खेल अब मनोरंजन बन गया है, जबकि... Olympic games and players, goodwill ambassador, hindi article, salman khan

 
आप किसी भी खिलाड़ी से इस लेख के 'टाइटल' का ज़िक्र करके देख लीजिए और वह घूंसे मारकर आपकी नाक तोड़ देगा. इसकी वजह भी कोई छुपी हुई नहीं है, बल्कि खिलाड़ी खेल को मनोरंजन की तरह नहीं, बल्कि युद्ध की तरह लेते हैं. देखा जाय तो, खिलाडियों के लिए खेल किसी युद्ध की तरह ही होता है, जहाँ जान लगा दी जाती है तो कई बार जान जाती भी है, किन्तु लोग तो इसे मनोरंजन का एक साधन ही मानते हैं. ऐसे में, आज के समय में जिस खेल में जितना तड़का है, जितना मनोरंजन है, जितने सितारे हैं वह खेल उतना ही लोकप्रिय है, इस बात में दो राय नहीं! अगर आप क्रिकेट का ही उदाहरण ले लें तो आप देख सकते हैं कि तमाम फ़िल्मी सितारों से लेकर, चीयर गर्ल्स और कॉर्पोरेट दिग्गज वहां मौजूद रहते हैं और उनके प्रभाव से लोगबाग भी क्रिकेट देखने जाते हैं. यह ट्रेंड दुसरे खेलों में कम दिखता है, खासकर भारत के सन्दर्भ में और नतीजा उनकी न्यून लोकप्रियता के रूप में सामने दिखता है. ऐसे में अगर भारतीय ओलम्पिक संघ ने सलमान खान जैसे सितारों को 'रियो ओलम्पिक' के लिए ब्रांड अम्बेस्डर नियुक्त कर ही दिया तो इसको लोकप्रियता बढ़ाने की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए, हालाँकि यह बात उतनी सीधी नहीं है, जितनी दिख रही है. प्रभावशाली हस्तियां किस तरह लाइमलाइट की चोरी करती हैं और किस तरह दूसरों को उभरने नहीं देती हैं, इस बात के कई उदाहरण हैं और जो खिलाड़ी अपना जीवन, ओलम्पिक जैसे स्थानों पर जाने के लिए दांव पर लगा देते हैं, वह आखिर किस प्रकार अपने स्थान को दुसरे के हक़ में जाने दे सकते हैं. जहाँ तक खेल प्रमोट करने की ही बात है तो इसे अन्य अवसरों पर भी किया जा सकता था, भारत में किसी प्रतियोगिता में सहभागी बनकर इसे प्रमोट किया जा सकता था, किन्तु ऐसा नहीं किया गया. ऐसे में, सवाल तो उठेंगे ही और उठने भी चाहिए. अगर वास्तव में किसी बड़े सितारे का ब्रांड अम्बैसडर बनना आवश्यक ही था, तो भारतीय ओलम्पिक संघ को 'संयुक्त ब्रांड अम्बैसडर' बनाने के विकल्प का चुनाव करना चाहिए था. इसमें संयुक्त रूप से एक दो खिलाड़ी भी अगर शामिल कर लिए जाते तो शायद यह विवाद ही न होता, किन्तु कौन समझाए खेल अधिकारियों को, जिन्हें खिलाडियों के अधिकारों की समझ ही नहीं है. 

