अब पीएम के 'कार्यों और बयानों' का आंकलन होना ही चाहिए! Prime Minister Narendra Modi Speech, Central Government, Work Analysis, Hindi Article



2014 के लोकसभा चुनाव में भारत की जनता ने भारी बहुमत से गुजरात के मुख्यमंत्री को भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया. शुरू के कुछ सालों में जनता और कई विश्लेषक पीएम के कार्यों का मिला-जुला आंकलन करते रहे, तो कइयों ने उन्हें 'हनीमून पीरियड' के रूप में 'सख्त विश्लेषण' से छूट भी दी. पर अब लगभग ढ़ाई साल, यानि केंद्र सरकार का आधा कार्यकाल बीत चुका है और कम से कम अब तो 'हनीमून पीरियड' की दुहाई नहीं दी जा सकती है. चुनावी समय में 'जुमलेबाजियाँ' तो खूब होती रही हैं, किन्तु अब क्या 'लाल किले' से भी इस युक्ति का प्रयोग करके वाहवाही लूटी जा रही है? यूं तो पीएम के भाषणों में पहले भी कई गलतियां हुई हैं, किन्तु इस बार लाल किले से उनकी टीम ने ऐसी गलतियां की हैं, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है. स्वतंत्रता दिवस जैसे अहम मौके पर जब एक-एक शब्द और एक-एक वाक्य को मेटल डिटेक्टर (Prime Minister Narendra Modi Speech, Central Government) से गुजरना चाहिए, वहां अगर पीएम को 'अपना ट्वीट' डिलीट करना पड़े तो फिर इससे बड़ी दूसरी बिडम्बना और क्या हो सकती है? अपनी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ाकर दिखलाने की कोशिश में किस प्रकार दांव उल्टा पड़ जाता है, पीएम का हालिया भाषण इसका सर्वोत्तम उदाहरण है. दरअसल उत्तर प्रदेश के हाथरस के नंगला फतेला में 70 साल बाद बिजली पहुंचाने को लेकर जो किरकिरी हुई, वैसी किरकिरी पीएम की पहले शायद ही कभी हुई हो. थोड़ी गंभीरता से देखा जाए तो 'लाल किला' इस प्रकार का मंच है भी नहीं कि आप वहां से इस तरह लोकप्रियता वाली बातें कहें, क्योंकि वहां से निकल सन्देश न केवल देश भर में, बल्कि विश्व के कोने-कोने में सूना जाता है. अगर मान भी लिया जाए कि किसी गाँव में अब तक बिजली नहीं पहुंची है और वर्तमान सरकार ने वहां एकाध गाँवों में बिजली पहुंचाने का कार्य कर दिखाया है तो क्या वाकई इसमें कोई पीठ थपथपाने वाली बात है? क्या सच में यह किसी सरकार की ठोस उप्लब्धित मानी जा सकती है? 

