Sunday, 1 May 2016

कंप्यूटर की दुनिया में 'सुरक्षा जरूरी' - Online security tips in Hindi, Article by Mithilesh, Latest Tips

हम सबने वह कहावत तो सुनी ही है कि 'प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर'! जाहिर सी बात है कि किसी बीमारी के इलाज में जितना समय और ऊर्जा खर्च होती है, उससे काफी काम ऊर्जा और थोड़ी सावधानी में हम काफी सुरक्षित महसूस कर सकते हैं. बात जब आपके कंप्यूटर, ऑनलाइन डेटा और हैकिंग जैसे विषयों की हो रही हो तब तो यह और भी ख़ास हो जाता है. पिछले दिनों मैं एक कंप्यूटर एक्सपर्ट से मिला था और उन्होंने बातों ही बातों में बताया की स्पैमिंग, फिशिंग और वायरस जैसे तमाम दुसरे टर्म्स के लिए 'हैकर्स' को खासी रकम मिलती है और यह रकम उन्हें देती हैं बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियां, ताकि उनके 'सिक्योरिटी प्रोडक्ट्स' बिक सकें अथवा प्राप्त सूचना के आधार पर बड़ी कंपनियां अपनी रणनीति बना सकें. खैर, यह बात अपनी जगह सही या गलत हो सकती है, किन्तु अगर हम सावधान रहते हैं तो काफी हद तक समस्या से बचा जा सकता है. इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों पर अवश्य ही गौर किया जा सकता है:

पासवर्ड्स हैकिंग एवं फिशिंग से बचें (Passwords hacking and Fishing): ज़रा सोचिये, अगर आपके कंप्यूटर का, मेल का, वेबसाइट एडमिन का पासवर्ड किसी के हाथ लग जाए तो? तो फिर न केवल उससे आपकी व्यक्तिगत या प्रोफेशनल सूचनाएं सार्वजनिक होने का खतरा रहता है, बल्कि डेटा लॉस से लेकर डेटा डिलीट होने तक का रिस्क आपके सामने रहता है. आज की दुनिया में, यह विचार करना ही कितना भयावह है कि आपकी मुख्य मेल आईडी हैक हो जाए अथवा आपके कंप्यूटर का डेटा करप्ट हो जाए. ऐसे में पासवर्ड को 'कठिन' रखना आप जानते ही हैं, जिसमें कैपिटल, स्माल लेटर्स के साथ नम्बर्स एवं स्पेशल कैरेक्टर्स का प्रयोग शामिल है तो इसको समय-समय पर बदलते रहना भी एक अच्छा विकल्प है. अगर आपने सावधानी से यह प्रक्रिया पूरी कर ली है तो फिर आपको 'फिशिंग' से सर्वाधिक सावधानी की आवश्यकता है. यह कुछ ऐसा है कि आपकी मेल पर एक लिंक आता है और उसे क्लिक करने पर आपके सामने हूबहू जीमेल या फेसबुक का लोगिन पेज दिखने लगता है. वस्तुतः यह हैकर्स की चाल होती है कि आप सामने दिख रहे पेज को जीमेल या फेसबुक समझकर अपना यूजर आईडी और पासवर्ड इंटर करें और ऐसा करते ही वह हैकर के पास चला जाता है. इससे बचने के लिए आपको किसी भी वेबसाइट का यूआरएल ब्राउज़र में खुद ही टाइप करना चाहिए और जीमेल, फेसबुक, ट्विटर इत्यादि बड़ी वेबसाइट के यूआरएल का सिक्योर (https) होना निश्चित कर लेना चाहिए. अंजान कंप्यूटर पर बैठते समय अगर आप अपने पासवर्ड को हैक होने से बचाना चाहते हैं तो आपको 'प्राइवेट ब्राउज़िंग' (Incognito Window) करना चाहिए, जबकि पासवर्ड रेमेम्बेर करने का ऑप्शन ब्राउज़र द्वारा पूछते ही मना कर देना चाहिए. 

ईमेल की सुरक्षा (Security of Email): ऑनलाइन दुनिया में अगर सुरक्षा से सम्बंधित किसी रिस्क की बात होती है तो उसमें सर्वाधिक चर्चा ईमेल पर रिस्क की ही होती है. ज़रा सोचिये, अगर आपकी ईमेल का पासवर्ड किसी के हाथ लग गया तो वह क्या-क्या कर सकता है? ज़रा कल्पना कीजिये कि आपकी कांटेक्ट लिस्ट में जितनी मेल आईडी हैं, उन पर कोई अश्लील वीडियो का स्पैम-लिंक भेज दे तो? जाहिर है, यह खतरा कहीं ज्यादा बड़ा है और आपको अपनी सेंट-मेल में भेजी गयी मेल पर भी कभी-कभार नज़र घुमा लेनी चाहिए. अगर कुछ ऐसी मेल नज़र आएं, जिन्हें आपने नहीं भेजा है तो तुरंत अलर्ट हो जाएँ और अपने पासवर्ड चेंज करने के साथ ही 'लोग आउट अदर डिवाइसेज' करें, जिससे खतरा कम हो सके. आम तौर पर देखा जाता है कि आपकी मेल आईडी हैक करने के बाद भी हैकर उसका पासवर्ड बदलने में रुचि नहीं रखता है और बहुधा आपकी मेल आईडी पुराने पासवर्ड से ही खुल जाती है. खुदा न खास्ता, अगर आपका पासवर्ड भी बदल दिया गया है तो तुरंत ही रिकवरी मेल्स और रिकवरी फोन्स की सहायता से उसका पासवर्ड रीसेट करने का प्रयत्न करें. बावजूद इसके अगर आप सफल न हों तो इसकी कानूनी रिपोर्ट करने में देरी न करें, अन्यथा आपकी मेल से हुई किसी गैर कानूनी गतिविधि के झमेले में आप भी पड़ सकते हैं. यह कुछ-कुछ आपके फोन के सिम की तरह है और जो प्रक्रिया आप फोन के सिम गुम होने पर अपनाते हैं, कुछ-कुछ वही प्रक्रिया ईमेल के हैक होने पर भी अपनाएं. और हाँ, अपने ईमेल की सेटिंग चेक करते समय 'फॉरवार्डिंग रूल्स' पर भी जरूर ध्यान दें कि कहीं आपकी फ्यूचर मेल्स तो कहीं नहीं जा रही हैं न! हालाँकि, ईमेल हैकिंग से बचने के लिए 2 वे ऑथेंटिकेशन प्रक्रिया को अपनाएं जो जीमेल जैसे कई सर्विस प्रोवाइडर प्रदान करते हैं. इस क्रम में मालवेयर से सावधानी रखना भी उतना ही आवश्यक है. 

क्रेडिट/ डेबिट कार्ड फ्रॉड (Credit/ Debit Card Fraud): यह एक ऐसा फ्रॉड है, जिससे आपको डायरेक्ट चूना लग सकता है, अगर आपने जरा भी असावधानी बरती. इसे हैक करने के लिए भी 'फिशिंग' जैसी टेक्निक्स काम में लाई जाती हैं तो ऑफलाइन भी इसके लिए काफी दुष्प्रयास किये जाते हैं. आप यदि बैंकों की ब्रांच में जाएँ तो वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लटके बैनर आपको हिदायत देते मिलेंगे कि 'आपका बैंक आपसे अकाउंट सम्बंधित जानकारी फोन पर नहीं मांगता है, अतः अपने क्रेडिट/ डेबिट कार्ड की डिटेल किसी को न दें.' होता क्या है कि आपको आपकी ही भाषा वाली किसी लड़की या लड़के का फोन आता है, जो कहता है कि वह 'अमुक बैंक से बोल रहा है और फिर धीरे-धीरे आपसे जानकारियां लेना प्रारम्भ करता है. नाम, पता, अकाउंट न. क्रेडिट कार्ड डिटेल .... ... !! ऐसे में, कई लोग फंस जाते हैं और फिर उनको कुछ देर बाद पता चलता है कि उनके अकाउंट से रूपये निकल चुके हैं. अगर ऐसा मेसेज आपके मोबाइल पर आता भी है तो तुरंत अपने बैंक से संपर्क करें. हालाँकि, बेहतर यह होगा कि आप ऐसे किसी जाल में फंसे ही नहीं. इसके लिए आप सिक्योर सर्वर (https) वेबसाइट के अतिरिक्त दूसरी किसी वेबसाइट का कतई प्रयोग न करें तो जानी पहचानी और ठीक ठाक कंपनियों के अतिरिक्त अंजान वेबसाइट पर क्रेडिट कार्ड डिटेल डालने से परहेज करें और अगर ऐसा करना जरूरी ही हो तो उस वेबसाइट और कंपनी का फिजिकल एड्रेस अवश्य ही चेक करें. सर्वे बताते हैं कि ऑनलाइन खरीददारी के लिए प्रीपेड कार्ड एक बढ़िया विकल्प होते हैं, जिसमें आप जरूरत के अनुसार राशि ही रखते हैं. वैसे आजकल अधिकांश कार्ड्स में एडेड लेयर सुरक्षा आती है, जो ओटीपी के माध्यम से ही आगे बढ़ती है, फिर भी पुराने कार्ड होल्डर्स को सावधानी बरतने की आवश्यकता है. तमाम विशेषज्ञ पब्लिक कम्प्यूटर्स और सार्वजनिक वाईफाई को शॉपिंग के लिए ठीक नहीं मानते हैं. 

स्मार्टफोन / टैबलेट सिक्योरिटी (Smartphone / Tablet Security): कंप्यूटर और लैपटॉप पर तो एकबारगी सुरक्षा-सम्बन्धी खतरे कुछ कम माने जा सकते हैं तो आपके स्मार्टफोन पर और भी ज्यादा अलर्ट और सावधानियों की आवश्यकता है. साफ़ है कि आपका स्मार्टफोन अब केवल एक फोन भर नहीं है, बल्कि वह एक पूरा कंप्यूटर पॅकेज या फिर उससे ज्यादा है. ज़रा गौर कीजिये, आपके स्मार्टफोन में वह सारे एप्लिकेशन और ओटीपी के लिए सिम तक मौजूद हैं, जिससे हैकिंग और भी आसान हो जाती है. इसके लिए आपको कहीं ज्यादा सजगता की आवश्यकता है. कई लोग बैंकिंग के लिए ऐप्स फोन में इंस्टॉल करके रखते हैं, जो उनको सहूलियत तो अवश्य ही देता है, किन्तु अगर आपका फोन सुरक्षित और कोड से लॉक नहीं है तो किसी के हाथ लगने पर यह आपका भारी नुक्सान करा सकता है. हम, आप रेस्टोरेंट में, मीटिंग में, सिनेमा में जहाँ कहीं जाते हैं फोन हमारे साथ होता है और कई बार ऐसा होता है कि हमारी ही गलती से वह कहीं छूट जाता है तो कई बार उस पर गलत लोग हाथ भी साफ़ कर देते हैं. ऐसी स्थितियों में आपकी मेल, आपके सोशल अकाउंट्स, पर्सनल फोटोज, बैंकिंग एप्लिकेशन का एक्सेस भी उस व्यक्ति के हाथ में चला जाता है. ऐसे में जरूरी है कि आप 'लॉक कोड', 'अपनी मोबाइल ब्राउज़िंग ट्रैकिंग ऑफ करना', रिकवरी ऐप इंस्टॉल करना, ओनर की कांटेक्ट डिटेल मोबाइल में फीड रखना और इन सबसे बढ़कर फिजिकली अपने फोन को सुरक्षित रखना सीख जाएँ. बहुत हद तक यह भी ठीक रहेगा कि आप बेहद जरूरी एप्लिकेशन ही फोन में रखें तो आर्थिक लेन-देन अपने लैपटॉप या कंप्यूटर से करें. स्पैम कॉल्स और एप्लीकेशनस में दिखाये जाने वाले विज्ञापनों को क्लिक करने से अवश्य बचें तो गूगल प्ले स्टोर या एप्पल स्टोर से ही एप्लिकेशन इंस्टॉल करने को प्राथमिकता दें. 

जाहिर है कि सुरक्षा एक ऐसा विषय है, जिसकी आवश्यकता हमेशा ही रहती है और बदलते तकनीकी युग में तो यह और भी आवश्यक हो जाता है. तकनीक से निश्चित तौर पर आपको काफी सहूलियतें मिली हैं, किन्तु अगर आप सुरक्षित नहीं हैं तो इसी तकनीक की सहायता से गलत तत्व आपको बर्बाद कर सकते हैं. इसलिए, तकनीक का इस्तेमाल अवश्य करें, स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल खूब करें, किन्तु 'सुरक्षा' के साथ!

