उलझ गयी हैं चतुर महबूबा!

Hindi article on jammu kashmir, mahbooba mufti, pdp and bjp

आधुनिक स्कूलों का लापरवाह रवैया

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बहु प्रतीक्षित किताब 'एक कदम आगे, दो कदम पीछे'...

वरिष्ठ साहित्यकार व समाजशास्त्री डॉ. विनोद बब्बर एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी द्वारा इस पुस्तक की भूमिका लिखी गयी है तो दुसरे साहित्यकार, शिक्षाविद ...

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Sunday, 7 February 2016

सैनिकों की कब्र पर आंसू से पहले... Hindi article on siachen issue, Indian Army, Pakistan Army, mithilesh ke lekh

अभी ज्यादे दिन नहीं हुए, जब  बीते 15 नवंबर 2015 और इस साल 4 जनवरी को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर (लद्दाख) में बर्फीला तूफान आया था. उस तूफान में सैन्य गश्तीदल को जानमाल की हानि हुई थी, जिसमें चार जवान शहीद हो गए थे. अचानक तेज हवाओं के साथ बर्फीला तूफान शुरू होने की घटनाओं से बचने के लिए सेना पूर्व तैयारी पर जोर देती रही है. इस घटना को ज्यादे दिन हुए भी नहीं थे कि एक और दुःखद घटना में भारतीय सेना के कई सैनिक शहीद हो गए. इसी क्रम में, विशाखापट्टनम में अंतर्राष्ट्रीय मेरिटाइम कांफ्रेंस को संबोध‍ि‍त करने हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने स‍ियाचिन में 10 सैनि‍कों की शहादत पर अफसोस जताया और कहा कि हमने स‍ियाचिन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए अब तक लगभग एक हजार सैनिक खो दिए हैं. जाहिर है, यह एक ऐसा आंकड़ा है जो हमारे सैनिकों की जान जाने का दर्द पूरे देश को महसूस कराती है. हालाँकि, रक्षा मंत्री ने स‍ियाचिन से सेना के हटाए जाने के सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और इतना ही कहा कि सि‍याचिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है. उन्होंने कहा, 'वहां (स‍ियाचिन) की भागौलिक स्थ‍ि‍ति ऐसी है कि उस इलाके पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए हम एक हजार सैनिक खो चुके हैं. हाल के दिनों में सुविधाएं बेहतर होने के बाद वहां जवानों की शहादत में कमी आई है, लेकिन एक भी सैनिक की शहादत से रक्षामंत्री परेशान हो जाते हैं, जो उन्होंने अपने बयान में साफ़ तौर पर कहा भी!  गौरतलब है कि हाल ही में सियाचिन ग्लेशियर पर हिमस्खलन के दौरान फंसे 10 सैनिकों की मौत हो गई, जिसमें एक जेसीओ भी शामिल थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस हादसे पर अपने ट्वीट में संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि ''सियाचिन में सैनिकों की मौत काफ़ी दुखद है. मैं उन सैनिकों को सलाम करता हूँ जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन दे दिया. परिजनों को मेरी संवेदनाएं.'' हिमस्खलन के दूसरे दिन भी बचाव का काम जारी रहा थे लेकिन पहले से ही किसी के भी बचने की संभावना बेहद कम थी क्योंकि यह काफ़ी ख़तरनाक भूस्खलन था. 

19600 फ़ीट की ऊंचाई पर जो आर्मी पोस्ट इसके दायरे में आई वह मद्रास बटालियन की थी. उत्तरी कमान के आर्मी कमांडर लैफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा एवं जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने सैनिकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई है. ऐसा भी नहीं है कि इस पूरे मामले को लेकर सिर्फ भारत ही नुक्सान उठाता हो, बल्कि पाकिस्तान ने भी इसको लेकर बड़े नुक्सान उठाये हैं. पिछले सालों में पाकिस्तान के भी 100 से ज्यादा सैनिक एक झटके में भूस्खलन जैसी आपदाओं में जान गँवा चुके हैं. इसी को लेकर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री अहमद मुख्तार ने जून 2012 में एक साक्षात्कार में कहा था कि दोनों मुल्कों की हुकुमतें सियाचिन का मसला सुलझाना चाहती हैं लेकिन भारत और पाकिस्तान का परंपरागत सम्बन्ध इसमें रूकावट हैं. उन्होंने तब कहा था कि सियाचिन से दोनों देशों में से किसी को कुछ हासिल नहीं होगा और ये महज अहं का मामला है, जो लगातार सैनिकों की जान ले रहा है. जाहिर है कि एक तरफ तो पाकिस्तान इस मामले को सुलझाने की बात करता है, किन्तु दूसरी ओर उसने कई ऐसे उपकरणों का आयात किया है, जो ज्यादा ऊंचाई और ठंढ में उपयुक्त होते हैं. इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के घुसपैठिये हर रोज तैयार रहते हैं कि सेना की दबिश कम हो और वहां से वह अपना रास्ता बनाएं! जाहिर है, यह सारा मसला सैन्य परिप्रेक्ष्य में है! जहाँ तक बात भारतीय पक्ष की है तो कई सौ करोड़ अतिरिक्त खर्च करने के बावजूद अगर हमारे सैनिकों की जान जा रही है तो यह न केवल दुखद है, बल्कि कहीं न कहीं हमारी कमजोरी को उजागर भी करता है! इसलिए रक्षामंत्री को इस बारे में मुकम्मल तैयारी करने का साहस दिखाना चाहिए, बजाय कि दुःख और सांत्वना व्यक्त करने के! इस मसले पर अगर कोई यह सलाह दे कि पाकिस्तान के साथ बातचीत अथवा सियाचिन के मुद्दे पर कोई समझौता किया जाना चाहिए, तो यह कतई व्यवहारिक और स्थाई फैसला नहीं होगा. इससे बेहतर वहां सैनिकों के लिए सुगमता और ज्यादे से ज्यादे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैश किया जाना ही वर्तमान में एकमात्र विकल्प है, जिसे आजमाया ही जाना चाहिए!

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Friday, 5 February 2016

बेतुका ही नहीं, आपराधिक है मेनका का बयान - New hindi article on sex determination test, maneka gandhi statement, mithilesh as a writer

मेरे जानने वाले एक परिचित की दो बेटियां हैं, लेकिन मेरा यह अनुभव कुछ समय पहले का है जब उनकी दूसरी संतान आने वाली थी. चूंकि, उनकी पहली संतान बेटी थी, इसलिए उनके घरवालों और खुद उनका मन भी था कि उनकी अगली संतान 'बेटा' हो! बस फिर क्या था, घर-परिवार और सगे-सम्बन्धियों में इस बात का पूरा माहौल बनाया गया और उन महोदय ने दो-तीन महीने में अपनी धर्मपत्नी को भी राजी कर लिया. ले देकर उनकी परिचित एक नर्स थी, जिसने छुपकर लिंग-परीक्षण कराने की जिम्मेदारी ले ली. संयोगवश लिंग-परीक्षण में बेटी ही निकली, और उसके बाद गर्भपात की तैयारियां भी हो गयी! जब डॉक्टर के पास यह केस गया तो उसने महिला के जान जाने का रिस्क बताकर गर्भपात करने से मना कर दिया क्योंकि गर्भधारण को पांचवा महीना हो रहा था, जिसमें साधारणतया भी खतरा बढ़ जाता है! आप यह सुनकर आश्चर्य करेंगे कि महिला के जान जाने का खतरा होने के बावजूद कई रिश्तेदारों ने गर्भपात का दबाव बनाना नहीं छोड़ा! हालाँकि, मेरे परिचित महोदय की थोड़ी बहुत अक्ल सलामत थी और उन्होंने रिस्क नहीं लिया. कहानी इसके बाद भी चली, क्योंकि सबको पता चल चुका था कि आने वाली संतान बेटी है, इसलिए उनके अगले चार महीने ताने और दुत्कार से भरे ही रहे. यह तब है, जब यह परिवार शिक्षित और संपन्न है. आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे समाज में आज भी बेटे-बेटियों का कितना गहरा भेद विद्यमान है! 

