डोनाल्ड ट्रंप: देर आयद, दुरुस्त आयद... President election in USA, Donald Trump, Hilary Clinton, Terrorism, Islam, Hindi Article, New



कहते हैं 'उगते सूरज को दुनिया सलाम करती है' और राजनेताओं के मामलों में तो यह कहावत खास तौर पर सही साबित होती है. दुनिया भर में ऐसे कई राजनेता शीर्ष पदों पर पहुंचे हैं, जिनसे लोग पहले तो कम्फर्टेबल नहीं होते हैं, किन्तु मजबूरी में ही सही उसे स्वीकार करना पड़ता है. कुछ ऐसा ही हाल विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली और धनी देश अमेरिका से ताल्लुक रखने वाले डोनाल्ड ट्रम्प (President election in USA, Donald Trump) का होने जा रहा है और पूरे अमेरिका से पहले, उनकी पार्टी में तो उनकी जय-जयकार हो ही चुकी है. ऐसे अवसर पर डोनाल्ड ट्रम्प का वह ट्वीट उद्धृत करने योग्य है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वह (सपोर्टर्स को) शर्मिंदा नहीं होने देंगे. कहीं न कहीं उनका यह ट्वीट, उनकी छवि के विपरीत जरूर है पर आशावादिता की एक झलक जरूर प्रस्तुत करता है. हालाँकि, उनकी आशावादिता की इमेज बनाने के चक्कर में उनकी पत्नी मेलानिया पर न केवल भाषण चुराने का आरोप लगा, बल्कि डोनाल्ड ट्रम्प के स्वाभाव के उलट भाषण देने के लिए उनकी खिंचाई भी हुई. 

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खैर, कुल मिलाकर खबर यह है कि रिपब्लिकन पार्टी ने रियल एस्टेट दिग्गज 'डोनाल्ड जॉन ट्रंप' को नवंबर में होने वाले आम चुनाव के लिए राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है. अपने ऊंटपटांग बयानबाजी से लगातार चर्चा में बने रहने वाले ट्रंप को राजनीति में कदम रखे मात्र एक साल ही हुए हैं, लेकिन अपनी लोकप्रियता के चलते उन्होंने पार्टी की उम्मीदवारी जीतने के लिए 17 शीर्ष जीओपी नेताओं को हराकर सभी को हैरान कर दिया है. थोड़ा पीछे जाकर देखें तो, ट्रंप (President election in USA, Donald Trump) किसी को लेकर कुछ भी बोल देते हैं, लेकिन आतंकी मुसलमानों के खिलाफ उनके बयानों की वजह से उन्हें अमेरिका में काफी लोकप्रियता भी मिली, जो अंततः उन्हें राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया की आखिरी कड़ी तक पहुंचाने में सफल रही! 9/11 आतंकी हमले (Terrorism worldwide) के बाद से अमेरिका में मुसलमानों को लेकर जो नफ़रत थी, ट्रंप ने उस नफरत को सीमा से बाहर जाकर भरपूर भुनाया और उनके भाषणों का व्यापक असर भी हुआ. उन्होंने ऐलान किया था कि अगर वो अमेरिका के राष्ट्रपति बनते हैं, तो मुसलमानों को अमेरिका में घुसने नहीं देंगे तो अपने भाषणों में ट्रम्प जोरदार तरीके से आतंकवाद और इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई का आह्वान करते थे. 

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जाहिर है, आतंक के खिलाफ आज हर कोई है और जो इसके खिलाफ खुलकर बोलता है, उसकी लोकप्रियता बढ़ ही जाती है. ट्रम्प का नारा है 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' और इसके लिए आईएसआईएस को खत्म करना उनकी प्राथमिकता है.’ हालाँकि, ऐसा कहना ज्यादती होगी कि ट्रम्प सिर्फ मुसलमान-विरोधी बयानों की वजह (Islam, Musalman) से यहाँ तक पहुंचे हैं, बल्कि अपने विपक्षी अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आलोचना  करने में भी उन्होंने दुसरे उम्मीदवारों से बाजी मारी है. हालाँकि, जो उनके विवादित बयान हैं, बाद में ट्रम्प (President election in USA, Donald Trump) ने उस पर कुछ हद तक सॉफ्ट-कार्नर भी लिया है और ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि अगर वह राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो चुनावी हथकंडों से आगे बढ़कर देशहित में कार्य करेंगे. अपनी उम्मीदवारी घोषित होते ही उन्होंने स्वीकार भी किया है, कि वो किसी को शिकायत का मौका नहीं देंगे. अगर सच में ट्रम्प ऐसा सोचते हैं तो ये  उन्हीं के लिए अच्छा होगा, क्योंकि बोलने और करने में काफी फर्क होता है. अगर सिर्फ बोलने से आतंकवाद ख़त्म होना होता तो कब का ख़त्म हो गया होता, क्योंकि विश्व का हर छोटा-बड़ा नेता आतंकवाद के खात्मे की बात करता है लेकिन अफ़सोस की अभी तक किसी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया. 

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डोनाल्ड ट्रम्प अगर वैश्विक राजनीति की परवाह न करते हुए आतंकवाद पर धांवा बोलते हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए, किन्तु अगर उन्हें लगता है कि सिर्फ बयानबाजी से आतंकवाद ख़त्म हो जायेगा तो कुछ बयानवीर हमारे यहाँ से भी लेते जाएँ, जैसे आज़म खान, साध्वी प्राची, योगी आदित्यनाथ इत्यादि. देखना दिलचस्प होगा कि प्रतिपक्षी हिलेरी क्लिंटन को ट्रम्प मात दे पाते हैं अथवा नहीं, वैसे उपराष्ट्रपति पद के लिए माइक पेन्स का चुनाव करना उनके पक्ष में माना जा रहा है, क्योंकि इससे रूढ़िवादी ईसाइयों को रिझाने में वह कामयाब हो सकते हैं. ट्रंप का साथ ना देने पर टेड क्रूज़ की आलोचना हुई है, जिससे इस बात को बल मिलता है कि उनकी पार्टी वाले धीरे-धीरे उनके पक्ष में लामबंद हो रहे हैं. कुल मिलाकर अगर ट्रम्प (President election in USA, Donald Trump) विवादों से दूर वैश्विक समस्याओं के साथ तालमेल करते हुए अपने देश की समस्याओं को दूर करते हैं तो उनका स्वागत चहुँओर होगा, जैसा कि अपने हालिया बयानों से वह संकेत भी दे रहे हैं. वैसे भी 'देर आयद, दुरुस्त आयद' की कहावत बेहद प्रभावी मानी जाती है और सकारात्मकता की उम्मीद पर तो पूरी दुनिया कायम है. 

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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