Friday, 24 March 2017

हिन्दू नववर्ष की महिमा एवं वर्तमान चुनौतिया - Hindu Nav Varsh, Importance and Opportunities

by on 20:36:00

त्यौहारों की धरती भारत में "हिन्दू नववर्ष" का खास महत्त्व है. चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष प्रतिपदा या युगादि भी कहा जाता है. इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है. कहते हैं शालिवाहन नामक एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से शत्रुओं का पराभव किया था. इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है. आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व 'ग़ुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है. किवदंतियों के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था, तो इसी दिन से नया संवत्सर (नवसंवत्सर) भी शुरू होता है. शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है. जीवन का मुख्य आधार 'वनस्पतियों को सोमरस' चंद्रमा ही प्रदान करता है और इसे ही औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है. संभवतः इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है.

Hindu Nav Varsh, Importance and Opportunities
देश भर में प्रचलित परम्पराओं की बात करें तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है. इसी तरह ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग भी तैयार होता है. दिलचस्प है कि महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की थी. कई लोगों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने बालि के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी. राजा बालि के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने तब घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां) फहराए थे. उसी की याद में आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र प्रदेश में प्रचलित है. दक्षिण के राज्यों की बात करें तो इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/ प्रसादम‘ बांटा जाता है. कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है. यूँ तो आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है, किन्तु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से 'आम' खाया जाता है. पारंपरिक रूप से नौ दिन तक मनाया जाने वाला यह त्यौहार दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होता है. 

ऐतिहासिक रूप से इसकी पृष्ठभूमि में अनेक कथाएं सुनने को मिलती हैं, किन्तु यह एक अजीब बिडम्बना है कि आज के आधुनिक समय में हमारी स्वस्थ भारतीय परम्पराओं को एक तरह से तिलांजलि ही दे दी गयी है. पाश्चात्य सभ्यता के 'न्यू ईयर' को हैपी बनाया जाने लगा है, किन्तु वैज्ञानिक रूप से तथ्यपरक होने के बावजूद हिन्दू नववर्ष को लोग महत्वहीन करने की कोशिशों में जुटे रहते हैं. 31 दिसंबर की आधी रात को नव वर्ष के नाम पर नाचने गाने वाले आम-ओ-ख़ास को देखकर आखिर क्या तर्क दिया जा सकता है! 

भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत से गहरा नाता है, इसलिए  इस दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं. धार्मिक लोग तो पवित्र नदियों में स्नान करते ही हैं, साथ में मांस-मदिरा का सेवन करने वाले लोग भी इस दिन तामसी पदार्थों से दूर रहते हैं. पर विदेशी संस्कृति के प्रतीक 1 जनवरी को मनाये जाने वाले नव वर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, अश्लील कार्यक्रमों से नयनाभिराम तथा अन्य बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का दूर-दूर तक रिश्ता नहीं रहा है. एक तरफ विक्रमी सम्वत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभियान की याद ताजा होती है, तो भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है,  जबकि ईसवी सन के साथ ही गुलामी द्वारा दिए गए अनेक जख्म हरे होने लगते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नव वर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नव वर्ष से कोई संबंध नहीं! काश कि हम सब भी यह समझते!

भारतीय त्यौहारों के सन्दर्भ में बात कही जाय तो न सिर्फ हिन्दू नव वर्ष, बल्कि प्रत्येक भारतीय त्यौहार हमारी सभ्यता से गहरे जुड़े हुए हैं और हमारे भूत, यानि हमारे बुजुर्ग, वर्तमान यानि युवा पीढ़ी और भविष्य यानि बच्चों के बीच में गहरा सामंजस्य स्थापित करते हैं. भारतीय त्यौहारों में एक संतुलन तो पाश्चात्य त्यौहारों में असंतुलन, एकाकीपन और यदि थोड़ा आगे बढ़कर कहा जाय तो शराब, शबाब इत्यादि के प्रयोगों से भारतीय शास्त्रों में वर्णित 'राक्षसी-प्रवृत्ति' तक का दर्शन होता है. इसके अतिरिक्त हमारे हिन्दुस्थान में सभी वित्तीय संस्थानों का नव वर्ष भी 1 अप्रैल से प्रारम्भ होता है, किन्तु कुचक्र रचने वालों की दुर्बुद्धि देखिये कि इस 1 अप्रैल को उन्होंने 'मूर्ख दिवस' का नाम दिया हुआ है. सच कहा जाए तो इस तरह के षड्यंत्रों और कुचक्रों से भारतीय सभ्यता को बदनाम करने में किसी प्रकार की कोर-कसर नहीं छोड़ी गयी है. भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि का सम्बन्ध भी चैत्र (अप्रैल) महीने से ही जुड़ा हुआ है. चैत्र में फसलों की कटाई होने के बाद किसानों के पास धन आता है और जब उनके पास धन आएगा तो निश्चित रूप से खुशहाली उनके कदम चूमेगी. बड़े दुःख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि देश भर के किसान आत्महत्या कर रहे हैं और देश में बनी नयी सरकार भी उनके लिए कुछ ख़ास नहीं कर पा रही है. ऐसी स्थिति में देश के किसान भला किस प्रकार हिन्दू नव वर्ष में खुशहाली का द्वार खोल पाएंगे, यह एक चिंतनीय विषय है. सच बात तो यह है कि किसानों के हित के ऊपर ध्यान देना लगभग बंद ही कर दिया गया है. हाँ, कभी कभार उनके ऊपर कर्ज माफ़ी को लेकर दया दृष्टि जरूर दिखलाई जाती है, किन्तु उनकी व्यथा कथा दूर करने के दीर्घकालिक उपाय कदापि नहीं किये जाते है.

हिन्दू नववर्ष को अगर प्रकृति के लिहाज से देखें, तो चैत्र शुक्ल पक्ष आरंभ होने के पूर्व ही प्रकृति नववर्ष आगमन का संदेश देने लगती है. प्रकृति की पुकार, दस्तक, गंध, दर्शन आदि को देखने, सुनने, समझने का प्रयास करें, तो हमें लगेगा कि प्रकृति पुकार-पुकार कर कह रही है कि नवीन बदलाव आ रहा है, नववर्ष दस्तक दे रहा है. वृक्ष अपने जीर्ण वस्त्रों (पुराने पत्तों) को त्याग रहे हैं, तो वायु (तेज हवाओं) के द्वारा सफाई अभियान भी चल रहा है. फिर वृक्ष पुष्पित होते हैं, आम बौराते हैं, सरसों नृत्य करता है और यह सब मिलाकर वायु में सुगंध और मादकता की मस्ती घुल सी जाती है. इस प्रकार के समृद्ध नववर्ष को छोड़कर यदि हम किसी और तरफ भागते हैं तो इसे हमारी अज्ञानता के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता है. जरूरत है इस अज्ञानता से हर एक को प्रकाश की ओर बढने की. शायद तभी हिन्दू नववर्ष की सार्थकता पुनः स्थापित होगी और इस सार्थकता के साथ समृद्धि, खुशहाली और विकास अपने पूर्ण रूप में प्रकाशमान होंगे.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Wednesday, 22 March 2017