21वीं सदी का दूसरा दशक बीतने वाला है और हम भारतीय आज तक इसी समस्या में उलझे हैं कि लड़कियों की भ्रूण-हत्या कैसे रुके और किस तरह स्त्री-पुरुष अनुपात की घटती संख्या पर लगाम लगाई जाय! सोचिये तो यह शर्मनाक विषय ही है, किन्तु इसके विपरीत तथ्य यह है कि यह एक सच्चाई है. इसी से सम्बंधित एक बेहद अजीब और विपरीत विचार प्रस्तुत करके केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस पूरी चर्चा को अलग मोड़ देने की बेतुकी कोशिश की है, किन्तु ऐसा लगता है कि इस संवेदनशील विषय को छूने से पहले उन्होंने भारतीय समाज की वर्तमान तस्वीर को अपने दिमाग में नहीं रखा. केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने इस सम्बन्ध में जो बयान दिया उसके अनुसार लिंग जांच को अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि जिन महिलाओं के गर्भ में लड़की है उनका ध्यान रखा जा सके और इस तरह कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सकेगी. अब इस विचार को सुनते ही प्रश्न उठता है कि लिंग-जांच पर प्रतिबन्ध आखिर लगाया क्यों गया था? प्रश्न यह भी उठता है कि इसके विपरीत विचार रखते हुए क्या मेनका गांधी ने यह मान लिया है कि भारतीय समाज की लड़कियों को गर्भ में मार देने की सोच में बदलाव हो चूका है अथवा उन्होंने आँख मूंदकर यह भरोसा कर लिया है कि हमारा कानून इस काबिल हो चूका है कि भारत की बड़ी आबादी पर वह नियंत्रण करने में सक्षम है! क्या मेनका को इस बात की खबर नहीं है कि चोरी, बलात्कार, हत्या जैसे संगीन अपराधों तक में हमारे कानून की क्या सीमाएं हैं? 

हालांकि मेनका ने कहा है कि यह उनके निजी विचार हैं और इस पर चर्चा की जानी चाहिए! पर सवाल यह है कि सिर्फ चर्चा की गरज से क्या किसी ऐसे मुद्दे को नकारात्मक मोड़ देना ठीक है, जो पहले से ही हमारे समाज पर एक कलंक है! क्या मेनका ने यह नहीं सोचा कि अगर चौथे महीने में किसी महिला के गर्भ में लड़की होना का पता कानूनी रूप से लगने लगे तो हमारे समाज की क्रूरता इतनी घनी है कि वह लड़की तो छोड़िये, उस गर्भवती महिला की जान तक पर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं! यह कहने में हमें जरा भी संकोच नहीं होना चाहिए कि सास-ससुर के साथ तमाम रिश्तेदार, पति और यहाँ तक कि सामाजिक बंधनों में बंधी वह महिला तक इस बात पर नकारात्मक हो जाती है कि उसके गर्भ में लड़की मौजूद है! जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मेनका गांधी सोनोग्राफी सेंटर्स द्वारा गैरकानूनी तरीके से लिंगानुपात की जांच संबंधी पूछे गये प्रश्न का जवाब दे रही थी, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘एक बार जांच में यह तय हो जाए कि बच्चा लडका है या लडकी तो उसकी निगरानी रखना आसान हो जायेगा. क्या मेनका यह बता सकती हैं कि वह बाकी के 6 महीने के लम्बे समय तक किस-किस पर और कहाँ-कहाँ निगरानी करेंगी? और अगर लोगों ने इसका उल्लंघन किया तो वह क्या उन्हें फांसी पर लटका देंगी? शुरू से आखिर तक अगर तथ्यों को उल्टा-पुल्टा किया जाय तो साफ़ हो जाएगा कि मेनका गांधी का विचार न केवल भ्रूण-हत्या की गंभीरता को नष्ट करता है, बल्कि इस जघन्य अपराध की समस्या को और भी बढ़ाने वाला ही है. 

उनके इस बयान से समाज के असामाजिक लोगों को ही बढ़ावा मिलेगा तो लालची डॉक्टर्स और लैब इससे प्रोत्साहित होंगे! यह एक दूसरा तथ्य है कि विकसित राज्यों में अविकसित राज्यों के मुकाबले सीएसआर का गिरता स्तर बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है. विपक्ष को भी लगता है कि मौजूदा कानून को हटाने से भ्रूण हत्या को लेकर लोगों का ख़ौफ़ ख़त्म हो जाएगा, ऐसे में मेनका गांधी का यह आपराधिक विचार कहाँ से उत्पन्न हो गया है! गौरतलब है कि कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम कसने के इरादे से सरकार ने 1994 में ही भ्रूण परीक्षण पर रोक लगा दी थी. हालाँकि, इस प्रावधान के बावजूद चोरी-छुपे ये सिलसिला जारी है तो डॉक्टर तर्क देते हैं कि भारत में इतने सेंटर ही नहीं हैं कि सबका लिंग परीक्षण कराया जा सके. 2011 के जनसंख्या आंकड़े के मुताबिक 1000 बच्चों में बच्चियों का अनुपात 943 है. हरियाणा में जहां 1000 लड़कों पर सिर्फ 876 लड़कियां है जबकी पंजाब में यह तादाद 926 है. हालाँकि, जितने अहम कानून इस समस्या से निपटने के लिए मौजूद हैं, उतना ही ज़रूरी लड़कियों के प्रति समाज के नज़रिए को बदलना भी है और हम इस मामले में निश्चित रूप से कहीं न कहीं असफल हो रहे हैं! हालाँकि, इसका हल कतई यह नहीं है कि मेनका गांधी जैसे बेतुका विचारों पर नकारात्मक चर्चा की जाय, बजाय कि इसकी भर्त्स्ना करने के! यह केंद्र सरकार के 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की नीति के भी विपरीत विचार है, क्योंकि आज भी हमारे देश में लोग बेटियों को बोझ मानते हैं और इस तथ्य को अगर कोई सरकारी मंत्री, वह भी महिला बाल-विकास मंत्रालय से जुडी हुईं, अनदेखा करती हैं तो यह समाज को अँधेरे में धकेलने जैसा कदम होगा. जरूरत इस प्रयास को और पुख्ता करने की हैं कि लिंगभेद से संबंधित लैब्स और डॉक्टर अगर पकडे जाएँ तो उनको और कड़ी सजा मिले, तो समाज में जागरूकता के प्रयासों को तेजी से बढ़ावा देने की आवश्यकता को अब अनिवार्यता में बदलने का प्रयास करना समय की मांग हैं.
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Thursday, 4 February 2016

आधुनिक स्कूलों का लापरवाह रवैया - New hindi article on security system in schools, delhi government, ryan international, business in education

खुद को आधुनिकता और टैलेंट विकसित करने का ठेकेदार मान चुके अति आधुनिक स्कूलों में से एक रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 6 साल के एक बच्चे की मौत का मामला सामने आने के बाद दिल्ली के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने साफ़ कहा कि वह एक एमसीडी स्कूल में और फिर एक नामी-गिरामी प्राइवेट स्कूल में मासूम बच्चों की मौत से सहमे हुए हैं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं. इससे सम्बंधित बैठक में फैसला लिया गया कि सभी सरकारी, एमसीडी और प्राइवेट स्कूलों को निर्देश दिया जाएगा कि वे अपने स्कूल कैंपस और बिल्डिंग का मुआयना करके देखें कि वहां कोई ऐसी खतरनाक जगह या कारण तो नहीं हैं जिससे किसी हादसे की आंशका हो! अगर ऐसा है तो उसे ठीक कराएं. इसके साथ-साथ सभी स्कूलों को एक सेल्फ डेक्लेरेशन देना होगा कि उनके स्कूल कैंपस सुरक्षित हैं. साफ़ है कि दिल्ली सरकार भी प्रथम दृष्टया रेयान इंटरनेशनल स्कूल में जो बड़ी लापरवाही की घटना हुई है, उसमें स्कूल-प्रशासन का दोष मानती है. सरकारी स्तर पर यह एक अच्छा संकेत है कि दिल्ली में, अलग-अलग जोन के लिए डीएम, एसडीएम, शिक्षा विभाग, पीडब्ल्यूडी, दिल्ली जल बोर्ड, फायर डिपार्टमेंट, दिल्ली नगर निगम के अधिकारियों की ज्वाइंट टास्क फोर्स जाने की घोषणा हुई है, जो अपने-अपने जोन के सभी स्कूलों का सुरक्षा की दृष्टि से मुआयना करेगी. जो शुरूआती संकेत मिले हैं, उसके अनुसार इस पहल से अगले करीब एक महीने में तकरीबन 3,500 स्कूल बिल्डिंग्स का मुआयना कराया जाएगा, जिसके तहत ये टास्क फोर्स स्कूलों में जाकर ये देखेगी कि उनका दिया हुआ डेक्लेरेशन सही है या नहीं? अगर कोई स्कूल गलत सूचनाएं देगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात कही जा रही है. 

