकता है, क्योंकि शिया समेत किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को निशाने पर लिया जाना आधुनिक जगत के मूल्यों के खिलाफ है तो सऊदी अरब जैसे राष्ट्रों में आज भी राजशाही होना अपने आप में मानवाधिकारों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है.

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