ईगो की टकराहट और 'नशाखोरी' का कॉमेडी में क्या काम? The Kapil Sharma Show Controversy, Hindi Article

by on 17:16:00

नशा! कहते हैं नशा बहुत ही हानिकारक होता है. ना केवल शरीर के लिए वरन आपकी इज्जत, प्रतिष्ठा और आपके सामाजिक संबंधों के लिए भी! आम आदमी को कौन पूछता है, अगर हम सेलिब्रिटीज की बात करें तो सलमान खान का मुम्बई हिट एंड रन केस उनके नशे में रहने का परिणाम है, वहीं पॉलिटिशियन भगवंत मान ने तो संसद की गरिमा को नष्ट करने के साथ -साथ संसद की सुरक्षा की परवाह किये बगैर बाकायदा वीडियो तक बना डाली. नशे की बात चले और संजय दत्त का नाम ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता. हर वक़्त नशे में रहने के कारण इस एक्टर ने भी पब्लिक में बहुत हंगामा किया है और इसी नशे के कारण आज कल मशहूर कॉमेडियन कपिल शर्मा भी चर्चा में बने हुए है.

अपने टीम मेंबर के साथ बदतमीजी के वजह से लोगों को हँसाने वाले कपिल आजकल लोगों के टॉरगेट पर आ गए हैं  ख़बरों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया से अपना शो करके भारत वापस आने के दौरान  कपिल शर्मा ने शराब पी रखी थी और नशे की हालत में सुनील ग्रोवर और चन्दन उर्फ़ 'चन्दू चायवाला' को अपशब्द कहने के साथ ही उनसे हाथापाई भी किया. फिर क्या था यह खबर जंगल के आग की तरह फ़ैल गयी और चारों तरफ कपिल की खिंचाई होने लगी.
हालाँकि शुरू-शुरू में कपिल इस बात पर टाल-मटोल वाला रवैया अपनाते रहे, लेकिन जैसे ही उन्हें मुद्दे की गंभीरता समझ में आयी उन्होंने सोशल मीडिया पर सुनील ग्रोवर से माफ़ी मांग ली. अब सवाल ये उठता है कि कपिल जैसे सुलझे और खुशमिजाज इंसान ने क्या केवल अपने साथी कलाकारों से बदतमीजी इसलिए की होगी कि वो नशे की हालत में थे तो ये कुछ हजम नहीं होता! 

आपको याद होगा कि सोनी से पहले कपिल का शो कलर टीवी पर आता था 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' के नाम से तभी भी इस शो कि टीआरपी आकाश छूती थी. उस समय में भी शो में एक खास स्थान रखते थे सुनील ग्रोवर 'गुत्थी' के रूप में. भले ही शो की जान कपिल थे मगर गुत्थी की लोकप्रियता कपिल के पैरलल होती थी, तो कभी -कभी कपिल पर हावी भी हो जाती थी. फिर इन दोनों में अनबन की खबर आयी और सुनील कपिल का शो छोड़ कर नया शो लेकर आये 'मैड इन इंडिया'. स्टार प्लस पर यह शो बुरी तरह पिट गया और उधर कपिल के शो की भी टीआरपी लगातार गिर रही थी. खैर बाद में दोनों में समझौता हो गया और एक बार फिर ये दोनों एक साथ काम करने लगे. वैसे तो शो पर कपिल का ही राज है, फिर भी सुनील लोगों में आकर्षण का केंद्र रहते हैं. तो क्या ये पॉपुलैरिटी तो नहीं है आपसी कलह की वजह? अगर ऐसा है तो बेहद गंभीर बात है क्योंकि दोनों कलाकारों ने एक बार पहले भी खुद को आजम लिया है अलग-अलग राहें चुन कर.

The Kapil Sharma Show Controversy, Hindi Article
इन दोनों को समझना चाहिए कि इस शो में लोग कपिल की हाजिर जवाबी तो डॉक्टर गुलाटी की बेबाकी तो चंदू की चाय को एक साथ देखना पसंद करते हैं. इसलिए ये पॉपुलैरिटी किसी एक व्यक्ति विशेष की ना हो कर पूरी टीम की है.
एक अहम् बात ये भी है कि जो टीम को आगे लेकर चलता है उसकी जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं, असफलता का ठीकरा भी उसी सर फूटता है तो सफलता का श्रेय पूरी टीम को जाता है. बावजूद इसके एक लीडर को पूरी टीम भावना का ख्याल रखना चाहिए और अगर कोई गलती हो जाये या कोई सदस्य नाराज है तो बिना लीपापोती किये दिल दे उससे माफ़ी मांग उसे मानाने की कोशिश करनी चाहिए. और बाकि सदस्यों को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि आगे चलने वाले पर तमाम दबाव होता है और ऐसे में कोई बंदा अपनी गलती के लिए माफी मांग रहा है तो पिछली बातों को भुला कर अपने काम के प्रति जिम्मेदारी निभाएं.
हालाँकि कपिल शर्मा इस केस में लगातार माफ़ी मांगते दिख रहे हैं मगर सुनील ग्रोवर अभी तक कड़क बने हुए हैं. सोशल मिडिया के ही माध्यम से सुनील ने कपिल के माफ़ी का तंज भरा जवाब दिया है और कहा है कि अपने प्रसिद्धि और प्रतिभा पर ज्यादा गर्व न करते हुए दुसरो का भी सम्मान करना चाहिए और कभी भी गॉड बनने की कोशिस नहीं करनी चाहिए. हालाँकि इस घटना के बाद कपिल शर्मा को अहसास  हो गया होगा कि ऐसी हरकतें उनके स्टारडम को नुकसान पंहुचा सकती हैं. वहीं ये बात सुनील ग्रोवर शायद अभी तक नहीं समझे हैं क्योंकि खबर आ रही है कि वो चन्दन समेत खुद शो कि शूटिंग नहीं कर रहे हैं और ना ही किसी प्रोडक्शन टीम का फ़ोन उठा रहे हैं. खैर हम भगवान से प्रार्थना करेंगे कि कपिल और सुनील अपनी आपसी मतभेद सुलझा कर वापस लोगों का मनोरंजन करें.

ये सिर्फ एक घटना नहीं है बल्कि हम अपने जीवन में भी अक्सर ये रुख अपना लेते हैं काम करते -करते हम टीम भावना से कब ऊपर उठ जाते हैं पता ही नहीं चलता. और फिर ऐसा महसूस करने लगते हैं कि मिलने वाली सारी सफलता सिर्फ और सिर्फ हमारी वजह से है. यह पूरी तरह से गलत है. अगर आप किसी भी टीम में है तो इस सफलता में सबका सहयोग है, कुछ कम कुछ ज्यादा. इसलिए अपने सहयोगियों और सहकर्मियों को उतना ही मान सम्मान दें जितना वो हमे देते हैं, ताकि संतुलन बना रहे और आपका काम-काज प्रभावित ना हो.