हालाँकि, पिछले दिनों दिल्ली के एक बड़े प्राइवेट स्कूल में जिस तरह से एक बच्चा टंकी में गिर गया और उसके बाद पूरे मामले पर स्कूल-प्रशासन ने जबरदस्त ढंग से लीपापोती की, उसने तथाकथित आधुनिक और अड्वान्स स्कूलों की पोल झटके में खोल दी है. दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति या संस्थान नहीं, जिससे कभी कोई गलती न हुई हो, लेकिन राष्ट्र के भविष्य-निर्माण की जिम्मेदारी संभाले ऐसे आधुनिक स्कूल इन गलतियों पर जिस गैर-जिम्मेदारी से रवैया अख्तियार कर रहे हैं, उसने न केवल पीड़ित अभिभावकों को, बल्कि पूरे राष्ट्र को गहरी व्यथा से भर दिया है. इसी सन्दर्भ में, दिल्ली के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में पहली कक्षा के छात्र दिव्यांश की मौत के मामले में पुलिस ने स्कूल की प्रिंसिपल और एक टीचर समेत कुल पांच लोगों को लापरवाही बरतने का आरोप लगाकर गिरफ्तार जरूर किया, लेकिन गिरफ्तारी के कुछ ही देर बाद उन्हें जमानत भी मिल गई. चूँकि, इस पूरे मामले पर जनदबाव बन रहा था, इसलिए प्रिंसिपल की गिरफ़्तारी की औपचारिकता पुलिस को निभानी ही थी, लेकिन इस मामले में न्याय हो सकेगा, इस बात में बड़ा प्रश्नचिन्ह है! गौरतलब है कि दिल्ली के वसंत कुंज स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल वसंत कुंज में 6 साल के दिव्यांश की मौत की पानी के टैंक में डूबने से मौत हो गई थी. पोस्टमार्टम की अंतरिम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने मौत की वजह फेफड़ों में पानी भरना बताया था, साथ ही साथ डॉक्टरों ने यह भी कहा कि टैंक में गिरने के बाद दिव्यांश ने बाहर आने के लिए काफी संघर्ष किया और आखिर में उसने हिम्मत और दम दोनों तोड़ दिया. इस मामले में शुरुआत से ही स्कूल प्रशासन पूरी तरह शक के घेरे में था. सीएफएसएल टीम ने भी स्कूल और घटनास्थल का मुआयना किया था, जबकि स्कूल प्रशासन ने अपने बचाव में दिव्यांश की क्लास डायरी का हवाला देते हुए, बड़ी ही बेशर्मी से उसे ही दोषी ठहरा दिया! डायरी में उसकी अनुशासनहीनता को लेकर दर्ज नोटिंग के जरिए स्कूल प्रशासन को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं हुआ कि वह अपना बचाव करने के चक्कर में, इंसानियत को ही शर्मसार कर रहा है! साफ़ है कि बड़े-बड़े स्कूल बनाकर, मोटी फीस के सहारे अपनी जेबें भर रहे, रेयान इंटरनेशनल जैसे कॉर्पोरेट स्कूल बच्चों की सुरक्षा और अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह न केवल भूल चुके हैं, बल्कि बच्चों की जान लेने की हद तक उनकी लापरवाही का स्तर पहुँच चूका है! 
बच्चे के माँ-बाप टेलीविजन पर चीख-चीख कर कह रहे हैं कि उनके बच्चे को किसी भी प्रकार की समस्या नहीं थी और न ही स्कूल प्रशासन ने इस सम्बन्ध में उन्हें कभी कम्युनिकेट ही किया था! वह अन्य बच्चों की तरह ही सामान्य बच्चा था, लेकिन स्कूल की लापरवाही ने अपने दोष टालने के लिए बच्चे को ही अपराधी घोषित कर दिया. साफ़ है कि इस प्रकार का रवैया न आज के लिए और न ही भविष्य के लिए हितकर है, क्योंकि बात सिर्फ एक अपराध की नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे ही और अपराधों के लिए रास्ता खुला रखने को लेकर है, जिसे सरकार और न्यायपालिका को सख्ती से बंद करना ही होगा! अन्यथा, राष्ट्र का भविष्य अपने शैशवावस्था में ही खतरे में पड़ जायेगा! यह बेहद दुखद बात है कि पहले इस तरह की लापरवाही के आरोप सरकारी स्कूल्स पर लगाये जाते थे, किन्तु शिक्षा को लाभकारी व्यवसाय में बदल चुके प्राइवेट स्कूल अपने परिसर में सुरक्षा के स्तर को लेकर इस हद तक लापरवाही बरत रहे हैं कि कोई अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने से ही डर जाए! ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ परिसर से ही बच्चों को खतरा हो, बल्कि उनके साथ कई बार ऐसी घटनाएं भी हो जाती हैं, जिसमें उनका मानसिक और शारीरिक शोषण तक की बातें सामने आ जाती हैं! इसके साथ-साथ, हालिया दिनों में भारी दबाव में बच्चों का मानसिक संतुलन डिस्टर्ब हो जाना भी एक बड़े रिस्क के रूप में सामने आया है. जाहिर है, कई स्तरों पर कार्य किये जाने की आवश्यकता है, किन्तु सबसे बड़ी अनिवार्यता इस बात की है कि रेयान इंटरनेशनल जैसे स्कूलों की प्रिंसिपल और प्रशासन का ऐसी किसी घटना के पहले और बाद का रवैया सुधारा जाय! इससे कम से कम अभिभावकों के ज़ख्म पर नमक तो नहीं लगेगा!

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Wednesday, 3 February 2016

उलझ गयी हैं चतुर महबूबा! Hindi article on jammu kashmir, mahbooba mufti, pdp and bjp

कहते हैं कि चूल्हे पर भोजन आराम से पकाना चाहिए, स्वाद बढ़िया हो जाता है! लेकिन, ज्यादा पकाने से भी भोजन के जल जाने का खतरा बन जाता है. कुछ ऐसा ही चतुर महबूबा मुफ़्ती के साथ हुआ लगता है! जम्मू कश्मीर में मुफ़्ती मोहम्मद सईद के मरहूम हो जाने के बाद हालात इतने ज्यादा उलझ गए हैं, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी! छन- छनकर जो बातें सामने आ रही हैं, उसके अनुसार महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में नहीं हैं, तो इसके साथ वह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से किन्हीं बातों पर आश्वासन चाहती हैं, साथ ही साथ वह पाकिस्तान से बातचीत को लेकर केंद्र के ऊपर किसी अन्य तरह का आश्वासन भी चाहती हैं! आप गौर से देखें तो इनमें से कोई भी बात राजनीतिक नहीं है और इनसे साफ़ जो सन्देश निकलकर सामने आ रहा है, वह यही है कि मामले में पीडीपी की ओर से जबरदस्त ढंग से टालमटोल की जा रही है, जिसका नतीजा मध्यावधि चुनाव ही है. हालाँकि ऊपरी तौर पर कहा यही जा रहा है कि महबूबा अपने पिता के सपनों के लिए कार्य कर रही हैं, लेकिन यह साफ़ नज़र आ रहा है कि हुर्रियत से लेकर पाकिस्तान तक को साधने के प्रयास में महबूबा अपने पिता के सपनों के साथ साथ अपनी पार्टी के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रही हैं! थोड़ा पीछे जाएँ तो, सन 2002 में जब पहली बार पीडीपी की सरकार कश्मीर में बनी तो लोग मेहबूबा की जगह मुफ़्ती साहब को बजीरे आला देखकर हैरान थे क्योंकि तब कश्मीर में लोगों ने मेहबूबा की पीडीपी को वोट दिया था, ऐसा आंकलन मीडिया में खूब प्रचलित हुआ. तब कहा गया कि कांग्रेस की जिद के कारण मेहबूबा मुफ़्ती के बजाय मुफ़्ती साहब को गठबंधन सरकार की कमान मिली थी. 

