पुलिसिया अन्याय की सत्य कहानी - Voice for Safety, Voice for Justice

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नमस्कार दोस्तों मेरा नाम विमलेश है और मैं फरीदाबाद तुलसी कॉलोनी में तकरीबन 3 साल से रहता हूं. मेरा साला संदीप मेरे पड़ोस में बाद में रहने आया. पहले हम दोनों के बीच रिश्ते अच्छे थे, मगर छोटी-मोटी चीजों से यह रिश्ते बिगड़ते चले गए.



बाद में हम दोनों के बीच बोलचाल भी बंद हो गयी.


पिछले दिनों तुलसी कॉलोनी में चंदा इकट्ठा करके मंदिर का निर्माण हुआ, जिसका जिम्मा संदीप और उसके दोस्तों के हवाले था. कॉलोनी के लोगों ने मिलकर उसे यह जिम्मेदारी सौंपी थी. कॉलोनीवासियों का यह मानना था कि मंदिर निर्माण में जो पैसा इकट्ठा हुआ था, उसमें 70 हज़ार से ₹80000 तक की घपलेबाजी हुई है.



कॉलोनी वासियों ने जब इनसे कई बार हिसाब मांगा तो संदीप और उनके ग्रुप के लोग कॉलोनी वासियों को डरा कर भगाने लगे.

एक बात और बताना आवश्यक है कि जहां संदीप, राजन और उनका ग्रुप खुद नहीं जाता था, वहां अपने घर की लेडीज (महिलाओं) को लाठी-डंडा लेकर भेज देते हैं. यह मामला कॉलोनी में कई बार हो चुका है. इस तरह से कॉलोनी की औरतों को भी इनके घर की लेडीज डराने लगी.



कॉलोनीवासी इसी वजह से संदीप को नापसंद करने लगे और संदीप इसका जिम्मेदार मुझे मानने लगा. क्योंकि लोग मेरे पास शिकायत करने आते थे कि आपका साला मंदिर का पैसा लेकर बैठ गया है, लेकिन मैं इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करता था, क्योंकि पहले ही हम दोनों के बीच तनाव था.


बाद में कॉलोनी वासियों ने हिसाब न देने पर संदीप और उसके ग्रुप को मंदिर के कार्यों से हटा दिया, जिसकी गवाह पूरी कॉलोनी है.


इस सब के बीच वहां के लोकल प्रॉपर्टी डीलर अनीस का भाई इरफान भी शामिल हो गया और संदीप के चक्कर में मुझे और कॉलोनी वाले को धमकी देने लगा. एक बार इसने मुझे फोन पर मारने की धमकी दी और मैंने एक शिकायत गोछी चौकी में दी थी.



उसके बाद वहां के एसएचओ साहब ने बुलाकर इरफान को डांट लगाई. यह मामला तकरीबन डेढ़-2 महीने पहले का है.

मुख्य मामला 6 अगस्त 2019 की सुबह का है. मेरा और मेरे साले संदीप का घर चूँकि सटा हुआ है और जैसे ही मैं इस दिन सुबह 8:00 बजे के आसपास घर से बाहर निकला तो उस वक्त संदीप की वाइफ नीतू घर से बाहर निकली थीं. उनके दरवाजे पर कोई आलू-सब्जी का टुकड़ा पड़ा हुआ था और जैसे ही मैं बाहर निकला नीतू ने गाली-गलौज करते हुए आलू का टुकड़ा मेरी तरफ उछाल दिया.

तभी  मेरी वाइफ घर से बाहर निकल गई और दोनों के बीच गाली-गलौच होने लगी. यह सब सुनकर जितेंद्र नाम का लड़का आ गया और संदीप की वाइफ की तरफ से मुझसे मारपीट करने पर उतारू हो गया.

शोरगुल सुनकर कॉलोनी के और लोग इकट्ठा हो गए, जिसमें ज्योति प्रजापति नाम का व्यक्ति मेरी ओर से जितेंद्र की बातों का जवाब देने लगा. हालांकि बीच बचाव पर यह मामला यहीं खत्म हो गया और कोई हाथापाई या कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं हुई.


