सवाल, बवाल या बेमिसाल केजरीवाल! One year of kejriwal government in delhi, hindi article by mithilesh

अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक उभार में तमाम अन्य कारण हो सकते हैं, किन्तु उनके जैसी उर्वरा राजनीतिक ज़मीन सैकड़ों सालों में किसी-किसी को मिलती होगी! नेता जो सर्वदा एक-दुसरे की जड़ काटते रहते हैं, उन तक ने एक होकर केजरीवाल को बढ़ाने का कार्य किया है! आखिर कोई नेता इतना सौभाग्यशाली हो सकता है क्या कि दूसरा नेता या राजनीतिक पार्टी अपने अस्तित्व पर उसे खड़ा करने का रिस्क ले सके! दिल्ली में कांग्रेस ने जान बूझकर केजरीवाल को अपना वोट-ट्रांसफर होने दिया तो दुसरे राज्यों में भी भाजपाई मोदी लहर को रोकने के लिए तमाम विपक्षी नेता केजरीवाल के पीछे खड़े दिखे! खैर, इस सबका परिणाम भी निकला और केजरीवाल बेहद मजबूती से दिल्ली की गद्दी पर काबिज भी हो गए और अब उनको काबिज हुए एक साल बीत गए हैं तो जाहिर तौर पर सवाल उठते हैं कि यह राजनीतिक गाड़ी किधर जा रही है? जहाँ तक दिल्ली के मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत सवाल है तो अरविन्द केजरीवाल को आप पसंद कर सकते हैं, नापसंद भी कर सकते हैं,  लेकिन उन्हें 'इग्नोर' कतई नहीं कर सकते हैं. दिल्ली में दूसरी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने के एक साल पूरा होने के अवसर पर उन्होंने अपने विशेष अंदाज़ में दिल्लीवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि 'पिछले साल इसी दिन दिल्लीवालों को 'आप' से प्यार हुआ था!' जाहिर है, अब वह एक मंझे हुए नेता की तरह अवसरों का लाभ उठाना समझ गए हैं और 'वेलेंटाइन डे' के मौके को उन्होंने बखूबी भुनाया. इस अवसर पर अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए केजरीवाल ने ऐलान किया कि दिल्ली में ई, एफ, जी और एच कैटेग‍िरी की कॉलोनियों में 30 नवंबर 2015 तक के पानी के बकाया मिल माफ कर दिए जाएंगे. जाहिर तौर पर 'फ्री' शब्द से उन्हें बेहद लगाव रहा है तो भला इस बार वह ऐसा क्यों नहीं करते! 

हालाँकि, एक साल पूरा होने के अवसर पर भाजपा और कांग्रेस दोनों खम ठोककर मैदान में उतर गयी हैं और दिल्ली में गली-गली पोस्टर लग चुके हैं, जिनमें 'एक साल, बवाल ही बवाल', 'हर रोज केंद्र से बवाल, एक साल केजरीवाल' जैसे नारे मोटे अक्षरों में लिखे हुए हैं! खैर, विरोधियों का काम ही है विरोध करना, लेकिन केजरीवाल के एक साल पूरा होने के अवसर पर दिल्ली की जनता क्या सोचती है, यह जानना दिलचस्प आंकड़ा प्रस्तुत करता है! विश्लेषक एक तरफ अरविन्द केजरीवाल को मंझे हुए नेता का खिताब देने में अब संकोच नहीं कर रहे हैं, वहीँ उन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने के मुद्दे पर केजरीवाल सरकार की तारीफ़ भी की हैं. हालाँकि, कुछेक विश्लेषक बिना लॉग-लपेट के यह मान रहे हैं कि केंद्र सरकार से टकराव की वजह से दिल्ली सरकार का ध्यान बंट गया और केजरीवाल काफ़ी कुछ नहीं कर सके. इसके साथ-साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी शुरू में उनमें असमंजस दिखा था, जिससे कहीं न कहीं इस नयी पार्टी की साख को कड़ी चोट पहुंची है. एक साल के दौरान ही कम से कम दो ऐसे विवाद रहे. जिनसे इस पार्टी की छवि को नुक़सान पहुंचा है. दिल्ली सरकार के दो मंत्रियों पर कार्रवाई की गई, यह एक अच्छी बात थी. लेकिन पार्टी को शुरू में ही सोचना चाहिए था कि अगर मंत्री पर कोई लांछन लगा है तो यह गंभीर बात है. उसे शुरू में ही सोचना चाहिए था कि इस मामले में कोई जांच हो रही है तो उसमें सहयोग करें. इसके अतिरिक्त, कांग्रेस पार्टी ने एक साल पूरा होने के कुछ ही दिन पहले एक स्टिंग जारी किया है, जिस पर पार्टी की ओर से कुछ भी साफ़ नहीं किया गया, जिससे भ्रष्टाचार के विरोध में बनी इस पार्टी पर प्रश्नचिन्ह उठ रहे हैं. हालाँकि, इस सरकार की जो सबसे बड़ी पहल रही है, वह पर्यावरण को लेकर उस सरोकार की है, जो इन्होंने जताया है! इन्होंने यातायात को लेकर जो प्रयोग किए हैं, वे अच्छे हैं या बुरे, सफल हैं या नाकाम, वह अलग बात है, पर उसे लेकर एक जागरूकता नज़र आती है और शायद यही वजह है कि एक बार फिर ओड-इवन का प्रयोग एक बार फिर शुरू किया जा रहा है. 

