अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता - International women day, new hindi article, lekhak mithilesh

मार्च के महीने में एक ओर जहाँ सर्दी की बिदाई हो रही होती है वहीं दूसरी ओर होली के आगमन से भारतीय जनमानस, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में अपार उत्साह भरा होता है. एक और खास बात के लिए मार्च का महीना विशेष रूप से याद किया जाता है और यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को लेकर है. पूरे विश्व में महिला अधिकारों को लेकर बातें हुई हैं, लड़ाइयां लड़ी गयी हैं, आंदोलन हुए हैं, किन्तु आज अगर हमें महिला दिवस मनाने की आवश्यकता पड़ रही है तो यह निश्चित रूप से सोचनीय विषय है, वह भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर! आखिर, कहीं तो कुछ ऐसी कमी रह गयी है कि महिलाओं के अधिकार, उनकी सुरक्षा, उनके विकास और इन सबसे बढ़कर उनकी आज़ादी को लेकर तय लक्ष्य से दुनिया पीछे रह गयी है. अभी हाल ही में अकेडमी (ऑस्कर) अवार्ड्स की घोषणा हुई है और इसमें पाकिस्तान से एक महिला की बड़ी चर्चा हो रही है. शरमीन ओबैद चिनॉय नामक यह महिला दो ऑस्कर जीतने वाली पाकिस्तान की अकेली शख़्स बन गई हैं. इस 37 वर्षीय महिला का नाम साल की सबसे अच्छी शॉर्ट सब्जेक्ट डॉक्यूमेंट्री के विजेता के रूप में पुकारा गया, तो वह पाकिस्तान सहित विश्व भर में सुर्खियों में छा गईं. उनकी फ़िल्म, अ गर्ल इन द रिवर- द प्राइस ऑफ़ फॉरगिवनेस, में पाकिस्तान में ऑनर किलिंग का मुद्दा उठाया गया है, जिसमें 18 साल की एक लड़की सबा की कहानी है, जिसे उसके रिश्तेदारों ने अपनी झूठी शान के लिए गोली मारकर नदी में फेंक दिया था, मगर वह चमत्कारिक ढंग से बच गई और अपनी कहानी बता पाई. 

पाकिस्तान जैसे देश में ऑनर किलिंग के मुद्दे पर ज़्यादा बात नहीं होती, किन्तु सोचने का विषय है कि भारत जैसा देश भी क्या इन मुद्दों पर सिर उठाकर बात कर सकता है? न .. न ... न ... आप भारत-पाकिस्तान की बुराइयों का तुलनात्मक अध्ययन यहाँ न करें और इस बात का हवाला न दें कि पाकिस्तान से भारत इन मामलों में बेहतर है, बल्कि आप अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लक्ष्यों को लेकर देखें और सोचें कि हममें कहाँ कमी रह गयी है. अगर फिल्मों की ही बात करें तो हॉनर-किलिंग के मुद्दे पर अभी अनुष्का शर्मा की एनएच-10 आयी थी, जिसने खासी चर्चा भी बटोरी तो कंगना राणावत की तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में 'दत्तो' को एक सीन में जलाने की कोशिश उसके परिजन करते दिखे हैं. बावजूद इसके कि वह राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी है, जिसने समाज और प्रदेश का नाम रोशन किया है. अगर आप इस महिला दिवस पर हॉनर किलिंग जैसे मुद्दों की ही शिनाख्त कर लें तो तस्वीर बेहद भयावह दिखेगी. कई प्रतिभाएं तो मार दी जाती हैं, तो उन महिलाओं का सोचिये, जिन्हें इस नाम से डरा कर उनकी प्रतिभा को ही जला दिया जाता है, दबा दिया जाता है. मैं बार-बार कहता हूँ कि अगर भारत या पाकिस्तान जैसे देशों को पश्चिम के विकास से जरा भी सीख लेनी हो तो वह महिला अधिकारों के मुद्दों पर ही लें. आखिर, वहां महिला-पुरुष दोनों कार्य करते हैं, दोनों उत्पादन करते हैं, तमाम समस्याओं को दोनों हल करते हैं, किन्तु हम महिलाओं को असेट बनाने की बजाय, अपनी मानसिकता से दबा देते हैं. इस बार का महिला दिवस मनाने से पहले हमें इस बाबत अवश्य ही सोचना चाहिए कि क्या हम महिलाओं की प्रतिभाओं को पनपने का अवसर दे रहे हैं अथवा उन्हें हॉनर किलिंग जैसे कुप्रवृत्तियों से आज 21 वीं सदी में भी डरा-धमका रहे हैं. 

अभी हरियाणा में जाट आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन के दौरान मुरथल में गैंग-रेप की बात सामने आयी, ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों ने इसकी पुष्टि भी की. यहाँ तक कि एक ट्रक-ड्राइवर ने टीवी कैमरों के सामने खुलकर कहा कि हाँ, गैंग रेप हुआ था, छेड़खानी हुई थी, किन्तु बिडम्बना देखिये कि न तो गवाही के लिए कोई महिला उपस्थित हुई और न ही एफआईआर हुई. हालाँकि, एक प्राथमिकी दर्ज जरूर हुई है, किन्तु सोचने वाली बात है कि आज भी महिलाएं इस तरह के हालात, सम्मान-असम्मान जैसे विषयों से क्यों इस हद तक घिरी हुई हैं कि अपने साथ हुए दुर्व्यवहार पर भी बोलने से हिचकती हैं? उनके घरवाले उन्हें चुप करा देते हैं, ताकि बात बाहर न फैले ... अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर अगर हम कानूनी रूप से, सामाजिक रूप से इतना भी समझ पाये और इसके निदान के लिए प्रयास करने की सोचना शुरू कर सके तो इससे बढ़कर इसकी कुछ और सार्थकता न होगी. इसके आगे तो लड़ाई बहुत लम्बी है, किन्तु महिलाएं समाज से, कानून से, परिवार से डर रही हैं, अपनी बात कह नहीं पा रही हैं, अन्याय का विरोध नहीं कर पा रही हैं तो हमारे समाज के मुंह पर यह करार तमाचा है और न केवल करारा तमाचा है, बल्कि विश्वगुरु, सुपरपावर जैसे तमाम शब्दों की खुलेआम धज्जियां भी उड़ाता है! सोचिये, सोचिये, सोचिये .. !!

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