इसके बाद मैं अपने ऑफिस चला गया, जिसका रिकॉर्ड ऑफिस में दर्ज है. इसके कुछ ही घंटों बाद दोपहर के समय संदीप अपने साथ राजन सिंह, अजीत पटेल, सुशील तिवारी, जितेंद्र और कुछ और लोगों को लेकर हाकी, डंडे, लाठी के साथ ज्योति प्रजापति के घर पर हमला कर दिया. इसका गवाह पूरा मोहल्ला है. यह लोग ज्योति की घर की औरतों से छेड़छाड़ करने लगे और ज्योति के पैरों पर इतनी बुरी तरीके से प्रहार किया कि उसको चला नहीं जा रहा है. इसका मेडिकल रिकॉर्ड भी पुलिस चौकी में दर्ज है.

अपने ऊपर हमला देखकर ज्योति के घर से औरतें ईंट-पत्थर चलाने लगीं, जिसमें संदीप के ग्रुप का एक सदस्य सुशील तिवारी का सर घायल हो गया.

इस वक्त तक मैं या मेरे भाई जिनके ऊपर पुलिस ने f.i.r. किया है और कॉलोनी के दूसरे लोग जिन पर एफआईआर की गई है उनमें से अधिकांश लोग नहीं थे सिर्फ ज्योति और गीता ही मौजूद थे, क्योंकि वह उनका घर था, बाकी लोग घटनास्थल पर थे ही नहीं! इसके एक नहीं कई पुख्ता सबूत हैं.

मैं विमलेश, उस वक्त ऑफिस में था, जब ज्योति ने मेरे पास फोन किया कि उसका पैर हॉकी द्वारा हमले में टूट गया है और उसे दवा करानी पड़ेगी. ऑफिस में मैं अपने सीनियर को बोलकर दवा कराने के लिए निकला और तब ज्योति को लेकर में हॉस्पिटल में गया. अब तक मेरे साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी.

बल्लभगढ़ सरकारी अस्पताल में जब मैं ज्योति को लेकर पहुंचा, तकरीबन शाम 5:00 बजे, ठीक उसी समय संदीप भी अपने सभी ग्रुप के साथ सुशील तिवारी जिसका सर घायल हो गया था, उसका मेडिकल कराने पहुंचा था. पाँव टूटने के कारण ज्योति से चला नहीं जा रहा था और वहां मुझे अकेले देखकर इन लोगों ने हॉस्पिटल में ही मुझ पर हमला कर दिया. अगर वहां सीसीटीवी होगा तो सारा रिकॉर्ड दर्ज होगा. इन लोगों ने मुझे बुरी तरीके से पीटा, जिसे वहां के सभी डॉक्टर-नर्स स्टाफ ने देखा. इसके बाद मुझे भी अपना मेडिकल कराना पड़ा.

अब तक मैंने यह बात कहीं और नहीं बताई थी, लेकिन जब मेरे ऊपर अटैक हो गया और मुझे जान से मारने की धमकी दी गई, तब मैंने अपने भाई जो दिल्ली में रहते हैं, उनको फोन किया और उनके कहने पर अपना फोटो खींचकर भेजा जिसका व्हाट्सएप रिकॉर्ड उसी दिन के रिकॉर्ड में मौजूद है.


इसके बाद मेरे बड़े भाई मिथिलेश ने मेरे दूसरे भाइयों को फोन किया, और सब के कहने के बाद मुझसे परिवार सहित मिलने आए. मेरी पत्नी अकेले घर पर रो रही थी इसलिए उसे संभालने के लिए भाई साहब और समस्त परिवार आया.

वह दिल्ली से गुडगाँव के रास्ते आए और टोल गेट पर सीसीटीवी कैमरे में और उनकी गाड़ी का रिकॉर्ड और टाइमिंग पूरी तरह से दर्ज है. मेरा एक दूसरा भाई कौशलेश का भी टोल रोड पर उस दिन उसकी गाड़ी का रिकार्ड दर्ज है.