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ऐसा नहीं है कि पीएम ने यह गलती पहली बार की हो, बल्कि पीछे भी उनकी टीम के होमवर्क में कई कमियां दिखी हैं, जिसकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए. हालाँकि, पीएम मोदी भाषण कला माहिर हैं, किन्तु जिस प्रकार से पिछले दिनों उन्होंने कई गलतियां की हैं, उससे सवाल तो उठते ही हैं. मसलन, अपने अमरीकी दौरे के दौरान, उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में गलत तथ्य सामने रखा था. उन्होंने अपने भाषण के दौरान कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में कहा कि यह 2000 साल पुराना है, जबकि हकीकत यह है कि यह 700 साल पुराना ही है. इसी तरह, नरेंद्र मोदी ने साल 2013 में हुई पटना की बहुचर्चित रैली में बिहार की शक्ति का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने सम्राट अशोक, पाटलिपुत्र, नालंदा और तक्षशिला का जिक्र किया था, लेकिन सच्चाई यह है कि तक्षशिला पाकिस्तान में स्थित है. तब मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार ने इस गलती को खूब हवा दी थी. ऐसे ही, नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi Speech, Central Government) ने साल 2014 के फरवरी महीने में मेरठ में कहा था कि आजादी की पहली लड़ाई को कांग्रेस ने बहुत कम आंका था, जबकि सच्चाई यह है कि मेरठ में 1857 की क्रांति शुरू हुई थी, जबकि कांग्रेस की स्थापना तो 1885 में हुई थी. नरेंद्र मोदी ने अपने एक और भाषण के दौरान कहा था, "जब हम गुप्त साम्राज्य की बात करते हैं तो हमें चंद्रगुप्त की राजनीति की याद आती है." जबकि सच्चाई यह है कि मोदी जिस चंद्रगुप्त का और उनकी राजनीति का जिक्र कर रहे थे, वो मौर्य वंश के थे. गुप्त साम्राज्य में तो चंद्रगुप्त द्वितीय हुए थे, लेकिन मोदी अपने भाषण में उनका जिक्र करना भूल गए. यहीं नहीं नरेंद्र मोदी ने 2013 में जम्मू में एक रैली को संबोधित करते हुए कह दिया था कि मेजर सोमनाथ शर्मा को महावीर चक्र व ब्रिगेडियर रजिंदर सिंह को परमवीर चक्र मिला था. जबकि सच्चाई यह है कि मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र व रजिंदर सिंह को महावीर चक्र मिला था. इसी तरह के एक और चर्चित मामले में, नरेंद्र मोदी साल 2013 के नवंबर महीने में खेड़ा में श्यामजी कृष्ण वर्मा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच अंतर नहीं कर पाए थे. 

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उन्होंने गुजरात का बेटा कह दिया और कह दिया था कि उन्होंने लंदन में 'इंडिया हाउस' का गठन किया था और उनकी मौत 1930 में हो गई थी. बता दें कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म कोलकाता में हुआ था और उनकी मौत 1953 में हुई थी. नरेंद्र मोदी ने जिस श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जिक्र किया था दरअसल वो श्यामजी कृष्ण वर्मा थे. ऐसे ही, नरेंद्र मोदी की उस समय भी बहुत किरकिरी हुई थी, जब उन्होंने पटना में रैली को संबोधित करते हुए कह दिया था कि सिकंदर की सेना ने पूरी दुनिया जीत ली थी, लेकिन जब उन्होंने बिहारियों से पंगा लिया था, उसका क्या हश्र हुआ था यह सभी जानते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि सिकंदर की सेना ने कभी गंगा नदी भी पार नहीं की थी. अब कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि यह सब शाब्दिक गलतियां हैं, किन्तु सवाल तो यह भी है कि वह कोई आम पद पर नहीं हैं और उनके भाषणों और उसके तथ्यों को चेक करने के लिए एक से बढ़कर एक ब्रिलिएंट टीम (Prime Minister Narendra Modi Speech, Central Government) है. ऐसे में सवाल तो यह भी उठता है कि क्या जानबूझकर यह सब हुआ है, आने वाले कई विधानसभा चुनावों के मद्देनजर या फिर नौकरशाही लापरवाह हो रही है? दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं, ख़ासकर नौकरशाही की लापरवाही क्योंकि पहले ही मोदी सरकार को 'नौकरशाहों की सरकार' कहा जा रहा था, जहाँ मंत्रियों को कम और अफसरों को ज्यादा पावर दी गई है. ऐसे में इन गलतियों के लिए जवाबदेह लोगों को सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? इन शाब्दिक गलतियों के अतिरिक्त, पीएम मोदी के कार्यों की शिनाख्त भी एक सरसरी दृष्टि से कर लिया जाना चाहिए. देखा जाए तो मोदी सरकार बार-बार पिछली यूपीए सरकार के मानकों से अपनी तुलना करती हैऔर फिर अपनी सरकार को 19 की बजाय 20 अंक देकर अपनी पीठ थपथपा लेती है. पर क्या वाकई 19 से 20 अंकों की बढ़ोत्तरी के लिए ही जनता ने भाजपा को केंद्र में बिठाया है? क्या वाकई कुछ किलोमीटर ज्यादा सड़क बना लेना या कुछ अधिक सोलर पैनल लगा देने भर से ही जनता संतुष्ट हो जाने वाली है? क्या सच में अधिकाधिक देशों की यात्रा करने और मन की बात करने से जनता की समस्याएं हल हो जाने वाली हैं? 