जाहिर तौर पर, दिल्ली जैसा संघ-शाषित राज्य, जहाँ राज्य सरकार पर काफी बंदिशें हों, पुलिस पास में न हो, वहां आपको सामाजिक और लोगों के हितों से जुड़ीं योजनाओं पर ही कार्य करना पड़ेगा, अन्यथा आप झूठ-मूट का इधर उधर भिड़ते रहेंगे, जो अंततः समय का नुक्सान ही करेगा! एक और जो बड़ी कमी इस नयी पार्टी में गिनाई जा रही है, वह निश्चित रूप से इसके सर्वोच्च नेता अरविन्द केजरीवाल का तानाशाही रवैया है. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बात इस पार्टी की सबसे पड़ी पूंजी हुआ करती थी. वे लोग अब इस पार्टी में नहीं हैं. उन्हें हटा कर पार्टी में तानाशाही क़ायम कर दी गई है. निश्चित रूप से केजरीवाल के स्वभाव में तानाशाही शुरू से ही रही है, पर बाद में इस तानाशाही प्रवृत्ति में बढ़ोतरी ही हुई है. आम आदमी पार्टी में मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल के अलाबा कोई नेता है भी इसका भरोसा नहीं होता है. ऐसे समय जब कांग्रेस पार्टी अपनी भ्रष्टाचारी और वंशवादी नीतियों के कारण हाशिये पर है, अरविन्द केजरीवाल को दक्षिणपंथी भाजपा के विकल्प के रूप में देखा जा सकता था, किन्तु उनकी अधिनायकवादी छवि ने उनसे यह मौका छिन लिया लगता है. इसके अतिरिक्त, इनकी सबसे बड़ी नाकामी तो यह है कि दिल्लीवासी यह पूछ रहे हैं कि जनलोकपाल बिल कहां गया? जाहिर तौर पर यह पहला साल केजरीवाल के लिए मिला-जुला रहा है तो अब दुसरे साल के लिए उन्हें अपने और अपनी सरकार के साथ पार्टी के प्रति भी लोगों में रूझान को बढ़ाना होगा, अन्यथा धीरे-धीरे उनसे लोगों की उम्मीदें ख़त्म हो जाएँगी, जो केजरीवाल कभी नहीं चाहेंगे! इस सन्दर्भ में दिल्ली वालों में एक लोकप्रिय न्यूज चैनल ने सर्वे भी किया, जिससे काफी कुछ अंदाजा लग जाता है. इस सर्वे की अन्य बातों के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आये है, वह दिल्ली सरकार के अधीन पुलिस को लाने को लेकर है. केजरीवाल सरकार हमेशा से यह मांग करती रही दिल्ली पुलिस उसके अधीन होनी चाहिए. लेकिन सर्वे में इसको लेकर जनता की राय अलग नजर आई. 43 फीसदी लोगों ने जहां यह कहा कि दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन होना चाहिए, वहीं 48 फीसदी ने कहा कि जो जैसा है वैसा ही रहना चाहिए. सर्वे में शामिल लोगों का यह भी मानना था कि अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की राजनीति ही करनी चाहिए. महज 17 फीसदी लोगों का मत है कि केजरीवाल को राष्ट्रीय राजनीति में किस्मत आजमानी चाहिए. जाहिर तौर पर दिल्ली की संवेदनशीलता को लोग महसूस करते हैं और केजरीवाल सरकार से यह अपेक्षा भी करते हैं कि वह केंद्र सरकार से टकराव कम और दिल्ली के विकास पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करे. उम्मीद है कि अब राजनीतिक अनुभव में समझ विकसित कर चुके अरविन्द केजरीवाल इस ओर ध्यान देंगे, तभी आने वाले सालों में वह बेमिसाल नज़र आएंगे, हालाँकि अभी तो उनके साथ 'बवाल और सवाल' का टैग ही ज्यादा चिपका नज़र आ रहा है.
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