एक बात और आज कल की पीढ़ी में नशा करना एक स्टेटस माना जाने लगा है. कुछ लोग नशा शौक से करते हैं तो कुछ लोग आदतन. लेकिन दोनों ही हालत में लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसके लिए कई बार उनको शर्मिंदा भी होना पड़ता है. और तो और उनके व्यवसाय पर भी इसका असर पड़ता है. आप पंजाब का उदाहरण ले सकते हैं. नशा वहां की पीढ़ी को ही बर्बाद करने लगा है. इसलिए जितना संभव हो सके नशे से दूरी बनाये रखें, वरना आपको भी कपिल शर्मा वाली स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. 


हालाँकि, इस पूरे वाकये के बीच यह भी संभव हो सकता है कि अपने शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए यह पूरा ड्रामा रचा गया हो. भाई, फिल्म वाले हैं ऐसे "ड्रामे" कर ही सकते हैं. वैसे ऐसा है तो भी इस समूचे ड्रामे से भी यह सन्देश तो मिलता ही है कि 'घमंड' से दूर रहें तो और भी अच्छा, किन्तु नशे से अवश्य ही दूर रहें. तो फिर हंसते रहें, मुस्कराते रहें और...

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Monday, 20 March 2017

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by on 01:17:00



- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.





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Wednesday, 8 March 2017

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by on 19:57:00



- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.





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Tuesday, 7 March 2017

उत्तर प्रदेश चुनाव में सिमटी समूची 'राजनीति' - UP Election 2017, Hindi Article

by on 22:57:00

चुनावी बेला में अंतिम लड़ाई होने वाली है, तलवारें खिंच चुकी हैं. सभी पार्टियां जी-जान से उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण के चुनाव के लिए अपनी ताकत झोंक चुकी हैं. खासकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अति सक्रियता से यह चुनाव लोकसभा के चुनाव से कम रोमांचक नहीं लग रहा है. ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रधानमंत्री के लिए उत्तर प्रदेश की जंग जीतना उनके अब तक के केंद्रीय कामकाज पर एक जनादेश के रूप में संकेत हो सकता है. इस चुनाव के अंतिम चरण की अहमियत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि भाजपा के 50 से अधिक मंत्री बनारस में डेरा डाले हुए हैं, तो पत्र-पत्रिकाओं में कई ऐसे कार्टून छप रहे हैं, जिसमें बनारस का कोई निवासी अल सुबह अपने दरवाजे पर दस्तक होते ही कहता है कि वह दूध वाला ही नहीं मोदी जी भी हो सकते हैं, इसलिए दरवाजा जल्दी खोलो!

UP Election 2017, Hindi Article, Modi, Rahul,Akhilesh, Mayawati (Pic: hindustantimes.com)
कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय बनारस बेहद हाईटेक चुनाव की गवाही दे रहा है. सवाल सिर्फ बनारस का ही नहीं है. इसकी तह में जाकर देखते हैं तो पाते हैं कि एक तरह से वाराणसी को पूर्वांचल की राजधानी ही कहा जाता है, क्योंकि यूपी की ऑफिशियल राजधानी बेशक लखनऊ हो, किन्तु पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग यात्रा, खरीददारी या फिर किसी अन्य सुविधा के लिए बनारस का ही रूख करते हैं. इसलिए बनारस में जो भी गतिविधियां हो रही हैं, उसकी चर्चा पूर्वांचल में गांव-गांव तक हो रही है, तो पीएम मोदी का क्षेत्र होने की वजह से इसकी चर्चा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में हो रही है. 

भाजपा का तो यहां काफी कुछ दाव पर लगा ही हुआ है, क्योंकि बिहार चुनाव हारने के बाद अमित शाह के लिए यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. हालाँकि, भाजपा अपनी रणनीति से अंतिम चरणों में बढ़त बनाती जरूर दिख रही है, जबकि तमाम ग्राउंड रिपोर्ट में शुरुआती चरणों में मायावती को बढ़त लेते हुए दिखाया गया था. 
इसी क्रम में यदि अखिलेश और राहुल गांधी की बात करें तो दोनों के गठबंधन होते समय कुछ ऐसा लगा था, मानो चुनावी मैदान से यह सभी का सफाया कर देंगे, किंतु धीरे-धीरे यह ख़ुमार उतरता गया. इसके दो बड़े कारण माने जा सकते हैं, एक तो अखिलेश यादव को उम्मीद थी कि खुद मुलायम सिंह यादव सपा के चुनावी समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए मैदान में पहलवान की तरह उतरेंगे, तो कांग्रेस भी अपने तुरुप के इक्के यानी प्रियंका गांधी को चुनाव प्रचार के लिए खुले तौर पर उतारेगी. देखा जाए तो सपा और कांग्रेस दोनों की तरफ से यह प्रयास नहीं किए गए और ऐसे में अखिलेश के कंधों पर कहीं ज्यादा भर आ गया. 
कमजोर पक्ष यह भी कि शिवपाल अखिलेश विवाद के बाद पार्टी के कई नेता दूसरी पार्टियों का दामन थाम चुके हैं, तो कई जगहों से भीतरघात की भी खबरें आयी हैं. वैसे भीतरघात हर पार्टी में खुलकर सामने आया है और कांग्रेस की बात करें तो इस पार्टी का प्रदेश में कोई ख़ास जनाधार तो बचा नहीं था, ऊपर से राहुल गांधी कोई खास करिश्मा कर ले जाएंगे, इस बात की उम्मीद शायद ही किसी को हो! वैसे चुनाव में जनता कब क्या कर दे, इसको लेकर अटकलें लगाना आसान नहीं है.

यदि समीकरणों की बात करें तो, कहा जा रहा है कि इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने सपा के कोर वोटर्स, यानी 'मुस्लिमों' को तोड़ने में काफी हद तक सफलता हासिल की है. इसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए, आखिर 100 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर मायावती ने बेहद मजबूत संदेश दिया है. 
अब उन मुस्लिम उम्मीदवारों को कोई धनाढ्य मुसलमान कहे या फिर जनाधार विहीन मुसलमान कहे, इससे कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि उन सीटों पर मायावती का दलित वोट पूरी तरह से उन मुस्लिम उम्मीदवारों को ट्रांसफर हो जाएगा. वही मुस्लिम सीटों पर यह उम्मीदवार काफी पहले घोषित हो गए थे और ऐसे में उन्होंने जमीनी तौर पर अपने लिए समर्थन अवश्य ही जुटाया होगा. 
ऊपर से इमाम बुखारी और देवबंद के कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मायावती को सपोर्ट देकर पत्ते खोल दिए हैं.  लब्बो-लुआब यह कि इस चुनाव में तीनों मुख्य पार्टियों के अपने मजबूत पक्ष हैं, तो कमजोर पक्ष भी हैं. 

