अनसुलझा ही न रहे कश्मीर


आज़ाद भारत की सबसे बड़ी भौगोलिक और ऐतिहासिक समस्या के बारे में यदि पूछा जाय तो 90 फीसदी से ज्यादा नागरिक अवश्य ही कश्मीर का नाम लेंगे. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के ही काल से यह हमारे देश का ऐसा राजनैतिक घाव बन चुका है, जो हमेशा रिसता और दुखता रहता है. इसकी पृष्ठभूमि में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह समस्या क्यों उत्पन्न हुई और उस दौर के राजनैतिक नायकों, राजाओं का रोल तब क्या रहा, हम सब इससे भली - भांति परिचित हैं. लेकिन, आज जब भारत वैश्विक ताकत के रूप में तेजी से उभर रहा है, और साथ में उसके दुश्मन उसी तेजी से उसे घेरने का यत्न कर रहे हैं तो ऐसे में कश्मीर को लेकर हमारी स्पष्ट नीति होने की पुरजोर जरूरत महसूस हो रही है. ऐसा भी नहीं है कि विभिन्न समय की सरकारों ने इस सीमाई राज्य की समस्या सुलझाने को लेकर प्रयत्न नहीं किया है, किन्तु सच तो यही है कि आज तक कोई भी नीति उस गहराई से इस राज्य को आत्मसात नहीं कर सकी है, जैसा उसे होना चाहिए था. अब तो, पाकिस्तान द्वारा अधिकृत कश्मीर में चीन अपनी बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना लाने की घोषणा कर चुका है. पाकिस्तान में अब तक के सबसे बड़े निवेश की घोषणा करके भारत के दो पारम्परिक प्रतिद्वंदी (शत्रु) राष्ट्रों ने भारत के माथे पर चिंता की लकीरों को गहरा दिया है. इन अंतर्राष्ट्रीय दबावों से बढ़कर, घाटी में हो रही भारत-विरोधी घटनाएं माहौल को तनावपूर्ण बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं. हालाँकि, जम्मू कश्मीर में हुए बार-बार के चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि वहां की अधिसंख्य जनता भारत के साथ अपना भविष्य देखती है, किन्तु अलगाववादी गुटों के नेता और सीमा-पार से मदद प्राप्त आतंकी माहौल को हल्का नहीं होने देते. वहां की कुछ विशेष जनसभाओं में बार-बार पाकिस्तानी झंडे लहराना, राष्ट्रीय अस्मिता पर ऊँगली उठाता है तो वहां मौजूद भारतीय फौजों के खिलाफ नारेबाजी, पत्थरबाजी जैसी घटनाएं देश के नागरिकों को चिंता में डाल देती हैं. हालाँकि, वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत में पाकिस्तानी झंडे लहराने की घटना को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसी हरकतें करने वाले लोगों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा चाहे वह भारत के किसी भी हिस्से के क्यों न हों. मोदी सरकार का एक साल पूरा होने के मौके पर पत्रकारों से बातचीत में गृह मंत्री ने आगे यह भी कहा कि जो लोग भी ऐसी गतिविधियों में शामिल होंगे उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. प्रश्न यह है कि सिर्फ इस तरह की बयानबाजियां ही की जाएँगी, या इस सरकार द्वारा कुछ ठोस करने का साहस भी दिखाया जायेगा. कश्मीरी पंडितों को घाटी में बसाने की योजना की चर्चा इसमें से एक है, लेकिन इस योजना की रफ़्तार इतनी सुस्त है कि यह न तो पलायित कश्मीरियों में जोश भर पायेगी और शायद पूरी भी नहीं होने पायेगी. इसके अतिरिक्त रिटायर्ड फौजियों को वहां बसाने की बात जाने कबसे कही जा रही है. अंतर्राष्ट्रीय दबाव तो बनेंगे ही, किन्तु दृढ इच्छाशक्ति के साथ जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा संसद द्वारा ख़त्म किये जाने का फ्लोर मैनेजमेंट आखिर कब दिखाया जाएगा, यह राजनैतिक प्रबंधन करने वाले ही जानें. विदेश नीति के स्तर पर, आर्थिक संबंधों को आगे रखकर हम चीन और पाकिस्तान को कितना दूर रख पाते हैं, यह भी हमारे प्रधानमंत्री की कार्यकुशलता पर निर्भर करेगा, हालाँकि इस बात के विपरीत आसार ज्यादा दिख रहे हैं. मतलब हमारी आर्थिक क्षमताओं का लाभ तो चीन जरूर ले रहा है, किन्तु सामरिक स्तर पर वह हमें ज़रा भी भाव देने के मूड में नहीं दिखता है. बन्दूक के साये में ही सही, कश्मीर में पर्यटन को एक या दो नहीं, दस कदम आगे बढ़कर बढ़ावा देने की नीति काम आ सकती है, लेकिन इससे पहले हमें पर्यटकों को वहां सुरक्षा का माहौल देना ही होगा. इन सब दिखने वाले समाधानों के अतिरिक्त, तेज-तर्रार रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के अनुसार सेना और उनका मंत्रालय गुप्त अभियानों पर काम कर रहा है, जो हमारी रक्षा नीति को विशेष धार देगी. हालाँकि उम्मीद कायम है, लेकिन यदि इस समस्या को हम अब भी सुलझाने में नाकाम रहे, तो यकीन मानिये, कश्मीर के साथ सम्पूर्ण भारत समस्या से घिर जायेगा. आखिर, किसी व्यक्ति की गर्दन पकड़ ली जाय तो उसका शेष धड़ आप ही पकड़ में आ जाता है. ठीक इसी प्रकार से कश्मीर हमारे राष्ट्र का शीश ही तो है. राष्ट्र अब तुष्टिकरण की सरकारों वाले दौर से बाहर निकल चुका है, उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रीय अस्मिता को बार-बार चुनौती देने वाले तत्वों पर लगाम कसने में वर्तमान सरकार सफल रहेगी.

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