इस पूरे वाकये से समझा जा सकता है कि महबूबा की अपनी पार्टी पर पकड़ कितनी मजबूत थी, जो कालांतर में और भी मजबूत होती गयी. हालाँकि, इसके बाद जब मुफ़्ती मोहम्मद भाजपा के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री बने तब महबूबा परदे के पीछे भाजपा नेतृत्व और अलगाववादियों के बीच पूल की तरह कार्य करती नज़र आयीं. बीच में कुछ अलगाववादियों को जब 'जे एंड के सरकार' ने नज़रबंद किया तब महबूबा ने हस्तक्षेप करके इस निर्णय को पलटा भी था. ऐसे में आज जो यक्ष प्रश्न उठता है, वह यह है कि आखिर महबूबा जैसी राजनेत्री को इतनी भी क्या समस्या आ गयी कि वह किंकर्तव्यविमूढ़ सी नज़र आ रही है! क्या उन्हें यह नहीं पता है कि अगर मध्यावधि चुनाव होते भी हैं तो पीडीपी के लिए जो स्थिति आज है, उससे बेहतर स्थिति की कल्पना बड़े से बड़ा आशावादी भी नहीं कर सकता! अगर कल, फिर जम्मू और कश्मीर में ऐसी ही त्रिकोणीय स्थिति पेश आती है, तब महबूबा का रूख कितना अलग होगा? आखिर, 10 महीने चली पीडीपी-बीजेपी हुकूमत मुफ़्ती साहब के बाद क्यों नहीं चल पा रही है ये एक बड़ा सवाल है! इस पूरी उहापोह से यूँ कहे कि मामला, बीजेपी बनाम पीडीपी से हटकर जम्मू बनाम कश्मीर में तब्दील होता जा रहा है! जाहिर है कि पिछले साठ वर्षो के कश्मीर केंद्रित सियासत को जम्मू रीजन से पहली बार चुनौती मिली है, जिसके आगे भी जारी रहने की उम्मीद कहीं ज्यादा मजबूत दिखती है! असल सवाल यही उलझ जाता है कि इस पूरी खींचतान में आम लोगों की परेशानी बढ़ती ही जा रही है. अपने पिता के अचानक देहावसान के बात महबूबा के पास जो सबसे बढ़िया रास्ता था, उसमें वह अगले पांच साल एक बेहतर कश्मीर का मॉडल प्रस्तुत कर सकती थीं लेकिन उन्होंने खुद को बेवजह उलझा लिया है! 

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उलझन और उससे आगे बढ़कर जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों के बीच सत्ता संतुलन साधने में वह खुद को नर्वस महसूस करना छोड़ेंगी और अपनी पार्टी के साथ-साथ जनता के बेहतर भविष्य के लिए आने वाले समय में मजबूती के साथ कार्य करेंगी! मेहबूबा मुफ़्ती के साथ जो सबसे बड़ी समस्या है वह उनका यह मानना कि वह सॉफ्ट सेप्रेटिजम के एजेंडे के सहारे खुद की पहचान मानती रही हैं. जब तक उनके पिता जीवित थे तो वह दोनों एजेंडे यानी सरकार चलाना और अलगाववादियों को भी संतुलित करने का यत्न करती रहीं, किन्तु अब जब उनके ही कन्धों पर सारा भार आ गया है, उनके लिए यह अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गयी है! बीच में ऐसी भी खबरें सामने आयीं कि महबूबा अपने भाई या फिर पीडीपी के ही किसी वरिष्ठ को मुख्यमंत्री पद की कमान दे सकती हैं. यह सुगबुगाहट इसलिए भी समाप्त हो गयी, क्योंकि महबूबा के अतिरिक्त कोई भी इस घाटी राज्य में सीएम बने वह महबूबा के रिमोट कंट्रोल से ही चलेगा और सारा राजनीतिक प्रबंधन, यहाँ तक कि छवि भी महबूबा की ही रहेगी! ऐसे में वह किसी भी बैक एजेंडे को उनके लिए चला पाना और भी मुश्किल होगा! 2002 की पीडीपी हुकूमत में अपनी पॉलिसी के जरिये मुफ़्ती सईद ने हुर्रियत के लीडरो को अपनी ज़मीन तलाशने पर मजबूर कर दिया था और उनकी हैसियत समाज में पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर रह गयी थी. हालाँकि, बाद के दौर में उन्हें कई ऐसे मौके मिले जिसमे उन्होंने दुबारा अपने को स्थापित किया. 

साफ़ है कि जब-जब कश्मीर में जम्हूरियत मजबूत होगी संवैधानिक शासन का जोर होगा तो अलगाववाद कमजोर होगा, जो प्रयोग मुफ़्ती साहब ने कर दिखाया था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस साहस का अभाव महबूबा मुफ़्ती में कहीं घर कर गया है. इस पूरे प्रकरण में भाजपा दम साधे इन्तेजार कर रही है, जो उसके लिए उचित भी है! साफ़ तौर पर इस पूरी उहापोह में उसके लिए कुछ ख़ास करने को नहीं है! हालाँकि, कई लोग यह आंकलन करने में जुटे हुए हैं कि इस राज्य में पीडीपी के इंकार के बाद भाजपा अल्पमत की सरकार का गठन कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो यह सांकेतिक भर ही होगा, क्योंकि इसके बाद चुनाव लगभग तय ही माने जायेंगे! वैसे नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला भाजपा पर डोरे डाल रहे हैं, लेकिन भाजपा उसके साथ इसलिए नहीं जाना चाहेगी, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावों में नेकां को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था और अगर उसके साथ भाजपा कोई मेलजोल करती है तो घाटी के लोगों में गलत सन्देश जाने का खतरा रहेगा! हालाँकि, यह पूरा समीकरण सिर्फ और सिर्फ महबूबा मुफ़्ती का उलझाया हुआ प्रतीत होता है, जो शुरुआत में तो एक अच्छा दांव था भाजपा पर दबाव बनाने का, लेकिन समय गुजरने के साथ दबाव महबूबा पर ज्यादा बढ़ गया लगता है! भाजपा बेहद परिपक्वता के साथ कदम बढ़ा रही है, लेकिन 'महबूबा' के जाल से भला कौन बच पाया है!

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Tuesday, 2 February 2016

शनिदेव, हाजी अली और 21वीं सदी - Shani mandir, shingnapur, hindi article by mithilesh

यूं तो हम प्रगतिवादी हैं, लेकिन जब बात महिलाओं की आती है तो हम ज़रा देर में रूढ़िवादी भी हो जाते हैं. इस पूरे सन्दर्भ में शनि महाराज और हाजी अली पर जो हालिया विवाद उत्पन्न हुआ है, उसने एक बार फिर यह साबित किया है कि आदमी खुद को हर किसी से बड़ा समझता है और शनि से लेकर शुक्र और हाजी अली तक सबको वह अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करता रहता है. तमाम उथल-पुथल के बाद अब शनि मंदिर मुद्दे पर शरद पवार का रूख सामने आया है. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से पाबंदी हटाने की मांग का समर्थन करते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख ने कहा है कि भगवान लिंग भेद नहीं कर सकते और उनका मानना है कि किसी को भी प्रार्थना करने से नहीं रोका जाना चाहिए. पवार ने यह तक कह डाला कि ‘‘मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित करने वाले ये किस तरह के भगवान हैं? अगर वास्तव में ऐसे कोई भगवान हैं तो मैं उनमें विश्वास नहीं करता, क्योंकि मेरे भगवान लैंगिक भेदभाव नहीं कर सकते.’’ आगे उन्होंने मीडिया से यह भी कहा कि उनकी मंदिर के अधिकारियों से बात हुई है और उनसे आग्रह किया है कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें और महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दें. रांकापा प्रमुख की हालिया बातों से तो यही लगता है कि उन्हें समाज की चिंता कितनी ज्यादा है, लेकिन वह शायद भूल रहे हैं कि अप्रत्यक्ष रूप से यह मंदिर उनकी ही पार्टी से जुड़ा हुआ है. उससे भी बड़ी बात यह है कि यह परंपरा कोई आज तो स्थापित हुई नहीं, लेकिन अब तक इस मामले में किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, जबकि इससे पहले महाराष्ट्र में और केंद्र में भी शरद पवार की सीधी सहभागिता थी. 

