तो 'केजरी चिड़िया' फंस ही गयी जाल में! Arvind Kejriwal in problem, 21 MLA case, Hindi Article, Mithilesh

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बचपन में मास्टरजी एक कथा सुनाया करते थे कि एक विद्वान गणितज्ञ पंडितजी को नदी पार करना था, लेकिन नदी में नाव नहीं थी. संयोग से उन्होंने देखा कि एक गांववाला भी नदी को चलकर पार कर रहा था. पूछने पर पता चला कि नदी ज्यादा गहरी नहीं है, सिवाय कहीं-कहीं गहरे गड्ढे के! गांववाले ने कहा कि पंडितजी उसके पीछे चलें, क्योंकि उसे पता है कि  नदी कहाँ ज्यादा गहरी है और किस तरफ उथली है, लेकिन पंडितजी तो विद्वान थे, आईआईटी टाइप किसी इंस्टीट्यूट से पढ़े थे तो उन्होंने झट अपना दिमाग चलाया और कहा कि नदी में लगभग कितने गड्ढे होंगे और उनकी गहराई क्या होगी. बिचारे गांववाले ने इसकी नापजोख तो की नहीं थी, लेकिन पंडितजी के ज़ोर देने पर अंदाजन उसने बता दिया कि 10 - 12 फ़ीट के तीन चार गड्ढे होंगे. बस पंडितजी ने झट औसत निकाला और गांववाले के पीछे से आगे-आगे चलने लगे. आगे की कथा आपने सुनी होगी या फिर 'मंतव्य' समझ जायेंगे कि उन विद्वान पंडितजी का क्या हुआ होगा! खैर, यह एक कहानी है लेकिन दिल्ली के विद्वान राजनेता अरविन्द केजरीवाल से इसका सम्बन्ध अगर आपने जोड़ा तो खुद ही दोषी होंगे आप और मानहानि का केस भी अगर केजरी महोदय ने किया तो वह आपकी समझ पर ही होगा! 