भाजपा के कमजोर पक्ष की बात की जाए तो अमित शाह द्वारा तमाम दलबदलुओं को अपनी पार्टी में शामिल करने से यह व्यवस्था शुरुआत में काफी हद तक चरमरा गई थी तो विरोध खुल कर साथ पर आ गया था, वहीं पूर्वांचल में आदित्यनाथ योगी और चर्चित नेता वरुण गांधी की आंतरिक नाराजगी ने पार्टी की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पर मानना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से अमित शाह के डिसीजन के साथ खड़े हुए और उन्होंने दिन रात एक कर अमित शाह के डिसीजन को सही साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, उसने भाजपा को अंतिम समय में काफी मजबूती प्रदान की है. समाजवादी पार्टी के कमजोर पक्ष की बात करें तो अखिलेश की रणनीतियां का ग्राफ नीचे की तरफ ही गया है. हालाँकि, अपने ऊपर और यूपी के विकास कार्यों को लेकर उठे हर सवालात का जवाब इस युवा नेता ने वगैर धैर्य खोये दिया है. मायावती की पार्टी में वह अकेली 'स्टार' हैं, इसलिए उनकी मजबूती और कमजोरी वह खुद ही हैं. अगर उनका 'मुस्लिम कार्ड' चल गया तो वह छुपा रुस्तम साबित हो सकती हैं, क्योंकि शुरू से उन्होंने मुस्लिम और दलित वोटर्स की इंजीनियरिंग पर बड़ी बारीकी से कार्य करना शुरू किया था. 

यह तो रहा राजनीतिक समीकरण, किन्तु उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रचार के दौरान तमाम राजनीतिक मर्यादाएं तो टूटी ही, एक दूसरे पर गाली गलौज से लेकर श्मशान, कब्रिस्तान, बिजली कटौती इत्यादि मुद्दों पर जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोप किए गए, उसने चुनाव की गरिमा तो घटाई ही है. ले देकर गधों की राजनीति ने इसमें एक नया ही ट्विस्ट डाल दिया. 
जाहिर तौर पर राजनेताओं को समाजिक गरिमा के प्रति सचेत रहना होगा और यही एक बड़ी वजह है जिससे आने वाले दिनों में लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी, अन्यथा सरकारें तो बनती हैं और बिगड़ती भी हैं, किंतु रह जाता है तो उनका काम करने का अंदाज और राजनेताओं के साथ पार्टियों का जमीनी आधार. 
इसके साथ यह बात भी कई बात सच हो जाती है, जिसमें चुनाव परिणाम आने पर पता चलता है कि जनता तमाम आंकलनों और समीकरणों को ध्वस्त करते हुए अपना फैसला सुना देती है. लोकतंत्र की असल ख़ूबसूरती भी तो यही है और जनता इस ख़ूबसूरती को हर बार बचाती हुई आयी है और इस बार भी वही होगा, इस तथ्य में दो राय नहीं!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Sunday, 5 March 2017

जेंडर इक्वलिटी: महानायक की सकारात्मक पहल से 'सीख' ले समाज - Gender Equality, Amitabh Bachchan Positive Step

by on 11:57:00


हमारे देश में प्राचीन काल से ही ऐसी मान्यता थी कि औरतें कमजोर होती हैं और वो अपने निर्णय खुद नहीं ले सकतीं. उन्हें हमेशा किसी न किसी पर निर्भर रहने की परंपरा में बांध दिया गया है. हालाँकि, इसके पक्ष और विरोध में कई तर्क/ वितर्क हो सकते हैं, किन्तु सच यही है कि 21वीं सदी में बदलाव होना ही चाहिए. काफी समय से ऐसा माहौल बनाया गया है कि औरत को बचपन अपने पिता के अधीन, शादी के बाद पति के अधीन और अपनी वृद्धावस्था या विधवा होने के बाद अपने पुत्र के अधीन रहना चाहिये. किसी भी परिस्थिति में उसे खुद को स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं रही है और ना ही पुरुषवादी समाज इस बात स्वीकार कर पाता है. यहाँ इस बात का यह मतलब कतई नहीं है कि हमें भारत की पारिवारिक व्यवस्था को तोड़ देना चाहिए, बल्कि इसके मूल में 'निर्णय लेने की शक्ति' और अधिकारों पर बराबर का हक़ महिलाओं को भी मिले, इस बात की पैरवी है. दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिलाओं ने इस बात को 'यथास्थिति' में स्वीकार भी कर लिया. हालाँकि, पहले उनकी कई मजबूरियाँ रही होंगी, पर आज के समय में उन्हें 'यथास्थितिवाद' का विरोध करना ही चाहिए. इसका यह मतलब भी नहीं है कि विरोध के नाम पर तलाक और बच्चों के लालन-पालन से मुक्ति की राह ढूंढ लेनी चाहिए, वरन अपने उद्यम से यह साबित करना चाहिए कि 'गृहस्थी' की गाड़ी में वह भी बराबरी में चलने वाला पहिया है. निश्चित रूप से इस स्थिति को बदलने में समय लगेगा, पर बेहतर विकल्प यही है. समाज के बुद्धिजीवी, सफल लोगों और आम पुरुषों को भी लड़कियों के अधिकारों को लड़कों से कम कतई महत्त्व नहीं देना चाहिए. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने इस सम्बन्ध में एक नज़ीर देने की कोशिश की है, जिसकी ओर गौर फ़रमाया जाना चाहिए.

अमिताभ बच्चन की सकारात्मक शुरुआत
यूं तो हमारे देश के कानून ने मान्यता दी है कि प्रत्येक बेटी को बाप की जायदाद  में बराबर का हिस्सा मिलेगा, लेकिन इसे मानता कौन है? जैसे और बहुत सारे कानून नाम मात्र के लिए बने हैं, वैसे ही ये भी महिलाओं के हक़ में बना एक नाम मात्र का कानून ही है. चूंकि कानून तभी असरदार होते हैं, जब लोग बाग़ उसका अनुसरण करते हैं. इस दिशा में सार्थक कदम उठाते हुए बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने लोगों को 'मजबूत सन्देश' देने का प्रयास किया है और वह यह कि "बेटे और बेटी में वाकई कोई फर्क नहीं है". इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति में बेटी को भी उतना ही हक़ दिया है, जितना अपने बेटे को! मतलब अमिताभ बच्चन अपने बेटे अभिषेक बच्चन और स्वेता नंदा बच्चन में अपनी संपत्ति बराबर बाटेंगे. उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा है, "जब मैं मरूंगा, तो मेरी संपत्ति बेटी और बेटे के बीच बराबर-बराबर बांटी जाएगी".
समाज में अच्छी बातें करने वालों की कमी नहीं है, किन्तु एक कदम आगे बढ़कर समाज की धारा को सकारात्मक मोड़ देने का जो साहस अमिताभ बच्चन ने दिखलाया है, उसे सलाम किया जाना चाहिए. और सलाम ही क्यों, उस राह पर चलने का प्रयास हर एक को करना चाहिए. लगे हाथ महिलाओं से जुड़े कुछ और मुद्दों की बात भी कर लेते हैं, क्योंकि एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने से ही हम कुछ प्रगति कर सकते हैं.

