मिलावट का मायाजाल! Impurity of food products in India, Hindi Article, Mithilesh

आज-कल यह एक कहावत सी बन गयी है कि भाई साहब, अब तो ज़हर भी शुद्ध नहीं रहा! यह कहावत अब हकीकत के पास बढ़ती जा रही है और आश्चर्य तो यह है कि हम कुछ भी तो नहीं कर पा रहे हैं, न तो प्रशासन के स्तर पर और न ही व्यक्तिगत स्तर पर. इसके लिए केवल प्रशासन और सरकार ही दोषी हो, ऐसा कतई नहीं है, बल्कि लोगबाग़ भी समझने को तत्पर नहीं दिखते हैं. अभी हाल ही में 'मैग्गी नूडल्स' को लेकर खूब बवाल काटा गया, किन्तु आप किसी भी शॉपिंग प्लेस पर जाकर देखिये और आप यह देखकर दंग रह जायेंगे कि अब यह पहले से कहीं ज्यादा मौजूद दिख रही है. न केवल बड़े शॉपिंग मॉल्स में, बल्कि गली-मोहल्ले की दुकानों से भी मैग्गी पहले ही की भाँती बिक रही है. अब जाने क्या परिवर्तन आ गया कुछ महीने में कि कई प्रदेशों में प्रतिबन्ध झेलने के बाद भी '2 मिनट नूडल' अपने पुराने फॉर्म में लौट आया. यह मिलावट की दुनिया की ऐसी कहानी है, जो कोल्ड ड्रिंक्स से लेकर तमाम खाद्य पदार्थों में गहरे तक घुला हुआ है. वैसे, हमारे देश में मिलावट कोई नयी बात नहीं है. बहुत पहले से बनिए और साहुकार दाल-चावल जैसे खाने की चीजों में कंकड़-पत्थर तक मिलाया करते थे, जिससे उन वस्तुओं का वजन बढ़ जाता था और ऐसे मुनाफा कमाया जाता था. लेकिन तब की मिलावट और अब की मिलावट में काफी अंतर आ गया है, क्योंकि पहले की महिलाएं कंकड़-पत्थर इत्यादि को निकालकर भोजन पका लेती थीं, किन्तु अब तो मुनाफे के साथ लोगों की सेहत के साथ बड़े स्तर पर खिलवाड़ किया जाने लगा है. इसी क्रम में, अगर हम बात करते हैं दूध की जो कि हर घर में अनिवार्य है, क्योंकि छोटे और नौनिहालों की पूरी खुराक होता है दूध. इसमें चिंताजनक तथ्य यह है कि दूध भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है. अगर सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो  पिछले चार सालों के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि दूध साल दर साल दूषित हो रहा है. 

मई 2015 में दूध में मिलावट पर राज्यसभा में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 में लिए गए 8247 सैंपलों में मिलावट मिली, जबकि पूरे देश में 2012-13 में यह आंकड़ा बढ़कर 10380 सैंपल तक पहुंच गया. इसके अगले साल यानी 2013-14 में दूध के 13571 सैंपल टेस्ट में फेल हो गए. जाहिर है, साल दर साल यह बढ़ता हुआ आंकड़ा, हमारे देश के घटते स्वास्थ्य का ही संकेत है. इसी तरह, 2014 में जनवरी से सितंबर के बीच ही 4861 सैंपल मिलावटी पाए गए थे. इससे स्पष्ट है कि साल दर मिलावट का आंकड़ा बढ़ रहा है, जिसमें दूध में यूरिया से लेकर डिटरजेंट तक की मिलावट धड़ल्ले से हो रही है. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ लोकल लेवल पर ही है, बल्कि मदर डेयरी जैसे बड़े ब्रांड में भी मिलावट का खुलासा हो चुका है. दूध से हम आगे बढ़ते हैं तो, सरसों के तेल और दूसरे खाद्य तेलों में अर्जीमोन मेक्सिकाना का बीज मिलाया जाता है, जिससे लोग 'ड्रॉप्सी' के शिकार हो जाते हैं. अर्जीमोन की मिलावट से सिर में दर्द, डायरिया, त्वचा पर धब्बे होने, बेहोशी, ग्लूकोमा और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत होती है. अब क्या लोग खाद्य तेलों को खाना बंद कर दें, या फिर अपना सर फोड़ लें! अगर एक वाकया हो तब तो कोई सुनाए, किन्तु यहाँ तो वाकयों की श्रृंखला सी है! इस क्रम में, मशहूर कंपनी कैडबरी की डेयरी मिल्क चॉकलेट को लेकर 2003 में उस समय विवाद छिड़ा, जब महाराष्ट्र में उसमें कीड़े पाए जाने का मामला सामने आया, तो कई ब्रांड्स के हल्दी और लाल मिर्च में रंगे हुए बुरादे मिला दिए जाते हैं. मिलावट की बातें कहने पर कई बार खाना-पीना छोड़ने को जी चाहता है. आचार में फिटकिरी, फलों और सब्जियों में जहरीले कीटनाशकों तथा खतरनाक केमिकल का प्रयोग किया जा रहा है. इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारे देश में तमाम त्योहारों के आते ही मिलावट खोरी का कारोबार जैसे चमक सा जाता है. मिलावटी मिठाइयां, सिंथेटिक पनीर, केमिकल वाले फल खुलेआम दुकानों पर सज जाते हैं और इन सारी की खपत भी जबरदस्त ढंग से होती है. हमारे देश में, खाद्य सुरक्षा कानून जरूर बने हैं, किन्तु यह कितने प्रभावी हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है. 

