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आधुनिक समय में संयुक्त परिवार: एक दृष्टि ...

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हिंदू सनातन धर्म 'संयुक्त परिवार' को श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान मानता है. धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो घर संयुक्त परिवार का पोषक नहीं है, उसकी शांति और समृद्धि सिर्फ एक भ्रम है. आज के बदलते सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं और उनकी जगह एकल परिवार आकार लेते जा रहे हैं. वर्तमान जीवनशैली और प्रतिस्पर्धा के दौर में तनाव के साथ अन्य मानसिक समस्याओं से निपटने में "अपनों का साथ" अहम भूमिका निभा सकता है, यह बात स्वयं सिद्ध की जा चुकी है. और बात जब अपनों की आती है तो फिर 'परिवार' और 'संयुक्त परिवार' ही वह स्तम्भ नज़र आते हैं, जहाँ "अपनों" का निर्माण होता है. यूं तो दुनिया में आपको तमाम दोस्त मित्र मिलते हैं, किन्तु जिनके साथ आप अपने जीवन का लंबा हिस्सा व्यतीत करते हैं, वह आखिर आपका परिवार ही तो होता है. खासकर, संयुक्त परिवारों में काफी लोगों की मौजूदगी आपको सामाजिक बनाती है तो मुसीबत के समय एक दुसरे के लिए सहारे का काम भी करती है. हाँ, इसके लिए 'संयुक्त परिवार' की रक्षा करनी होती है और वह होती है सम्मान, संयम और सहयोग से. सच कहा जाए तो, संयुक्त परिवार से संयुक्त उर्जा का जन्म होता है और संयुक्त उर्जा दुखों को खत्म करती है, ग्रंथियों को खोलती है. हालाँकि, अगर परिवार को सींचने में आपके सद्कर्म और सही ढंग से अर्जित किये गए संशाधन शामिल नहीं होते हैं तो इसके विपरीत कलह से कुल का नाश भी होता है. वस्तुतः संयुक्त हिंदू परिवार का आधार है: कुल, कुल की परंपरा, कुल देवता, कुल देवी, कुल धर्म और कुल स्थान. इन्हीं के आधार पर संयुक्त परिवार के लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर समस्याओं का हल ढूंढते थे और कारवाँ आगे बढ़ता चला जाता था. हालाँकि, वर्तमान में संयुक्त हिन्दू परिवार में 'अहंकार और ईर्ष्या' का स्तर बढ़ गया है, जिससे परिवारों का निरंतर पतन स्वाभाविक ही है. ईर्ष्या और पश्चिमी सभ्यता की सेंध के कारण हिन्दुओं का ध्यान न्यूक्लियर फेमिली की ओर ज्यादा हो गया है और इसी कारण परिवार के सहयोग से व्यक्ति वंचित हो जा रहा है. Samyukt Parivar, United Family, Joint Family Discussion in Hindi
Samyukt Parivar, United Family, Joint Family Discussion in Hindi (Pic Credit: yourarticlelibrary.com)
इससे भी बड़ी बात यह है कि संयुक्त परिवार बच्चे के विकास के लिए अमृत तुल्य होता है, खासकर उसके मानसिक विकास के लिए! वहीं एकल परिवार में बच्चे के मस्तिष्क की संरचना अलग हो जाती है, जो कई बार सामाजिक तालमेल में अक्षम सिद्ध होती है और नतीजतन अपराध और असामाजिक कार्यों में दुर्भाग्यपूर्ण बढ़ोत्तरी हो रही है. इसी क्रम में चर्चा करने पर हमें पता चलता है कि शास्त्र के अनुसार स्त्री परिवार का केंद्र बिंदु है और उसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रोल है परिवार को संजोने में. ऐसे ही, घर के बुजुर्ग की बातों का सम्मान और पालन करने पर संयुक्त परिवार की संरचना मजबूत होती जाती है. वैज्ञानिक ढंग से परिवार के सदस्य अगर अपना रोल निभाएं तो कोई कारण नहीं कि यह संस्था मजबूती से टिकी न रहे! पति से विरोध नहीं बल्कि अनुरोध, तो पति को भी पत्नी को आदेश नहीं देना चाहिए, बल्कि उससे अनुरोध ही करना चाहिए. वस्तुतः संयुक्त परिवार में स्त्री का सम्मान बेहद महत्त्व का है और जहाँ ऐसा