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अरे मैं मसखरी नहीं कर रहा, बल्कि हम युवा तो उनके एक ज़माने में फैन रहे हैं. एक नयी राजनीतिक पहल उन्होंने बढ़िया शुरू की, मुख्यमंत्री भी बने, लेकिन अनुभवी लोगों को झट पीछे करके आगे आ खड़े हुए और परिणाम अब दिख रहा है. योगेन्द्र यादव सहित बाकी सभी सहयोगी आंदोलनकारियों और नेताओं को, जो उनसे ज़रा भी भिन्न विचार रखते थे, उनको उन्होंने न केवल दरकिनार किया बल्कि पार्टी से बाहर धक्का दे दिया. पार्टी में रह गए नए लड़के, जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं. वह भी उन सभी विधायकों को कुछ न कुछ देकर तुष्टिकरण के चक्कर में केजरीवाल ने ऐसा कुआं खोद रक्खा है, जो उनके राजनीतिक उतार का कारण बन सकता है. अभी हाल ही में दिल्ली एमसीडी उपचुनाव हुए थे और आपने गौर किया होगा कि भाजपा का वोट शेयर तो पहले जैसा ही था, लेकिन केजरीवाल का 55 फीसदी वोट शेयर 30 फीसदी के पास रह गया और कांग्रेस ने 25% वह वोट झटकने में सफलता हासिल कर ली, जो केजरीवाल की ओर सरक गया था. कांग्रेस के उम्मीदवार भी जीते. अब अगर केजरीवाल के 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होती है तो कोई महान आशावादी ही उम्मीद लगा सकता है कि फिर से केजरीवाल यह सारी 21 सीटें जीत लेंगे. नतीजा उनके कामकाज और उनकी नयी नवेली पार्टी को एकजुट रखने में नकारात्मक तौर पर पड़ेगा और फिर ऐसे में ही पार्टियां भ्रष्टाचार की दलदल में कूद जाती हैं. 
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इसे दिल्ली की जनता का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि दो दिन की बनी पार्टी को जिस विश्वास के साथ लोगों ने भारी बहुमत दिया, वह विश्वास अब टूटता नज़र आ रहा है. चुनाव के समय पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल ने भी लोगों को विश्वास दिलाया कि भारतीय राजनीति में वह और उनके साथी क्रन्तिकारी परिवर्तन ला देंगे, वह विश्वास दरक रहा है और दरार लगातार चौड़ी होती जा रही है. मगर अपने दूसरे कार्यकाल के लगभग डेढ़ साल के दरम्यान ये पार्टी चर्चे में तो रहती है लेकिन अपने काम की वजह से कम और अपने विवादों की वजह से ज्यादा! फिर चाहे पुलिस हो या अधिकारी या चाहे एलजी हों या प्रधानमंत्री ही क्यों न हों! सभी के साथ केजरीवाल न केवल उलझते हैं, बल्कि कई बार तो गाली-गलौच पर उतर आते हैं. दिल्ली के मुख्य्मंत्री द्वारा कई बार सार्वजानिक मंच से देश के प्रधानमंत्री को बुरा-भला कहना तो जैसे आम बात हो गयी है. लेकिन अब तो इन्हें देश के राष्ट्रपति से भी शिकायत हो गयी है, क्योंकि मामला केजरीवाल के लिए उल्टा जो है! राजनीति की गन्दगी को साफ कर राजनीति में परिवर्तन की बातें करने वाले केजरीवाल ने जब दिल्ली में दूसरी बार सरकार बनाई तो इसके कुछ दिन बाद ही आप के 21 विधायकों (MLA) को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी अप्वाइंट कर लिया था, जो कि एक तरह से गैरजरूरी कदम था, लेकिन केजरीवाल शायद अपने विधायकों को टूटने से बचाना चाहते थे. तब इस बात की चर्चा भी खूब हुई थी. भारतीय राजनीति में ऐसा परिवर्तन देख कर तो सभी दंग रह गए. विपक्ष के रूप में कांग्रेस (शून्य विधायक) और बीजेपी (तीन विधायक) हंगामा करते रह गए. इसी क्रम में, 24 जून 2015 को कानून मंत्री कपिल मिश्रा ने बिना बहस के एमएलए को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाने वाला 'बिल' जोकि आम आदमी पार्टी द्वारा पेश किया गया था, उसे पास कर दिया. 

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हालाँकि दिल्ली असेंबली से पास हुए इस बिल को केंद्र सरकार से मंजूरी नहीं मिली थी. दिलचस्प बात ये है कि इस मामले के खिलाफ प्रशांत पटेल नाम के एक शख्स ने राष्ट्रपति के पास एक पिटीशन फाइल की थी और आरोप लगाया था कि नियम के विरुद्ध 'आप' के 21 विधायक लाभ के पद पर हैं, क्योंकि नियम कहता है कि विधायकों की कुल संख्या का 10 प्रतिशत ही संसदीय सचिव का पद हो सकता है. राष्ट्रपति ने मामले को संज्ञान में लेते हुए इस पिटीशन को इलेक्शन कमीशन के पास भेज दिया और इस पर कार्रवाई करने को कहा. इसके बाद चुनाव आयोग ने 'आप' के सभी 21 विधायको को मार्च 2015 में नोटिस भेजा और जवाब माँगा, जिसका टालमटोल के ढंग से जवाब देते हुए आम आदमी पार्टी ने तर्क दिया था कि वह सरकार के कामकाज को बेहतर ढंग से चलाने के लिए ऐसा कर रही है. आम आदमी पार्टी ने यह भी कहा कि ये पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी होने के नाते दिल्ली सरकार से कोई सैलरी, अलाउंस या ऐसी कोई दूसरी सुविधा नहीं ले रहे जो लाभ के पद के दायरे में आए, लेकिन राष्ट्रपति ने इसे मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया. राष्ट्रपति के इनकार के बाद आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता पर न केवल सवाल खड़े हो गए हैं, बल्कि उनका रद्द होना भी कई विशेषज्ञ तय मान रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि उन सभी विधायकों की सदस्यता ख़ारिज हो सकती है, जो इस मामले में घिरे हैं. और अगर ऐसा होता है तो दिल्ली फिर से  21 सीटों पर चुनाव होगा.

