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मालदीव में चीन की 'हार' का निहितार्थ

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आज़ादी के बाद से ही भारत के पड़ोस में 'ड्रैगन' एक बड़ा प्रतिद्वंदी रहा है. प्रतिद्वंदिता की यह कड़ी 21वीं सदी में कुछ ज्यादा ही दांव-पेंच से भरी दिखी है.

अब ज़रा यही देखिये कि भारत के पारंपरिक मित्र रहे देशों जैसे श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव इत्यादि पर कर्ज़ों का ज़ाल लाद कर चीन इस खुश फहमी का शिकार हो गया था या फिर है कि वह भारत को उसके पड़ोसियों द्वारा ही घेरने में सफल हो जाएगा!
कमोबेश उसकी यह रणनीति एक हद तक सफल होती भी दिखी है, लेकिन उसकी नीयत में खामी धीरे-धीरे ही सही सामने आ रही है. कहते हैं 'साफ नियत से कोई काम करो तो वह फलीभूत होता है, किंतु चीन की नियत में हमेशा से ही खोट रही है.

चीन भारत के पड़ोसी देशों की मदद इसलिए नहीं करना चाहता है कि वह उन पड़ोसी देशों को विकास के पथ पर अग्रसर करना चाहता है, बल्कि उसको तो भारत को घेरने की चिंता कहीं ज्यादा बनी रहती है.

पर भारत के धैर्य और स्थाई रणनीति से "बुरी नजर वाले चीन" का मुंह एक बार और मालदीव में "काला" हो गया है. मालदीव में जिस प्रकार चीन ने अपनी बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत कर्ज का जाल फैलाया था, उसके तहत मालदीव में भारत के विरुद्ध माहौल बनाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. 2013 से 2018 के बीच मालदीव के राष्ट्रपति रहे अब्दुल्ला यामीन पर चीन का दांव एक तरह से सफल हो भी गया था, क्योंकि अब्दुल्ला यामीन पूरी तरह से चीन के चंगुल में दिखने लगे थे. यहां तक कि अपने देश में उनका विरोध होने पर उन्होंने आपातकाल ही लगा दिया था, लेकिन एक वक्त के बाद धुंधलापन साफ हो गया और जब मालदीव में चुनाव हुए तो भारत के पक्ष में वहां की बहुसंख्यक जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले इब्राहिम मोहम्मद सोली सत्ता में काबिज हो गए.
यामीन का चीन का पिछलग्गू बनना मालदीव की जनता को ज़रा भी न भाया, क्योंकि 'जनता' को कोई नेता कितना भी मूरख समझे, किन्तु 'जनता सब जानती है'.

यहाँ से मालदीव भारत के करीब आने लगा, यहाँ तक कि नए प्रेजिडेंट ने भारतीय पीएम मोदी को अपनी शपथ-ग्रहण समारोह में ख़ास मेहमान की तरह बुलाया और भारत से अपनी नजदीकी जतलाने में ज़रा भी कोताही नहीं की.
बस इन बातों से चीन बौखला उठा और न केवल वह मालदीप पर अपनी धौंस दिखाने लगा, बल्कि अपने कर्जे का भारी-भरकम इनवॉइस भी मालदीप को थमाने में देर नहीं की. यह वाकया मीडिया में काफी चर्चित भी रहा. मालदीव के भारत से मजबूत होते संबंधों के कारण चीन की मीडिया भी बौखला उठी और ग्लोबल टाइम्स जो कि चीन का एक प्रमुख अखबार है उसके एक लेख में भारत द्वारा मालदीव की मदद की पेशकश को 'ओल्ड ट्रिक' बता दिया गया. ग्लोबल टाइम्स में यह भी लिखा गया कि भारत मालदीव से अपनी नजदीकी सिर्फ चीन को दूर रखने के लिए बना रहा है.

जाहिर तौर पर 'चोर को पूरी दुनिया चोर ही नजर आती है' और चीन को भी ऐसा लग रहा है कि उसकी तरह भारत भी 'नीचता' पर उतर आएगा और अपने पड़ोसियों पर कर्ज का जाल फैलाएगा, उनका अपने स्वार्थ की पूर्ती हेतु अनर्गल इस्तेमाल करेगा, लेकिन चीन संभवतः यह नहीं जानता है कि भारत के संबंध अपने पड़ोसियों से हमेशा से कल्चरल रहे हैं ना कि सिर्फ और सिर्फ व्यावसायिक, रणनीतिक या कूटनीतिक!