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Saturday, 30 April 2016

धर्म,आस्था और संस्कृति का संगम है सिंहस्थ कुम्भ! Simhastha kumbh mela in Ujjain, Hindi Articles, Mithilesh

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हमारा देश भारत धर्म-प्रधान देश और यह एक बड़ा कारण है कि हमारी संस्कृति सदियों से इस मजबूत डोर में बंधी होने के कारण 'अक्षुण्ण' रही है. यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐसा देश है, जहाँ आपको हर कदम पर आस्था और धर्म के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन आसानी से हो जाएंगे! निश्चित रूप से भारत देश के हर क्षेत्र में आपको आस्था का एक नया रूप देखने को मिलता है, लेकिन इन सभी रूपों का अंत एक ही जगह होता है और वह है 'ईश्वर की साधना' और 'मोक्ष की प्राप्ति'! भारत की इसी आस्था का महामेला आपको महाकुंभ में देखने को मिलता है. भारतीय धर्मों में चमकते हुए ध्रुव तारे की भांति कुम्भ की महिमा का गान किया गया है और चूंकि कुम्भ का मेला 12 वर्षों के बाद आता है, इसलिए इसका महत्व काफी बढ़ जाता है. इस सम्बन्ध में कई किवदंतियां मौजूद हैं, जिसमें पुराणों के अनुसार देवताओं और राक्षसों के सहयोग से  समुद्र-मंथन में जो 'अमृत' से भरा हुआ कुंभ (घड़ा) भी निकला था, जिसे राक्षस भी पीना चाहते थे और देवता उन्हें अमृत नहीं देना चाहते थे, क्योंकि ऐसी मान्यता रही है कि 'अमृतपान' करने के पश्चात 'जीव' अमर हो जाता है. इस सन्दर्भ में, अमृत-कुंभ के लिए स्वर्ग में बारह दिनों तक संघर्ष चलता रहा और इस छीना-झपटी में उस 'अमृत-कुंभ' से चार स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिर गईं. यह स्थान पृथ्वी पर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक माने जाते हैं. इन स्थानों की पवित्र नदियों को अमृत की बूंदे प्राप्त हुईं और इसलिए ही इन पावन स्थानों पर यह पर्व कुंभ-स्नान के नाम से मनाया जाता है. हिन्दू दर्शन में इस बात की मान्यता है कि विशेष काल में कुम्भ स्नान करने से तमाम पूण्य प्राप्त होते हैं. इन चारों स्थानों पर निश्चित अवधि के पश्चात कुम्भ मेला लगता है और इस बार का कुम्भ-स्नान महाकाल की नगरी, भगवान् श्रीकृष्ण के शिक्षा केन्द्र, महाकवि कालिदास की भूमि, राजा विक्रमादित्य की नगरी 'उज्जैन नगरी' में मनाया जा रहा है. उज्जैन के पर्व को सिंहस्थ इसलिए कहा जाता है कि सिंह राशि पर बृहस्पति ग्रह-योग होने के समय 'कुम्भ स्नान' का समय आता है. 

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का मंदिर यहीं पर स्थित है, जो विश्व प्रसिद्द है. हिन्दू समाज में मेलों का महत्व बहुत पहले से है, जिसका एक विशेष सामाजिक महत्त्व भी है. अपनी आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रदर्शन और विस्तार के लिए मेले का आयोजन किया जाता रहा है, जहां सब लोग इकठ्ठे हो कर आपसी भाईचारे और सद्भावना के साथ आयोजन का आनंद लेते हैं और यह परंपरा आज भी हमारे देश में पूरे गौरव के साथ मनाई जाती है. थोड़ा पीछे के काल की तरह यात्रा की जाय तो, आज से सौ साल पहले भी लोग जान-मॉल कि परवाह किये बगैर कुंभ के मेले में शामिल होने के लिए दूर-दूर से पहुंचते थे. कई बार हम सबने भी सुना होगा कि कुम्भ स्नान पर छोटे-छोटे बच्चे बिछड़ जाते थे, जो या तो मिलते नहीं थे अथवा बड़े हो जाने के पश्चात माँ-बाप से उनका मिलन होता था. इस विषय पर हमारे बॉलीवुड ने भी तमाम फिल्में बनायी हैं, जो इसकी भव्यता का आप ही गवाह हैं. ऐसा भी नहीं है कि कुम्भ-स्नान करने केवल देशवासी ही पहुँचते हों, बल्कि विदेशी भी बड़ी संख्या में 'भारत दर्शन' के इरादे से कुम्भ मेलों में पहुँचते हैं. जाहिर है कि ऐसे में यह 'टूरिज्म' का बड़ा श्रोत बनकर भी उभरा है. थोड़ा पीछे जाकर अगर हम आंकलन करें तो, बहुत पहले कुम्भ नहाने का प्रचलन और सुविधा प्रयाग शहर में ही थी! ज्यादातर लोग प्रयाग के कुम्भ में ही इकठ्ठा होते थे. हालाँकि, उस समय में प्रयाग आने वाले तीर्थ यात्रियों को लुटेरों का बड़ा डर रहता था, लेकिन हमारे देश के धर्मभीरू लोगों की तो यही खासियत रही है कि हर 'डर' पर विजय प्राप्त करके वह धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लेते रहे हैं. आज तो हर तरह की यातायात सुविधा होने से हम सहजता से कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं, किन्तु पुराने समय में तो सार्वजनिक यातायात की सुविधाएं न होने के कारण कुंभ में आने के लिए लोग पैदल या बैलगाड़ी से ही संगम पहुंचते थे. 

साधारण ग्रामीण यात्रियों को रास्ते में चोर-डाकु अक्सर अपना निशाना बनाते थे. हालाँकि, तीर्थयात्रियों को रात में लुटने का डर न सताए इसके लिए प्रयाग आने वाले रास्तों पर विशेष सराय बनाए जाते थे और इन सरायों में सुरक्षा के विशेष बंदोबस्त भी किए जाते थे. हालाँकि, इस सिंहस्ठ कुम्भ में भी कई साधुओं ने अपने सामानों की चोरी पर होहल्ला मचाया, किन्तु तब और अबके समय में ज़मीन आसमान का फर्क है. हिन्दी फिल्मों में बचपन में दो भाई या दो बहन अक्सर कुंभ के मेले में खो जाते थे, किन्तु अब 'भीड़-प्रबंधन' के लिए कुशलता से तकनीक को प्रयोग में लाया जाता है. बदलते वक्त में जहां भारत का तकनीकी चेहरा बदला है, वहीं कुंभ आयोजन भी अब हाईटेक हो गए हैं. इस बार सिंहस्थ आयोजन में तकनीक का सहारा लेकर उसे और सफल बनाने की भरपूर कोशिश की गयी है, जिसमें होटल, यातायात सहित तमाम दूसरी सहूलियतें शामिल हैं. राज्य सरकार ने शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में इस मेले को सफल बनाने के लिए सर्वस्व झोंक दिया है. तकनीक के जरिए अब तो अंतरिक्ष से भी सिंहस्थ मेले के दर्शन किए जा सकते हैं तो इस सिंहस्थ में सूचना तकनीक के सहारे सीसीटीवी कैमरे, लाइव स्ट्रीमिंग, आकर्षक वेबसाइट, मीडिया सेंटर और जीपीएस टैगिंग की व्यवस्था भी की गयी है. जाहिर है, तकनीक ने बड़े स्तर पर सिंहस्ठ  का चेहरा बदल कर रख दिया है. चूंकि अनेक दुसरे कुम्भ मेलों की तरह, सिंहस्थ में भी आने वाली अधिकतर आबादी ग्रामीण बूढ़ों और महिलाओं की होती है और उनके लिए सूचना तकनीक मोबाइल ऐप का महत्व कुछ ख़ास नहीं है और ऐसे में उनकी   मदद करने के लिए जगह-जगह कैंप लगाए गए हैं, तो इस बार कुंभ मेले में भटकने वाले लोगों को प्रशासन द्वारा विभिन्न जगहों पर लगी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है. 

एक सूचना के अनुसार, लोगों की सुरक्षा और निगरानी के लिए 481 कैमरे लगाए गए हैं तो राज्य सरकार की ओर से मेले में मेडिकल की भी बेहतरीन सुविधा की गयी है. चूंकि, आजकल किसी भी आयोजन को लेकर आतंकी खतरा मंडराता ही हैं, इसलिए इससे निपटने और सुरक्षा की दृष्टि से 23 हजार पुलिस बल तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं में 80 हजार व्यक्तियों की तैनाती की गयी हैं, जिसमें 60 हजार वॉलेंटियर्स भी शामिल हैं. इन सबके बीच जो अनोखी पहल हुयी है, वो है ख़ास मेले के लिए 'बैंकिंग सुविधा' जिससे कि अब लोगों को कैश लेकर  घूमने की जरुरत नहीं है. इसके लिए मेले में तमाम बैंकों ने 'सिंहस्थ कार्ड' जारी किया है, और इसकी सहायता से आप कुछ भी खरीद सकते हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ़ करनी होगी, जिन्होंने पूरी कोशिश की है कि मेले में आने वाले यात्रियों को किसी प्रकार की तकलीफ न हो, और इसके लिए क्षिप्रा नदी के चारों तरफ घाटों का निर्माण तथा सड़कों का निर्माण भी किया गया है. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संस्कार किस माध्यम से हमारी भारतीय व्यवस्था ट्रांसफर करती है, अगर इसका दर्शन किसी को करना हो तो उसे अवश्य ही जाना चाहिए 'सिंहस्ठ कुम्भ', जो आने वाले 21 मई 2016 को 'पूर्णिमा के मुख्य शाही स्नान' को संपन्न होगा.
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मिलावट का मायाजाल! Impurity of food products in India, Hindi Article, Mithilesh

आज-कल यह एक कहावत सी बन गयी है कि भाई साहब, अब तो ज़हर भी शुद्ध नहीं रहा! यह कहावत अब हकीकत के पास बढ़ती जा रही है और आश्चर्य तो यह है कि हम कुछ भी तो नहीं कर पा रहे हैं, न तो प्रशासन के स्तर पर और न ही व्यक्तिगत स्तर पर. इसके लिए केवल प्रशासन और सरकार ही दोषी हो, ऐसा कतई नहीं है, बल्कि लोगबाग़ भी समझने को तत्पर नहीं दिखते हैं. अभी हाल ही में 'मैग्गी नूडल्स' को लेकर खूब बवाल काटा गया, किन्तु आप किसी भी शॉपिंग प्लेस पर जाकर देखिये और आप यह देखकर दंग रह जायेंगे कि अब यह पहले से कहीं ज्यादा मौजूद दिख रही है. न केवल बड़े शॉपिंग मॉल्स में, बल्कि गली-मोहल्ले की दुकानों से भी मैग्गी पहले ही की भाँती बिक रही है. अब जाने क्या परिवर्तन आ गया कुछ महीने में कि कई प्रदेशों में प्रतिबन्ध झेलने के बाद भी '2 मिनट नूडल' अपने पुराने फॉर्म में लौट आया. यह मिलावट की दुनिया की ऐसी कहानी है, जो कोल्ड ड्रिंक्स से लेकर तमाम खाद्य पदार्थों में गहरे तक घुला हुआ है. वैसे, हमारे देश में मिलावट कोई नयी बात नहीं है. बहुत पहले से बनिए और साहुकार दाल-चावल जैसे खाने की चीजों में कंकड़-पत्थर तक मिलाया करते थे, जिससे उन वस्तुओं का वजन बढ़ जाता था और ऐसे मुनाफा कमाया जाता था. लेकिन तब की मिलावट और अब की मिलावट में काफी अंतर आ गया है, क्योंकि पहले की महिलाएं कंकड़-पत्थर इत्यादि को निकालकर भोजन पका लेती थीं, किन्तु अब तो मुनाफे के साथ लोगों की सेहत के साथ बड़े स्तर पर खिलवाड़ किया जाने लगा है. इसी क्रम में, अगर हम बात करते हैं दूध की जो कि हर घर में अनिवार्य है, क्योंकि छोटे और नौनिहालों की पूरी खुराक होता है दूध. इसमें चिंताजनक तथ्य यह है कि दूध भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है. अगर सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो  पिछले चार सालों के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि दूध साल दर साल दूषित हो रहा है. 