भारत में अगर हम खेलों की बात करें तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट को ही लोग ज्यादा जानते हैं और पसंद भी करते है. ग्राउंड पर अगर बात की जाए तो, भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को भी बहुत कम ही लोग जानते है. यदि इस खेल में किसी को लोग पहचानते हैं तो केवल कैप्टन या एकाध खिलाडियों को ही, वह भी बेहद सीमित स्तर पर. सिर्फ हॉकी ही क्यों, भारत में क्रिकेट को छोड़कर अन्य दुसरे खेलों के साथ ऐसा ही बर्ताव होता है. यदि किसी को किसी प्रतियोगिता में गोल्ड या दूसरा मैडल मिला तो मीडिया में न्यूज़ जरूर बन गयी और उसके बाद फिर सब 'फुस्स'! हाल ही में ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने वाली दीपा जैसी जिम्नास्ट को ओलम्पिक क्वालीफाई करने से पहले शायद ही कोई जानता होगा. ऐसी परिस्थितियों में जब इन खिलाडियों का दिन आता है, अगर उस समय भी उन्हें न पूछा जाय तो 'योद्धा खिलाडियों' का खून तो उबाल मारेगा ही. इसी क्रम में, यह बात भी दावे के साथ कही जा सकती है कि एक दो लोगों को छोड़ दें, तो पीटी उषा, मिल्खा सिंह, अभिनव बिंद्रा जैसे अनेक खिलाड़ियों के बारे में लोग जनरल नॉलेज की किताबो में ही पढ़ते हैं. वही क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, धोनी इत्यादि की बात करें तो उन्हें हिंदुस्तान का एक छोटा बच्चा भी जानता है. जाहिर हैं, अब सवाल और जवाब दोनों ही मनोरंजन का हैं. ऐसे में, योद्धा खिलाडियों को भी अपने नजरिये में थोड़ी तब्दीली लानी चाहिए, क्योंकि कई बार 'कामयाबी और काबिलियत' के बीच फासले थोड़े बढ़ जाते हैं. साफ़ है कि बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान का रियो ओलिंपिक 2016 का गुडविल एम्बैसडर के चुने पर हंगामा होना ही हैं, किन्तु यह हंगामा सही-गलत से ज्यादा हालात के ऊपर निर्भर है. जब इस बात की घोषणा हुई तब वहां मौजूद कई खिलाड़ियों ने इस बात का समर्थन भी किया है. वहां 2012 के ओलिंपिक में ब्रॉन्ज़ मैडल जीतने वालीं एमसी मैरीकॉम, पुरुष हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह, महिला हॉकी टीम की  कप्तान, दीपिका कुमारी, अपूर्वी चंदेला और मोनिका बत्रा आदि उपस्थित थे. हालाँकि, खेल जगत में यह पहली बार ही हुआ है कि इसके लिए कुछ खिलाड़ियों ने खुलकर आलोचना भी की है. कई तो यह आरोप लगाने से नहीं चूके है कि सलमान ख़ान अपनी आने वाली फिल्म 'सुलतान' के प्रोमोशन के लिए भारतीय दल के गुडविल एंबैसडर बने हैं. हालाँकि, ऐसी बातें पूरी तरह सही नहीं हैं, किन्तु इन सभी परिस्थितियों के लिए सलमान खान की बजाय, क्यों नहीं भारतीय ओलम्पिक संघ को जिम्मेदार ठहराया जाय! 

