रफ़्तार के लिए तैयार है भारतीय रेलवे! High Speed Train in India, Hindi Article, Talgo Coaches, Bullet Train, Gatiman Express



भाजपा की सरकार में यदि कुछ विभागों में काम हुआ माना जाए, तो उनमें रेल मंत्रालय जरूर शामिल होगा. रेलमंत्री सुरेश प्रभु की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम ही होगी, क्योंकि और तमाम सुधारों के साथ वह जनता के मन में 'भारतीय रेलवे' के प्रति सकारात्मक भाव भरने में सफल रहे हैं. यकीन मानिये सुरेश प्रभु की साधारण मगर जुड़ाव पैदा करने वाली कार्यशैली ने रेलवे की छवि इस कदर सुधारी है, जितनी किसी 'पीआर कंपनी' को सौ करोड़ रूपये देने के बाद भी नहीं होगी. हालाँकि, अभी सफर लम्बा है और इसके लिए सुरेश प्रभु लगातार प्रयासरत भी हैं. यात्रियों की हर संभव मदद करने के लिए रेल मंत्री के साथ पूरा मंत्रालय सक्रीय है तो, रेलवे में हो रहे विकास में तेज चलने वाली ट्रेनों को (High Speed Train in India, Hindi Article) शामिल करने के लिए अलग-अलग ट्रेनों का परीक्षण भी समय-समय पर हो रहा है. बुलेट-ट्रेन प्रोजेक्ट की बातें हम सबको ज्ञात है ही और इसी क्रम में दूसरी तेज-रफ़्तार ट्रेनों के प्रोजेक्ट्स पर भी ज़ोर दिया जा रहा है. अभी तक भारतीय रेल में सबसे तेज चलने वाली ट्रेन 'गतिमान एक्सप्रेस' थी, जिसकी अधिकतम रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटा है. 

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इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए ट्रेनों की गति में और अधिक सुधार के लिए स्पेन की बनाई हुई ट्रेन 'टैल्गो' का परीक्षण मथुरा और पलवल के बीच कराया गया, जिसमें 84 किलोमीटर की दुरी को 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से महज 37 मिनट में तय कर लिया गया. इसके दौरान 60 किलोमीटर की दुरी को टैल्गो ट्रेन ने अपनी अधिकतम गति से तय किया, जो भारतीय रेलवे के लिए रफ्तार का नया रिकॉर्ड है. ज्ञातव्य हो कि इस ट्रेन की गति का परीक्षण क्रमशः 130, 140, 150, 160 और 170 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर भी कराया गया, जो सफल रहा है. वैसे, इसके पहले भी बरेली और मुरादाबाद के बीच इसका सफल परीक्षण हो चुका है और यह आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा. यदि सब कुछ ठीक रहा तो टैल्गो ट्रेन का अगस्त से मुंबई और दिल्ली के बीच चलना तय है. बुलेट ट्रैन से कम खर्चे में यदि टैलगो भारतीय परिदृश्य में सफल (High Speed Train in India, Hindi Article) रहती है तो यात्रियों का बोझ उठाने में भारतीय रेलवे को काफी सहूलियत हो जाएगी. यदि इसकी तकनीकी स्पेक्स की बात करें तो आमतौर पर भारतीय कोच में चार व्हील होते हैं वही टेलगो की तकनीक पर आधारित एक कोच में सिर्फ दो व्हील ही हैं, जिस पर कोच झूले की तरह लटका होता है. 