मई 2015 में दूध में मिलावट पर राज्यसभा में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 में लिए गए 8247 सैंपलों में मिलावट मिली, जबकि पूरे देश में 2012-13 में यह आंकड़ा बढ़कर 10380 सैंपल तक पहुंच गया. इसके अगले साल यानी 2013-14 में दूध के 13571 सैंपल टेस्ट में फेल हो गए. जाहिर है, साल दर साल यह बढ़ता हुआ आंकड़ा, हमारे देश के घटते स्वास्थ्य का ही संकेत है. इसी तरह, 2014 में जनवरी से सितंबर के बीच ही 4861 सैंपल मिलावटी पाए गए थे. इससे स्पष्ट है कि साल दर मिलावट का आंकड़ा बढ़ रहा है, जिसमें दूध में यूरिया से लेकर डिटरजेंट तक की मिलावट धड़ल्ले से हो रही है. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ लोकल लेवल पर ही है, बल्कि मदर डेयरी जैसे बड़े ब्रांड में भी मिलावट का खुलासा हो चुका है. दूध से हम आगे बढ़ते हैं तो, सरसों के तेल और दूसरे खाद्य तेलों में अर्जीमोन मेक्सिकाना का बीज मिलाया जाता है, जिससे लोग 'ड्रॉप्सी' के शिकार हो जाते हैं. अर्जीमोन की मिलावट से सिर में दर्द, डायरिया, त्वचा पर धब्बे होने, बेहोशी, ग्लूकोमा और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत होती है. अब क्या लोग खाद्य तेलों को खाना बंद कर दें, या फिर अपना सर फोड़ लें! अगर एक वाकया हो तब तो कोई सुनाए, किन्तु यहाँ तो वाकयों की श्रृंखला सी है! इस क्रम में, मशहूर कंपनी कैडबरी की डेयरी मिल्क चॉकलेट को लेकर 2003 में उस समय विवाद छिड़ा, जब महाराष्ट्र में उसमें कीड़े पाए जाने का मामला सामने आया, तो कई ब्रांड्स के हल्दी और लाल मिर्च में रंगे हुए बुरादे मिला दिए जाते हैं. मिलावट की बातें कहने पर कई बार खाना-पीना छोड़ने को जी चाहता है. आचार में फिटकिरी, फलों और सब्जियों में जहरीले कीटनाशकों तथा खतरनाक केमिकल का प्रयोग किया जा रहा है. इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारे देश में तमाम त्योहारों के आते ही मिलावट खोरी का कारोबार जैसे चमक सा जाता है. मिलावटी मिठाइयां, सिंथेटिक पनीर, केमिकल वाले फल खुलेआम दुकानों पर सज जाते हैं और इन सारी की खपत भी जबरदस्त ढंग से होती है. हमारे देश में, खाद्य सुरक्षा कानून जरूर बने हैं, किन्तु यह कितने प्रभावी हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है. 

हालाँकि, समय के साथ खाद्य सुरक्षा कानून में 2006 में बदलाव किया गया तो फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड अथॉरिटी आफ इंडिया (fssai) का गठन भी किया गया, लेकिन मिलावटखोरों की नकेल कसने में अभी भी यह कानून पूरी तरह से सक्षम नहीं है, इस बात में दो राय नहीं! सवाल यह भी है कि नियम तो बन गए हैं, लेकिन इस नियम को लागू करने में सख्ती की पुरज़ोर आवश्यकता है. अगर कानून की दृष्टि से बात करें तो, खाद्य पदार्थों की जांच का ज़िम्मा मुख्यतौर पर राज्यों के हवाले है और राज्यों में जांच लेबोरेटरी की हालत दैनीय अवस्था में है तो व्यवस्था भी इतनी लचर है कि किसी जांच-अधिकारी को खरीदना 'कॉर्पोरेट्स' के लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं होता है. लेबोरेटरीज़ में मौजूद होने वाली सुविधाओं सहित स्टाफ की कमी और सैंपलिंग का काम तय नियमों के मुताबिक नहीं होना गम्भीर समस्या में तब्दील हो चुका है, किन्तु इसकी फ़िक्र करे तो कौन करे? अब बात करें मिलावटखोरों को सज़ा दिलाने की तो इसके आंकड़े ही ऐसे हैं, जो पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी हैं. इन मामलों में, पहले ही सैंपलिंग और केस दर्ज करने की दर हुत कम है, तो इसमें भी जो केस दर्ज होते हैं, उन मिलावटखोरों को सज़ा कितनी मिलती है, यह कोई बताने वाली बात नहीं है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 में सिर्फ 764 मिलावटखोरों को सज़ा मिली, जबकि देशभर में मिलावट खोरों की प्रजाति किस हद तक विकसित हो रही है, यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है. इन सभी चर्चाओं के बीच बड़ा प्रश्न उठता है कि मिलावट पर लगाम कैसे लगेगी और कौन लगाएगा? जाहिर है कि सिर्फ सरकार पर जिम्मेदारी डाल देने से बात नहीं बनने वाली है. अगर मिलावट को रोकना है तो सबसे पहले पब्लिक को ही जागरूक होना होगा. इस क्रम में हमारे पास एक मजबूत कानून भी आ गया है, जिसे पिछले ही साल लोकसभा में 'कंज्यूमर प्रोटेक्शन बिल' के नाम से पेश किया गया था, जिसे बाद में स्टैंडिंग कमिटी को भेज दिया गया था. कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कानून बनाकर इसे अनिवार्य कर दिया जाए कि उपभोक्ताओं की ओर से खाद्य पदार्थों में मिलावट की शिकायत के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया जाए!

किसी कारणवश ऐसा नहीं होने पर अधिकतम 21 दिनों की समय-सीमा तय की जाए. जाहिर है अब जागरूक होने की बारी हमारी ही है  और अगर हम जागरूक होंगे तो जरूर ही सकारात्मक असर पड़ेगा, तो घटिया सामानों की बिक्री पर भी रोक लगेगी ही! एक और बढ़िया प्रावधान में, उपभोक्ता मामले, खाद्य और जनवितरण को लेकर स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में खाद्य पदार्थों का ब्रांड एंबेस्डर बनाए गए सेलिब्रिटीज पर भी शिकंजा कसा गया है. अब प्रियंका चोपड़ा जैसी किसी भी बड़ी हस्ती को यह कहने से पहले सोचना होगा कि 'हम तो बेचेंगे ही, जिन्हें नहीं खरीदना वो न खरीदें!' जाहिर तौर पर अमिताभ बच्चन जैसे मेगा स्टार को भी उपभोक्ताओं को प्रभावित करने से पहले सोचना होगा, जिन्हें हम टीवी पर दर्जन भर विज्ञापन करते देखते हैं और उन सामानों की गारंटी लेते हुए भी, जिनके बारे में वह खुद भी आश्वस्त नहीं होते होंगे! वैसे, पैसे के आगे यह तमाम सेलिब्रिटीज नैतिक मूल्यों को ठोकर ही मारते हैं, किन्तु फिर भी यह प्रावधान उनकी कुछ तो जिम्मेदारी अवश्य तय कर सकेगा! किसी भी प्रोडक्ट का बिज्ञापन करने वाले सितारों की जिम्मेदारी तय करना वैसे भी जरुरी था, क्योंकि इनके चाहने वाले 'फैंस' कई बार बिना सोचे समझे इनकी बातों में आकर सामान खरीद लेते हैं, और उनमें कइयों की क्वालिटी खराब निकल जाती है. हालाँकि, इन तमाम उपायों के बावजूद 'जागो ग्राहक जागो' का स्लोगन सर्वाधिक उपयोगी साबित हो सकता है और यह बात जनता को समझनी ही होगी!

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सोशल मीडिया और नेतागिरी के अन्तर्सम्बन्ध! Politics and Social Media in India, Hindi Article, Mithilesh

राजनीति भी क्या चीज है, इसमें कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना वाली बात बेहद सटीक बैठती है. कुछ-कुछ बिजली के स्विच जैसी बात इसमें भी होती है कि एक जगह बटन दबाओ और दूसरी ओर 'बल्ब' जल उठता है. खैर, बात इस बार थोड़ी घुमा फिराकर है और राजनीति के साथ-साथ इसमें नए ज़माने के साथ कदमताल करने की जरूरत भी रेखांकित है. संघ और भाजपा अरसे से, 70 साल से ज्यादा उम्र वालों को राजनीति की मुख्यधारा में न शामिल करने पर ज़ोर देते रहे हैं. नरेंद्र मोदी की कैबिनेट और उससे पहले लोकसभा चुनाव में टिकट देने के मामले में भी इसका काफी हद तक ख्याल रखा गया था, किन्तु फिर भी कई लोग लिपट ही गए. अब हमारे तेज-तर्रार प्रधानमंत्री पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी के नेताओं को भी मजबूर कर रहे हैं कि वह जनता से ज़ुडने की अपनी उपयोगिता साबित करें और वह भी अपडेटेड टेक्नोलॉजी के साथ, अन्यथा उन पर प्रश्नचिन्ह उठाये ही जाते रहेंगे. जाहिर तौर पर पिछली पीढ़ी के कई लोग फेसबुक, ट्विटर इत्यादि से उस तरह से साम्य नहीं बिठा पाते हैं, जैसे वर्तमान पीढ़ी के लोग! देखा जाय तो पीएम का अपने नेताओं और मंत्रियों को इस बात के लिए ज़ोर देना कि वह सोशल मीडिया पर एक्टिव रहे, गलत तो नहीं ही है, बल्कि कई स्तर पर फायदेमंद भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया प्रेम को कौन नहीं जानता भला! पौने दो करोड़ फ़ॉलोअर्स हैं उनके ट्विटर अकाउंट में और इस तरह वो भारत के दूसरे सबसे लोकप्रिय शख्सियत हैं ट्विटर पर! इसी क्रम में, उनके फेसबुक पेज को 2.8 करोड़ लोगों द्वारा लाइक किया जाता है. जाहिर है, यह न केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बयान करता है, बल्कि उनकी एक्टिवनेस भी सोशल प्लेटफॉर्म्स पर देखने लायक होती है. चाहे उनका सरकारी कामकाज हो या देशी-विदेशी यात्रायें, किसी राष्ट्राध्यक्ष का जन्मदिवस हो अथवा कोई प्राकृतिक आपदा, हर छोटी-बड़ी चीज का ब्यौरा, उनकी संवेदनाएं आपको उनकी ऑफिसियल वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट्स पर मिल जायेगा. आधुनिक विचारों वाले प्रधानमंत्री मोदी ये जानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ना है, उन तक अपने विचारों को प्रेषित करना है तो यह काम सोशल मीडिया द्वारा आसानी से संभव हो सकता है.

अगर भारत में आंकड़ों की बात करें तो, एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 तक भारत में फेसबुक यूजर्स की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा होगी. ऐसे में नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं की पुरजोर कोशिश होगी कि उनकी सरकार द्वारा किया गया काम लोगों तक पहुंचे और इसके लिए वह शुरू से ही अपने मंत्रियों, सांसदों तथा पार्टी विधायकों को सोशल मीडिया के प्रयोग के बारे में कहते रहे हैं. नरेंद्र मोदी की सक्रियता इस बात से ही मापी जा सकती है कि वह केवल सलाह ही नहीं देते हैं, बल्कि उनकी सलाह पर कहाँ तक अमल हुआ है, इस बात की एनालिसिस भी वह करते हैं. इसी के अंतर्गत भाजपा के डिजिटल सेल के द्वारा एक डिजिटल एमआईएस (मैनेजमेंट इनफार्मेशन सिस्टम) बनाया गया, ये पता लगाने के लिए कि कितने सांसद सोशल मिडिया पर सक्रीय हैं, किस हद तक सक्रीय हैं और उनका स्टेटस क्या है! इसमें सांसदों के सोशल मीडिया अकाउंट को ट्रैक तो किया ही गया है, साथ ही साथ हर सांसद के ट्विटर और फेसबुक पर फॉलोअर की संख्या, ट्वीट्स की संख्या और रिट्वीट का हिसाब रखा गया है. जाहिर है, इस रिपोर्ट का सबसे अहम पैमाना है कि क्या सांसद सरकार के काम का प्रचार करते हैं या नहीं? हालाँकि, इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री को निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि उनके अधिकांश सांसद तो सोशल मीडिया के संपर्क में हैं ही नहीं, तो कुछ मशहूर नाम तो बेहद कम सक्रीय हैं. इनमें मेनका गांधी, संतोष गंगवार, डॉक्टर राम शंकर कठेरिया, संजीव बाल्यान, निरंजन ज्योति, निहाल चंद, हरिभाई चौधरी और हंसराज अहिर का नाम शामिल किया गया है. जाहिर, है आगे के समय में इन रिपोर्ट्स के आधार पर प्रधानमंत्री निष्क्रिय सोशल मीडिया नेताओं पर लगाम कस सकते हैं. देखा जाय तो इन तमाम नेताओं को खुद तो सोशल मीडिया अकाउंट मैनेज करना नहीं होता है, बल्कि इसके लिए उनके पास तमाम दुसरे लोग भी होते हैं, किन्तु उनको गाइड तो इन्हें खुद ही करना पड़ेगा! प्रधानमंत्री की मंशा इन नेताओं को समझनी ही चाहिए, क्योंकि आज 90 फीसदी से ज्यादा यूथ सोशल मीडिया पर ख़ासा समय व्यतीत करता है और अगर उसके सामने सरकार की योजनाओं, कार्यान्वयन की जानकारियां पेश नहीं की जाएँ तो फिर सरकार की छवि ठीक नहीं बनती है. यह भी आश्चर्य ही है कि भाजपा द्वारा बनाई गयी 'एमआईएस' में उत्तर प्रदेश और गुजरात तो सबसे पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में आंकड़ा ऐसा है कि 71 में से 43 सांसदों के तमाम सोशल मिडिया अकाउंट ही नहीं हैं, तो गुजरात में 26 में से 15 सांसद तो ट्विटर और फेसबुक से ही गायब हैं, बाकी सोशल मीडिया अकाउंट्स की कौन कहे! जाहिर तौर पर यह एक शर्मनाक आंकड़ा ही है, क्योंकि यह साबित करता है कि आप एक बड़ी आबादी को 'अनदेखा' करने का रिस्क ले रहे हैं, जो आप के साथ-साथ पार्टी को भी नुक्सान पहुंचा सकता है.