हालाँकि, इसके साथ यह भी एक सच ही है कि जब तक लोग खुद अपनी रूढ़िवादी रिवाजों को नहीं छोड़ते हैं तब तक सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती, किन्तु असल सवाल तो यही है कि यह मुद्दा अब ही इतना ज़ोर शोर से क्यों उठ रहा है! इससे पहले के जो घटनाक्रम हुए थे, उसके अनुसार शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं देने की प्राचीन परंपरा का उल्लंघन करते हुए महिला प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मंदिर में जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन उन्हें ऐसा करने से मंदिर-प्रशासन द्वारा रोक दिया गया. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से मुलाकात कर इस सिलसिले में ज्ञापन सौंपा था। बाद में फडणवीस ने कई ट्वीट कर सांस्कृतिक परम्पराओं में बदलाव की वकालत करते हुए साफ़ कहा कि भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म महिलाओं को प्रार्थना का अधिकार देते हैं. आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने भी बीती सात फरवरी को शनि शिंगणापुर मंदिर का दौरा कर मंदिर के अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच जारी गतिरोध को तोड़ने का प्रयास करते हुए वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और बालाजी तिरुपति मंदिर का उल्लेख किया था और न्यायपूर्ण हल की उम्मीद जताई थी. इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि इस मुद्दे को बेवजह उछाला जा रहा है और राजनीति करने की कोशिश जमकर की जा रही है, लेकिन प्रश्न फिर वही उठता है कि आखिर इस प्रकार के मुद्दे पर राजनीति करने की जगह आज 21 वीं सदी में भी क्यों विराजमान है? 
पिछले दिनों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बड़ा सटीक बयान देते हुए कहा था कि हिंदुत्व, वैज्ञानिकता को मानने का दर्शन है और हमें उन परम्पराओं में निश्चित रूप से बदलाव करना चाहिए जो विज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं. साफ़ है कि आज के समय में शनि महाराज का डर दिखाकर वैज्ञानिक सोच को ही धत्ता बताया जा रहा है और उससे भी बड़ी बात यह कि इस गैर जरूरी मुद्दे पर राजनीति करने की खुली छूट दी जा रही है, जो निश्चित रूप से पीड़ादायक है. आखिर, देश में कई और जरूरी मुद्दे हैं, मगर कोई समझने को तैयार हो तब न! यही हालत कमोबेश हाजी अली दरगाह को लेकर भी है. मुंबई स्थित संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने हाजी अली दरगाह में मज़ार तक जाने की माँग को लेकर आज़ाद मैदान में धरना दिया है तो इस संगठन ने मुंबई उच्च न्यायालय में इस मांग को लेकर एक जनहित याचिका पहले से ही दायर की है. यह मामला राज्य महिला आयोग तक भी पहुँच चूका है अथवा संगठन की सदस्यों द्वारा पहुंचाने की बात कही जा रही है. अब इन तमाम जद्दोजहद के बावजूद हालात में कुछ परिवर्तन आते हैं तो उसकी कुछ सार्थकता होगी, अन्यथा राजनीति और होहल्ला तो होता ही रहता है!

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Monday, 1 February 2016

खाद्य सुरक्षा की चिंतनीय स्थिति - Hindi new article by Mithilesh on food security bill and supreme court decision

देश में अगर हर मामले का हल उच्चतम न्यायालय के आदेशों से ही निकले तो फिर समझना मुश्किल नहीं है कि देश में प्रशासनिक व्यवस्थाएं किस हद तक चरमरा गयी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि वह जवाब दाखिल कर बताए कि सभी राज्यों में समाज कल्याणकारी योजनाओं का स्टेट्स क्या है? क्या लोगों को जरूरत की चीजें मिल रही हैं? बैंक लोन और पानी की सुविधा को लेकर राज्य क्या कर रहे हैं? कभी-कभी प्रतीत होता है कि अगर देश की सुप्रीम कोर्ट विभिन्न मामलों पर सक्रीय रूख अख्तियार न करे तो, विभिन्न मुद्दों की सच्चाइयाँ दबी की दबी रह जाएं! इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने में कोताही बरतने पर गुजरात समेत कई राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है. न केवल फटकार लगाई बल्कि बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने पूछा है कि जिस क़ानून को देश की संसद ने बनाया है, उसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा है. जस्टिस मदान बी लोकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने गुजरात सरकार से यह तक पूछ डाला कि क्या गुजरात भारत का हिस्सा नहीं है? पहली बार में विश्लेषकों को यह टिप्पणी थोड़ी ज्यादा ही कड़ी लग सकती है, किन्तु हमें समझना होगा न्यायालय के मंतव्य को भी, जो सीधा-सीधा जनहित से तो जुड़ा ही है, साथ ही साथ कानून के पालन से भी जुड़ा हुआ है. शासन कर रहे राजनेताओं को यह सोचना चाहिए कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने यह क्यों कहा कि 'क़ानून कहता है कि ये पूरे देश मे लागू होगा और गुजरात इसे लागू नहीं कर रहा है! कल कोई कह सकता है कि वो सीआरपीसी, आईपीसी जैसे क़ानूनों को लागू नहीं करेगा.” जाहिर है, यह सारी बातें इतनी गंभीर हैं जो पूरी की पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह उठाती हैं. सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को सूखा प्रभावित राज्यों में मनरेगा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा जैसी कल्याण योजनाओं की वस्तुस्थिति के आंकड़े जुटाने के भी निर्देश दिए. इसके साथ साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले में 10 फ़रवरी तक हलफ़नामा दायर करने का आदेश भी दिया और इस मामले की अगली सुनवाई 12 फ़रवरी को करने का निर्णय लिया. 

सुप्रीम कोर्ट ने 18 जनवरी को सरकार से इन कल्याण योजनाओं के बारे में केंद्र से सूचनाएं देने को कहा था ताकि पता लगाया जा सके कि सूखा प्रभावित इलाक़ों में न्यूनतम रोजगार और भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है या नहीं. खंडपीठ एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, झारखंड, बिहार, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कई इलाक़े सूखे की चपेट में हैं और प्रशासन उन्हें पर्याप्त राहत मुहैया नहीं करा रहा है. जाहिर है कि समस्या अगर एक स्तर पर ही हो तो उसे अनदेखा भी कर दिया जाय, लेकिन संसद द्वारा लागू कानून की किस प्रकार से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, यह बात समझ से बाहर हो चुकी है. इस पूरी लापरवाही या अनदेखापन का खामियाजा भुगतती है जनता और मुसीबत का पिटारा बढ़ता जाता है. बहुत आश्चर्य नहीं होता है कि एक तरफ हमारे गोदाम राशन से भरे रहते हैं तो दूसरी ओर जनता भूख से बेहाल हो जाती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणी से प्रशासनिक लापरवाही के साथ साथ राजनीतिक नेताओं को भी जवाबदेही बनेगी!  भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और केन्द्रीय भंडारण निगम की गतिविधियां लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की अवधारणा से प्रेरित हैं. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, जो 5 जुलाई 2013 से लागू हुआ है, इसके तहत टीपीडीएस के अंतर्गत हकदार लाभार्थियों को अत्यधिक राजसहायता प्राप्त खाद्यान्न उपलब्ध कराना केंद्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों की कानूनी बाध्यता है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत हकदार व्यक्तियों को राजसहायता प्राप्त दरों पर खाद्यान्नों की वास्तविक डिलीवरी अथवा आपूर्ति सुनिश्चिित करना राज्य सरकारों का दायित्व हो गया है. अब समझना मुश्किल नहीं है कि इतने स्पष्टीकरण के बावजूद अगर जनता समस्याओं से त्रस्त है तो कोर्ट की नाराजगी सौ फीसदी वाजिब है. हालाँकि, इस नाराजगी के बावजूद ज़मीनी हालात किस हद तक बदलेंगे, यह कहना अत्यंत मुश्किल है. 