सिर्फ मालदीव ही क्यों श्रीलंका में हमने पिछले दिनों देखा कि किस प्रकार चीन के प्रभाव में रहने वाले नेता महिंदा राजपक्षे को जबरदस्ती चुनी हुई सरकार के मुखिया रानिल विक्रमसिंघे को हटाकर राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई और श्रीलंका में चीन का इस बार मोहरा बने वहां के राष्ट्रपति मैथ्रिपाला सिरीसेना.

हालाँकि वह भारत से अपने संबंधों का भी दम भरते रहे हैं लेकिन जिस प्रकार उन्होंने चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किया और चुनाव की घोषणा की जिसे बाद में श्रीलंकाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया उससे साफ जाहिर होता है कि वह चीन के हाथों की कठपुतली बन गए थे. बेशक उनका निर्णय इंटरनल पॉलिटिक्स के तहत ही क्यों ना लिया गया हो, लेकिन मीडिया में खबर यही आयी कि भारत के अगेंस्ट उनका निर्णय गया है. इससे थोड़ा पहले जाएँ तो श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट को जिस प्रकार से 99 साल की लीज पर चीन को दिया गया उसने भी श्रीलंकाई आवाम को एक तरह से नाराज कर दिया और श्रीलंका को अपने सदाबहार दोस्त भारत की याद आने लगी थी. श्रीलंका में दूसरे तमाम प्रोजेक्ट्स हैं, जिनसे वहां की जनता और नेताओं को चीन से घुटन महसूस होने लगी है, लेकिन चीन को तो सिर्फ 'भारत विरोधी रणनीति' से मतलब दिखता है.

कहा जाता है कि चीन ने किसी भी देश को खुले मन से विकास के लिए कर्ज नहीं दिया है बल्कि उसने हमेशा ही 'शॉर्ट टर्म पॉलिसी' अपनाई है और छोटे देशों को मजबूर किया है कि वह भारत विरोधी रणनीति अपना लें!

मालदीव, श्रीलंका के अतिरिक्त चीन जिस प्रकार से भूटान में अपना प्रभाव जमाने के लिए बेकरार दिख रहा है और इसी के तहत बहुचर्चित डोकलाम विवाद भी हुआ था, उससे उसकी मंशा साफ जाहिर होती है.

भूटान के बाद नेपाल में भी वह बिजली बनाने सहित दूसरी परियोजनाओं को लेकर काफी बेचैनी दिखला रहा है लेकिन नेपाल की बिजली का सबसे बड़ा खरीदार भारत ही रहा है और इस लिहाज से चीन को नेपाल में कुछ परियोजनाओं से अपना हाथ खींचना पड़ा है. जाहिर तौर पर भारत के लम्बे-ऐतिहासिक संबंधों के आगे चीन की आक्रामक-क़र्ज़ देने वाली पालिसी में गिरावट नज़र आने लगी है. अब धीरे-धीरे चीन की पॉलिसी और उसके कर्ज के जाल को भारत के तामाम पड़ोसी देश या यूं कहें कि विश्व के तमाम देश समझने लगे हैं और वह दिन दूर नहीं जब वह उसका पर्दाफाश वैश्विक पटल पर जल्द ही हो जाएगा.

यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी चीन के खिलाफ आवाम और लीडरशिप में नाराजगी दिखने लगी है. चूंकि पाकिस्तानी नेता भारत-विरोध में 'अंधत्व' की हद तक गुजर जाने को तैयार रहते हैं, इसलिए वह 'चीनी अपमान' का घूँट पीने को मजबूर हैं, किन्तु अन्य देश इस तरह का 'पागलपन' भला क्यों दिखलायेंगे?

ऐसे में मालदीव से चीन के प्रभाव के घटने की शुरुआत हो चुकी है और निश्चित ही यह चीन की विस्तारवादी रणनीति में माइलस्टोन कहा जाएगा. हाँ! छोटे देशों को चीन से सावधानी अवश्य ही दिखलानी होगी, क्योंकि उसका यही एजेंडा है कि सदियों से भारत के दोस्तों को उससे दूर कर दिया जाए. जाहिर है कि अब यह बात तमाम लोगों को समझ आने लगी है और ऐसे में चीनी लीडरशिप और वहां की मीडिया की बौखलाहट स्वाभाविक ही है.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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