मुस्लिम नेता होने का फ़र्ज़ निभाया ओवैसी ने... Asaduddin Owaisi Islamic State Statement, Hindi Article, Terrorism and Jihad



भारतीय राजनीति में उन्हें अवांछित माना जाता रहा है और तमाम विवादित बयानों के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय-स्तर पर चर्चा मिलती ही है. वो फ़िल्मी डायलॉग उन पर फिट बैठता है, जिसके अनुसार 'आप उनसे नफरत कर सकते हैं, आप उन्हें पसंद कर सकते हैं, किन्तु आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते हैं. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi Islamic State) की, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उनकी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमीन (एआईएमआईएम) पार्टी पिछले चार वर्षों से महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति में शामिल है और उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है, तो आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उनकी संभावित मौजूदगी से मुख्यधारा की पार्टियों में खलबली सी मची है. आम तौर पर ओवैसी की छवि एक मुस्लिम कट्टरपंथी नेता की रही है, जिनपर हमेशा भड़काऊ बयान देने का आरोप लगता ही रहता है. पिछले दिनों उनका 'भारत माता की जय' न बोलने का बयान काफी चर्चित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई उनकी गर्दन पर 'छूरी' भी रख दे तो वह 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे. 

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सोशल मीडिया पर उनकी इस बात की खूब खिंचाई हुई तो उनका मजाक बनाते हुए कई यूजर्स ने ट्वीट भी किया कि ऐसा कहते हुए ओवैसी 'भारत माता की जय' तो बोल ही गए! हालाँकि, यहाँ उनकी चर्चा उनके द्वारा दिए गए एक सकारात्मक बयान को लेकर है और वह बयान ऐसा है जिसे देते हुए बड़े से बड़ा मुस्लिम नेता भी काँप जाये, पर ओवैसी (Asaduddin Owaisi Islamic State) की तारीफ़ करनी होगी कि कम से कम यहाँ उन्होंने सच्चे मुसलमान होने का फ़र्ज़ निभाया और अपने समर्थकों को सही राह दिखलाने की कोशिश की! इस बार ओवैसी ने सबको चौंकाते हुए और अपनी छवि के बिलकुल विपरीत बयान दिया है. उन्होंने आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) की तुलना "जहन्नुम के कुत्तों" से करते हुए मुस्लिम बिरादरी को उनसे दूर रहने की सलाह दी और मुस्लिम युवाओं से हथियार उठाने की बजाय 'शिक्षा का जिहाद' शुरू करने की अपील की है. ओवैसी ने मुस्लिम युवाओं से अपनी अपील में साफ़ तौर पर कहा कि वे इस्लामिक स्टेट के चंगुल में फंसने से बचें! 

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आप ओवैसी के इस बयान को कम करके न आंके, क्योंकि बाकी बड़े मुस्लिम चेहरे आईएस पर खुलकर कहने से बचते ही रहे हैं और जो कुछ लोगों ने विरोध भी किया है, तो उनका स्वर बहुत हल्का रहा है. ऐसे में 'ओवैसी' को 'इस्लामिक स्टेट' के आतंकियों के खिलाफ रूख अख्तियार करने के लिए अवश्य ही प्रशंसा मिलनी चाहिए. न केवल इस्लामिक स्टेट की बुराई के लिए, बल्कि मुस्लिम युवाओं को शिक्षा के प्रति उन्होंने जिस नजरिये से जागरूक (Asaduddin Owaisi Islamic State) करने की कोशिश की है, उतने खुले तौर पर बड़े से बड़ा मुस्लिम विद्वान भी बयान नहीं देता है. इसमें रत्ती भर भी शक नहीं है कि जेहाद आज के समय में 'मार-काट' और दुसरे धर्मावलम्बियों की जान लेने और खुद को 'सुसाइड-बम' बनकर जान देने का पर्याय बन चुका है, किन्तु ओवैसी ने 'ज़िहाद' की उत्तम परिभाषा गढ़ने की कोशिश की है यहाँ उन्होंने यहाँ तक कहा कि जिहाद करना है तो 'हथियार न उठाओ', बल्कि गरीबों को बचाओ, उनकी मदद करो, गरीब बच्चियों की शादी कराओ, यही जिहाद है. यकीन नहीं होगा आपको कि कोई चर्चित और विवादित मुस्लिम शख्शियत 'ज़िहाद' की ऐसी व्यवहारिक परिभाषा भी दे सकती है? पर ऐसा हुआ है और यह बेहद ख़ुशी की बात है कि इसकी शुरुआत असद्दुद्दीन ओवैसी जैसे नेता ने की है. 


