भूलते जा रहे आज़ादी की कीमत! Freedom and Freedom of expression, hindi article, mithilesh2020

प्रश्न पूछना लाजमी हो जाता है कि क्या हम आज़ादी की कीमत समझ रहे हैं? कहा जाता है कि आज़ादी मिलने से ज्यादा उसकी रखवाली करना और उसे बनाये रखना महत्वपूर्ण होता है, किन्तु इस जरूरी तथ्य को अनदेखा करते हुए आजकल 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के नाम पर राष्ट्रद्रोह तक का समर्थन करने वाले लोग खड़े हो गए हैं. इस सम्बन्ध में महेंद्र सिंह धोनी ने बेहद सटीक ट्वीट करते हुए कहा है कि भारतीय सेना सीमाओं पर चौकसी में खड़ी है और उसी के बूते हम 'फ्रीडम ऑफ़ स्पीच' पर बहस कर सकने लायक बने हैं! जाहिर है, यह पूरा मामला उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है, जिन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की वह सीमा नहीं पता है, जहाँ के बाद राष्ट्रद्रोह शुरू हो जाता है. इस सम्बन्ध में मलयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद की एक उक्ति को उद्धृत करना उचित होगा कि ‘भारत चीन की बराबरी कर सकता है लेकिन यहाँ जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र है.' आप समझ सकते हैं कि हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रधानमंत्री को गाली दी जा सकती है, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की जा सकती है, सेना को अपमानित किया जा सकता है, किन्तु इन सबसे उम्मीद भी की जाती है कि तमाम अपमान के बावजूद प्रधानमंत्री उनके विकास के लिए कार्य करें, सुप्रीम कोर्ट उन्हें न्याय प्रदान करे और सेना हर मुसीबत से उनकी रक्षा करे! दोहरापन के स्तर का आप अनुमान किसी व्यक्ति (@pray_ag) के एक ट्वीट से लगा सकते हैं, जिसमें उनका दर्द छलका है कि "जब कोई आतंकी हमला हो, बाढ़ आए, दंगा हो, जाट आरक्षण हो तो सेना को बुलाइए, लेकिन जब राष्ट्रीय राजधानी में कोई राष्ट्रविरोधी गतिविधि हो तो तथाकथित बुद्धिजीवियों को टीवी पर बहस के लिए बुला लीजिए. 

आखिर अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले यह समझने को क्यों नहीं तैयार हैं कि उन्हें जो भी अधिकार मिले हैं, उसके लिए लाखों लोगों ने अपने खून बहा दिए हैं और लगातार आज भी सीमा पर सैनिकों के खून बह रहे हैं. इस खून की बदौलत हमारे यहाँ लोकतंत्र है, आरक्षण है, अधिकार है, न्यायपालिका है, संसद है .... और हम इन्हीं की कद्र नहीं करेंगे तो फिर हमें गुलामी में जाने से भला क्या बचा सकता है. क्या अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को सेना की शहादत की हकीकत देखने समझने की फुर्सत है? इसी क्रम में, जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पम्पोर में एक सरकारी इमारत में छिपे उग्रवादियों के खिलाफ अभियान में सेना के एक अधिकारी कैप्टन पवन कुमार शहीद हो गए है. सेना के प्रवक्ता ने बताया कि कैप्टन पवन कुमार के पिता राजबीर सिंह ने कहा कि मेरा एक ही बच्चा था और मैंने उसे सेना को, देश को दे दिया. किसी भी पिता के लिए इससे ज्यादा गर्व की बात क्या हो सकती है. क्या वाकई यह शहादत इसीलिए है कि अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रविरोधी नारे लगाये जाएँ, आरक्षण के नाम पर हज़ारों करोड़ों की संपत्ति को राख कर दिया जाए, राजनीति के नाम पर देश की संसद को बंधक बना लिया जाए? तीन साल की सर्विस में शहीद पवन कुमार ने साबित किया कि वह बहुत बहादुर और निडर अधिकारी थे, लेकिन उनमें परिपक्वता उम्र से कहीं ज्यादा थी. गौरतलब है कि पम्पोर में एक सरकारी इमारत इंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट में घुसे आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान कैप्टन पवन कुमार शहीद हो गए हैं. क्या उनकी शहादत पर टेलीविजन की स्क्रीन काली की जाएँगी? क्या पत्रकार जगत के मठाधीश उनके ऊपर स्टोरी बनाएंगे या फिर इसे एक रूटीन मानकर भूल जायेंगे? भुवनेश्वर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के खिलाफ साजिश होने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी सरकार को बदनाम करने और अस्थिर करने के लिए साजिशें रची गई हैं! मोदी ने इसका कारण सरकार की तरफ से विदेशी धनों को लेकर एनजीओ से ब्यौरे मांगे जाना वजह बताई है. 

अगर इस तरह के आरोपों में जरा सी भी सच्चाई है तो यह बेहद खतरनाक है और विपक्ष समेत तमाम राजनीतिक समुदाय को इस समस्या से निपटने में प्रधानमंत्री को सहयोग करना चाहिए. कई मामले राजनीतिक और कूटनीतिक होते हैं, जिनसे निपटने में सरकार को सहयोग की आवश्यकता होती ही है. प्रधानमंत्री ने भुवनेश्वर की रैली में यह भी कहा कि देश की आजादी के लिए जिन महान विभूतियों ने अपना जीवन अर्पित कर दिया हम सबको मिलकर यह तय करना होगा कि हम उन्हें आजादी के 75वें साल में कैसा भारत देना चाहते हैं. सवाल यह है कि 'हम सब' मिलकर सामान्य अनुशासन तो कायम रख नहीं पा रहे हैं, फिर आगे की राह किस प्रकार तय होगी? किसी ने ठीक ही कहा है कि "जाको पैर न फटी बेवाई, वो क्या जाने पीर पराई"! अब लोगों के पेट भर रहे हैं, इसलिए उनको बकवास ज्यादा सूझ रही है. अब लोगों को सम्पन्नता रास नहीं आ रही, विकास रास नहीं आ रहा, इसलिए वह कभी देशद्रोह, कभी तोड़फोड़, कभी समाज द्रोह जैसे कार्यों में लिप्त हो रहे हैं. मुश्किल यह है कि इनको सहलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी बड़े ज़ोर शोर से मैदान में आते हैं, लेकिन जब मामला बिगड़ जाता है .....  ... तो सेना ही आती है! जाहिर है कि वक्त रहते आज़ादी की कीमत समझनी ही पड़ेगी, अन्यथा फिर न हमें सेना बचा पायेगी, न प्रधानमंत्री और न ही न्यायपालिका! तब हम शिकायत भी नहीं कर सकेंगे, क्योंकि इन संस्थानों को कायम रखने के लिए न्यूनतम अनुशासन की अवहेलना करना ही हमारी तथाकथित 'अभिव्यक्ति' का अधिकार बन गया है.

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