आखिर इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं के उभार में 'सोशल मीडिया' प्लेटफॉर्म्स का रोल कहीं ज्यादा बड़ा है. इस क्रम में, बीजेपी के कुछ सांसदों ने जरूर प्रधानमंत्री को राहत पहुंचाई हैं और इसमें स्टार परफॉर्मर रहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, जिनके ट्विटर पर 50 लाख से अधिक फॉलोअर हैं. ऐसे ही, तकरीबन साढ़े आठ लाख फॉलोअर के साथ केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी दूसरे स्थान पर रहे. इसी क्रम में, पूर्व जनरल वीके सिंह, कलराज मिश्र, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और डॉक्टर महेश शर्मा भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले लोगों में शुमार हैं. अब सवाल ये उठता है कि मोदी के 'डिजिटल इंडिया' के सपने का क्या होगा, जब उनके सांसद ही इसके महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं. अब वह जमाना नहीं रहा कि इलेक्शन के समय दरवाजे -दरवाजे घूम के अपनी उपलब्धि लोगो को बताई जाये और वोट देने के लिए उन्हें तैयार किया जाये. आजकल लोगों का ज्यादातर समय फेसबुक या ट्विटर पर बीतता है, खासकर युवा वर्ग का! एंड्राइड फ़ोन और इंटरनेट की उपलब्धता ने लोगों को सोशल मीडिया के संपर्क में 24  घंटे रखना सुनिश्चित किया है. अब चाहे गांव हो या शहर हर जगह लोग फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग से जुड़े हैं. ऐसे में अगर आपको अपनी बात कहनी है तो सोशल मीडिया से बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है. हमारे प्रधानमंत्री खुद सबसे ज्यादा सोशल माध्यमों पर एक्टिव रहते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को टक्कर दे रहे हैं. भारत में भी अपने रेल मंत्री सुरेश प्रभु का उदाहरण देखें तो ट्विटर पर लोगों की समस्या का निपटारा करने में उन्होंने एक नया मानदंड स्थापित किया है. जाहिर है, अगर ऐसे में हमारे प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के नेताओं से सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने, यूजर्स से जुड़ने की अपेक्षा कर रहे हैं तो यह गलत कहाँ है? और सिर्फ भाजपा के नेता ही क्यों, बल्कि दूसरी पार्टियों के नेताओं को भी इनसे सीख ले कर लोगों को जोड़ने का अभियान चलाना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में 'नेतागिरी और सोशल मीडिया' का अन्तर्सम्बन्ध और गहरा ही होने वाला है.
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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Friday, 29 April 2016

तेल व्यापार से आगे की सोच है सऊदी अरब की! Crude oil and Saudi Arabia, Hindi Article, Mithilesh

बीते दिनों में वैश्विक सम्बन्धों में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. खासकर ईरान पर से तमाम आर्थिक प्रतिबन्ध हटा लेने के पश्चात सऊदी अरब के माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक ही हैं, क्योंकि कच्चे तेल के क्षेत्र में प्रतियोगिता और बढ़ने ही वाली हैं. कहा जा सकता है कि सऊदी अरब के आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा होने का मुख्य कारण है, बीते दशक में काफी लंबे समय से चले आ रहे कच्चे तेल के दामों का लगातार घटना! गौरतलब है कि काला सोना के नाम से मशहूर 'कच्चे तेल' पर ही यहां की पूरी आर्थिक निर्भर है. तेलों के दाम में गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस तेल का दाम जून 2014 में 100 डॉलर/बैरल था, आज उसकी कीमत मात्र 39 डॉलर/बैरल है, यानि 2 साल में तेल की कीमत धड़ाम हो गयी है. जाहिर है, अगर आपके पास आमदनी के श्रोत घटेंगे तो विभिन्न मदों में जाने वाले खर्चों पर भी आपको नियंत्रण करना ही होगा और सऊदी अरब ने भी अपने कई तरह के भारी भरकम बजट को कम किया है अथवा उसे ऐसा करने के लिए विवश होना पड़ा है. इकोनॉमिक्स एनालिस्ट रैचेल जेम्बिया के अनुसार 'सऊदी अरब को फाइनेंशियल रिजर्व से हर महीने 10 से 15 बिलियन डॉलर नुकसान भी उठाना पड़ रहा है, जिसकी वजह से उसके पास अब सिर्फ और सिर्फ  600 अरब डॉलर का फाइनेंशियल रिजर्व शेष रह गया है. जाहिर है, इन हालातों से निबटने के लिए कुछ न कुछ कदम तो उठाये ही जाने थे और इसी को लेकर सऊदी प्रशासन ने नयी दृष्टि पेश करने की कोशिश की है. हालाँकि, यह विजन किस हद तक ग्राउंड पर फलीभूत होगा, और इसके क्या साइड इफेक्ट सामने आएंगे, यह जरूर देखने वाली बात होगी. कहा जा सकता है कि इस तरह की आर्थिक हालत से निकलने के लिए सऊदी अरब ने पेश किया है "सऊदी विज़न 2030"!  सऊदी विज़न 2030 का मुख्य मकसद देश को  तेल की निर्भरता से काफी हद तक मुक्ति दिलाना है, जिससे इस खाड़ी देश की अर्थव्यवस्था तेल के दाम काम होने की स्थिति में 'डगमगाने' न लगे! इस कवायद के लिए सऊदी के तेल की सबसे बड़ी कंपनी अरामको (Aramco) के 5 % शेयर को बेचने की तैयारी की गयी है. 

तेल के इन शेयरों से जो पैसा मिलेगा, उसको जमा करके दुनि‍या का सबसे बड़ा 'सॉवरेन वेल्‍थ फंड' बनाने के साथ नॉन आयल रेवेन्यू को इकठ्ठा करना  प्रमुख उद्देश्य बताया गया है. जाहिर है यह एक बेहद महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट है और आने वाले समय के लिए एक दूरदृष्टि भी. इसके लिए सऊदी अरब के डि‍प्‍टी क्राउन प्रिंस मोहम्‍मद बि‍न सलमान ने पब्‍लि‍क इन्‍वेस्‍टमेंट फंड (पीआईएफ) पर जोर दिया है, जो तेल पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता को ख़त्म करने में मदद कर सकता है. इस सम्बन्ध में, ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट को देखें तो पीआईएफ लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर से ज्‍यादा का होने का अनुमान है और यह इतनी बड़ी रकम है, जो एप्‍पल, गूगल की कंपनी अल्‍फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट और बर्कशायर हैथवे जैसी कंपनियों को खरीदने के लिए काफी है. एक और अनुमान के अनुसार, अभी तक दुनिया में इससे बड़ा कोई 'आईपीओ' नहीं है. जाहिर है कि आने वाले समय की जरूरतों के लिहाज से इस तरह के प्रोजेक्ट्स को परवाना चढाने की कोशिशें की जा रही हैं, ताकि किसी भी तरह के झटके से 'सऊदी अर्थव्यवस्था' अप्रभावित रहे. मिली जानकारी के अनुसार, इस जमा किये गए फण्ड का मुख्यालय किंग अब्दुल्लाह की फिनांसियल डिस्ट्रिक्ट में होगा और इसके तहत सरकारी संपत्तियों को भी होल्ड किया जा सकता है तो भूमि को विकसित करने के लिए भी सरकार तमाम कदम उठा सकती है, जिसके लिए अलग अलग कंपनियों को ठेका देने की भी तैयारी चल रही है. सऊदी अरब प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अनुसार, ऑयल कंपनी को इस तरह के प्रोसीजर से एक बड़ी इंडस्‍ट्री में बदला जा सकता है, जो अंततः तेल पर निर्भरता को कम करेगा. इसके लिए अगले साल तक कंपनी का आईपीओ भी सामने आ सकता है. 

एक साक्षात्कार में प्रिंस ने यह भी कहा कि‍ "अरामको कंपनी का आईपीओ और शेयर्स को पीआईएफ में ट्रांसफर करना तकनीकी रूप से सऊदी सरकार का रेवेन्‍यू सोर्स होगा, न कि‍ तेल पर इन्‍वेस्‍टमेंट". सऊदी प्रशासन की जो योजना है, उसके अनुसार इस बड़े इन्‍वेस्‍टमेंट को कई तरह से इस्तेमाल किया जायेगा जिससे कि‍ आने वाले 20 साल में तेल पर आर्थिक निर्भरता न के बराबर हो जाये. अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की कड़ी में, सऊदी अरब अपने मिलिट्री के खर्चो को भी कम करने की सोच रहा है और इसके लिए आधे मिलिट्री के उपकरणों को अपने देश में ही तैयार करने की रणनीति पर यह खाड़ी देश गम्भीरता से विचार कर रहा है. हालाँकि, कथनी और करनी में बड़ा फर्क होता है और जब तक योजनाएं ज़मीन पर लागू न की जाएँ, तब तक कुछ भी कहना अत्यन्त कठिन कार्य है. तमाम वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं ने अपने प्रारूप और स्वरुप बदल लिए हैं तो क्षेत्र में दबदबा रखने के लिए केवल तेल के सहारे आगे बढ़ने की रणनीति को बदलना सऊदी अरब की मजबूरी ही कही जा सकती है. आर्थिक विश्लेषक इस मामले में कोई आंकलन देने की जल्दबाजी से बचना चाह रहे होंगे, क्योंकि जो देश दशकों से तेल के दम पर अपना राज कायम रखे हुए है और उसके तेल का हिस्सा एशिया में लगभग 70 % तो अमेरिका में 20% और यूरोप में 10% जाता हो, वह अचानक तो ऐसा नहीं ही कर सकेगा. हालाँकि, तेल के क्षेत्र में ईरान के खुलकर आ जाने से परिस्थितियों में बदलाव अवश्यम्भावी ही था और यह बात सऊदी प्रशासन बखूबी समझ चुका है.

