आरक्षण का दावानल


आरक्षण शब्द के ऊपर हमारे देश में इतना कहा सुना जा चुका है कि अब कुछ शेष नहीं है. 21वीं सदी में यह बात बेहद आश्चर्यजनक लगती है कि आरक्षण के लिए कुछ लोगों द्वारा रेल की पटरियां तक उखाड़ दी जा रही हैं. एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और दुसरे ऐसे ही नारे अपने सूटकेस में रखकर पूरे विश्व का भ्रमण कर रहे हैं और दूसरी ओर राजनीतिक शह पर बेतरतीब हो हल्ला मचाया जा रहा है. इस हंगामे से हो रहे नुकसान का आंकलन करने बैठा जाय तो सर दुखने लगता है. मौजूदा गुर्जर आंदोलन के कारण रेलवे को करीब 100 करोड़ रूपये का नुकसान झेलना पड़ा है. आंदोलन के चलते अभी तक कोटा-मथुरा मार्ग पर 326 मेल एवं एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने या मार्ग परिवर्तित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इसके अतिरिक्त 21 मई से आईआरसीटीसी पर करीब 1.9 लाख टिकट रद्द किये गये हैं. इस रुट पर जाने वाले ग्राहकों को भारी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. कोटा.मथुरा मार्ग पर दक्षिण एवं उत्तर तथा उत्तर एवं पश्चिम के बीच प्रमुख रेल यातायात चलता है तथा आंदोलन के कारण यह मार्ग बाधित हो गया है. अब समझ यह नहीं आ रहा है कि कानून व्यवस्था का मजाक उड़ाने की अनुमति भला क्यों और कैसे दी जा रही है. इस पूरी कड़ी में हाई कोर्ट के सख्त संज्ञान के बाद भी आंदोलकारी आरक्षण के लिए किसकी शह पर डंटे हुए हैं, यह शोध का विषय हो सकता है. हालाँकि तमाम सियासी उठापटक और रेल से सड़क तक प्रदर्शन के बीच गुर्जर आंदोलन मामले में नया मोड़ आने की सम्भावना बढ़ी है. एक अपुष्ट खबर के अनुसार राजस्थान सरकार आख‍िरकार गुर्जरों को सरकारी नौकरी में पांच फीसदी आरक्षण को लेकर राजी हो गई है और वसुंधरा सरकार ने इसके लिए विधेयक लाने की बात कही है. पर प्रश्न और उसका हल यहीं तक हो तो बात समाप्त की जा सकती है, लेकिन आरक्षण से सम्बंधित छोटी सी भी सकारात्मक या नकारात्मक बात निकलती है तो दूर तलक जाती है. जाट आरक्षण, मुस्लिम आरक्षण और ऐसे ही अंतहीन यात्रा का साक्षी बनता रहा है यह शब्द. अर्थ तो खैर, आज तक समझ ही नहीं आया है इसका, क्योंकि संविधान बनाते समय इसका प्रावधान मात्र कुछ वर्षों के लिए दबे-कुचलों के लिए किया गया था, लेकिन कौन नहीं जानता है कि 'क्रीमी-लेयर' शब्द इसके साथ मजबूती से चिपक गया है और आरक्षण का 90 फीसदी से ज्यादा लाभ अयोग्य व्यक्ति ही ले रहे हैं. असली गरीब और इस आरक्षण का हकदार आज भी ठोकरें खाने को मजबूर है. कई जाने माने विद्वान और स्वतंत्र एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में आर्थिक आधार पर आरक्षण करने की वकालत की है, जबकि जातिगत आधार पर इसे ख़त्म करने की सिफारिशें भी हुई है, लेकिन इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सका है. सच बात तो यह है कि जब तक आरक्षण ख़त्म करने की पहल नहीं की जाएगी, तब तक गुर्जरों के इस आंदोलन की तरह विभिन्न समुदाय अपने स्वार्थ के लिए सरकारों पर दबाव बनाते रहेंगे. लेकिन, संविधान में आरक्षण समाप्त करने की बात भला कौन सुने, कई सरकारें इस बात पर आमादा हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 फीसदी की सीमा को भी पार कर लिया जाए. राजनैतिक स्वार्थ से घिरी आरक्षण की काली दुनिया, देश की प्रतिभाओं का कब तक सत्यानाश करती रहेगी, यह अपने आप में यक्ष प्रश्न है. इस प्रश्न के उत्तर ढूंढने की ओर भला किसका ध्यान है कि गरीब और गरीब क्यों हो रहे हैं, जबकि अमीर और अमीर होते जा रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि सार्वजनिक संसाधनों पर अयोग्य और अनैतिक व्यक्तियों का कब्ज़ा होता जा रहा है. बेहतर यह होगा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन करे, जो जातिगत आरक्षण ख़त्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की दिशा में नए सिरे से रिपोर्ट पेश करे. इस रिपोर्ट को लागू करने की अवधि 10 साल, 20 साल तक हो सकती है, लेकिन उसके बाद हमारी आने वाली पीढ़ियां कम से कम आरक्षण की इस काली आग से तो छुटकारा पा सकेंगी, अन्यथा.... धुंआ उठता रहेगा, इस काली आग का धुंआ, आरक्षण के अंतहीन दावानल का धुंआ !!

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