Gender Equality, Amitabh Bachchan Positive Step, Pic: Google Search
महिलाओं के पिछड़ने की प्रमुख वजहें
अगर हम समाज में महिलाओं के पिछड़ने के कुछ कारणों को ध्यान दें, तो पाएंगे कि समाज का पुरुषवादी स्ट्रक्चर मुख्य रोड़ा रहा है. हमारे समाज में ऐसी मान्यता रही है कि लड़का पैदा होगा तो घर की जिम्मेदारी उठाएगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा. इसके उलट बेटी को तो पराये घर जाना है और उसके शादी में खर्च भी तो होना है. ऐसी मान्यताएं लगातार महिलाओं की स्थिति को समाज में कमजोर करती गयीं. हालाँकि, अब शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में महिलाओं को बराबरी की निगाह से देखे जाने की कोशिश जरूर हो रही है, किन्तु अभी काफी दूरी तय की जानी बाकी है. वहीं, दूसरी तरफ गरीबी और शिक्षा की कमी भी औरतों को समाज में बराबरी का हक़ ना मिलने  के लिए जिम्मेदार है. जब किसी गरीब परिवार में बेटी का जन्म होता है तो वो परिवार इतना सक्षम नहीं होता है कि सारे बच्चों को बराबर शिक्षा और बेसिक सुविधाएँ दे सके और ऐसे में लड़कियों को यह कह कर संतोष दिलाया जाता है कि तू पढ़ कर क्या करेगी आगे तो चूल्हा ही फूंकना है, तेरा भाई पढ़ेगा तो नौकरी कर घर कि जिम्मेदारी उठाएगा. इस तरह एक लड़की के पिछड़ने की शुरुआत हो जाती है. वहीं अपेक्षाकृत थोड़े संपन्न परिवारों में ऐसा देखने को कम मिलता है और लड़की की भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बेसिक जरूरतों को पूरा किया जाता है. प्रत्येक साल हाई स्कूल और इंटर मीडिएट में लड़कियों का परीक्षा परिणाम लड़कों से बेहद अच्छा होता है, और अगर माता-पिता लड़कियों की शिक्षा पर निवेश करें तो वो नौकरी प्राप्त करने के क्षेत्र में पिछड़ी नहीं रहेंगी. हालाँकि, बात हमारे एजुकेशन सिस्टम की भी है, जिसमें ऊँची से ऊँची पढ़ाई करने के बावजूद क्या लड़का और क्या लड़की, धक्के खाते नज़र आते है. बात यहाँ 'जॉब ओरिएंटेड' और उससे भी आगे बढ़कर कहा जाए तो 'व्यवहारिक शिक्षा' देने की होनी चाहिए. लड़कियों के मामले में यह और पेचीदा हो जाता है. ऐसे ही शादी के बाद औरतों के जॉब छोड़ने की संख्या काफी ज्यादा है और इसका एक ही स्वस्थ हल है कि 'होम बेस्ड जॉब्स' की संख्या बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाए. इन्टरनेट की दुनिया इस बात की ओर सकारात्मक इशारा जरूर करती है, किन्तु महिलाओं को सही दिशा दिखाने की जरूरत अवश्य है, जिसे संगठित रूप से किया जाना चाहिए.

क्या कहते हैं आंकड़े
कन्याभ्रूण हत्या एक अमानवीय कार्य है और यह बेहद शर्मनाक है कि इस प्रकार की कुप्रथाएं आज भी देश में बड़े पैमाने पर प्रचलित हैं. बेटे की चाहत में लगभग 1,00,000 अवैध गर्भपात हर साल केवल इसलिये कराये जाते हैं, क्योंकि गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़की का भ्रूण होता है. हालाँकि प्रसवपूर्व लिंग जाँच भारत में पूर्णतः अवैध है फिर भी पैसों के लालच में कुछ मेडिकल संस्थान और डॉक्टर्स इन कार्यों को अंजाम दे रहे हैं. इस तरह के कुकृत्य लिंगभेद को बढ़ावा देने के साथ ही लैंगिक असमानता को भी बढ़ाता है. इसके साथ ही विश्व आर्थिक फोरम ने 2016 के लिए ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जारी की थी जो शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति और आर्थिक आधार पर दुनिया के विभिन्न देशों में महिलाओं की स्थिति बयां करती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक लैंगिक समानता के मामले में भारत 144 देशों में 87वें पायदान पर है, वहीं चीन 99वें और पाकिस्तान 143वें स्थान पर है. हालाँकि लैंगिक समानता के मामले में पिछले साल की तुलना में सुधार जरूर हो रहा है, फिर भी स्थिति गंभीर ही कही जायेगी. सकारात्मकता की बात करें तो, जेनेवा के विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) द्वारा तैयार किए गए वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सबसे ज्यादा सुधार शिक्षा के क्षेत्र में हुआ है, जहां ''भारत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में अपने अंतर को पाटने में पूरी तरह सफल रहा है. हालाँकि, सम्पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करने में भारत को 113वां स्थान मिला. इस सन्दर्भ में डब्ल्यूईएफ का कहना है कि आर्थिक परिदृश्य में ''और अधिक काम किया जाना बाकी है''. इस क्षेत्र में 144 देशों में भारत 136वें स्थान पर है, वहीं अगर स्वास्थ्य की बात करें तो स्वास्थ्य एवं जीवित बचने के मामलों में इसे निचला, मतलब 142वां स्थान मिला. लेकिन, ख़ुशी की बात ये है कि राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में भारत का स्थान शीर्ष 10 देशों में रहा. साल 2015 में दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों ने डब्ल्यू20 नाम का एक कार्यक्रम लांच किया था, जिसमें जी20 देशों की 20 महिला नेता होंगी. महिला नेताओं की भागीदारी वाले इस समूह का मुख्य उद्देश्य लैंगिक समानता वाले वैश्विक आर्थिक विकास को बल देना है और आर्थिक विकास प्रक्रिया में महिलाओं को सशक्त बनाना  है. वहीँ डब्ल्यू20 की नवनियुक्त अध्यक्ष गुल्देन तुर्कतान ने कहा कि यह लीक से हटकर काम करेगा और महिलाओं के सशक्तिकरण के जरिए आर्थिक विकास प्रक्रिया में लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करेगा.