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अपनी पार्टी मुखिया के बिना सर-पैर वाले निर्णय का खामियाजा अब वो विधायक भुगतेंगे, जिन्होंने लाखों रूपये फूंक दिए होंगे अपने चुनाव प्रचार में और डेढ़ से दो साल में फिर चुनाव का बोझ उनके कंधे पर पड़ेगा तो बिचारे क्या करेंगें! हालाँकि, 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने पर बीजेपी और कांग्रेस की तो चांदी हो जाएगी. जाहिर है, कांग्रेस कई सीटें जीतकर वापसी करना चाहेगी तो भाजपा भी दिल्ली विधानसभा में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहेगी. बिचारी दिल्ली की जनता जो मुफ्त पानी, बिजली और इंटरनेट का आस धरे बैठी है उसे मिलेगा 21 सीटों पर दोबारा चुनाव का बोझ! शायद इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि राजनीति अनुभव की चीज है. पहले सीखो फिर बदलो और तब तक अनुभवी व्यक्ति का साथ न छोड़ो! लेकिन केजरीवाल तो उन पंडितजी की तरह हैं, जो अपनी विद्वता के कारण सबको पीछे धकेलने में यकीन रखता है और इसका क्या परिणाम आया है, यह उनके सामने है. हालाँकि, इन बातों और वाकयों से वह कोई सीख लेंगे, इसकी उम्मीद कम ही है, क्योंकि जो सीख जाए, वह केजरीवाल ही क्या! वैसे भी इन 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने से भी उनकी सरकार बहुमत में ही रहेगी. पर 'केजरी चिड़िया' के जाल में फंसने पर कई लोग खुश हुए होंगे और अगर 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होती है, जिसकी उम्मीद बलवती हो चुकी है तो फिर इस नयी सरकार पर मोटामोटी एक 'जनमत सर्वे' भी हो जायेगा, जिस पर केजरीवाल अपने शुरूआती दिनों में खूब ज़ोर देते रहे हैं! जाहिर है, इससे उनकी अपनी इच्छा ही पूरी होगी. हाँ, यह बात अलग है कि हाल-फिलहाल वह अपनी 'जनमत' वाली इच्छा इस रूप में पूरा करने के पक्ष में नहीं होंगे, अन्यथा वह केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी को बिना वजह लानत-मलानत क्यों भेजते?

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.

चलते-चलते एक नजर उन विधायकों पर जिनकी मेंबरशिप खतरे में है, क्योंकि क्या पता ये लोग फिर दोबारा दिल्ली विधानसभा में जा पाएं या नहीं, इसलिए कम से कम एक बार तो इनका नाम छपना ही चाहिए:
1. जरनैल सिंह, राजौरी गार्डन
2. जरनैल सिंह, तिलक नगर
3. नरेश यादव, मेहरौली
4. अल्का लांबा, चांदनी चौक
5. प्रवीण कुमार, जंगपुरा
6. राजेश ऋषि, जनकपुरी
7. राजेश गुप्ता, वज़ीरपुर
8. मदन लाल, कस्तूरबा नगर
9. विजेंद्र गर्ग, राजिंदर नगर
10. अवतार सिंह, कालकाजी
11. शरद चौहान, नरेला
12. सरिता सिंह, रोहताश नगर
13. संजीव झा, बुराड़ी
14. सोम दत्त, सदर बाज़ार
15. शिव चरण गोयल, मोती नगर
16. अनिल कुमार बाजपई, गांधी नगर
17. मनोज कुमार, कोंडली
18. नितिन त्यागी, लक्ष्मी नगर
19. सुखबीर दलाल, मुंडका
20. कैलाश गहलोत, नजफ़गढ़
21. आदर्श शास्त्री, द्वारका


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