उस वक्त हम लोग गोछी चौकी पर थे, क्योंकि हमें पता नहीं था कि मुकद्दमा कहाँ दर्ज कराना है. गोछी चौकी के यहाँ से बताने पर हम लोग सिकरोना चौकी की ओर तकरीबन रात साढ़े 9 बजे रवाना हुए.

हम लोग पूरी कॉलोनी वासी सहित और अपने भाइयों के साथ सिकरोना पुलिस चौकी गए. यह मामला लगभग रात 9:30 से 11:00 के बीच का है. वहां हम लोगों ने पुलिस को सारा घटनाक्रम बताया और एफआईआर दर्ज करने के लिए कहा, लेकिन पुलिस टालमटोल करती रही.

सिकरोना पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर रही थी, इसी बीच हमारे बड़े भाई साहब की बात कुछ सीनियर अधिकारियों से भी हुई और वह उन्होंने एफआईआर दर्ज करने की रिक्वेस्ट करवाई. इन अधिकारीयों में धौज पुलिस स्टेशन के एसएचओ संदीप जी (9582200157) के साथ हुई बातचीत भी शामिल है. कुछ बातचीत की तो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है. यह सब बातें साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि पुलिस चौकी सिकरोना के चौकी इंचार्ज और तालीम इत्यादि जांच-अधिकारियों ने एसएचओ साहब सहित सीनियर अधिकारियों को न केवल गलत इनफार्मेशन दी, बल्कि हमारे खिलाफ खुद साजिश रचकर हमें ही मामलों में फंसाया.

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इतना सब होने के बाद पुलिस ने हमसे बोला कि एफआईआर दर्ज हो गयी है, सुबह कॉपी मिल जाएगी. लेकिन कॉलोनी के लोग डरे हुए थे और रास्ते में संदीप और उसके साथी कुछ लोगों को मारने के लिए खड़े थे, ऐसी सूचना मिली थी. बहुत रिक्वेस्ट पर पुलिस ने हमारे साथ कॉलोनी में आने का निर्णय किया और साथ चली भी. पुलिस थोड़ी दूरी पर रुकी रह गयी. क्योंकि हमारा घर और संदीप और राजन का पास पास में ही है, तभी राजन और उसकी माँ निकल कर गाली-गलौज करने लगे. फिर मैंने भी उस पर रिएक्शन किया जिसकी एवज में पुलिस मेरे को और मेरे भाई भी वहां खड़े थे, उनको उठाकर प्राइवेट गाड़ियों में ले जाने लगे.

इसकी रिकॉर्डिंग मौजूद है.

यहाँ पर सिर्फ गाली-गलौच हुई थी और न कोई हाथापाई हुई, न किसी को कोई चोट आयी, न कोई मेडिकल है... बावजूद इसके पुलिस लोकल दबाव में (अथवा लालच में) सीनियर्स को मिसगाइड करके न केवल हमें लॉकअप में डाला, बल्कि जेल भिजवा कर ही दम लिया.

धाराएं ऐसी-ऐसी लगा रखी हैं, मानो कानून सिकरोना चौकी इंचार्ज सत्यपाल और एएसआई तालीम, सुनील का गुलाम है और वह खुदा हैं और उनकी आगे कहीं जवाबदेही होगी ही नहीं!!


ख़ास बात यह है कि यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ और इससे सम्बंधित कई रिकॉर्डिंग, कॉल्स मौजूद हैं. जबकि पुलिस ने यह पूरा मामला कहीं ज़िक्र ही नहीं किया है.


मुख्य हमलावर संदीप सिंह, राजन, अजीत पटेल को उसने बाहर ही छोड़ दिया और कुछ अभियुक्तों को पकड़ कर रात के समय लॉकअप में हमारे साथ ही रखा, ताकि मोहल्ले के काफी लोग जो रात में चौकी पर धरना दे रहे थे, उन्हें संतुष्ट किया जा सके.
जैसे-जैसे सुबह हुई, पुलिस हम पर समझौते का दबाव बनाने लगी.

