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मुद्दा तो है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन...

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"मेरे बच्चे कल बाहर निकलेंगे तो रोड पर भीड़ उन्हें घेरकर पूछ सकती है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान इसलिए मुझे अपने बच्चों की भविष्य की चिंता होती है." यह बयान है नसीरुद्दीन शाह का जिस पर हो हल्ला मचा हुआ है... काउंटर में बहुत सारे प्रदर्शन हुए तो अभिनेता को अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल में अपना कार्यक्रम भी रद्द करना पड़ा.

इस कड़ी को आगे बढ़ाएं तो नसीर की तरह ही धांसू अभिनेता कहे जाने वाले अनुपम खेर का भी एक बयान आया कि "सेना पर पत्थर बरसाए जाते हैं, आर्मी चीफ को गालियां दी जाती है वायुसेना चीफ को जो मर्जी कहा जाता है और कितनी आजादी चाहिए लोगों को?"

ध्यान से देखेंगे तो यह दोनों बयान एक हद तक सही हो सकते हैं, लेकिन इन दोनों ही के पीछे छिपे मंतव्य कहीं ना कहीं राजनीति से प्रेरित प्रतीत होते हैं. हाल ही में 3 विधानसभा चुनावों के परिणाम आये, जिसमें बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा की इस हार से विपक्ष से जुड़े लोगों को एक मुद्दा हाथ लग गया कि अजेय दिखने वाले नरेंद्र मोदी की 2019 में हार हो सकती है!

चूंकि पहले भी पुरस्कार-वापसी जैसे अभियान चलाये जा चुके थे, किंतु तब कुछ खास असर नहीं पड़ा था और भाजपा एक के बाद दूसरे राज्यों को जीतती जा रही थी. जाहिर तौर पर असर नहीं पड़ता देख नरेंद्र मोदी का विरोध भी धीमा पड़ गया था...

आखिर अंत में जनता ही तो कसौटी होती है किसी भी दांव के चलने या ना चलने की! अब जबकि तीन राज्यों में भाजपा कुछ कमजोर सी दिख रही है, तब भाजपा-विरोधी राजनीति करने वालों को भी एक मौका मिल गया है और नसीरुद्दीन शाह जैसे अनुभवी और मजे हुए अभिनेता इस बात को नहीं समझते होंगे, ऐसा सोचना "बचकाना" ही है. ज़ाहिर तौर पर वह इस बात को बखूबी जानते हैं कि जो बात उन्होंने कही है, उसका राजनीतिक अभिप्राय क्या है और वास्तव में उसका असर कहाँ तक पड़ सकता है?
Naseeruddin Shah Statement and its meaning, Hindi Article (Pic: indiatoday)

उन्होंने कोई नई बात नहीं कही है बल्कि उनके जैसे स्तरीय व्यक्ति ने यह मुद्दा बहुत ही घिसे-पीटे और कमजोर ढंग से उठाया है. इसमें मुद्दे के हल की चाहत कम दिखी है और 'विपक्षी रुदन' ज्यादा दिखा है. हालाँकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता वर्तमान समाज में वास्तव में एक डर का माहौल फैला हुआ है. मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं और यह न केवल वर्तमान समाज, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उतना ही खतरनाक है.

हालाँकि, कई लोग इस माहौल के लिए सिर्फ भाजपा जैसी एकाध पार्टियों को इसके लिए एकतरफा ढंग से आरोपी बना देते हैं, जो पूरी तरह सच नहीं माना जा सकता. कमोबेश सभी पार्टियां जाति, धर्म और द्वेष की राजनीति करती हैं और यह 'कटु सत्य' हैं. जनता भी इस 'द्वेष और नफरत' की राजनीति को समझ ही रही है, तभी 2014 में कांग्रेस की बुरी पराजय हुई थी और वह सत्ताधारी दल से 44 सीटों पर सिमट गयी थी. कोई माने या ना माने किंतु पांच राज्यों मिजोरम, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव के पहले जिस तरह से अयोध्या में धर्मसभा और उसके बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में सभा की कोशिशें हुई उसके बावजूद भाजपा की हार भी कहीं ना कहीं अतिवादिता से जुड़ी हो सकती है!

जनता कई मुद्दों को समझने की कोशिश करती है और इसके लिए उसे किसी 'पुरस्कार गैंग की पुरस्कार वापसी' का रिफरेंस लेने की जरूरत नहीं पड़ती हैं, ना ही नसीरूद्दीन शाह जैसे अभिनेता के बयान की जरूरत उसे पड़ने वाली हैं, न ही अनुपम-बयानों की आवश्यकता उसे है.

जनता हर चीज को ढंग से समझती है और उस पर मजबूत अमल भी करती है जिससे बड़े से बड़े बादशाहों का डेरा डोल जाता है तो बेहतर हो कि नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर जैसे लोग जनता से जुड़े मुद्दों पर ज्यादा चिंता ना दिखलाएं. जनता अपनी चिंता और फिक्र करना खूब जानती है. ऐसे में सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेकने की बजाय गंभीरता से समाज किस दिशा में जा रहा है उस हेतु हर व्यक्ति को अपने स्तर पर सकारात्मक प्रयास करना होगा और ऐसे ही समाज में बदलाव आ सकेगा. नसीरुद्दीन शाह जैसे लोगों को समझना होगा कि अगर वाकई समाज में मॉब लिंचिंग और मुस्लिम विरोध जैसी घटनाएं बढ़ी है तो उसके लिए क्या वाकई सिर्फ वर्तमान सरकार ही जिम्मेदार है और नसीरुद्दीन शाह के बाद अनुपम खेर जैसे लोगों को भी समझना होगा क्या वाकई समाज के असल मुद्दों से समाज में नफरत फैलाने के मुद्दों से आंख मूंद लेने से काम चल जाएगा?

यह यक्ष प्रश्न है और इन प्रश्नों का उत्तर हर एक व्यक्ति को, हर एक नागरिक कोअपने स्तर पर ढूंढना होगा, तभी भारत कल्याण-पथ पर आगे बढ़ पायेगा. योगगुरु और बड़े बिजनेस मैन बन चुके बाबा रामदेव का बयान इस मामले में गौर करने लायक हैं. उन्होंने कहा हैं कि 'हिंदुस्तान में जितनी सामाजिक सहिष्णुता है, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं है और उन्हें (नसीरुद्दीन शाह) दुनिया घूमकर देख लेना चाहिए.' इसके साथ बाबा ने यह भी कहा हैं कि "भारत को सांप्रदायिक राष्ट्र बनाने का मकसद नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें आध्यात्मिक भारत और आध्यात्मिक विश्व बनाने की दिशा में काम करना होगा."

वो कहते हैं न कि समझदार को इशारा ही काफी होता हैं, लेकिन क्या द्वेष फैलाने वाले और उस नफरत पर हर एंगल से राजनीति करने वाले तथाकथित 'बुद्धिजीवी' इस बात को समझ पाएंगे, यह बड़ा सवाल हैं.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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