राजस्थान ने पेश की मिसाल
वैसे तो पूरे भारत में बेटियों की संख्या बेटों की अपेक्षा कम है, अर्थात पूरा भारत लिंगानुपात की समस्या से जूझ रहा है, किन्तु हरियाणा और राजस्थान में स्थिति और भयावह है. इन राज्यों में आलम ये है कि हज़ारों लड़के कुंवारे रहे हैं, क्योंकि वहां लड़कियों की भारी कमी है. कई बार तो शादी के लिए यहाँ के लोग दूसरे राज्यों पर निर्भर रहते हैं. इन सब के बीच राजस्थान ने अपने ऊपर लगे इस धब्बे को धोते हुए साल दर साल बाल लिंगानुपात पर काम किया है. राजस्थान में लोगों का बेटियों के प्रति नजरिया बदल रहा है और इसी का नतीजा है कि पहली बार राजस्थान में लड़कियों की किलकारियां लड़कों से ज्यादा सुनाई दी हैं. जी हाँ, राजस्थान के टोंक में 1000 लड़कों पर 1002 लड़कियों के जन्म का रिकॉर्ड वो तस्वीर है, जिस पर हर राजस्थानी को नाज है. इसके साथ ही अन्य राज्यों को भी इससे सीख लेते हुए बेटियों की स्थिति में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए.
सशक्त नारी की संकल्पना
प्रकृति का नियम है कि जो “ताकतवर है उसे ही समाज में अधिकार प्राप्त है” और धीरे-धीरे इसी सिद्धांत को अपनाकर पुरुष जाति ने अपने शारीरिक बनावट और शक्ति के बल पर समाज में अपना प्रभुत्व कायम किया. हालाँकि, सिर्फ शारीरिक ताकत ही 'प्रभुत्व' का पैमाना रहता तो हाथी और व्हेल जैसे बड़े जानवरों का शासन इस पृथ्वी पर रहता, इसलिए औरतें को अपनी शारीरिक कमजोरी को अपना नसीब व नियति समझकर बैठ नहीं जाना चाहिए. किसी महान ऋषि का कथन है कि अगर पुरुष में नारी के गुण आ जाएँ तो वह ऋषि बन जाता है, वहीं अगर नारी में पुरुष के गुण आ जाएँ तो कई बार 'कुलटा' हो जाती है. इस बात को सकारात्मकता के साथ लेकर नारी जाति को अपने मूल गुणों विनम्रता, ममता इत्यादि को कायम रखते हुए अपनी ताकत साबित करनी होगी. इस कथन का अभिप्राय यह भी नहीं है कि दुष्टों के साथ विनम्रता का चोला ओढ़े रहा जाए, बल्कि उसे ताकत और सामर्थ्य के साथ सही रास्ते पर लाया जाए. ऐसे में अब हालात बदल भी रहे हैं और महिलाएं हर उस क्षेत्र में जहाँ पुरुष का बोल बाला रहा है, वहां भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. आप बॉडी बिल्डिंग से लेकर कुश्ती, फिर चाहे वेट लिफ्टिंग ही क्यों न हो महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वो किसी पुरुष से कम नहीं हैं, बल्कि कई बार तो उनसे आगे हैं. अगर महिलाएं ठान लें तो वे कोई भी मुश्किल काम कर सकती हैं. अगर हमें भावी पीढ़ी को समाज के प्रति संवेदनशील, सहिष्णु बनाना है तो हमें भी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की मुहिम में भागीदार बनना होगा. सशक्त महिलाएं ही समाज को सही राह दिखाने व सामाजिक मूल्यों को बरकरार रखने में सहायक हो सकती हैं.

उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग अमिताभ बच्चन के कदम (बेटा-बेटी एक समान) से प्रेरणा लेंगे और बेटियों के प्रति अपने नजरिये को बदलेंगे. लड़कियों को इतना सक्षम बनाएंगे कि वो आत्मनिर्भर हों, तब जा कर कहीं समाज में हो रहे लिंग पर आधारित भेद -भाव  को कम किया जा सकता है.
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Sunday, 26 February 2017

I Recommend this Hindi Article, BBC Hindi, Cooking, Fooding

by on 11:38:00



- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.





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गालियों के सहारे यूपी फतह की कोशिश में हैं राजनेता - UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics

by on 10:25:00


किसी का काम बोलता है, तो किसी को साथ पसंद है. वहीं कोई सबके साथ में विकास की बात करता है तो कोई दलितों के उद्धार की बात करता है. समस्या यह है कि यह 'अच्छी बातें' सिर्फ बैनर - पोस्टरों तक ही सीमित रह गयी हैं, क्योंकि यूपी में चुनाव के अंतिम फेज तक आते आते नेताओं ने नया ट्रेंड पकड़ लिया है और वो है एक दूसरे पर कीचड़ उछालना. न केवल कीचड़ उछालना, बल्कि इतनी घटिया भाषा का प्रयोग करना जिसको सुनकर आश्चर्य होता है कि क्या ये वही नेता हैं जो हमारा प्रतिनिधित्व करेंगें? क्या यही सदन में बैठकर हमारी बेटी बहनों की सुरक्षा का इंतजाम करेंगे? या हमारे बच्चों के भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने का जिम्मा हम इन्हें ही देने वाले हैं? इन ओछी बातों को ये नेता लोग इतनी सरलता और आत्मविश्वास के साथ करते हैं जैसे जनता निरी मूर्ख हो और उसे ऐसी बातें आसानी से सुनायी जा सकती हैं. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ यूपी के चुनाव में हो रहा है, बल्कि बिहार चुनाव में भी भाषा की अश्लीलता का भरपूर नज़ारा देखने को मिला था. इसी कड़ी में कुछ दिन पहले की बात है बीजेपी के एक लोकल नेता दयाशंकर सिंह ने एक रैली में बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ अपशब्द कहे थे, जिसकी चहुंओर निंदा हुई. पर दूसरे पक्ष का निंदा से काम चल जाए तो फिर बात ही क्या? 'बहनजी' की चापलूसी में बसपा के कुछ नेता इतने गिर गए कि उन्होंने शब्दों की हर एक मर्यादा तोड़ दी! उन्माद ऐसा बढ़ा कि ये नेता इंसाफ भूल दयाशंकर सिंह कि माँ -बेटी एक करने लगे. अब तक लोगों की सांत्वना बटोर रहीं 'बहन जी' अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की वजह से जनता के टारगेट पर आ गयी थीं. ऐसा सिर्फ एक उदाहरण नहीं है बल्कि ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में गालियों का फ्री स्टाइल मुकाबला हो रहा है, जिसमें हर कोई एक दूसरे को चित्त करने की कोशिश में लगा है. उन्माद, साम्प्रदायिकता भड़काने से लेकर बकवासबाजी की कई ऐसी विधाएं दिखी हैं,  जिनका ज़िक्र साहित्य की पुरानी किताबों में भी शायद ही मिले. UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics
पीएम बनाम यूपी सीएम
UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics, Akhilesh Yadav
हमारे प्रधानमंत्री बातों के कितने धनी हैं ये बताने की जरुरत नहीं है, वाट्सएप्प, फेसबुक और ट्विटर के जोक्स का सारा कलेक्सन है इनके पास. अपने चुटीले अंदाज में जब ये विरोधियों पर कटाक्ष करते हैं, तो इनके समर्थक जिन्हें नया नाम 'अंधभक्त' मिला हुआ है, झूम उठते हैं. अभी हाल ही में यूपी के फतेहपुर में पीएम मोदी ने अखिलेश सरकार में कब्रिस्तानों की बाउंड्रीवाल और रमजान में 24 घण्टे बिजली जबकि दिवाली के दिन भी बिजली गायब रहने की बात उठाकर भाजपा का पुराना दांव चल दिया तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तड़प उठे. अपने शासन काल में हुए अपराधों की बढ़ोतरी के आरोपों को झेल रहे जैसे-तैसे सत्ता में दोबारा आने की आस लगाए अखिलेश भी आनन् -फानन में अमिताभ बच्चन से अपील कर बैठे कि वो 'गुजरात के गधों' का प्रचार करना बंद कर दें. अखिलेश का यह तीर 'निशाने' पर लगा और पीएम मोदी अपनी अगली सभा में 'गधा पुराण' पर चर्चा करते नज़र आये. अब जब पीएम और सीएम ही लड़ाई में लगे हों तो फिर सिपाहियों की बात कौन करें! किन्तु, फिर भी कुछ धुरंधरों के बयानों पर गौर किया जाना आवश्यक हैं. UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics

UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics, PM Narendra Modi
बीजेपी यहाँ भी है 'लीडर'
बीजेपी के एक नेता धौलाना विधानसभा सीट से प्रत्याशी रमेश चन्द्र तोमर का जवाब नहीं! अपने चुनावी रैली में उन्होंने धमकाते हुए कहा था कि 'यूपी के धौलाना को मौलाना विधानसभा' नहीं बनने देंगे. ऐसे ही केंद्रीय मंत्री सुरेश बालियान तो मुलायम सिंह यादव के मरने की भविष्यवाणी तक कर बैठे. अपने इस बयान की सफाई में बालियान ने कहा कि सपा के शासन में यूपी ने बुरा राज देखा है. मुलायम ने हमेशा सांप्रदायिकता की राजनीति की है. मैं उनसे कहना चाहुंगा कि अब तो मरने का समय आ गया है. हद है भाई अगर मुलायम सिंह यादव ने साम्प्रदायिकता की राजनीति की है तो जनता इसका जवाब देगी, लेकिन आपको किस ने अधिकार दे दिया सजा सुनाने का, वह भी मरने का? बीजेपी विधायक सुरेश राणा ने तो खुलेआम ऐलान कर दिया कि अगर बीजेपी की सरकार बनी तो कैराना, देवबंद और मुरादाबाद में कर्फ्यू लगा दिया जाएगा. जाहिर है मामले को गरमाने और ध्रुवीकरण की कोशिशों को परवान चढाने की कोशिशें खूब की गयी हैं. 
बीजेपी के राज्यसभा सांसद विनय कटियार का बयान तो आप लोगों  को याद ही होगा, जिसमें उन्होंने प्रियंका गाँधी को टक्कर देने के लिए बीजेपी की सुन्दर महिला कार्यकर्ताओं और अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने की बात तक कर डाली. अब इन नेताओं से उम्मीद करना कि ये 'महिला सम्मान' को जारी रखेंगे, बेमानी ही है. 
यही नहीं अपने काम और प्रशासन के लिए जाने -जाने वाले शिवराज चौहान भी यूपी की बदली आबो-हवा से नहीं बच पाए और उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार करते हुए कह डाला कि 'आजम खान ऐसे नेता हैं कि उनका नाम ले लूं तो नहाना पड़ता है'. खैर आज़म खान खुद ऐसे नेता हैं जिन्हें दूसरों के ऊपर कीचड़ उछालने में महारथ हासिल है. अब जब गंगा ही बह रही है तो बीजेपी के फायरब्रांड नेता और गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ की चर्चा न हो ऐसा कैसे हो सकता है? एक चुनावी रैली में योगी आदित्यनाथ ने कह दिया कि यूपी की सरकार ने बहुसंख्यक समाज को जो पीड़ा दी है, इन पीड़ा देने वाले कुत्तों को कभी हम सत्ता में नहीं आने देंगे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को कश्मीर नहीं बनने देंगे. भाई, उत्तर प्रदेश कश्मीर बने न बने, किन्तु 'बदज़बानी का प्रदेश' जरूर बन गया है. UP Election 2017, Hindi Article, Slazing in Politics



बकवासबाजी में कड़ी टक्कर दे रही है समाजवादी पार्टी 
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीजेपी में ही बदजुबानी की बयार बही है बल्कि सपा नेता भी खूब जम कर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. सपा सरकार में मंत्री राम करन आर्या ने  बीजेपी को बड़ा राक्षस और कांग्रेस को छोटा राक्षस बताते हुए कहा कि छोटे राक्षसों से हाथ इसलिए मिलाया है कि बड़े राक्षस को रोक सकें! अब भैया, राक्षसों से यूपी की जनता पिछले पांच साल त्रस्त रही, हाईवे तक पर खुलेआम बलात्कार हुए, तो कम से कम समाजवादी पार्टी के नेता इस तरह की बातें न करें. वहीं समाजवादी पार्टी के ही वरिष्ठ नेता राजेंद्र चौधरी भी देश की सुरक्षा को लेकर इतने चिंतित नजर आये कि पीएम मोदी और अमित शाह दोनों को 'आतंकवादी' ही बता डाला. माने अदालतें आखिर किस लिए हैं अगर नेता ही 'आतंकवादी' और 'राक्षसों' का फैसला करने लगें?

बसपा क्यों रहे पीछे
अब जब सभी कर रहे हैं तो हम क्यों पीछे रहें की तर्ज़ पर बसपा के शूरमा भी अपनी तलवारे निकाल कर मैदान में कूद पड़े हैं. बिचारा चुनाव आयोग 'बेबसी' से नोटिफिकेशन जारी करता रहता है, किन्तु उसकी सुनता कौन है? बसपा के महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दकी जिन्होंने दयाशंकर सिंह की बेटी डिमांड की थी, बाद में वह पीएम मोदी का लेखा-जोखा सुनाने लगे. उनका कहना है कि कभी मोदी धमकाने का भाषण देते हैं तो कभी सीना पीटने लगते हैं. कभी भाषण देते-देते ताली बजाने लगते हैं. गौरतलब है कि 'ताली बजाने' से उनका आशय कुछ और ही था. 
बीएसपी के ही एक और प्रत्याशी हाजी याकूब कुरैशी ने एक रैली में  बीजेपी का डर दिखाते हुए मुसलमानों  से अनुरोध किया है कि बीजेपी को रोको वरना बीजेपी तुमको रोजा नहीं रखने देगी, नमाज पढ़नी भी बंद हो जाएगी. हद हो गयी भाई, इन नेताओं के पास सत्ता में आने का एक मात्र रास्ता यही दिखता है कि भोली-भाली जनता को डरा कर उनका वोट हासिल किया जाये.

