'कुम्भ की महत्ता और सुर-असुर प्रवृत्तियाँ'

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मैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का रहने वाला हूँ और अधिकांश बार ट्रेन से यात्रा के दौरान प्रयाग (इलाहाबाद) ज़रूर आता था. दस सालों से अधिक समय से तो दिल्ली में ही डिजिटल वर्ल्ड से जुड़ा अपना काम करता हूँ, किन्तु उससे पहले बचपन में भी जब मकर-संक्रांति के आसपास प्रयाग में गंगा-पुल पर ट्रेन क्रॉस करती थी, तब पुल के नीचे बने लाइट से जगमगाते टेंट्स आज भी सजीव हैं.
पुल पर अपेक्षाकृत ट्रेनें धीमी गति से चलती हैं और कभी-कभी सिग्नल न मिलने के कारण जब ट्रेन पुल पर रुक जाती थी तो मेरी चांदी हो जाती थी. रात कितनी भी हो, अपने गाँव आते और जाते समय इलाहाबाद से कई स्टेशन पहले से आँख फाड़-फाड़कर जगा रहता था. 

बहरहाल, इलाहाबाद अब प्रयाग हो गया और प्रदेश में कोई भी सरकार रहे, इस प्राचीन सांस्कृतिक आयोजन के लिए वह दिल खोलकर पैसा खर्च करती है तो सुविधाओं पर किसी प्रकार से कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है. इस बार तो व्हाट्सप्प पर कुम्भ के एक टेंट का विडियो मैंने देखा, जिसकी कल्पना फाइव स्टार में ही की जा सकती है.
ज़ाहिर है ज़माना बदला है, किन्तु ऐसी स्थिति में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या 'कुम्भ का उद्देश्य' भी बदल गया है?
कई लोग कह सकते हैं कि कुम्भ का भला क्या उद्देश्य हो सकता है... आखिर वह एक मेला ही तो है. इसके पीछे की कहानी भी लगभग प्रत्येक व्यक्ति को ही पता है कि अमृत-घट की सुर-असुरों में खींचतान से अमृत की कुछ बूँदें धरती के चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में गिर गयीं थीं और तब से ही 'कुम्भ' नामक मेला चला आ रहा है.
पर क्या वाकई इतनी भर ही महत्ता है 'कुम्भ' की...?

बताते चलें कि विश्व में इतना बड़ा आयोजन शायद ही कोई दूसरा हो. एक अनुमान के मुताबिक इस बार अर्धकुम्भ में तकरीबन 15 करोड़ लोग जुट सकते हैं तो 2012 के मुकाबले इस बार 12 गुना बजट भी बढ़ गया है. जी हाँ! 2012 में इसका बजट 200 करोड़ था तो इस बार 2500 करोड़ का बजट है. चलिए बजट की बातें छोड़ देते हैं, किन्तु आप सोचिये और गूगल कर लीजिये कि 15 करोड़ या उससे अधिक आबादी वाले विश्व में कितने देश हैं?

वर्ल्डओमीटर्स वेबसाइट के 2018 के आंकड़े के अनुसार, मात्र 8 देश इससे ऊपर हैं. जाहिर है, इसकी विशालता आप ही समझी जा सकती है... पर आश्चर्य यह है कि यहाँ कोई सरकार किसी को आमंत्रण-पत्र नहीं भेजती है कि आप 'कुम्भ' में आइये!

यह समूचा सिस्टम स्व-प्रेरित, स्व-संचालित है. न केवल भारत से वरन समूचे विश्व से लोग यहाँ आते हैं और भारतवासी 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव से उनका स्वागत करते हैं.
भारत को इन्टॉलरेंट कहने की नादानी दिखलाने वाले लोगों को यहाँ आकर 'वसुधैव कुटुंबकम' का भाव अवश्य ही महसूस करनी चाहिए. अगर ऐसे लोग खुद को 'बुद्धिजीवी' समझते हैं तो संगम के साथ ज्ञान का संगम भी यहाँ हर ओर मौजूद होता है. वह गंगा में बेशक डुबकी लगाएं न लगाएं, किन्तु 'ज्ञान-गंगा' में तो उनको अवश्य ही डुबकी लगानी चाहिए.
आखिर, अमृत की चाह किसे नहीं होती?
तो 'ज्ञान-अमृत' हासिल करने के लिए 'कुम्भ' से बेहतर जगह भला और क्या हो सकती है. गंगा के किनारे करोड़ों लोगों में जाति, पंथ और पूजा-पद्धति की दीवारें टूटती नज़र आती हैं. आप भी मेरी तरह सामान्य पुल से नीचे झांकियेगा और आपको 'विश्व' नज़र आएगा, वह भी एक परिवार की तरह.

कुम्भ से एक और बात जो मुझे समझ आती है, वह देव और असुरों के मिलकर कार्य करने की है. आज के समय में हर व्यक्ति खुद को सही(देव) तो दूसरे को गलत(असुर) ठहराने में लगा हुआ है.
समाज से समरसता कम होती जा रही है तो 'कुम्भ' का एक सन्देश यह भी है कि अगर अमृत रुपी फल प्राप्त करना है तो मिलकर 'मंथन' करना पड़ेगा. हाँ! मंथन के पश्चात् जो 'अमृत' निकलेगा, वह तो 'योग्य' को ही मिलेगा और इसके लिए विष्णु भगवान् को 'मोहिनी-रूप' में छल करने की ज़रुरत भी नहीं पड़ेगी.

इसको कुछ यूं समझा जा सकता है कि एक बाप के अगर दो बेटे हैं और मान लीजिये कि एक का स्वभाव देव और दूसरे का असुर जैसा है. अब ज़रा गौर कीजिए कि यश, धन की बराबर-बराबर मात्रा मिलने पर भी कौन उसे संरक्षित कर सकेगा और कौन उसका नाश कर देगा?

असुर प्रवृत्ति का वर्णन वर्तमान में हम इस सन्दर्भ में अवश्य ही ले सकते हैं. कुम्भ के बारे में और भी कई विचित्र दुनिया और सन्देश हम देखते रहे हैं और देखते रहेंगे. यह अनंत है, यहाँ 'अमृत' भी अनंत मात्रा में ही है और हमारी जितनी पात्रता होगी, उस अनुसार ही हम 'अमृत-ग्रहण' कर सकेंगे.

आप के 'कुम्भ' के बारे में क्या विचार हैं, कमेंट-बॉक्स में अवश्य बताएं.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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