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अगर तर्कों के आधार पर बात की जाए तो नरेंद्र मोदी से जिस चीज की सर्वाधिक उम्मीद थी, वह निश्चित रूप से 'नौकरियों का सृजन' था, जिसमें कुछ ख़ास परिवर्तन नहीं दिख रहा है. विदेश नीति में अमेरिका के साथ सम्बन्ध सुधारना जॉर्ज बुश के शासनकाल से ही शुरू हो गए थे, जो स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ रहे हैं. रही बात पाकिस्तान की तो इस मोर्चे पर सरकार को 10 में से 3 नंबर भी शायद ही मिले. इस सम्बन्ध में अनुभवी कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी का इस बार का तर्क शायद ही कोई गलत ठहराए, जिसमें उन्होंने कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति ‘सहसा और बिना सोच वाली’ है. येचुरी ने आगे कहा कि ‘‘भारत सरकार कश्मीर पर ऐसी नीति का अनुसरण कर रही है जिसके आगे दुष्प्रभाव होंगे. हमें कश्मीर के भीतर मुद्दों का निवारण करना चाहिए. भारतीय संसद के एक प्रतिनिधिमंडल (Prime Minister Narendra Modi Speech, Central Government, Kashmir Issue) को जमीनी हालात को देखने के लिए भेजना चाहिए.’’ सबसे दिलचस्प बात येचुरी ने आगे कही कि ‘‘इसी मोदी सरकार ने भारत-पाक संवाद के पैकेज का एलान किया था, लेकिन बाद में वे बातचीत से पीछे हट गए. फिर अचानक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोपहर का भोज करने के लिए पाकिस्तान पहुंच गए और कहा कि बातचीत बहाल होगी. अब वे कह रहे हैं कि कोई बातचीत नहीं होगी.’’ थोड़ा और पीछे जाकर देखें तो पाकिस्तान के जांचकर्ताओं को पठानकोट हमले के मामले में घर में घुसने की इजाजत दे दी गयी, जो पहली बार हुआ. थोड़ा और ईमानदारी से आंकलन करें तो पीएम ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान मुद्दे का ज़िक्र तो लाल किले से कर दिया है, किन्तु उस मुद्दे पर सरकार आगे कैसे बढ़ेगी, इसका रोडमैप कहीं नज़र नहीं आ रहा है. 

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आखिर पीएम कोई एक व्यक्ति तो हैं नहीं, बल्कि उनकी बात सवा सौ करोड़ देशवासियों की बात है और जब सवा सौ करोड़ देशवासी 'बलोच राजनीति' में रुचि रखने की बात लाल किले के मंच से कहते हैं तो फिर इसे आगे भी जारी रखना होगा. घरेलु राजनीति में जरूर पीएम को इसका फायदा मिलेगा, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान के नवाज़ शरीफ 'कश्मीर-कश्मीर' चिल्लाकर अपनी घरेलु राजनीति में फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. पर न तो पाकिस्तानी पीएम को पता है कि 'कश्मीर-कश्मीर' चिल्लाने का दुष्परिणाम क्या होगा और न तो हमें पता है कि 'बलोच राजनीति' पर हम आगे कैसे बढ़ेंगे? इससे भी आगे, लाल किले के भाषण पर ही, जिस प्रकार देश के मुख्य न्यायाधीश ने 'न्यायिक नियुक्तियों' पर कुछ न बोलने के लिए पीएम की आलोचना की, उसे भी सरकार को गंभीरता से देखना चाहिए. नारी-सुरक्षा पर भी पीएम ने लाल किले से कुछ खास नहीं कहा तो 'नौकरियों के सृजन' की कोई बड़ी रूपरेखा प्रस्तुत नहीं की. ऐसे में पीएम के कहे 'शब्दों' में तो गलती नज़र आती ही है, जिसे शायद शाब्दिक और मानवीय भूल कह कर जनता क्षमा कर दे, किन्तु उनके कार्यों में 'जुमलेबाजी' को जनता शायद ही अनदेखा करे!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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