उन्होंने यहां तक कहा या तो समझौता कर लो नहीं तो सारी धाराएं तुम्हारे पर ठोक देंगे. आगे की सारी कार्यवाही आईओ के लिखने पर ही होगी.

हमारे मन में भी एक बार आया कि समझौता कर लें, लेकिन हम लोग समझौते के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि संदीप और उसके साथियों की रोज-रोज की आदत हो गई थी. वह लोग अपने विरोधियों के खून के प्यासे हो गए थे. उनके कुछ दोस्तों का साथ, कुछ लोकल व्यक्ति का साथ एक गैंग का रूप ले चुका था.

हमें पता था कि हम अगर आज समझौता कर लेंगे तो कल यह फिर वही ड्रामा करेंगे, इसलिए हमने खुद केस आगे बढाने का निर्णय लिया.

आखिर जान जाने से जेल जाना बेहतर है!

संदीप और उसका ग्रुप (या गैंग) हमें और दूसरों को मारने की धमकी देते हैं, तो मैं समझौता करके कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था.

समझौते से इनकार करते ही पुलिस के अंदाज बदल गए और उन्होंने कई पर्चे बनाकर हमसे हस्ताक्षर कराने की कोशिश की. हमारे इंकार करने पर सत्यपाल साहब ने धाराएं लगाने और गाली देने का उपक्रम शुरू किया. जब हम नहीं दबे तो पुलिस बिना सुबूत के जो कुछ कर सकती थी, वह सब किया, सभी धाराएं लगाई.

पुलिस ने सभी सबूतों को अनदेखा करते हुए बिल्कुल एक तरफा रिपोर्ट दर्ज किया. थाने में हम लोगों द्वारा एफआईआर की कॉपी मांगने पर भी सिकरोना पुलिस ने प्राथमिकी की कॉपी नहीं दी. चौकी इंचार्ज सत्यपाल  और आईओ तालीम ने इस मामले में लगातार गोपनीयता बरती. जिस भी प्रकार से हमारे खिलाफ और दूसरी पार्टी के पक्ष में केस बन सकता था उन्होंने किया.

कोर्ट में एफआईआर की कॉपी हमारे वकील द्वारा  मांगने पर भी वे लोग टालमटोल करते रहे कि इनकी जमानत ना हो.

हमें कुछ भी पता नहीं था और हमें रिमांड पर लेने के लिए सारी अर्जी दी जा रही थी. हमारे वकील को कुछ पता ही नहीं था ना एफआईआर की कॉपी दी गई थी और तब तक कोई जानकारी नहीं दी गयी, जब तक जज साहब ने जेल भेजने का आदेश न दे दिया.

बाद में यह बात जज साहब के सामने हमारे बड़े भाई साहब ने बताया कि पुलिस एफआईआर की कॉपी हमें नहीं दे रही है और ना हमारे वकील को दिया है.

लेकिन तब तक आदेश लिखा जा चुका था, पर यह बात पता चलने पर आइओ और सिकरोना पुलिस चौकी को कड़ी डांट पड़ी और जज साहब के आदेश के बाद आईओ ने एफआईआर की कॉपी हमारे वकील को दी.

फिर हमें नीमका जेल में पुलिस छोड़ आयी.



आश्चर्य यह है कि जिन लोगों के ऊपर महिलाओं से छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज है, ग्रुप में मिलकर किसी के घर के ऊपर हमला करने का आरोप है, जिनके खिलाफ प्रॉपर मेडिकल रिपोर्ट है, 25 से अधिक लोगों ने गवाही दी, टाइमिंग दर्ज है, फिर भी उनकी ज़मानत का पुलिस ने विरोध नहीं किया और IPC 1860 का 354 लगने के बावजूद उसी दिन कुछ लोगों की जमानत हो गयी.