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Sunday, 31 January 2016

टीम इंडिया को बधाई, परन्तु ... Indian cricket team in Australia, Great victory, hindi article by mithilesh, corruption in game

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा क्लीन-स्वीप की घटना ऐतिहासिक है. किसी मित्र ने बताया मुझे कि यह कई दशकों बाद हुई घटना है. हालाँकि, मैंने इसकी तस्दीक नहीं की, लेकिन इस बात में मुझे कतई शक नहीं है कि विदेशी ज़मीन पर भारतीय टीम का यह चमत्कार ही है. इसकी चर्चा आगे करेंगे, लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में खेलों को लेकर हालात अगर लगातार बदल रहे हैं तो इसका श्रेय काफी हद तक क्रिकेट को ही है. बहुत दिन नहीं हुआ, जब अखबारों में खिलाडियों द्वारा गरीबी में जीने और अपने मेडल तक बेच देने या उन्हें गिरवी रखने की खबरें पढ़ने को मिल ही जाती थीं. ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि सभी खिलाड़ियों की हालत पूरी तरह सुधर गयी हो, किन्तु यह तो माना ही जाना चाहिए कि क्रिकेट की अपार लोकप्रियता और दुसरे बिजनेस मॉडलों के सक्सेज होने से आज बैडमिंटन लीग, फूटबाल लीग, कबाड़ी लीग जैसे अनेक आयोजन बड़े पैमाने पर हो रहे हैं, जिनसे रोजगार की बेहतर संभावनाएं पैदा हुई हैं. साफ़ है कि खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब ... वाली कहावत अब उलट गयी है, मतलब, अब खेल-कूद कर भी नवाब बनने का सपना सच किया जाने लगा है. भारतीय युवकों का यह सपना सच करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले भारतीय क्रिकेट में पिछले दिनों बड़ी उथल-पुथल रही है. आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग से लेकर लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल तक में भारतीय प्रतिनिधित्व को लेकर किरकिरी झेलनी पड़ी है तो टीम में भी कैप्टेंसी विवाद को जरूरत से ज्यादा तूल दिया गया. जगमोहन डालमिया के आकस्मिक निधन से प्रशासनिक स्तर पर भी बीसीसीआई ने कई मुसीबतें झेलीं, किन्तु ऑस्ट्रेलिया में जिस तरह से इस टीम ने क्लीन स्वीप किया है, अपने आप ही यह बधाई की पात्र हो जाती है. सिडनी में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए तीसरे और अंतिम टी-20 मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से हराकर तीन मैचों की सिरीज़ 3-0 से जीत ली है.

 इसके साथ ही भारतीय टीम आईसीसी टी-20 रैंकिंग में चोटी पर पहुँच गई है. इस मैच में, ऑस्ट्रेलिया ने शेन वॉटसन के शानदार शतक की बदौलत 197 रन बनाए थे तो उसके जवाब में, भारत ने 20 ओवरों में तीन विकेट खोकर 200 रन बनाकर मुक़ाबला जीत लिया. इस क्रम में, भारत की ओर से सुरेश रैना 49 रन बनाकर नाबाद रहे तो युवराज सिंह 12 गेंदों में 15 रन बनाकर नाबाद रहे. इससे पहले भारत की पारी में रोहित शर्मा और शिखर धवन ने ठोस शुरूआत की और जाते-जाते भारत को एक मजबूत आधार दे दिया. शिखर धवन 9 गेंदों में चार चौकों और एक छक्के की मदद से 26 रन बनाकर आउट हुए तो रोहित शर्मा ने 38 गेंदों में पाँच चौकों और एक छक्के की मदद से 52 रन बनाए. धवन के बाद आए विराट कोहली 36 गेंदों में 50 रन बनाकर आउट हुए. जाहिर है, विराट कोहली को यूं ही भारतीय टीम का चमकदार सितारा नहीं कहा जा रहा है, बल्कि वह इसके पूर्ण हकदार हैं. भारत की ओर से नेहरा, बुमराह, अश्विन, जडेजा और युवराज ने एक-एक विकेट भी लिया. हालाँकि, जितने रन दोनों परियों में बने, उतने तो कई बार वनडे मैचों में भी मुश्किल से बनते हैं, लेकिन यही तो क्रिकेट के इस ताबड़तोड़ फॉर्मेट की ख़ूबसूरती है, जो अपने दर्शकों को रोमांच से भर देता है. जाहिर है, कई झंझावातों से जूझ रही टीम को ऑस्ट्रेलिया में मिली इस जीत से बड़ी राहत मिली होगी तो भारतीय प्रशंसकों में भी क्रिकेट की लोकप्रियता को नई ऊंचाई भी निश्चित रूप से मिली होगी. देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में भारतीय क्रिकेट टीम और बीसीसीआई किस स्तर तक बढ़िया प्रदर्शन करते हैं और उनको कायम भी रखते हैं या नहीं! लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को क्रिकेट के हित में किस हद तक लागू किया जाता है, इस बात पर भी भारतीय क्रिकेट का भविष्य बहुत कुछ निर्भर करेगा, इस बात में कोई दो राय नहीं है. साफ़ है कि टीम इंडिया को तो इस ऐतिहासिक जीत पर बधाई दी जा सकती है, किन्तु प्रशासन को क्रिकेट के भविष्य को लेकर काफी कुछ करने पर किन्तु-परन्तु का प्रश्नचिन्ह यथावत है. दिल्ली में डीडीसीए पर हाल ही में जो भ्रष्टाचार के आरोप उठे थे, वह तो तमाम क्रिकेट असोशिएशंस में व्याप्त करप्शन की एक बानगी भर ही है. हालाँकि, अभी क्रिकेटर्स, क्रिकेट प्रशासक और भारतीय प्रशंसकों के लिए जीत के जश्न का समय है, किन्तु जश्न में क्रिकेट के भविष्य का मुद्दा न भूल जाएं, इसी में खेल की भी सार्थकता है और टीम की भी!

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Friday, 29 January 2016

दलाली, बेरोजगारी और भारतीय रेल - New article on railway and corruption, dalali, unemployment, berojgari, mithilesh as a hindi writer


http://editorial.mithilesh2020.com/2015/11/blog-post_20.html
पिछले दिनों एनसीआर में एक प्लॉट का पावर ऑफ़ अटार्नी कराने की बात आयी तो कई दलालों से बात करने के बाद भी 28 हजार पर बात बनी. मुझे अंदाजा था कि इसमें कम से कम आधी फीस तो गवर्नमेंट को जाएगी ही, बाकी आधी दलालों की जेब में! जब हम सब-रजिस्ट्रार के ऑफिस में पहुंचे तो पूरी प्रक्रिया के दौरान सरकारी फीस जानकार मैं हैरान रह गया कि यह मात्र 1200 रूपये थी! बाकी 27,800 दलालों के नेक्सस की जेब में! जरा गौर कीजिये, यह पूरी की पूरी काली कमाई, जिस पर सरकार को कुछ भी तो नहीं मिला और जनता का उस पर से भरोसा उठा सो अलग! यह हाल, कमोबेश हर एक दफ्तर की ही है और इसलिए कभी-कभी इस बात पर बड़ी कोफ़्त होती है कि भारत में इतनी दलाली है कि सीधे-सादे काम भी समस्याग्रस्त हो जाते हैं! आश्चर्य नहीं कि एक फाइल पर सिग्नेचर करने भर के लिए आपको हज़ारों हरी और लाल पत्तियां पर्स से निकालनी पड़ती हैं. इसी सन्दर्भ में, आप तरीके से सोचें तो जिसको कहीं जाना होता है, वह व्यक्ति ही ट्रेन की टिकट खरीदता है... !! लेकिन नहीं! इस काम में मेट्रो शहरों की तो छोड़ दीजिये, टू टियर सिटीज को भी छोड़ दीजिये, जिला मुख्यालयों को भी छोड़ दीजिये, बल्कि कस्बे तक में आपको दलालों की दुकानें मिल जाएँगी, जो आपको रेलवे का कन्फर्म टिकट दिलाने का दावा करते हैं... और आश्चर्य देखिये, दिला भी देते हैं! समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्या चमत्कार हो जाता है कि एक आम-यात्री को ऑनलाइन या टिकट-खिड़की पर नाक रगड़ने के बाद भी टिकट नहीं मिलता है, जबकि वही टिकट डबल प्राइस पर दलाल दिला देते हैं! 
 