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लालू यादव के देशी नुस्खे और गर्मी से बचाव! - Laloo Yadav Tips for Summer Season, Hindi Article, Mithilesh

देखा जाए तो देश के सर्वाधिक चर्चित नेताओं में शामिल लालू प्रसाद यादव की छवि को एक 'मसखरा' के तौर पर ज्यादा देखा जाता है, हालाँकि जनता की नब्ज़ पर जिस कदर यह राजनेता रखता है, वैसे इक्के-दुक्के राजनेता ही मिलेंगे. कई कॉर्पोरेट और एलिट वर्ग के लोग लालू यादव का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं रहते हैं, लेकिन जब इन्हीं लोगों को चुनाव के मैदान में यह देशी नेता पटखनी देता है, तब लोग बंगले झाँकने लगते हैं कि आखिर इसके पास कौन सा दिव्यास्त्र है, जिसके दम पर यह कई दशकों से जनता के दिलों में घुसा हुआ है. लोग उसे घोटालेबाज कहें, अपराधी कहें, अनपढ़ या गंवार कहें, लेकिन राजनीति में लालू यादव के देशी नुस्खों का तोड़ नहीं. हालाँकि, इस बार बात राजनीति से ज्यादा उनके उस सुझाव की है, जो गर्मी से बचने के लिए उन्होंने दिया है. देश में चरों तरफ गर्मी ने हाहाकार मचा रखा है. अभी तो अप्रैल का महीना ही गुजरा है, जबकि मई और जून की चिलचिलाती गर्मी तो अभी बाकी ही है. ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल के मुखि‍या लालू प्रसाद यादव ने लोगों का ध्यान पुरानी परम्परागत चीजों की तरफ खींचा है, जिससे गर्मी में राहत मिल सकती है. हालाँकि, ऐसा नहीं है कि यह बातें लालू यादव ने ओरिजिनल खुद कही हैं, बल्कि पहले भी तमाम जानकार इसे बताते रहे हैं, लेकिन यह लालू यादव की खासियत ही है कि वह आम चीजों को भी अपने विशेष अंदाज से ख़ास बना देते हैं. अपने प्रसिद्ध अंदाज में पहले तो उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा के विपरीत विचार रखने वाले बाबा रामदेव पर चुटकी ली और कहा कि 'रामदेव की छुट्टी कर दूंगा', उसके बाद लोगों में जागरूकता फ़ैलाने की कोशिश करी कि कैसे लोग प्राकृतिक संसाधनों को भूलकर आधुनिकता की दौड़ में अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. चूंकि बाबा रामदेव स्वदेशी आंदोलन एवं आयुर्वेदिक नुस्खों के बड़े पैरोकार माने जाते हैं, इसलिए अगर कोई इस बारे में सलाह देगा तो उनका ज़िक्र अवश्यम्भावी ही है, बेशक वह 'चुटकी' के अंदाज में ही क्यों न हो! इस चुटकी के बाद, अपने भाषण में लालू ने 'आम के पन्ने' (कच्चा आम उबालकर बनाया जाने वाला जूस)  का विशेष गुणगान किया है. वैसे कच्चे आम का पन्ना गर्मियों में लगने वाली लू के लिए रामबाण दवा है, जिसे आयुर्वेद ने भी स्वीकारा हैं. 

उसके बाद लालू यादव ने लोगों को फ्रीज़ के ठंडे पानी की जगह मिट्टी के मटके का पानी पीने की सलाह दी. यह बात भी सामान्य तौर पर महसूस की जाती है कि गर्मियां आते ही ठन्डे पानी के ना होने से प्यास नहीं बुझती और हम फ्रीज में पानी रखना शुरू कर देते है, पर यह पानी बहुत ज़्यादा ठंडा होने से नुकसान करता है, तो पेट में गैस और चर्बी को भी बढाता है. इसके अलावा प्लास्टिक की बोतल भी पानी रखने के लिए सुरक्षित नहीं होती है. वही अगर हम देशी नुस्खों की ओर देखते हैं तो मिटटी के घड़े में रखे पानी का तापमान बिलकुल ठीक रहता है, ना बहुत अधिक ठंडा ना गर्म! और मटके का पानी पीने से मन को तुरंत तृप्ति मिलती है. अनुभवों से जाहिर होता है कि इसका पानी पीने से ना ही गला खराब होता है, ना ही सिरदर्द की समस्या आती है. बाजार में मुश्किल से 25 से 30 रूपये में मिलने वाले घड़े के उपयोग से आप बिजली की बचत भी कर सकते है तो आपकी छोटी सी पहल से गरीब कुम्हारों को रोजगार मिलेगा और ऐसे आप देश के कुटीर उद्योग के विकास में सहभागी बन सकते हैं. इसी क्रम में, लालू यादव की दूसरी सलाह थी कि 'कोल्ड ड्रिंक्स' से बचें और मट्ठा(छाछ) पिएं. ये सलाह भी बिलकुल सटीक है, जो सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है. तमाम जाँच तथा प्रयोगों में यह सिद्ध हो चूका है कि बाजार में मिलने वाले डिब्बाबंद शीतल पेयपदार्थ, कोल्ड्ड्रिंक्स इत्यादि जहर के समान हैं. इनमें मिलाया जाने वाला केमिकल कैसे हमारी आँतों को नुकसान पहुंचाता है तो कई मामलों में तमाम कोल्ड्ड्रिंक्स, सॉफ्टड्रिंक्स 'कैंसर' जैसी घातक बिमारियों को आमंत्रित करते हैं, वहीं दूसरी तरफ मट्ठा या छांछ जो कि कैल्सियम, मिनरल तथा विटामिन से भरपूर होने के साथ ही हमारे पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है, उसका सेवन अमृत तुल्य है. गर्मी के मौसम में तो खासकर, आप 1 गिलास छाछ पी लीजिए और फिर देखिये आनंद. पेट से लेकर शरीर का अंग-प्रत्यंग दुरुस्त होने की गवाही देगा.आर्थिक दृष्टि से भी देखा जाए तो जब हम छांछ का प्रयोग करते हैं तो जाहिर सी बात है दूध के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और गरीब किसान, ग्वाले को पर्याप्त रोजगार! इसके अतिरिक्त, शुद्धता से भरपूर छांछ हर हाल में बाजारू कोल्ड ड्रिंक से सस्ता और स्वास्थ्यवर्धक पहले ही सिद्ध हैं. इसी कड़ी में लालूजी की तीसरी सलाह जो सबके लिए व्यवहारिक नहीं है, किन्तु गाँव के अनेकों लोगों के लिए अवश्य ही व्यवहारिक और गर्मी से राहत देने वाला भी है. इसमें मिट्टी के घरों को अपनाना और गोबर से दीवारों को लीप कर रहने की सलाह शामिल है. 

इसी सलाह में, छत को कंक्रीट करने की बजाय लोग ताड़ के पेड़ के तने का इस्तेमाल करें और छप्पर के लिए खप्पर का इस्तेमाल किया जाए. देखा जाए तो यह हल 'पर्यावरण फ्रेंडली तो जरूर है, किन्तु आज के परिदृश्य में ये सलाह फिट बैठना बेहद मुश्किल है. वैसे, आजकल जहाँ गांव भी आधुनिकता की दौड़ में शामिल हो चुके हैं और वो मिटटी के घर में रहना भला कैसे पसंद करेंगे. वैसे, लालू यादव की इस सलाह को धनाढ्य लोग भी अपने फार्म हाउस पर अपनाते ही हैं तो गाँव के संपन्न लोग भी छप्पर फूस से निर्मित हिस्सों में ही गर्मी में बैठना पसंद करते हैं. जाहिर हैं, यह अपने आप में एक विशेष और पारम्परिक समाधान हैं गर्मी से राहत का! इसी कड़ी में, चौथी सलाह में लालू ने बिलकुल तात्कालिक और सबसे जरुरी मुद्दे को उठाया है. लालू के मुताबिक न सिर्फ पुराने कुंओं को जिंदा करना होगा बल्कि हर गांव में कम से कम 10 नए कुएं खोदने होंगे. उन्होंने कहा कि सरकार को इसके लिए सब्सिड़ी देनी चाहिए! पानी की कमी से किस कदर हाहाकार मचा हुआ, यह बात बताने की आवश्यकता नहीं. आईपीएल से लेकर महाराष्ट्र और उत्तराखंड से लेकर देश के दूसरे भाग पानी की किल्लत से जूझने लगे हैं और इन सबका हल लालू यादव की सलाह से अवश्य ही निकाला जा सकता हैं. कुओं की मौजूदगी से बरसात का पानी इकट्ठा होता है और धरती का पानी रिसाइकिल होता रहता है, जिससे वाटर लेबल काफी हद तक मेंटेन रहता है. लालू द्वारा दी गयी पांचवी और आखिरी सलाह भी स्वागत योग्य है. लालू यादव ने गांवों में होने वाले धार्मिक यज्ञों को गर्मी में नहीं करने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि इससे गांव में आग लगने का खतरा तो बढ़ ही जाता है और पानी की बर्बादी भी होती है. हालाँकि, हमारे ऋषि मुनि और ज्ञानी लोग पहले ही ऐसा नहीं करते हैं, किन्तु फिर भी अगर अज्ञान के चक्कर में कुछ लोग ऐसा करते हों तो उन्हें इस सलाह से सीख लेनी चाहिए. 

गर्मी के बढे हुए तापमान में वैसे ही अधिकांश चीजें गर्म होती हैं और ऐसे में छोटी सी लापरवाही भी काफी नुकसानदायक हो सकती है. लालू यादव की सलाह के अतिरिक्त भी अगर हम कुछ और छोटी-मोटी बातों का ध्यान रखें तो  गर्मी में होने वाली परेशानियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है, मसलन गर्मी में जब भी घर से निकले, कुछ खा कर और पानी पी कर ही निकलें, खाली पेट नहीं, क्योंकि इससे 'लू लगने' और 'डिहाइड्रेशन' होने का खतरा रहता हैं. इसी के साथ, गर्मी में ज्यादा भारी और बासी खाना खाने से बचें, क्योंकि गर्मी में शरीर की जठराग्नि मंद रहती है, इसलिए वह भारी खाना पूरी तरह पचा नहीं पाती और जरुरत से ज्यादा खाने या भारी खाना खाने से उलटी-दस्त की शिकायत हो सकती है. इसी क्रम में, गर्मी में सूती और हलके रंग के कपडे पहनने चाहिये, क्योंकि चटक कपड़े पराबैगनी किरणें ज्यादा अवशोषित करते हैं और जल्दी गर्म हो जाते है. ऐसी ही कुछ छोटी मोटी सावधानियों में घर से बाहर निकलने पर चेहरा और सर रुमाल से ढकना, कच्चे प्याज का सेवन तथा जेब में प्याज रखना जैसे नुस्खे आजमाने चाहिए, जिससे लू नहीं लगेगी. इसके अतिरिक्त, ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पानी पिएं और हाँ लालू यादव भले ही बातों को हल्के अंदाज में कहते है लेकिन आपको गर्मी को हल्के में लेने की जरुरत नहीं, क्योंकि अगर एक बार आप इसके चपेट में आ गए तो फिर लालू और बाबा रामदेव भी आपको परेशानियों से नहीं बचा पाएंगे. इसलिए 'प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर' और हमारी देशी परम्पराओं के साथ आयुर्वेदिक नुस्खे यही तो कहते हैं.

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Thursday, 28 April 2016

तो अब राजनीति 'पीआर' के सहारे ही होगी? Digital agencies and Politics in India, Hindi Article, Mithilesh

राजनीति में जीत हार का फैसला अब पीआर एजेंसियां और डिजिटल कंपनियां बखूबी करने लगी हैं. अब नेताओं और कार्यकर्ताओं का जन-संपर्क अभियान और पब्लिक की नब्ज़ पकड़ने की कला जवाब देने लगी है. कहते हैं दुनिया के पुराने धंधों में से एक 'राजनीति' के खिलाड़ी काफी चतुर होते हैं, लेकिन अब उनकी चतुराई के ऊपर भी आदेश देने वाले और रणनीतियां बनाने वाले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं. देखा जाए तो यह ट्रेंड 'डेमोक्रेसी' के लिए थोड़ा अटपटा सा है, क्योंकि जनता में जो 'एजेंसियां' या 'कंसल्टेंट' किसी नेता या पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, वह जनता के प्रति जवाबदेह तो हैं नहीं और उनका उद्देश्य 'येन, केन, प्रकारेण' जीत हासिल करना होता है, वह भी 'कॉर्पोरेट स्टाइल' में. इसके लिए वह टेक्नोलॉजी से लेकर, तमाम मीडिया ऑप्शन और पैसे का खुलकर प्रयोग करते हैं, जबकि इसकी एवज में राजनीतिक पार्टियां उन्हें दुसरे लाभों के साथ 'खासी रकम' भी देती हैं. यह रकम इतनी बड़ी होती है, जिस पर एकबारगी यकीन नहीं होता है, मसलन 500 करोड़ से लेकर हज़ार करोड़ और ऐसे ही आंकड़े! जाहिर है, हमारा चुनाव आयोग तमाम 'चुनावों' में कम पैसे खर्च करने पर ज़ोर देता रहा है, किन्तु देश के चुनाव तो एक 'उद्योग' के रूप में विकसित हो रहे हैं, एक बड़े उद्योग के रूप में! ऐसे में जनता पर बोझ पड़ना तो तय ही है. पीआर यानि 'पब्लिक रिलेशन' और पीआर कंपनियों का काम होता है 'ब्रांडिंग और इमेज बिल्डिंग' जिससे नेताओं या पार्टी की समाज में सकारात्मक छवि बनायी जा सके और उसके सहारे उसकी 'चुनावी' नैय्या पार हो सके! इसकी कार्यप्रणाली की बात करें तो, पीआर कंपनियां जनता या टार्गेट ऑडियंस के मन में किसी भी पार्टी की सकारात्मक इमेज बनाने में सक्षम होती हैं और इसके लिए, गलत या सही तरीके से टार्गेट ऑडियंस को प्रभावित करने वाले लोगों और चीजों पर उनका ध्यान सर्वाधिक होता है. 