जैसे-तैसे 9 अगस्त 2019 को हम चारों भाइयों को जमानत मिली, उस दिन हमें पता चला कि संदीप सिंह, राजन सिंह को सीधे जमानत करा दी गई है और उन्हें आईओ ने प्रेजेंट किया है.

एक नहीं, सभी को महिलाओं के सम्मान के खिलाफ धारा लगने के बावजूद बेल मिल गयी तो इस पर प्रश्न सीधे सीधे उठता है, क्योंकि वकीलों ने बताया कि 354 में बेल मिलनी मुश्किल होती है… वह भी एक नहीं सभी की बेल!

आखिर इस दरियादिली की कुछ तो वजह रही होगी?

एक परसेंट भी पुलिस ने विरोध नहीं किया, इसलिए समझा जा सकता है कि सिकरोना पुलिस चौकी किस प्रकार का रुख अख्तियार कर रही है?

कानून के जानकारों ने बताया कि आप लोगों के खिलाफ जो धारा लगी है पुलिस 100 परसेंट आप लोगों के खिलाफ काम कर रही है. यह किस दबाव में काम हो रहा है हम कैसे कर सकते हैं?

हम लोग जैसे ही जमानत पर छूटे हमारे वकील साहब ने सलाह दिया कि घर पर मत जाना क्योंकि पुलिस जिस तरह इस मामले में रुख अख्तियार कर रही है, हो सकता है कि आपको फिर किसी न किसी जुर्म में अरेस्ट कर ले या फिर आपके विरोधी हंगामा करके आपको अरेस्ट करा दें.

बाद में हमें कॉलोनी के कई लोगों का फोन आया कि कॉलोनी के आम निवासियों के घर पुलिस छापा मार रही है और उन्हें परेशान किया जा रहा है.
कानूनी सलाह के अनुसार हम अपने तुलसी कॉलोनी, फरीदाबाद के मकान में ताला लगा दिए हैं, क्योंकि एक तो हमें अपनी जान का खतरा है, ऊपर से पुलिस सारी धाराएं हमारे खिलाफ लगा रखी है.

मेरी उच्च अधिकारियों से विनती है कि इन तमाम सबूतों के अनुसार इस केस की सही तरीके से जांच हो. सीनियर अधिकारियों को जानकारी थी, इसके बावजूद सिकरोना पुलिस चौकी के पूरे स्टाफ ने चौकी इंचार्ज सत्यपाल, आइओ तालीम के नेतृत्व में सारे स्टाफ ने जिस प्रकार का रुख अख्तियार किया उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

मैं उच्च अधिकारियों से निवेदन करना चाहता हूं कि हमारे केस की उच्चस्तरीय जांच की व्यवस्था की जाए और हमारे ऊपर जो गलत  f.i.r. है उसे रद्द किया जाए. निवेदन है कि इस केस को किसी और पुलिस थाने में भेजकर शुरू से जांच कराई जाए, क्योंकि यहाँ पुलिस का मामला पूरी तरह से एकतरफा और बहुसंख्यक पब्लिक को परेशान करने वाला है.

मानवाधिकार आयोग,  महिला आयोग से भी हमारी गुजारिश है कि इस मामले को संज्ञान में लें, क्योंकि एक नहीं यह कई व्यक्तियों की जान से जुड़ा मामला है.

अभी कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है, लेकिन पुलिस जिस तरह से एक पक्ष को खुलेआम सपोर्ट कर रही है, उससे उत्साहित होकर संदीप, राजन अपने लोकल सपोर्ट और ग्रुप के साथ खुलेआम गुंडागर्दी पर उतारू हैं और एक नहीं, कई-कई व्यक्तियों को सीधे टारगेट पर रखा है, जान से मारने की धमकी दे रहे हैं और सिकरोना पुलिस चौकी खुद एक साजिशकर्ता के रूप में सामने खड़ी है.

कृपया त्वरित जांच और सुरक्षा प्रदान करें.

प्रार्थी - विमलेश कुमार सिंह, निवास - तुलसी कॉलोनी, मादलपुर, फरीदाबाद




प्रस्तुतकर्ता - मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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