http://editorial.mithilesh2020.com/2015/12/mithilesh-new-article-on-odd-even.html
अगर इस एंगल को थोड़ा घुमाकर देखें तो भारत की बेरोजगारी से त्रस्त, पिछले दरवाजे से फैला यह एक बड़ा नेटवर्क है, जहाँ कोई नियम-कानून नहीं और जिसका-जितना हाथ बनता है, उतना वह अपने ग्राहक को काटता है. इस तरह के बड़े नेक्सस में बड़ी ट्रांजैक्शन होती है, जिस पर सरकार को टैक्स के रूप में एक रूपया नहीं मिलता है! ऐसा नहीं है कि इस तरह का नेक्सस सिर्फ रेलवे में ही हो, बल्कि हर एक और प्रत्येक सरकारी विभाग में डेढ़ गुना, दो गुना, दस गुना और कई जगहों पर तो हज़ार गुना तक कमीशन है, जो एक तरफ तो देश में बेरोजगारी की हालत बयां करती है तो दूसरी ओर जनता को अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक दबाव में लाती हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारी व्यवस्था में इतनी बड़ी खामी का कोई स्थाई इलाज ढूँढा नहीं जा सका है. हाँ, कभी-कभार सरकारें कुछ न कुछ उपाय करती रहती हैं, जिनसे कुछ हलचल तो जरूर मचती है, किन्तु जल्द ही यह बड़ा नेक्सस इसका तोड़ निकाल लेता है, क्योंकि जो सरकार योजना बनाती है, खुद उसी सरकार के नौकरशाह और अधिकारी, दलालों को इसका तोड़ भी बता देते हैं! अबकी बार रेलवे ने अपने कुछ फैसलों से हलचल पैदा करने की कोशिश जरूर की है, जिससे सीधे तौर पर कुछ ठोस निकलने की उम्मीद नज़र तो आती नहीं! हाँ, इससे जरूरतमंद यात्रियों को असुविधा होने की राह जरूर खुल गयी है. ट्रेन की टिकट बुकिंग में दलालों पर नकेल कसने के लिए रेल मंत्रालय ने ऑनलाइन ई-टिकट और आई-टिकट को लेकर जिन नियमों में बदलाव किए हैं, उसके अनुसार अब कोई भी यात्री एक महीने में सिर्फ छह टिकट बुक करवा पाएगा, जबकि इससे पहले प्रत्येक लॉगिन से एक महीने में 10 टिकट बुक करवाए जा सकते थे. 
http://editorial.mithilesh2020.com/2015/12/mithilesh-hindi-article-on-corruption.html

जो शुरूआती बातें कही जा रही हैं, उसके अनुसार रेलवे द्वारा अपनी वेबसाइट के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गए फैसलों के तहत आईआरसीटीसी पर एक यूज़र आईडी से एक दिन में सिर्फ दो टिकट (सुबह 8 से रात 10 बजे तक) ही मान्य हैं, जबकि तत्काल बुकिंग में भी 10 बजे से 12 बजे तक दो टिकटें ही बुक करवाई जा सकेंगी. इसके अलावा एजेंट बुकिंग शुरू होने के पहले आधे घंटे तक टिकट बुक नहीं करवा सकते, तथा 8 बजे से 12 बजे तक ई-वॉलेट और कैशकार्ड से बुकिंग नहीं की जाएगी. गौरतलब हैं कि यह सारे नियम, 15 फरवरी, 2016 से लागू होने जा रहे हैं. गौरतलब है कि हाल ही में रेलवे ने जनरल टिकट के नियमों में भी बदलाव किए थे, जिनके तहत जनरल टिकट अब सिर्फ तीन घंटे तक मान्य रहेगा.  इसके पीछे जो तर्क दिए गए हैं, उसके अनुसार सामान्य यात्रियों को महीने में छह बार से ज्यादा टिकट बुक करने की जरूरत नहीं होती है. रेलवे अधिकारियों के अनुसार, टिकट बुकिंग से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि 90 प्रतिशत उपभोक्ता महीने में छह टिकट बुक करते हैं, और महज 10 प्रतिशत लोग छह से ज्यादा टिकट बुक करते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि शेष 10 फीसदी उपभोक्ता संभवत: टिकटों की दलाली कर रहे थे. समझना मुश्किल नहीं हैं कि यह सारे तर्क सम्भावना के आधार पर दिए गए हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं बताया गया हैं. इस फैसले में जिन 10 प्रतिशत यात्रियों के ज्यादा यात्रा करने की बात कही गयी हैं, उनमें बिजनेस क्लास के लोगों के होने की संभावना भी ज्यादा है, जिसे अनदेखा कर दिया गया है. साफ़ है कि इस फैसले से रेलवे में दलालों पर प्रतिबन्ध लगे न लगे, किन्तु उसके फैसले की कई स्तरों पर किरकिरी जरूर होगी! बेहतर होता अगर रेलवे ऐसे अटपटे फैसलों से बचता और अपना निगरानी तंत्र और मजबूत करता! 

http://editorial.mithilesh2020.com/2016/01/mithilesh-new-article-on-startup-india.html
निगरानी-तंत्र मजबूत करने के साथ ही साथ विभिन्न स्थानों पर स्टेट बैंक के आउटलेट्स (ग्राहक सुविधा केंद्र) की तरह ऑफिशियल आउटलेट्स जारी करता, ताकि ग्राहकों को उनके नजदीक सुविधाएं मिल सकें तो इस पूरे नेक्सस पर सरकार की नज़र भी बनी रहती! इसके अतिरिक्त, बेरोजगारी के स्तर पर भी हमें समग्र प्रयास की अंतहीन जरूरत तो है ही, साथ ही साथ सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी सख्ती बरते जाने की भी आवश्यकता है, क्योंकि दलाल पैदा करने और पालने पोसने के लिए खाद-पानी का बड़ा हिस्सा यहीं से मिलता है. एक संगठित अध्ययन के साथ, इन समस्याओं पर श्वेत-पत्र जारी किया जाता और जरूरी सिफारिशों को कड़ाई से लागू किया जाता! वगैर इन उपायों के चाहे रेलवे हो या कोई अन्य सरकारी विभाग, दलालों के नेक्सस से मुक्ति लगभग असंभव ही दिखती है.
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली. 
http://editorial.mithilesh2020.com/2015/12/mithilesh-hindi-article-on-internet.html
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Thursday, 28 January 2016

21वीं सदी शर्मसार है! New hindi article by mithilesh, richest and poorest people, black money


अमीरी-गरीबी का मुद्दा सर्वकालीन है, इस बात में कोई दो राय नहीं है. हाँ! आज चूँकि हम खुद को आधुनिक, शिक्षित, विकासशील, मानवतावादी और जाने क्या-क्या होने का दावा करते रहते हैं तो ऐसे में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को नापना जरूरी हो जाता है कि क्या वाकई में हम वह हैं, जिसका होने का दावा करते थकते नहीं? इस सन्दर्भ में गहराई से जाने पर आपको लगेगा कि फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स जैसी कंपनियां दुनिया के उन तमाम इंसानों का मजाक उड़ाती हैं, जिन्हें इंसानियत के बुनियादी हक़ भी हासिल नहीं हो सके हैं! पहले की ही तरह, वेल्थ-एक्स की हालिया रिपोर्ट में अमीरों की अमीरी की एक बार फिर झलक दिखलाई गयी है. बड़ा दिलचस्प लगता है यह देखना और समझना कि दुनिया में किस-किस कुबेर के पास क्या-क्या सम्पदा मौजूद है? जरा गौर फरमाइए इन आंकड़ों पर! दुनिया के अमीरों की इस लिस्ट में आईटी की दुनिया के बादशाह और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स 87.4 अरब डॉलर यानी करीब 5.9 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ फिर से एक बार दुनिया के सबसे अमीर आदमी बन गए हैं. पहले नबंर पर बिल गेट्स के बाद, दूसरे नबंर पर कोई अमाचिओ ओर्टेगा हैं जिनके पास 4.5 लाख करोड़ रुपये है. इसी तरह, तीसरे नबंर पर ब्रेकशिरे हथवे के पास 4.1 लाख करोड़ रुपये है तो चौथे नबंर पर जैफ बेजॉन के पास 3.8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति है. इसके बाद, पांचवें नबंर पर 3.2 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ कोच इंडस्ट्रीज के डेविड कोचल हैं, छठे स्थान पर कोच इंडस्ट्रीज के चार्ल्स कोच हैं, सातवें स्थान पर ओरेकल कॉरपोशन के लैरी एलिसन और उसके बाद आठवें स्थान पर फेसबुक के मार्क जकरबर्ग हैं जिनकी संपत्ति 2.9 लाख करोड़ रुपये है. 