हालाँकि, समय के साथ खाद्य सुरक्षा कानून में 2006 में बदलाव किया गया तो फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड अथॉरिटी आफ इंडिया (fssai) का गठन भी किया गया, लेकिन मिलावटखोरों की नकेल कसने में अभी भी यह कानून पूरी तरह से सक्षम नहीं है, इस बात में दो राय नहीं! सवाल यह भी है कि नियम तो बन गए हैं, लेकिन इस नियम को लागू करने में सख्ती की पुरज़ोर आवश्यकता है. अगर कानून की दृष्टि से बात करें तो, खाद्य पदार्थों की जांच का ज़िम्मा मुख्यतौर पर राज्यों के हवाले है और राज्यों में जांच लेबोरेटरी की हालत दैनीय अवस्था में है तो व्यवस्था भी इतनी लचर है कि किसी जांच-अधिकारी को खरीदना 'कॉर्पोरेट्स' के लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं होता है. लेबोरेटरीज़ में मौजूद होने वाली सुविधाओं सहित स्टाफ की कमी और सैंपलिंग का काम तय नियमों के मुताबिक नहीं होना गम्भीर समस्या में तब्दील हो चुका है, किन्तु इसकी फ़िक्र करे तो कौन करे? अब बात करें मिलावटखोरों को सज़ा दिलाने की तो इसके आंकड़े ही ऐसे हैं, जो पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी हैं. इन मामलों में, पहले ही सैंपलिंग और केस दर्ज करने की दर हुत कम है, तो इसमें भी जो केस दर्ज होते हैं, उन मिलावटखोरों को सज़ा कितनी मिलती है, यह कोई बताने वाली बात नहीं है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 में सिर्फ 764 मिलावटखोरों को सज़ा मिली, जबकि देशभर में मिलावट खोरों की प्रजाति किस हद तक विकसित हो रही है, यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है. इन सभी चर्चाओं के बीच बड़ा प्रश्न उठता है कि मिलावट पर लगाम कैसे लगेगी और कौन लगाएगा? जाहिर है कि सिर्फ सरकार पर जिम्मेदारी डाल देने से बात नहीं बनने वाली है. अगर मिलावट को रोकना है तो सबसे पहले पब्लिक को ही जागरूक होना होगा. इस क्रम में हमारे पास एक मजबूत कानून भी आ गया है, जिसे पिछले ही साल लोकसभा में 'कंज्यूमर प्रोटेक्शन बिल' के नाम से पेश किया गया था, जिसे बाद में स्टैंडिंग कमिटी को भेज दिया गया था. कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कानून बनाकर इसे अनिवार्य कर दिया जाए कि उपभोक्ताओं की ओर से खाद्य पदार्थों में मिलावट की शिकायत के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया जाए!

किसी कारणवश ऐसा नहीं होने पर अधिकतम 21 दिनों की समय-सीमा तय की जाए. जाहिर है अब जागरूक होने की बारी हमारी ही है  और अगर हम जागरूक होंगे तो जरूर ही सकारात्मक असर पड़ेगा, तो घटिया सामानों की बिक्री पर भी रोक लगेगी ही! एक और बढ़िया प्रावधान में, उपभोक्ता मामले, खाद्य और जनवितरण को लेकर स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में खाद्य पदार्थों का ब्रांड एंबेस्डर बनाए गए सेलिब्रिटीज पर भी शिकंजा कसा गया है. अब प्रियंका चोपड़ा जैसी किसी भी बड़ी हस्ती को यह कहने से पहले सोचना होगा कि 'हम तो बेचेंगे ही, जिन्हें नहीं खरीदना वो न खरीदें!' जाहिर तौर पर अमिताभ बच्चन जैसे मेगा स्टार को भी उपभोक्ताओं को प्रभावित करने से पहले सोचना होगा, जिन्हें हम टीवी पर दर्जन भर विज्ञापन करते देखते हैं और उन सामानों की गारंटी लेते हुए भी, जिनके बारे में वह खुद भी आश्वस्त नहीं होते होंगे! वैसे, पैसे के आगे यह तमाम सेलिब्रिटीज नैतिक मूल्यों को ठोकर ही मारते हैं, किन्तु फिर भी यह प्रावधान उनकी कुछ तो जिम्मेदारी अवश्य तय कर सकेगा! किसी भी प्रोडक्ट का बिज्ञापन करने वाले सितारों की जिम्मेदारी तय करना वैसे भी जरुरी था, क्योंकि इनके चाहने वाले 'फैंस' कई बार बिना सोचे समझे इनकी बातों में आकर सामान खरीद लेते हैं, और उनमें कइयों की क्वालिटी खराब निकल जाती है. हालाँकि, इन तमाम उपायों के बावजूद 'जागो ग्राहक जागो' का स्लोगन सर्वाधिक उपयोगी साबित हो सकता है और यह बात जनता को समझनी ही होगी!

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