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हालाँकि, इसमें आपस में डिब्बे को कनेक्ट करने में भारतीय कोच की तुलना में अधिक समय लगता है पर टेलगो में डिब्बे छोटे होने के कारण दो कोच के बीच में हाईपावर एयर स्प्रिंग लगी होती है जो मोड़ पर तेज गति में भी आसानी से मुड़ जाती है. परंपरागत भारतीय ट्रेन के कोचों में पहियों के बीच कमानी और सामान्य शॉकर होते हैं, जबकि टेलगो कोच  के शॉकर में हाइड्रोलिक पावर होने के कारण तेज गति में यात्रा के दौरान न झटके लगते हैं और न ही कंपन होता है. इसमें काफी कुछ कम्प्यूटराइज्ड भी है, जैसे सेंसर पर संचालित बोगी के व्हील की बेयरिंग ज्यादा गर्म होने पर बोगी के प्रत्येक कंट्रोल रूम में लगे कंप्यूटर की स्क्रीन पर ट्रेन की स्पीड कम करने के लिए आटोमेटिक संदेश (High Speed Train in India, Hindi Article) मिल जाएगा. ऐसे ही, ट्रेन को तत्काल रोकने के लिए इसमें डिस्क ब्रेक लगे होते हैं, जिसके कारण ट्रेन बिना झटके के रुक जाती है. इसी क्रम में अगर हम इसके बोगियों की बात करें तो इसमें बड़े साइज की खिड़की, वैक्यूम टॉयलेट, चेयर कार में 36 और एग्जीक्यूटिव में 27 सीट हैं. एक सीट से दूसरी सीट की दूरी भारतीय ट्रेनों की तुलना में तीन इंच अधिक है, जो यात्रियों के लिए आरामदायक भी है. 

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इसके साथ-साथ इसमें चार लाइन के बीच में एक एलईडी लगा हुआ है, जिस पर सिग्नल मिलने के बाद मनचाहे चैनल देखे जा सकते हैं, तो सिग्नल न मिलने की स्थिति में फिल्म देख सकते हैं. इसके अतिरिक्त, इसकी प्रत्येक सीट पर सेंसर है, जिसके माध्यम से सीट को आगे पीछे किया जा सकता है, तो हर सीट पर चार्जर और ईयरफोन के लिए प्वाइंट लगे हुए हैं. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इसकी सारी सुविधाएं किसी फ्लाइट की भांति ही हैं. हालाँकि, जब हम कीमतों की तुलना करते हैं, तो आपको बता दें कि एक परंपरागत भारतीय कोच की कीमत 7 करोड़ के आस-पास पड़ती है, जबकि आयात करने पर इस अत्याधुुनिक सुविधा युक्त बोगी की कीमत भी सात करोड़ रुपये ही पड़ेगी, लेकिन भारत में बोगी बनाने के लिए अनुबंध हुआ तो यहां पर साढ़े चार करोड़ में ही यह मिल सकेगी. हालाँकि, यह सभी बातें अभी शुरूआती स्तर (High Speed Train in India, Hindi Article) पर ही हैं और शुरुआत में तो 'सेल्स' की ही बातें होती हैं, जबकि सपोर्ट का इशू तो बाद में आता है. ऐसे में कीमतों और टिकाऊपन को लेकर भारतीय अधिकारियों को अतिरिक्त सजगता बरतनी होगी. इसके अतिरिक्त, जो कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां इन कोचों को पटरी पर उतारने में पेश आने वाली है, उसमें इसके कोचों का भारतीय प्लेटफार्म से करीब एक फीट डाउन रहना प्रमुख है. 

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साफ़ है कि ऐसे में ट्रेन से उतरना, चढ़ना आसान नहीं है. ऐसे में प्लेटफार्म डाउन करने पड़ेंगे या फिर नए बनाने होंगे. वहीं इतनी तेज रफ़्तार से चलने वाली ट्रेन के लिए उसके अनुकुल ट्रैक की भी जरूरत पड़ेगी. ऐसे में यह ट्रेन भी गतिमान एक्सप्रेस की तरह कुछ चुनिंदा मार्गों पर ही चलाई जा सकती है, क्योंकि पूरे भारत में ऐसी ट्रेन को चलने के लिए रेलवे के इतने बड़े नेटवर्क को फिर से बनाना लगभग असम्भव ही है. हालाँकि प्रयोग चलते रहने चाहिए और सिर्फ एक प्रयोग से ही सारी समस्याएं नहीं सुलझाई जा सकती हैं, पर काफी कुछ राहत (High Speed Train in India, Hindi Article) जरूर मिल सकती है. सुरेश प्रभु और रेल-मंत्रालय इन तमाम परीक्षणों के लिए बधाई के पात्र हैं तो आगे के प्रयोगों के लिए उन्हें ढेरों शुभकामनाएं, ताकि भारत की दिनों-दिन बढ़ती आबादी की यातायात समस्याएं सुलझाने की दिशा में वह तेज गति से आगे बढ़ सकें. ठीक गतिमान की तरह, टैलगो की तरह या फिर बुलेट ट्रेन की तरह ... !!

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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