फेसबुक की बात आयी है तो बताते चलें कि हालिया तिमाही नतीजा आने के बाद फेसबुक के शेयर 6.78 डॉलर या सात प्रतिशत चढ़कर 101.23 डॉलर पर पहुंच गए हैं. हालांकि इनकम के लिहाज से गूगल, फेसबुक की तीन गुनी बड़ी कंपनी बनी हुई है, लेकिन फेसबुक यह अंतराल धीरे-धीरे कम कर रहा है क्योंकि यह कंपनी अपने लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग एप्लिकेशन के जरिए ज्यादा मोबाइल विज्ञापनों की बिक्री कर रही है. साफ़ जाहिर है कि ज़ुकरबर्ग पहले फेसबुक और अब फ्री बेसिक्स के माध्यम से धनाढ्यों में शीर्ष पर पहुँचने की पूरी तैयारी कर चुके हैं. धनवानों की इस लिस्ट में, ब्लूमबर्ग ग्रुप के माइकल ब्लूमबर्ग का नंबर नौवां है तो दसवां स्थान रिटेल कंपनी आईकेईए के इनग्वार कम्पर्ड को मिला है. भारत के सन्दर्भ में इस सूची को देखें तो, 24.8 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ मुकेश अंबानी 27वें पायदान पर, अजीम प्रेमजी 16.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 43वें स्थान पर और फिर दिलिप सांघवी 16.4 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 44वें स्थान पर विराजमान हैं. यह तो हुई एक बात, किन्तु इससे आगे की कहानी बिलकुल ही अलग और कहीं न कहीं दर्द देने वाली भी है. अमीरों की बात अगर थोड़ा दुसरे शब्दों में करें तो, एक आंकलन के अनुसार, दुनिया में 62 ऐसे लोग हैं जिनके पास इतनी दौलत है जितनी इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब लोगों के पास भी नहीं है! चौंकिए नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ऑक्सफैम (Oxfam) के अनुसार, 2016 के जनवरी महीने का यह आंकड़ा हमारी इंसानियत और अमीरी को बेहद सटीकता से आइना दिखाती है. बताते चलें कि ऑक्सफेम 90 देशों में काम कर रही 17 संस्थाओं का एक इंटरनेशनल संगठन है जिसका मकसद गरीबी, भुखमरी से लड़ना है. यह संस्था साफ़ कहती है कि दुनिया का हर तीसरा आदमी भारी गरीबी में जी रहा है. यही नहीं, बल्कि इसके आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक गैर बराबरी पिछले कुछ सालों में बड़ी ही तेज़ी से बढ़ी है. साफ़ है कि ऐसे में फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स की दुनिया के अमीरों की लिस्ट जारी करना मानवता के लिए शर्मसार ही करने वाला है! 

ऐसे हालातों में जो सबसे मुश्किल बात उभर कर सामने आती है, वह यह है कि गरीबी और अमीरी के इन आंकड़ों से दुनिया के नीति-निर्धारकों और खुद तथाकथित धनाढ्यों के ऊपर शायद ही किसी बात का फर्क पड़ता है! अभी हाल ही में कॉर्पोरेट के ऊपर सीएसआर (कॉर्पोर्टेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत भारत सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से मुनाफे का दो फीसदी (शायद) खर्च करने की सुगबुगाहट ही उठी थी कि तमाम कॉर्पोरेट घरानों ने इसके खिलाफ दबे स्वरों में मोर्चा खोल दिया! कई आंकलन यह साफ़ बताते हैं कि सीएसआर कई कंपनियों में औपचारिक भर ही हैं और इससे अगर कुछ कंपनियां आगे बढ़ती भी हैं तो वह इससे अपना पीआर मजबूत करके व्यापार बढ़ा लेती हैं! ऐसे में सीधा प्रश्न यही उठता है कि अगर 21 वीं सदी में भी हम गरीबी-अमीरी के बारे में इतनी गहराई से बात कर रहे हैं तो क्या अपने आप में हमारी बुद्धिजीविता के लिए यह शर्मिंदा करने वाली बात नहीं है? अगर हाँ! तो इससे निपटने के ठोस उपाय कहाँ हैं? अगर गरीबी की परतों को और उधेड़ें तो 2011 में दुनिया के 388 सबसे अमीर लोगों के पास आधी ग़रीब दुनिया के बराबर दौलत थी, जो 2012 में ये 177 अमीरों के पास सिमट गई. 2014 में यह 80 लोगों के पास रह गई और 2015 में 62 सबसे अमीर लोगों के पास. मतलब साफ़ है कि पूँजी ख़ास जेबों में बड़ी तेजी से केंद्रित होती जा रहे है! इसके साथ-साथ, ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के गरीब देशों की हालत तो और भी खराब है, क्योंकि दुनिया के रिच पर्सन्स ने 7.6 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति दूसरे देशों में छुपा रखी है. इससे सम्बंधित देशों की सरकारों को 190 अरब डॉलर टैक्स का नुक्सान स्वाभाविक ही है. ऑक्सफैम ने गंभीर आर्थिक गैर बराबरी को रोकने के लिए तीन तरफा कोशिशों की वकालत करते हुए कहा है कि टैक्स से बचने के रास्तों पर कार्रवाई, जनसेवाओं में ज्यादा निवेश और कम तनख़्वाह पाने वालों के वेतन में भारी इजाफ़ा समस्याओं से काफी हद तक निजात दिल सकती है. यह सारी बातें हम कुछ टूटे-फूटे आंकड़ों में हम पहले भी जानते रहे हैं! 

आखिर, देश में काले धन के मुद्दे पर सरकार तक बदल गयी और प्रत्येक भारतीय के बैंक अकाउंट में पंद्रह लाख आने की बात यही तो थी! पर हाय रे अमीरी-गरीबी के मुद्दे! तेरा न तब कुछ हुआ, और आज भी कुछ न होगा! भले ही कोई अन्ना, रामदेव या ऑक्सफैम कुछ आंकड़े, कुछ आंदोलन क्यों न हो जाए! इस मामले में हम जितना ही अंदर घुसेंगे, उतनी ही पीड़ा होगी क्योंकि मूल समस्या यह है कि इंसान जब तक पीड़ित रहता है, वह संघर्ष करता है, आवाज उठाता है, किन्तु ज्योंही वह कुछ लेवल ऊपर आता है, वैसे ही उसका स्वभाव अचानक ही परिवर्तित हो जाता है और वह भी काले धन के रूप में गरीबों का हक़ किसी क्रीमी लेयर या कृमी कीड़े की भांति चाटना, हड़पना शुरू कर देता है. फिर मुश्किल यह होती है कि वह पैसा, जो गरीबों का हिस्सा है, उसे अमीर लोग और कंपनियां टैक्स बचाने के लिए टैक्स हेवेन्स में जमा करती जाती हैं और अंततः गरीबी और गैर बराबरी का मुकाबला करने के लिए जरूरी संसाधन सरकारों को नहीं मिल पाते. भ्रष्टाचारी नेता इस मामले में टैक्स हेवेन्स का जान बूझकर संरक्षण करते हैं. अनुमान है कि मल्टीनेशनल कंपनियों की ओर से इस तरह टैक्स बचाने से विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. साफ़ है कि मुसीबत की जड़ें गहरी जम चुकी हैं और हम तथाकथित बुद्धिजीवी फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स की दुनियाभर की अमीरों की लिस्ट देखकर 'रोमांचित' होते हैं! मुकेश अम्बानी जैसे धनाढ्य 'एंटीला' जैसे ऊँचे टावर पर चढ़कर घोषणा करते हैं कि यह क्षण 'रिलायंस परिवार' के लिए गौरव का है! काश वह यह भी बता सकते कि कौन से रिलायंस परिवार के लिए यह गौरव का क्षण है? क्या वह 30 - 40 हजार एम्प्लोयी, जो मुकेश अम्बानी से जुड़े हुए हैं?  अगर हाँ! तो बाकी देशवासियों के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं? और अगर नहीं! तो फिर रिलायंस या दुसरे किसी भी कार्पोरेट घराने का सीधा मतलब तो कोई 'अम्बानी' या 'अमाचिओ ओर्टेगा' ही तो हैं? बाकी जनता और खुद उनके एम्प्लाइज को भी 21वीं सदी में वही तो मिलता है, जिसे कहते हैं ... बाबाजी का ... !!!

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