इस क्रम में, एजेंसियां सबसे पहले यूथ वोटर्स के बीच सीरियस इमेज रखने वाले प्रभावशाली लोगों को चुनने का काम करती हैं और ऐसे में, कंपनी की ओर से ये ध्यान रखा जाता है कि ये लोग राजनीतिक न हों और उनका उनके समाज में ठीक ठाक प्रभाव हो. समाज के अलग-अलग वर्ग से प्रभावशाली लोगों को चुनने के बाद उनसे आर्टिकल, बाइट और पब्लिक इवेंट में अप्रत्यक्ष तौर पर क्लाइंट (जिसकी ब्रांडिंग करनी हो) की तारीफ या उनकी इमेज को बेहतर करने का काम होता है. जाहिर है, इससे काफी फर्क पड़ता है और एक हद तक जनता प्रभावित भी होती है तो इसके लिए पैसे का लेन-देन भी खूब होता है, जो अंततः जनता की जेब से निकाले जाते हैं. इन सबके बीच सोशल साइट्स, मीडिया मैनेजमेंट, स्पीच राइटिंग, प्रेस रिलीज मैनेजेमेंट, पब्लिक इवेंट कराना, वेब ब्लॉग और अन्य जगहों पर भी क्लाइंट की इमेज बिल्डिंग का काम खूब ज़ोर शोर से जारी रहता है. ऐसा नहीं है कि पीआर कंपनियों का कांसेप्ट कोई नया है, किन्तु इससे पहले जब भी 'पीआर' का नाम सुना जाता था, वह बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ या फिर कॉर्पोरेट के प्रोडक्ट्स और इमेज बिल्डिंग के सन्दर्भ में ही सामने आता था. भारत में, इसकी गम्भीर शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 के लोकसभा चुनावों से मानी जा सकती हैं. नरेंद्र मोदी की धुआंधार सफलता से, अधिकांश राजनेताओं का ध्यान इस तरफ गया है. उस समय, जहाँ एक तरफ मोदी की जीत की चर्चा हो रही थी वहीं उनके जीत में सहायक "प्रशांत किशोर" का नाम भी खूब मशहूर हुआ. ये वही प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने मोदी की खूब ब्रांडिंग की और नारा दिया "अबकी बार मोदी सरकार". खूब चढ़ा ये नारा लोगों की जुबान पर! मोदी से प्रभावित हो कर उनके प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार ने भी बिहार चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर का सहारा लिया और जीत का बढ़िया स्वाद चखा. पीआर कंपनियों और उनके कंसल्टेंट्स की हनक इस बात से ही समझी जा सकती है कि नीतीश ने प्रशांत किशोर को अपने मंत्रिमंडल के समकक्ष स्थान दिया और अपना राजनीतिक सलाहकार ही बना डाला! 

जाहिर है, यह इसलिए भी था ताकि प्रशांत किशोर किसी और खेमे में न चले जाएँ, जैसा कि नरेंद्र मोदी के सफल कैम्पेनिंग के बाद वह भाजपा का कैम्प छोड़ चुके थे. ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में ही मोदी ने ये शुरुआत की है, बल्कि विदेशो में तो पीआर कंपनियों द्वारा इमेज ब्रांडिंग का खूब चलन है, जो राजनीतिक क्षेत्रों में भी ख़ासा दखल रखती है. रूस के प्रेसीडेंट व्लादिमीर पुतिन ने अपनी ब्रांडिंग और पीआर का काम अमेरिकी फर्म कैचम को दे रखा है. यही फर्म अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की इमेज बिल्डिंग का भी काम करती थी. कंपनी की सॉलिड ब्रांडिंग और लॉबिंग के चलते ही पुतिन को 2007 में टाइम मैग्जीन से पर्सन ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला था. अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन के साथ-साथ बराक ओबामा ने भी अपने लिए पीआर कंपनियों का सहारा लिया था. इस बार इस फार्मूले को प्रयोग करने जा रहे हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव! कहने को तो अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी विरासत में मिली है लेकिन इसके पीछे अखिलेश की मेहनत भी रही है, हालाँकि सपा की कानून व्यवस्था और कुछ नेताओं की विवादित छवि से वह चिंतित बताये जाते हैं. चूंकि वह नयी पीढ़ी के नेता हैं, इसलिए 'पीआर' एजेंसियों का कांसेप्ट उन्हें जंचा है, लेकिन वह कितना सफल होता है, यह जरूर देखने वाली बात होगी. 

इसके लिए, पीआर के क्षेत्र में एक बड़े नाम, गेराल्ड जे ऑस्टिन से अखिलेश यादव की पहली मुलाकात लंदन में हुई बतायी जा रही है और ऑस्टिन ने भी समाजवादी पार्टी के लिए अभियान की योजना बनाने के लिए हामी भर दी है. मिली जानकारी के अनुसार गेराल्ड ने कहा है कि वह उनके राजनीतिक सलाहकारों और समर्थकों को ट्रेनिंग दे सकते हैं. अमेरिका के चार-चार प्रेसिडेंट्स का चुनावी कैंपेन सफलतापूर्वक संभाल चुके ऑस्टिन के बारे में सीएम अखिलेश ने भी पूरी जानकारी जुटा रखी है. अमेरिका की डेमोक्रेट पार्टी के चुनाव सलाहकार गेराल्ड ऑस्टिन साल 1968 से ही राष्ट्रपति चुनावों के लिए पार्टी की योजना बनाते रहे हैं. वे चार अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन के साथ-साथ बराक ओबामा के चुनाव कैंपेन को पूरी तरह से कामयाब बना चुके हैं. जाहिर है ऐसे व्यक्तित्व को हायर करने के बाद अखिलेश का उत्साह चरम पर होगा, लेकिन सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश की जनता की किस हद तक समझ और उससे बढ़कर किस हद तक परवाह इन जैसी एजेंसियों को रहेगी. सवाल यह भी उठेगा कि इधर या उधर से कितनी मोटी रकम इनको जायेगी, जो चुनाव में जिताने की गारंटी लेते हैं. सवाल उठता ही है और उठेगा ही कि 'पीआर' के सहारे राजनीति करने वालों को प्रदेश के विकास और उसकी प्रगति की कितनी फ़िक्र है तो चुनाव आयोग के निर्देशों का कितना पालन करती हैं राजनीतिक पार्टियां!

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'अखिलेश' को जरूर मिले डेवलपमेंट की क्रेडिट! Development of Uttar Pradesh and Akhilesh Yadav, Hindi Article

यूं तो उत्तर प्रदेश को राजनीति का अखाड़ा इसलिए ही कहा जाता है, क्योंकि यहाँ इसके तमाम नए-पुराने दांव एक दुसरे पर आजमाए ही जाते रहते हैं. जो सत्ता में रहता है, अपना बचाव करता है तो विपक्षी उसके वादों एवं कार्यों को हवा में उड़ाने का दावा करते हैं. हालाँकि, कई बार आरोप-प्रत्यारोप हवा-हवाई ही होते हैं, जिनका खंडन करना सत्ता पक्ष आवश्यक नहीं समझता है और अगर बात कही जाय अखिलेश यादव की तो, वह तू-तू, मैं-मैं करते शायद ही कभी देखे गए हों. लेकिन, इस बार जब बसपा नेत्री मायावती ने मेट्रो-प्रोजेक्ट को लेकर अखिलेश से क्रेडिट छीनने की कोशिश की तब इस युवा नेता से रहा नहीं गया और उन्होंने इसका जवाब भी पुरजोर तरीके से दिया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछले दिनों लखनऊ यूनिवर्सिटी में आयोजित उत्तर प्रदेश बजट 2016-2017 पैनल परिचर्चा के उद्घाटन के दौरान मेट्रो और एक्सप्रेस-वे की बात करते हुए मायावती पर जमकर हमला बोला. मायावती की बात का सधे अंदाज में जवाब देते हुए, अखिलेश ने कहा कि अगर मेट्रो मायावती का प्रोजेक्ट था तो वो अपनी सरकार में मेट्रो क्यों नहीं चला पाईं? बताते चलें कि कुछ दिन पहले मायावती ने कहा था कि मेट्रो और एक्सप्रेस-वे बसपा सरकार की योजना है. जवाब देते हुए अखिलेश यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने हमले को और तीखा करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा कि अगर 2008 में मेट्रो कागजों पर बनाई गई थी तो 2012 तक मायावती ने इसे जमीन पर क्यो नहीं उतारा? 

भई, इस मृदुभाषी सीएम की बात का जवाब बसपा प्रमुख को अवश्य ही देना चाहिए कि अगर उनकी विकास योजनाओं में इतना ही दम और दूरदर्शिता थी तो फिर 2012 में प्रदेश की जनता ने सत्ता से उन्हें बाहर क्यों धकेल दिया था? खास तौर पर, मेट्रो प्रोजेक्ट की बात करें तो अखिलेश यादव को प्रदेश में इस सुविधा पर पर्याप्त ध्यान देने की क्रेडिट अवश्य ही मिलनी चाहिए. आखिर इसके लिए ही तो, लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन का हाल ही में संपन्न हुए 5वें वार्षिक मेट्रो रेल इंडिया समिट, 2016 में एक्सीलेंस इन इनोवेटिव डिजाइंस के लिए सर्वश्रेष्ठ मेट्रो परियोजना के रूप में आंकलन किया गया है. बताते चलें कि मार्च 2016 में आयोजित इस सम्मलेन में जयपुर मेट्रो, मुंबई मेट्रो, एल एंड टी मेट्रो रेल, लखनऊ मेट्रो के अतिरिक्त दूसरी कंपनियां एवं मेट्रो रेल परियोजनाओं के कंसल्टेंट्स और विनिर्माताओं ने भाग लिया था और इन सबमें लखनऊ मेट्रो ने बाजी मार ली. सिर्फ लखनऊ में ही क्यों बात करें, बल्कि अखिलेश यादव की दूरदृष्टि की सराहना इस बात के लिए भी करनी होगी कि लखनऊ के अतिरिक्त मेरठ, आगरा, कानपूर, इलाहाबाद एवं वाराणसी जैसे शहरों में भी मेट्रो प्रोजेक्ट्स चलाने की रूपरेखा इन्हीं के शासनकाल में तैयार की गयी है. इसमें कानपूर और वाराणसी मेट्रो की योजना तो काफी आगे बढ़ चुकी है, जबकि अन्य शहरों के लिए प्लानिंग अगले फेज में है. इस क्रम में, वाराणसी मेट्रो चलाने के लिए 15 हज़ार करोड़ रूपये की लागत से 29 किलोमीटर लम्बे रुट पर प्रस्ताव को सरकार ने अनुमोदित भी कर दिया है, जिसका डी.पी.आर. पहले ही स्वीकृत हो चुका है. 

इन आंकड़ों के साथ-साथ मायावती जैसे विपक्षियों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि 2013-14 के बजट में अखिलेश यादव ने ही लखनऊ मेट्रो का ज़िक्र किया था, जिसके बाद प्रदेश की राजधानी में वर्ल्ड-क्लास यातायात सुविधा करने की तैयारियां शुरू की गयीं और अभी तक के काम का आंकलन करने के बाद तमाम एजेंसियां एवं मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का ज़िक्र है कि निश्चित समय, यानि 2017 में लखनऊ मेट्रो फर्स्ट फेज का कार्य पूरा हो जायेगा. जाहिर है, लखनऊ को न केवल मेट्रो मिली है, बल्कि यह नवाबों के इस शहर की गति को किस तेजी से और स्मूदनेस के साथ आगे बढ़ाएगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. मेट्रो के रूप में शहरी जीवन को किस हद तक गति मिलती है, यह बात दिल्लीवासियों से बेहतर कौन समझ सकता है भला! आज दिल्ली यातायात व्यवस्था में रीढ़ की हड्डी बन चुकी दिल्ली मेट्रो की तर्ज पर अगर लखनऊ इस वैश्विक सुविधा से जुड़ सकेगा तो सूबे के मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत रुचि एवं उनकी दूरदर्शिता की सराहना खुले दिल से होनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव की विकास पुरुष की छवि केवल प्रदेश में मेट्रो-प्रोजेक्ट्स को लेकर ही है, बल्कि विकास एवं निवेश का माहौल बनाने के लिए भी इस युवा सीएम ने पूरे दिल से कार्य किया है. अभी हाल ही में, वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में सरकार की कोशिशों से उद्यम स्थापित करना या कारोबार करना पहले की तुलना में ज्यादा आसान हुआ है. अखिलेश सरकार के लिए यह आंकलन एक उपलब्धि की तरह ही है, क्योंकि यूपी इस मामले में हिंदुस्तान के 10 शीर्ष राज्यों में से एक और उत्तर-क्षेत्र का इकलौता राज्य बन गया है. 