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हालाँकि, वह अपने इस रूख पर (इस्लामिक स्टेट और आतंकियों के विरोध के साथ 'ज़िहाद' का मतलब वगैर हथियार उठाये लोगों की भलाई करना) कब तक कायम रहते हैं, यह जरूर देखने वाली बात होगी. पर जब तक वह कायम हैं, तब तक उन्हें तवज्जो मिलनी ही चाहिए. इस क्रम में अगर हम आगे बात करते हैं तो अभी कुछ दिन पहले ही ओवैसी (Asaduddin Owaisi Islamic State) ने हैदाराबाद के गिरफ्तार किए गए पांच संदिग्ध आतंकियों को कानूनी मदद देने का ऐलान किया था, जिसकी निंदा चारों तरफ हो रही थी तो उनके ऊपर देशद्रोही होने का आरोप लगाया जा रहा था. हालाँकि, उन्होंने 'कानूनी दायरे' में रहने की बात बार-बार कही है और सिर्फ इसलिए कि वह बिगड़े लोगों को सही रास्ते पर लाना चाहते हैं, उनको दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? यह अलग बात है कि खुद ओवैसी साहब और उनके भाई के बोल ही कई-कई बार बिगड़ चुके हैं. पर देर आयद, दुरुश्त आयद की तर्ज पर अगर कोई सही राह पकड़ना चाहता है तो उसका स्वागत तहे दिल से किया जाना चाहिए, इस बात में दो राय नहीं! वैसे भी जब कोई गलत बोल निकालता है तो उसका विरोध सभी करते हैं और 'भारत माता की जय' और 'बीफ' के मुद्दे पर भड़काऊ बयान देने के लिए ओवैसी को निशाने पर लिया जा चुका है और लिया भी जाना चाहिए! 

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आपको याद होगा जब उन्होंने कहा था कि कोई मेरी गर्दन भी काट दे तो भारत माता की जय नहीं बोलूंगा, तो उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए शबाना आजमी ने कहा था कि माता शब्द से ऐतराज  है तो 'भारत अम्मी' क्यों नहीं बोलते! वहीं आरएसएस तो जैसे इनके लिस्ट में टॉप पर रहता है, किन्तु जाने-अनजाने 'संघ' की विचारधारा से ओवैसी साहब प्रभावित होते दिख रहे हैं. संघ के करीब रहने वाले जानते हैं कि अपने स्थापना-काल से ही यह संगठन देश की खातिर मरने से ज्यादा 'जीने' की बात करता है और ओवैसी ने भी अपने बयान में यही तो कहा है इस बार 'कि ज़िहाद की खातिर मरो नहीं, बल्कि बिना हथियार उठाये 'जियो' और गरीबों के लिए संघर्ष करो! हालाँकि, इस बार इनकी तारीफ़ करनी होगी, क्योंकि हाल ही में जब मदीना में पैगम्बर मोहम्मद की मस्जिद के सामने धमाका हुआ तो इनके ऐसे बयान (Asaduddin Owaisi Islamic State) की किसी को उम्मीद नहीं रही होगी!इनके बयान के बाद कुछ लोगों की प्रतिक्रिया आ रही है कि ओवैसी इसलिए भी ये बयान दे रहे हैं क्योंकि इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक भी ISIS के मुद्दे पर ही विवादों में फंसे हैं. गौरतलब है कि बांग्लादेश में आतंकी हमलों में शामिल मुस्लिम युवा जाकिर नाईक से प्रभावित थे, तो हाल ही में हैदराबाद से गिरफ्तार हुए ISIS के 5 संदिग्धों में से भी एक ने जाकिर नाईक की तकरीरों से प्रभावित होने की बात कही थी. 

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अब मसला जो भी हो, लेकिन आईएस के दरिंदों की ना सिर्फ निंदा बल्कि मुस्लिम युवाओं को उनके चंगुल से दूर रहने की सलाह देने के लिए ओवैसी की प्रशंसा होनी ही चाहिए. ओवैसी अगर अपने इसी रूख पर कायम रहते हैं तो उन जैसे लोग 'ज़ाकिर नाईक' जैसे तथाकथित मुस्लिम विद्वानों से लाख गुना बेहतर हो सकते हैं, क्योंकि आज वाकई में 'इस्लाम की खातिर मरने वाले 'मूर्खों' की नहीं, बल्कि इस्लाम की खातिर वगैर हथियार उठाये जीने वाले 'योद्धाओं' की ही जरूरत है. ज़िहाद के नाम पर तमाम आतंकी संगठन पहले ही इस्लाम को 'ज़हन्नुम' में धकेल चुके हैं और ओवैसी जैसे नेताओं की बात से एक आस जरूर बंधती है कि 'इस्लाम' भी शांतिप्रिय धर्म बन सकता है और  तस्लीमा नसरीन जैसे विचारकों को जवाब मिल सकता है जो यह मानते हैं कि 'इस्लाम शांतिप्रिय धर्म नहीं है'. हालाँकि, ओवैसी साहब (Asaduddin Owaisi Islamic State) नेता हैं और नेताओं की जुबान बहुत जल्द बदल सकती है. पर उनके कहे का अर्थ बिलकुल नहीं बदल सकता और इस्लाम का भला चाहने वालों को इन शब्दों को कसकर पकड़ने की जरूरत है. फ़िल्मी सितारे इरफ़ान खान ने भी कड़े स्वर में ढाका हमले पर 'मुसलमानों' की चुप्पी पर सवाल उठाया है, तो यूपी कैबिनेट के मंत्री आजम खान भी 'इस्लामिक स्टेट' को इस्लाम को बर्बाद करने वाला मानते हैं, किन्तु आज़म खान अमेरिका को दोष देकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति भी जतला देते हैं. जाहिर है, कस कर विरोध करने की जरूरत है 'आतंकियों' की! ऐसे में आवश्यक है कि तमाम प्रबुद्ध मुसलमान आगे आएं और आतंकवाद का उसी लहजे में विरोध करें, जिसमें ओवैसी ने किया है तो 'ज़िहाद' की वही परिभाषा लोगों को समझाएं, जो अभी ओवैसी साहब ने समझाने की कोशिश की है.

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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