होता है वहां रोग और शोक नहीं होते. संयुक्त परिवार में किसी विचार पर मतभेद होने पर संयमित रहकर सदस्यों से एकांत में और फिर सम्मिलित चर्चा करना चाहिए. इससे भी महत्वपूर्ण है कि स्त्री, पुरुष दोनों को अपना चरित्र उत्तम बनाए रखना चाहिए. शास्त्र कहते हैं कि जब पति-पत्नी में आपसी कटुता या मतभेद नहीं होता है तो गृहस्थी धर्म, अर्थ व काम से सुख-समृद्ध हो जाती है. यह बात पूर्णतः सत्य है और इसमें संशय नहीं किया जाना चाहिए. संयुक्त परिवार चूंकि टूटते जा रहे हैं, इसलिए इससे जुड़े विभिन्न रिश्तों की बात करना भी जरूरी है, ताकि आगे की पीढ़ियों को कम से कम इनका नाम याद तो रहे. संयुक्त परिवार में पिता के माता-पिता को दादी और दादा कहते हैं. ऐसे ही, पिता के छोटे भाई को काका (चाचा) एवं बड़े भाई को ताऊ कहते हैं. इसी तरह, पिता की बहन को बुआ, ताऊ की पत्नी को ताई इत्यादि कहा जाता है. संयुक्त परिवार में जहां बच्चों का लालन-पालन और मानसिक विकास अच्छे से होता है वहीं वृद्धजन का अंतिम समय भी शांति और खुशी से गुजरता है. यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिन बच्चों को कोई व्यक्ति पाल पोस कर बड़ा करता है, वह अगर बुढापे में दूर रहे तो उससे उत्पन्न पीड़ा का वर्णन नहीं किया जा सकता है. Samyukt Parivar, United Family, Joint Family Discussion in Hindi

संयुक्त परिवार में जहाँ बुजुर्गों का ख्याल रखने में सहूलियत होती है, वहीं हमारे बच्चे दादा-दादी, काका-काकी, बुआ आदि के प्यार की छांव में खेलते-कूदते और संस्कारों को सीखते हुए बड़े होते हैं. गृह कलह, सास-बहु, पति-पत्नी के झगड़े, गरीबी और आत्मकेंद्रित महत्वाकांक्षा के कारण एकल परिवार बनते जा रहे हैं, तो समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल सामने आ रहा है 'तलाक' के रूप में! एकल परिवार में विवाद के समय कोई किसी को समझाने वाला नहीं होता है तो सही राह भी नहीं दिखती है. कहा जा सकता है कि तलाक के बढ़ते मामलों से हमें संयुक्त परिवार बचा सकता है. इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार से सम्बंधित अनेक सिद्धांत और परिणाम हैं, जो मानव-मात्र के लिए न केवल आवश्यक हैं बल्कि अनिवार्य भी होने चाहिए! जैसे, यदि आप घर के सदस्यों से प्रेम नहीं करते हैं तो आपसे धर्म, देश और समाज के प्रति प्रेम या सम्मान की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है? थोड़ी सी सावधानी और नियमित दिनचर्या से हम संयुक्त परिवार को न सिर्फ टूटने से बचा सकते हैं, बल्कि घर में एक खुशनुमा वातावरण भी बना सकते हैं, जैसे घर के सभी सदस्य एक साथ बैठकर ही भोजन करें. साथ बैठ कर भोजन करने से एकता और प्रेम बढ़ता है, यह बात तो सभी जानते हैं, किन्तु मानते कितने हैं, इस बात में बड़ा क्वेश्चन मार्क है. कुछ छोटी मगर महत्वपूर्ण बातों की ओर इशारा करें तो, घर के सभी सदस्य एक दूसरे से हर तरह के विषयों पर शांतिपूर्ण तरीके से वार्तालाप करें, तो किसी भी सदस्य पर अपने विचार नहीं थोपे जाने चाहिए. घर में हंसी खुशी का माहौल रहे, इसके लिए सभी को अपने स्तर पर प्रयास करने चाहिए, वह भी लगातार. सबसे महत्वपूर्ण घर की अर्थव्यवस्‍था में सभी एक-दूसरे का बराबर सहयोग किया जाना आवश्यक है, खासकर वर्तमान में! यदि 'अर्थव्यवस्था' ठीक तरह से प्रबंधित हो गयी, तो 'पारिवारिक टूटन' का एक बड़ा कारण स्वतः ही दूर हो जाता है. अर्थव्यवस्था में व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए हमें 'अपने पैसे' बचाने और 'दूसरे सदस्य के पैसे खर्च कराने' की सोच से दूर रहना चाहिए. इसके साथ कुल परंपरा, रिवाजों का पालन करना और संयुक्त संपत्ति और पूंजी पर सभी का अधिकार तो हो ही, साथ में उसके प्रति कर्तव्य भी निश्चित होना चाहिए. कहा जाता है, वगैर कर्तव्य के अधिकार, विद्वेष को ही जन्म देते हैं. Samyukt Parivar, United Family, Joint Family Discussion in Hindi, Essay in Hindi, Hindi Articles