बताते चलें कि यह रिपोर्ट तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि व्यापार शुरू करना, उसके लिए ज़मीन अलॉटमेंट एवं कंस्ट्रक्शन की त्वरित इजाजत मिलना, पर्यावरण विभाग से तालमेल के बाद त्वरित अनुमति, मजदूरों की नियमावली का अनुपालन, टैक्स नियमों का अनुपालन एवं जांच प्रक्रिया इत्यादि में किस स्तर तक स्पष्टता एवं आसानी है. जाहिर है, अगर वैश्विक एजेंसियां इस बात की ओर इशारा कर रही हैं तो कहीं न कहीं अखिलेश यादव का ध्यान उत्तर प्रदेश की उस पुरानी बदनामी की ओर जरूर ही गया होगा, जो 'इंस्पेक्टर राज' के लिए बदनाम था, जिस पर अखिलेश यादव काफी हद तक लगाम लगाने में सफल सिद्ध हुए हैं. जाहिर है, अगर विकास के मोर्चे पर अखिलेश यादव की सराहना हो रही है तो फिर मुख्यमंत्री का उत्साह बढ़ना स्वाभाविक ही है. तभी तो, अखिलेश यादव ने हाल ही में यह दावा किया है कि उनकी पार्टी वर्ष 2017 में होने वाला विधानसभा चुनाव भी जीतेगी, क्योंकि उन्हें किए गए विकास कार्यों पर भरोसा है. यहीं नहीं, अखिलेश ने समाजवादी पार्टी द्वारा 265 से अधिक सीटें जीतने की भविष्यवाणी भी कर दी है. हालाँकि, चुनाव परिणाम आने के बाद ही असल सूरते-हाल समझ आएगी, किन्तु विकास के मोर्चे पर अखिलेश का उत्साह बढ़ा हुआ है, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है. वह इस आत्मविश्वास का उपयोग जनता को रिझाने में किस हद तक कर पाते हैं, यह जरूर देखने वाली बात होगी. 

इसी क्रम में, तमाम विकास परियोजनाओं को गिनाते हुए मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि बनारस दुनिया की सबसे पुरानी सांस्कृतिक नगरी है और इस शहर के पर्यटन विकास के लिए यूपी सरकार हर संभव कदम उठाएगी, जिसमें धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी. बताते चलें कि वाराणसी में पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों का एक हिस्सा वरुणा कॉरिडोर भी है तो, सारनाथ को बौद्ध पर्यटन का केंद्र बनाने के साथ ही 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का दावा प्रदेश सरकार पहले ही करती रही है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रदेश के दुसरे क्षेत्रों में भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सही दिशा में पहले ही प्रयत्न कर रहे हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीएम अखिलेश का यह आत्मविश्वास अवश्य ही भाजपा और बसपा के खेमे में चिंता पैदा कर रहा होगा, क्योंकि सपा सरकार के कुछ अन्य लोग बेशक विवादित हुए हों, किन्तु अखिलेश की छवि जनता में मजबूत ही हुई है. इसके साथ -साथ अगर विकास के मोर्चे पर उन्हें विश्व भर से सराहना मिल रही है तो फिर यह 'सोने पर सुहागा' ही तो हुआ! हालाँकि, आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठता है, यह अवश्य ही देखने वाली बात होगी.
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Wednesday, 27 April 2016

खेल अब मनोरंजन बन गया है, जबकि... Olympic games and players, goodwill ambassador, hindi article, salman khan

 
आप किसी भी खिलाड़ी से इस लेख के 'टाइटल' का ज़िक्र करके देख लीजिए और वह घूंसे मारकर आपकी नाक तोड़ देगा. इसकी वजह भी कोई छुपी हुई नहीं है, बल्कि खिलाड़ी खेल को मनोरंजन की तरह नहीं, बल्कि युद्ध की तरह लेते हैं. देखा जाय तो, खिलाडियों के लिए खेल किसी युद्ध की तरह ही होता है, जहाँ जान लगा दी जाती है तो कई बार जान जाती भी है, किन्तु लोग तो इसे मनोरंजन का एक साधन ही मानते हैं. ऐसे में, आज के समय में जिस खेल में जितना तड़का है, जितना मनोरंजन है, जितने सितारे हैं वह खेल उतना ही लोकप्रिय है, इस बात में दो राय नहीं! अगर आप क्रिकेट का ही उदाहरण ले लें तो आप देख सकते हैं कि तमाम फ़िल्मी सितारों से लेकर, चीयर गर्ल्स और कॉर्पोरेट दिग्गज वहां मौजूद रहते हैं और उनके प्रभाव से लोगबाग भी क्रिकेट देखने जाते हैं. यह ट्रेंड दुसरे खेलों में कम दिखता है, खासकर भारत के सन्दर्भ में और नतीजा उनकी न्यून लोकप्रियता के रूप में सामने दिखता है. ऐसे में अगर भारतीय ओलम्पिक संघ ने सलमान खान जैसे सितारों को 'रियो ओलम्पिक' के लिए ब्रांड अम्बेस्डर नियुक्त कर ही दिया तो इसको लोकप्रियता बढ़ाने की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए, हालाँकि यह बात उतनी सीधी नहीं है, जितनी दिख रही है. प्रभावशाली हस्तियां किस तरह लाइमलाइट की चोरी करती हैं और किस तरह दूसरों को उभरने नहीं देती हैं, इस बात के कई उदाहरण हैं और जो खिलाड़ी अपना जीवन, ओलम्पिक जैसे स्थानों पर जाने के लिए दांव पर लगा देते हैं, वह आखिर किस प्रकार अपने स्थान को दुसरे के हक़ में जाने दे सकते हैं. जहाँ तक खेल प्रमोट करने की ही बात है तो इसे अन्य अवसरों पर भी किया जा सकता था, भारत में किसी प्रतियोगिता में सहभागी बनकर इसे प्रमोट किया जा सकता था, किन्तु ऐसा नहीं किया गया. ऐसे में, सवाल तो उठेंगे ही और उठने भी चाहिए. अगर वास्तव में किसी बड़े सितारे का ब्रांड अम्बैसडर बनना आवश्यक ही था, तो भारतीय ओलम्पिक संघ को 'संयुक्त ब्रांड अम्बैसडर' बनाने के विकल्प का चुनाव करना चाहिए था. इसमें संयुक्त रूप से एक दो खिलाड़ी भी अगर शामिल कर लिए जाते तो शायद यह विवाद ही न होता, किन्तु कौन समझाए खेल अधिकारियों को, जिन्हें खिलाडियों के अधिकारों की समझ ही नहीं है. 

भारत में अगर हम खेलों की बात करें तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट को ही लोग ज्यादा जानते हैं और पसंद भी करते है. ग्राउंड पर अगर बात की जाए तो, भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को भी बहुत कम ही लोग जानते है. यदि इस खेल में किसी को लोग पहचानते हैं तो केवल कैप्टन या एकाध खिलाडियों को ही, वह भी बेहद सीमित स्तर पर. सिर्फ हॉकी ही क्यों, भारत में क्रिकेट को छोड़कर अन्य दुसरे खेलों के साथ ऐसा ही बर्ताव होता है. यदि किसी को किसी प्रतियोगिता में गोल्ड या दूसरा मैडल मिला तो मीडिया में न्यूज़ जरूर बन गयी और उसके बाद फिर सब 'फुस्स'! हाल ही में ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने वाली दीपा जैसी जिम्नास्ट को ओलम्पिक क्वालीफाई करने से पहले शायद ही कोई जानता होगा. ऐसी परिस्थितियों में जब इन खिलाडियों का दिन आता है, अगर उस समय भी उन्हें न पूछा जाय तो 'योद्धा खिलाडियों' का खून तो उबाल मारेगा ही. इसी क्रम में, यह बात भी दावे के साथ कही जा सकती है कि एक दो लोगों को छोड़ दें, तो पीटी उषा, मिल्खा सिंह, अभिनव बिंद्रा जैसे अनेक खिलाड़ियों के बारे में लोग जनरल नॉलेज की किताबो में ही पढ़ते हैं. वही क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, धोनी इत्यादि की बात करें तो उन्हें हिंदुस्तान का एक छोटा बच्चा भी जानता है. जाहिर हैं, अब सवाल और जवाब दोनों ही मनोरंजन का हैं. ऐसे में, योद्धा खिलाडियों को भी अपने नजरिये में थोड़ी तब्दीली लानी चाहिए, क्योंकि कई बार 'कामयाबी और काबिलियत' के बीच फासले थोड़े बढ़ जाते हैं. साफ़ है कि बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान का रियो ओलिंपिक 2016 का गुडविल एम्बैसडर के चुने पर हंगामा होना ही हैं, किन्तु यह हंगामा सही-गलत से ज्यादा हालात के ऊपर निर्भर है. जब इस बात की घोषणा हुई तब वहां मौजूद कई खिलाड़ियों ने इस बात का समर्थन भी किया है. वहां 2012 के ओलिंपिक में ब्रॉन्ज़ मैडल जीतने वालीं एमसी मैरीकॉम, पुरुष हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह, महिला हॉकी टीम की  कप्तान, दीपिका कुमारी, अपूर्वी चंदेला और मोनिका बत्रा आदि उपस्थित थे. हालाँकि, खेल जगत में यह पहली बार ही हुआ है कि इसके लिए कुछ खिलाड़ियों ने खुलकर आलोचना भी की है. कई तो यह आरोप लगाने से नहीं चूके है कि सलमान ख़ान अपनी आने वाली फिल्म 'सुलतान' के प्रोमोशन के लिए भारतीय दल के गुडविल एंबैसडर बने हैं. हालाँकि, ऐसी बातें पूरी तरह सही नहीं हैं, किन्तु इन सभी परिस्थितियों के लिए सलमान खान की बजाय, क्यों नहीं भारतीय ओलम्पिक संघ को जिम्मेदार ठहराया जाय! 

इस मामले पर गुडविल एंबैसडर बनने के बाद सलमान ख़ान ने सफाई देते हुए कहा कि "मेरा रोल एक धक्का गाड़ी की तरह एक ज़ोर लगाने का है. उम्मीद करता हूं कि खिलाड़ियों को इससे फ़ायदा होगा. ये नहीं जानता कि इससे कामयाबी मिलेगी या नहीं, लेकिन मेरी कोशिश ज़रूर रहेगी कि मैं उनमें जोश भर सकूं". जाहिर तौर पर सलमान खान, अपनी ओर से सफाई पर सफाई दे रहे हैं, लेकिन विवाद भी कुछ कम नहीं हो रहा है. इसी क्रम में, भारतीय हॉकी कप्तान सरदार सिंह का कहना है की "सलमान के फ़ैन्स की बहुत लम्बी लाइन हैं. उनके इन खेलों के जुड़ने से सलमान के फ़ैन्स भारतीय खेलों को भी फ़ॉलो करेंगे और जिससे भारतीय खेलों को भी ज़रूर फ़ायदा होगा". इसी क्रम में, 2012 में लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता रह चुके पहलवान योगेश्वर दत्त को सलमान का 'गुडविल एंबेसडर' बनना पसंद नहीं आया जिसके लिए उन्होंने आलोचना भी की और कहा की "पीटी उषा, मिल्खा सिंह जैसे बड़े स्पोर्ट्स स्टार हैं भारत में, जिन्होंने कठिन समय में देश के लिए मेहनत की थी! पहलवान योगेश्वर दत्त  के बाद फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने भी इस पर नाराजगी जताई. इसी कड़ी में, गौतम गंभीर का गुस्सा भी दिखा और उन्होंने कहा कि "देश में खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है, अगर अभिनव बिंद्रा को गुडविल एबेंसडर बनाया जाता तो मुझे ज्यादा अच्छा लगता". इन तमाम विरोधों के बाद आलोचनाओं से खीझ कर सलमान खान के पिता सलीम खान ने सलमान के भारतीय ओलिंपिक दल के सद्भावना दूत बनने को सही ठहराते हुए कहा कि "सलमान खान ने भले ही प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लिया हो, लेकिन वह 'ए' श्रेणी का तैराक, साइकिलिस्ट और भारोत्तोलक है". सलीम खान ने मिल्खा सिंह का नाम लेते हुए कहा कि "मिल्खा जी यह बॉलीवुड नहीं है, यह भारतीय फिल्म इंडस्ट्री है और वह भी दुनिया में सबसे बड़ी है. यह वही इंडस्ट्री है जिसने आपको गुमनामी में जाने से बचाया." जाहिर तौर पर सलीम खान भी भावनाओं में बह गए और उन्हें थोड़ा संयम रखते हुए मिल्खा सिंह जैसे योद्धाओं के मनोभावों को पकड़ना चाहिए था. मिल्खा सिंह को सलीम खान की आलोचना नागवार ही गुजरी और उन्होंने तत्काल कहा कि 'बॉलीवुड ने उनपर फिल्म बनाकर कोई अहसान नहीं किया, बल्कि उन्होंने ही अपनी कहानी मात्र 1 रूपये में दी थी'! जाहिर है इस विवाद का कोई अंत नहीं है और इस विवाद को उत्पन्न कराकर भारतीय ओलम्पिक संघ के अधिकारी अवश्य ही मुस्करा रहे होंगे कि चलो, किसी बहाने ही सही, 'भारतीय ओलम्पिक संघ' का नाम तो लिया गया. हाँ, इससे बेशक किसी की भावनाओं को चोट पहुंचे या खिलाडियों का 'योद्धा होने का भ्रम' ही क्यों न टूटे! चूंकि अब खेल पूरी तरह मनोरंजन की जकड़ में आ गया है, इसलिए यह सब तो होना ही हैं.