इस मामले पर गुडविल एंबैसडर बनने के बाद सलमान ख़ान ने सफाई देते हुए कहा कि "मेरा रोल एक धक्का गाड़ी की तरह एक ज़ोर लगाने का है. उम्मीद करता हूं कि खिलाड़ियों को इससे फ़ायदा होगा. ये नहीं जानता कि इससे कामयाबी मिलेगी या नहीं, लेकिन मेरी कोशिश ज़रूर रहेगी कि मैं उनमें जोश भर सकूं". जाहिर तौर पर सलमान खान, अपनी ओर से सफाई पर सफाई दे रहे हैं, लेकिन विवाद भी कुछ कम नहीं हो रहा है. इसी क्रम में, भारतीय हॉकी कप्तान सरदार सिंह का कहना है की "सलमान के फ़ैन्स की बहुत लम्बी लाइन हैं. उनके इन खेलों के जुड़ने से सलमान के फ़ैन्स भारतीय खेलों को भी फ़ॉलो करेंगे और जिससे भारतीय खेलों को भी ज़रूर फ़ायदा होगा". इसी क्रम में, 2012 में लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता रह चुके पहलवान योगेश्वर दत्त को सलमान का 'गुडविल एंबेसडर' बनना पसंद नहीं आया जिसके लिए उन्होंने आलोचना भी की और कहा की "पीटी उषा, मिल्खा सिंह जैसे बड़े स्पोर्ट्स स्टार हैं भारत में, जिन्होंने कठिन समय में देश के लिए मेहनत की थी! पहलवान योगेश्वर दत्त  के बाद फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने भी इस पर नाराजगी जताई. इसी कड़ी में, गौतम गंभीर का गुस्सा भी दिखा और उन्होंने कहा कि "देश में खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है, अगर अभिनव बिंद्रा को गुडविल एबेंसडर बनाया जाता तो मुझे ज्यादा अच्छा लगता". इन तमाम विरोधों के बाद आलोचनाओं से खीझ कर सलमान खान के पिता सलीम खान ने सलमान के भारतीय ओलिंपिक दल के सद्भावना दूत बनने को सही ठहराते हुए कहा कि "सलमान खान ने भले ही प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लिया हो, लेकिन वह 'ए' श्रेणी का तैराक, साइकिलिस्ट और भारोत्तोलक है". सलीम खान ने मिल्खा सिंह का नाम लेते हुए कहा कि "मिल्खा जी यह बॉलीवुड नहीं है, यह भारतीय फिल्म इंडस्ट्री है और वह भी दुनिया में सबसे बड़ी है. यह वही इंडस्ट्री है जिसने आपको गुमनामी में जाने से बचाया." जाहिर तौर पर सलीम खान भी भावनाओं में बह गए और उन्हें थोड़ा संयम रखते हुए मिल्खा सिंह जैसे योद्धाओं के मनोभावों को पकड़ना चाहिए था. मिल्खा सिंह को सलीम खान की आलोचना नागवार ही गुजरी और उन्होंने तत्काल कहा कि 'बॉलीवुड ने उनपर फिल्म बनाकर कोई अहसान नहीं किया, बल्कि उन्होंने ही अपनी कहानी मात्र 1 रूपये में दी थी'! जाहिर है इस विवाद का कोई अंत नहीं है और इस विवाद को उत्पन्न कराकर भारतीय ओलम्पिक संघ के अधिकारी अवश्य ही मुस्करा रहे होंगे कि चलो, किसी बहाने ही सही, 'भारतीय ओलम्पिक संघ' का नाम तो लिया गया. हाँ, इससे बेशक किसी की भावनाओं को चोट पहुंचे या खिलाडियों का 'योद्धा होने का भ्रम' ही क्यों न टूटे! चूंकि अब खेल पूरी तरह मनोरंजन की जकड़ में आ गया है, इसलिए यह सब तो होना ही हैं.

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2 comments:

  1. पहलवान योगेश्वर दत्त ने भारतीय ओलम्पिक संघ से एंबैसडर का काम पूछा था ? भारतीय ओलम्पिक संघ ने यदि संघ की पब्लिसिटी के लिए यह कदम उठाया है जो थोड़ा बहुत ही सफल होगा क्योकि योगेश्वर दत्त , मिल्खा सिंह और गौतम गम्भीर की आलोचनाएं इसको कुछ हद तक कम कर सकती है .

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  2. पहलवान योगेश्वर दत्त ने भारतीय ओलम्पिक संघ से एंबैसडर का काम पूछा था ? भारतीय ओलम्पिक संघ ने यदि संघ की पब्लिसिटी के लिए यह कदम उठाया है जो थोड़ा बहुत ही सफल होगा क्योकि योगेश्वर दत्त , मिल्खा सिंह और गौतम गम्भीर की आलोचनाएं इसको कुछ हद तक कम कर सकती है .

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