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इस तरह से देखें तो छोटे -बड़े कई सारे नेता जुबानी तीर का इस्तेमाल चुनाव के दरमियाँ कर रहे हैं. एक दूसरे की बखिया उधेड़ दो, जनता भी खुश हम भी खुश! किसी को अपने काम का हिसाब न देने का कितना बढ़िया रास्ता निकाला है हमारे नेताओं ने, जनता का सारा का सारा ध्यान दूसरों की कमियों को देखने में निकल जायेगा और इस तरह नेता फिर से पांच सालों के लिए सुरक्षित हो जायेंगे. वाकई... दांव तो जबरदस्त है, किन्तु उन्हें शायद पता नहीं है कि ये पब्लिक 'सब जानती है'.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Tuesday, 21 February 2017

शांति स्वरूप भटनागर को याद करना जरूरी है, क्योंकि... Shanti Swaroop Bhatnagar Biography in Hindi, New

by on 11:29:00


इसरो द्वारा 104 उपग्रहों को एक साथ लांच करके पूरी दुनिया में भारत की ताकत का डंका बजा दिया गया है. इसरो के इस मुकाम को हासिल करने के लिए सैकड़ों वैज्ञानिकों ने प्रयोगशालाओं में न जाने कितने दिन-रात एक किये होंगे. पर क्या आपको पता है, इन सब शोध और विकास की शुरुआत में डॉ शांति स्वरूप भटनागर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. बेहद दिलचस्प है कि रसायन विज्ञान में फेल होने वाले डॉ. भटनागर भारत के प्रयोगशालाओं के जनक माने जाते हैं. 
आप कल्पना कर सकते हैं कि आज के समय में हमारी शिक्षा व्यवस्था किस दिशा में जा रही है, जहाँ बच्चों की योग्यता का मापन उनके द्वारा पाए गए मार्क्स से ही किया जाता है. ऐसे में शांति स्वरुप भटनागर जैसे साइंटिस्ट्स का ज़िक्र करने से वास्तविक रूप से प्रतिभावान लोगों को आगे बढ़ने में निश्चित रूप से मदद मिलने ही वाली है. 
Shanti Swaroop Bhatnagar Biography in Hindi, New, Pic: thefamouspeople.com
इसलिए भी शांति स्वरूप भटनागर को याद करना जरूरी है. आज के हमारे वैज्ञानिकों की उपलब्धियाँ 'ख़ास' हैं, किन्तु डॉ. भटनागर का योगदान अतुलनीय है. दयाल सिंह ट्रस्ट की छात्रवृति से 1921 में लन्दन विश्वविधालय से विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री पाने वाले डॉ भटनागर सीएसआईआर के पहले मुख्य निदेशक थे. डॉ. भटनागर के योगदान को याद करने के लिए सीएसआईआर द्वारा 1958 से प्रत्येक साल डॉ. शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार युवा वैज्ञानिकों को विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है. 

अगर डॉ. भटनागर के जीवन के संघर्षों को याद करें तो, मात्र 8 महीने की उम्र में ही उनके सर से पिता का हाथ उठ गया था. उनके नाना अभियंता थे, जिन्होंने उनके अंदर विज्ञान को लेकर उत्सुकता का बीज बोया. बचपन के छोटे-छोटे प्रयोगों से ही महान वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा मिली और ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बच्चे की प्रतिभा निखारने का पूरा अवसर मिला इन्हें. जाहिर है, आज के समय में किताबों के बोझ तले दबे 'बचपन' को खेल-खेल में विज्ञान की ओर प्रवृत्त करने की ओर ध्यान देना चाहिए. 
आपको जानकर हैरानी होगी कि महान वैज्ञानिक के तौर पर ख्याति अर्जित करने वाले डॉ. भटनागर पर कभी लेखनी का भूत सवार था. 1911 में इन्होंने उर्दू में एक नाटक लिखा ‘करामाती’, जिसका मंचन 'सरस्वती स्टेज सोसाइटी' में अंग्रजी भाषा में हुआ. इस नाटक को उस वर्ष का 'सर्वश्रेष्ठ नाटक’ का पुरस्कार भी मिला था. 
कहते हैं अगर डॉ. भटनागर वैज्ञानिक नहीं होते तो शायद बहुत बड़े साहित्यकार होते. आगे की इनकी यात्रा भी कुछ कम दिलचस्प न रही. लन्दन से लौटने के बाद बीएचयू में रसायन विज्ञान के  प्रोफेसर के तौर पर 3 साल तक इस वैज्ञानिक ने सेवा प्रदान किया. बताते चलें कि वहाँ भी उनकी कलम नही रुकी और बीएचयू के लिए तब उन्होंने 'कुलगीत' की रचना की थी, जिसे उच्च कोटि की हिंदी कविता का उदाहरण माना जाता है. फिर पंजाब यूनिवर्सिटी में फिजिकल केमेस्ट्री के प्रोफेसर के साथ साथ यूनिवर्सिटी केमिकल लैबोरेट्रीज के डायरेक्टर के पद पर डॉ. भटनागर कार्यरत रहे, जिसे इनकी जिंदगी का बहुत ही अहम समय माना जाता है. वहीं उन्होंने रिसर्च करना शुरू किया था. उस समय उनके रिसर्च अलग-अलग देशी-विदेशी संगठन के औद्योगिक परेशानियों के समाधान पर केंद्रित था. वहाँ डॉ. भटनागर 19 साल अनवरत सेवा देने के बाद पूरी तरह शोध के क्षेत्र में आ गए. 

Shanti Swaroop Bhatnagar Biography in Hindi, New, Pic: photodivision.gov.in
1940 में कोलकाता के अलीपुर में प्रयोगशाला तैयार किया जिसे बोर्ड ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (BSIR) नाम दिया गया. वहाँ 2 साल निदेशक रहने के बाद 1942 में कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च की नींव रखी. उसके बाद उन्होंने कई प्रयोगशालाओं की स्थापना की. उनकी खोज ने कच्चे तेल की खुदाई की कार्यपद्धति को उन्नत बनाया. फिजिकल कमेस्ट्री, मैग्नेटो केमिस्ट्री और एप्लाइड केमिस्ट्री में उनकी खोज सम्माननीय मानी जाती है. इतना ही नहीं, डॉ. भटनागर भारत सरकार के शिक्षा विभाग के सलाहकार भी रहे थे. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (University Grants Commission) का पहला सभापति भी डॉक्टर भटनागर को नियुक्त किया गया था. 
डॉक्टर भटनागर के सराहनीय योगदान के लिए उन्हें भारत से लेकर ब्रिटेन तक सम्मान मिला, किन्तु सबसे महत्वपूर्ण उनका प्रेरक जीवन रहा. वैसे तो 1943 में यूनाइटेड किंगडम के मशहूर रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने जाने से लेकर 1954 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से उन्हें नवाजा गया था, पर युवाओं को प्रेरित करने से लेकर लेखकीय प्रतिभा के लिए उन्हें याद किया जाना बेहद ख़ास है. 
1955 में शान्ति स्वरूप भटनागर के निधन के बाद उनके नाम से पुरस्कार देने की घोषणा की गयी, जो आप ही उनकी खासियत को बयान करता है. कहते हैं ऊँची ईमारत में नींव के पत्थरों को कोई नहीं देखता, किन्तु डॉ. भटनागर जैसी सख़्शियतें नींव में होने के बावजूद अपनी चमक न केवल इस युग में बल्कि आने वाले युग में भी बिखेरती रहेंगी, इस बात में दो राय नहीं...  

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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