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अगर इस सन्दर्भ में समाज की बात की जाए तो हम देखते हैं कि अगर कोई पुश्तैनी संपत्ति है तो उसके सदस्य उसे बेचने और बर्बाद करने पर तुल जाते हैं, बजाय कि उसे बढ़ाने और मेन्टेन करने के! ऐसा करना कई लोगों को आसान और व्यवहारिक तो जरूर लगता है, किन्तु ऐसे लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि 'पुश्तैनी संपत्ति या ज़मीन' को बेचकर वह अपना और अपनी अगली पीढ़ी की जड़ ही काटते हैं. और पेड़ चाहे कितना भी विशाल हो अथवा छोटा हो, अगर उसकी जड़ काट दी जाए तो फिर उसे सूखना ही होता है. संयुक्त परिवार और उससे जुड़ी परम्पराओं को आप अपने संस्कार की जड़ मान सकते हैं. आगे विचार करते हैं तो समझ आता है कि पारिवारिक रिश्तों के बीच रुपयों को लेकर 'अहम्' की उत्पत्ति नहीं होनी चाहिए. सच कहा जाए तो, घर का कोई भी सदस्य किसी दूसरे सदस्य से न तो अमीर होता है और न गरीब. खून के रिश्ते में हमें 'मर्यादा' का ख्याल रखना चाहिए तो एक दूसरे की जरूरत पड़ने पर मदद भी करनी चाहिए. यदि यह सारी बातें हमें समझ आ जाएँ तो संयुक्त परिवार धरती का स्वर्ग बन जाता है. संयुक्त परिवार में जिम्मेवारियों का निर्वहन एक और कारक है, जिससे हमारे परिवार को मजबूती अथवा कमजोरी मिलती है. अतः माता-पिता, भाई-बहन, बेटी-बेटा और पत्नी के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ जाना उतना ही आवश्यक है. आधुनिक समय में वर्ष में एक या दो बार मनोरंजन या पर्यटन के लिए सभी मिलकर बाहर जा सकते हैं, जिससे एक दूसरे के साथ तालमेल करने में सहूलियत हो सकती है. छोटी बातों में यह भी महत्वपूर्ण है कि परिवार के सदस्यों को जहां एक दूसरे की बुराई करने से बचना चाहिए, वहीं उन्हें घर की स्त्रियों के मायके की बुराई से भी दूर रहना चाहिए. इसके विपरीत यदि घर के सदस्य यदि एक-दूसरे की तारीफ और सम्मान करेंगे तो निश्चित ही संयुक्त परिवार में एकजुटता आएगी. इसके साथ अपने परिवार की समस्याओं में परिवार के बाहरी लोगों के हस्तक्षेप को आमंत्रित नहीं करना चाहिए, भले ही वह आपके रिश्तेदार ही क्यों न हों! 'शकुनि' जैसे लोग अक्सर काम बिगाड़ते ही हैं. हालाँकि, कई लोग अच्छे भी होते हैं, किन्तु संयुक्त परिवार के बारे में अगर आप सामाजिक अनुभव देखें तो 90 फीसदी रिश्तेदार 'तोड़ फोड़' में ही सहयोग करते नज़र आते हैं तो फिर राई का पहाड़ भी वह बनाने में संकोच नहीं करते हैं. बेशक उसका परिणाम संयुक्त परिवार में बिखंडन ही क्यों न हो जाए! ऐसे ही, जहाँ तक हो सके नजदीकी रिश्तेदारों से लेन-देन से यथासंभव बचना चाहिए, क्योंकि इससे रिश्तों में खटास उत्पन्न हो जाती है, जो बाद में आपके पूरे संयुक्त परिवार पर असर डालती है. व्यवहारिक रूप से परिवार के पुरुष सदस्यों को किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए, क्योंकि वही संस्कार बच्चों में प्रत्यारोपित होते हैं. यह सब छोटी बातें हैं, जिनसे संयुक्त परिवार हमारे लिए धरती पर ही स्वर्ग के समान हो सकता है, बशर्ते उपरोक्त बातों को हम सही अर्थों में लेने का प्रयत्न करें तो!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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