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कॉमेडी का बदलता स्वरुप एवं 'दी कपिल शर्मा शो' - Definition of Comedy in Hindi, The Kapil Sharma Show, Hindi Article, Mithilesh

'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' ने सफलता के जो कीर्तिमान रचे, उससे किसी भी दुसरे कॉमेडियन को ईर्ष्या हो सकती है. हालाँकि, उनकी बढ़ती लोकप्रियता से न केवल कॉमेडियन्स ही ईर्ष्यालु हो गए, बल्कि उनकी 'कलर्स' चैनल वालों से भी अनबन शुरू हो गयी और इसके बाद कपिल शर्मा ने नयी राह पकड़ ली! सोनी चैनल पर आने वाला 'दी कपिल शर्मा शो' सफल होगा कि असफल यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन जिस प्रकार कपिल शर्मा ने अपनी टीम को सहेज कर रखा है, वह उनकी प्रबंधन क्षमता साबित करने के लिए काफी है. चूंकि कपिल शर्मा का यह शो भी काफी कुछ 'पुराने फॉर्मेट' पर ही है और टीम भी उनकी साथ ही है तो विश्लेषक यह भविष्यवाणी कर पा रहे हैं कि कपिल अपना पुराना रूतबा बरकरार रखने में सफल रह सकते हैं. हालाँकि, इस बीच कॉमेडी के बदलते हुए स्वरूपों पर एक नज़र डालना लाजमी हो जाता है. यह इसलिए भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि लोगों में और बच्चों में कहीं न कहीं इस बात का 'रिफ्लेक्शन' भी खूब जाता है और इससे हमारा समाज प्रभावित भी होता है. आज के समय में कॉमेडी का मतलब ही बदल गया है, जिसमें किसी का मजाक उड़ाकर उसे ही कॉमेडी मान लिया जाता है तो किसी से डबल मीनिंग बात करने को ही कॉमेडी कह दिया जाता है. किसी की मिमिक्री तक तो ठीक है, किन्तु खुद कपिल शर्मा के पिछले शो में 'सुमोना चक्रवर्ती' के होठों का जिस तरह से बार-बार मजाक बनाया जाता है, उससे कहीं न कहीं एक सामाजिक जिम्मेदारी का भी मजाक बन जाता है. आज भी हमारे देश में लड़कियों को बराबरी का हक़ मिलने में काफी कुछ बाकी है तो कई लडकियां इस हद तक 'ब्यूटी कॉन्शियस' होती हैं कि वह इन बातों को अपने दिल पर ले लेती हैं. ऐसे में इसे बेशक कॉमेडी कहकर इग्नोर करने की कोशिश की जाय, किन्तु फर्क तो पड़ता ही है. 

हालाँकि, कपिल शर्मा के पिछले शो में दुसरे शोज की अपेक्षा कम अश्लीलता होती है, किन्तु फिर भी कपिल काफी द्विअर्थी बातें कह जाते हैं. अब चूंकि वह एक बड़ी सेलेब्रिटी बन चुके हैं, अतः उन्हें अपने कंटेंट पर कहीं ज्यादा ध्यान देना होगा. यदि आपने "हम पांच", 'तू तू मैं मैं', ऑफिस-ऑफिस जैसे कॉमेडी शो देखे होंगे तो आपको याद होगा कि उसमें परिस्थितिजन्य हास्य की बातें ज्यादा होती थीं और फूहड़ता कम! इस तरह के शो में कलाकार जो भी दिखते थे, जो भी दिखाते थे, उसमें किसी को आपने आप में ग्लानि महसूस नहीं होती होगी और न कोई किसी के सामने अपनी बेइज्जती ही महसूस करता था, जैसाकि आज-कल के शो में होता है. पुराने कॉमेडी शोज में भाषा भी मर्यादित और शालीन होती थी तो उस समय किसी भी कॉमेडी शो में 'अपशब्द' तो होते ही नहीं थे, लेकिन आज कल इसका ही ट्रैंड हो गया है. आप टीवी शो से लेकर रेडियो के किसी भी प्रोग्राम को देख सुन सकते हैं और वहां आपको शालीनता के पैमाने पर निराश ही हाथ लगेगी. पिछले दिनों 'एआईबी' (आल इंडिया ***द) की भी खूब चर्चा हुई थी, जिसने अश्लीलता की सीमाओं को कॉमेडी के नाम पर भरपूर लांघा था. इस शो के लिए कारन जौहर, रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर जैसे सितारों को भी बदनामी झेलनी पड़ी थी. हालाँकि, परवाह किसको है और क्यों है भला! टीआरपी तो मिल रही है न, और क्या चाहिए भला! कुछ दिन पहले टीवी पर एक कॉमेडी शो आता था, जिसमें स्टेज पर एक कॉमेडी किंग होता था और सामने आम मध्यवर्गीय श्रोता बैठे होते थे. कॉमेडी किंग 'ऑडिएंस' में से जान बूझकर बहुत दुबले, बहुत मोटे या बेसुरा गाने वाले को बुलाता या उसे सवाल पूछने का आमंत्रण देता था और फिर उसका मजाक उड़ाया जाता था. दुबला आदमी है तो उसके दुबलेपन का और मोटा आदमी है तो उसके मोटापे का मजाक उड़ाया जाता था. इतना ही नहीं उसके प्रोफेशन को भी नहीं छोड़ा जाता था. हालाँकि, समाज में आ रही गिरावट सिर्फ कॉमेडी और बॉलीवुड के क्षेत्र में ही नहीं है, बल्कि दुसरे क्षेत्रों में भी इसने अपना ख़ासा प्रभाव जमा लिया है, किन्तु जब बात कॉमेडी की करते हैं तो इसका अभिप्राय समाज के दूसरे क्षेत्र जो गलत राह पर हैं और किसी की सुनना समझना नहीं चाहते हैं, उनको कॉमेडी के माध्यम से एक ट्रैक पर लाना ही तो है, किन्तु अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि अब सिर्फ टीआरपी का गेम ही मामले को तय कर रहा है. 

जहाँ तक बात कपिल शर्मा की कॉमेडी की है तो इस कॉमेडी के सब्जेक्ट में एक रंगीन मिजाज विधवा दादी, एक उम्रदराज और बिनव्याही बुआ, एक मुंहलगू नौकर हास्य उत्पन्न जरूर करते हैं, किन्तु कई बार दादी और बुआ की हरकतों में थोड़ी अश्लीलता भी दिख ही जाती है तो पिछले शो की दादी का काम शराब पीकर डांस करना, किस करना और डबल मीनिंग संवाद थोड़ा असहज भी कर देते हैं. हालाँकि, आज के समय के बिजनेस की डिमांड भी कुछ अलग ही है. मिमिक्री भी कॉमेडी के साथ ही आता है, लेकिन इसके नियम जो बताये जाते हैं, उसके अनुसार किसी बेरोजगार या किसी के मर जाने पर उसकी मिमिक्री नहीं की जाती थी, किन्तु यह नियम भी बाद में तोड़े जाने लगे. यदि रेडियो की बात करें, तो कई एफएम स्टेशन के रेडियो जॉकी (आरजे) उचक्केपन के साथ अपने सुनने वालों के साथ पेश आते हैं, जिसमें किसी का बैंड बजाना, हड़काना, अश्लील भाषा के लिए उकसाना और अंत में माफ़ी मांगना और कहना कि "यार बुरा मत मानो हम तो तुम्हारा बैंड बजा रहे थे". कई बार यह हरकतें श्रोताओं का मनोरंजन तो जरूर करती हैं और लोग भी चटकारे ले लेकर इसे सुनते और देखते हैं, किन्तु इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि छोटे-छोटे बच्चे भी यही सब देख कर सीखते हैं और वह इसे कॉमेडी के रूप में नहीं, बल्कि गलत आदत के रूप में विकसित कर लेते हैं. आज जो बच्चों में चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, शैतानी की पराकाष्ठा है, उसमें कहीं न कहीं फिल्म, रेडियो और कॉमेडी शोज की भी जिम्मेदारी निहित है. आखिर, एक बच्चे का दिमाग किस प्रकार परिस्थितियों को जज कर पाएगा और वह जो दिखता है, जैसा दिखाया जाता है, वैसा व्यवहार करने को उत्सुक हो जाता है. थोड़े टाइम पहले विदेशी मजाकों का भद्दा भारतीय संस्करण दिखाया जाता था , जिसमे एक कमरे को छुपा कर लगाते थे उसके बाद उस शो का मेंबर किसी मुसीबत में फसे होने का नाटक करता था जिसका असर गुजरने वालो पर पड़ता था जो उन्हें सुनते थे या उनकी मदद के लिए आगे आते था, लेकिन जब उन्हें पता लगता था की यह सब एक ड्रामा हो रहा है तो एक झेंपने वाली मुस्कान के साथ आगे बढ़ जाते थे. 

यह बातें कॉमेडी की सीमा में आती हैं कि नहीं यह तो नहीं पता, किन्तु यह सब देखकर लोग सच में मुसीबत में फंसे व्यक्ति को 'कॉमेडी' समझकर ही आगे बढ़ने लगे हैं. आखिर, चरवाहे का बच्चा और भेड़िया की कहानी तो हम सब को पता ही है, जिसमें कॉमेडी करने के मकसद से वह लड़का झूठ-मूठ का 'शेर-शेर' चिल्लाता है और गाँव वाले उसकी मदद को आगे आते हैं, किन्तु जब उसके झूठ को सब जान जाते हैं तब सच में 'शेर' आने पर कोई उसकी मदद को नहीं आता. आखिर, इस तरह की बातें कॉमेडी में किस प्रकार आ सकती हैं, यह समझ से बाहर की बात दिखती है. यदि ऋषिकेश मुखर्जी और जसपाल भट्टी जैसे कॉमेडी करने और बनाने वाले ये कॉमेडी शोज देखते तो उनको भी एक बार रोना आ जाता! स्वस्थ कॉमेडी में कभी भी व्यक्ति पर नहीं हंसा जाता है, बल्कि हंसने वाले परिस्थितियों पर ही कॉमेडी करते हैं. यदि अनपढ़ और विकलांगों पर कॉमेडी की जाय, मजहब, जाति, धर्म, सरदार, सांप्रदायिक और महिलाओं के खिलाफ कॉमेडी की जाय तो इसे हंसी के काबिल माना जाय या तरस के, यह बात समझ से बाहर है. इसी तरह, बीमारी, बुढ़ापे, हकलाहट, लंगड़ेपन या अंधेपन के साथ अपनी बीवी और  साले सालियों तक को हास्यकवि के कविता का शिकार होना पड़ता है. हालाँकि, कई बार बिचारे कॉमेडियन भी अतिवादिता का शिकार हो जाते हैं, जैसे 'कीकू शारदा' अभी जेल होकर आये हैं, क्योंकि उन्होंने एक धर्मगुरु के जैसे कपड़े पहनकर कॉमेडी करने की जुर्रत कर दी थी. कॉमेडी अगर दिखावे का विरोध करे, अंधविश्वास पर चोट करे, लोगों को हंसी-हंसी के माध्यम से मोरल वैल्यूज का थोड़ा बहुत ही सही, परिचय कराये तो फिर 'बात बन जाए, किन्तु इन बातों को 'टीआरपी' के दल्लों को कौन समझाए!
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