अनिवार्य है बिहार का नवोत्थान - Development of Bihar and the Politics


यूं तो ऐसा कोई दिन नहीं, जब बिहार से सम्बंधित खबरें राष्ट्रीय सुर्खियां न बनती हों. बात चाहें राजनीति की हो, गरीबी की हो, पलायन की हो, जर्जर सड़कों की हो या स्कूल की चारदीवारियों पर चढ़े नक़ल कराते लोगों की हो, बिहार हर रोज राष्ट्रीय परिदृश्य पर चर्चा में बना रहता है. आज के दिन दो ख़बरों ने इस प्रदेश की ओर देखने और सोचने पर पुनः मजबूर कर दिया. पहली खबर थी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृतियाँ 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' के 50 वर्ष पूरा होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम, जिसमें हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित बिहार से सम्बंधित केंद्रीय मंत्री, साहित्यकार इत्यादि मौजूद थे. यूट्यूब इस कार्यक्रम के 1 घंटे के वीडियो को देखने पर आपको सुखद अनुभूति होगी. हम जैसे नयी पीढ़ी के लोग, जिन्हें बिहार की गौरवमयी संस्कृति का बहुत कम ज्ञान है, या जिन्हें बिहार के बारे में बहुत सकारात्मक ज्ञान नहीं है, उन्हें नरेंद्र मोदी की वेबसाइट या यूटूब पर मौजूद यह वीडियो जरूर देखना चाहिए. कहने को तो यह एक साहित्यिक कार्यक्रम था, किन्तु राजनीति के माहिर हमारे प्रधानमंत्री ने इस अवसर का प्रयोग बिहार विधानसभा के आने वाले 
Development of Bihar and the Politics, hindi article by mithilesh2020 - 22 may
चुनावों के लिए बड़ी ख़ूबसूरती से किया. रामधारी सिंह दिनकर के सहारे, प्रधानमंत्री ने अपनी चिर-परिचित शैली में बड़ी आत्मीयता से बिहार के लोगों को जाति की राजनीति से निकलने की सलाह दी. इशारे-इशारे में प्रधानमंत्री यह भी बताने से नहीं चुके कि यदि राजनीति की जातिवादी शैली से बिहार के लोगों ने किनारा नहीं किया, तो भारत के हृदय स्थल की तरह, हिंदी बेल्ट का यह महत्वपूर्ण प्रदेश, पिछड़ेपन की आग में जलते रहने को अभिशप्त होगा. देखा जाय तो, यह तथ्य कोई नया नहीं है कि बिहार के पिछड़ेपन और जाति-व्यवस्था पर आधारित राजनीति ने विकास की कमर तोड़कर रख दी है. विज्ञान भवन की इस खबर के अतिरिक्त जिस दूसरी खबर ने ध्यान खींचा, वह मशहूर लेखिका मधु किश्वर का एक बयान था. सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर का कहना है कि बिहार को 50 सालों के लिए ठेके पर सिंगापुर को दे दिया जाना चाहिए, और कुछ बेहतरी होने पर वापस ले लिया जाना चाहिए. ऐसा उन्होंने अपने ट्वीट में 19 मई को कहा, जब वे बिहार में सासाराम से पटना की ओर जा रही थीं. ख़राब रास्ते के साथ-साथ उन्हें ट्रेफिक जाम का भी सामना करना पड़ा था. उनके इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया आज 22 मई को हुई, जब सोशल मीडिया के यूजर्स ने भारी संख्या में प्रतिक्रिया देनी शुरू की. हालाँकि, बाद में उन्होंने अपने ट्वीट पर सफाई जरूर दी, किन्तु वह मुद्दा तो उठ ही गया, जिसको लेकर सुशासन और विकास बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार अपनी पीठ ठोकते रहते हैं. वैसे नीतीश और उनके समर्थक कुछ भी कहें, किन्तु यह एक तथ्य है कि यदि कानून व्यवस्था में थोड़े सुधार को छोड़ दिया जाय, तो बिहार के हालात में दूसरा कुछ ठोस बदलाव हो नहीं पाया है. और वह बदलाव हो भी तो कैसे, क्योंकि राजनीतिक उठापठक का कई दशकों से कुरुक्षेत्र बना हुआ है बिहार. लालू यादव के जंगलराज के बाद, नीतीश और भाजपा को बहुमत मिला, किन्तु नीतीश कुमार की अव्यवहारिक राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा ने बिहार राज्य के राजनैतिक भविष्य को गहरे अनिश्चितता के भंवर में फिर फंसा दिया. और बिडम्बना देखिये कि जिस बिहार को राष्ट्रीय फलक पर बदनाम करने के लिए लालू यादव कुख्यात रहे हैं, वह एक बार फिर अपने दांव-पेंच के साथ बिहार के भविष्य का फैसला करने का खम ठोक रहे हैं. इस विधानसभा चुनावी गणित को छोड़ भी दिया जाय, तो हिंदी बेल्ट का प्रमुख राज्य होने के कारण और कई महत्वपूर्ण राज्यों से सीमाएं लगी होने के कारण, बिहार राजनीतिक रूप से हमेशा शक्तिशाली बना रहेगा. इसके अतिरिक्त, यहाँ से निकले तमाम प्रभावशाली लोग विभिन्न राज्यों में अपने पैर मजबूती से जमा चुके हैं और कई राज्यों में बिहारी लोग बाकायदा राजनैतिक रूप से भी सक्रीय हैं. इन सबके बावजूद, मूल बिहार की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, तो इसका हल जातिगत राजनीति से छुटकारा पाने में ही है, जैसा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा है. इसके अतिरिक्त किसी भी राज्य या देश की सबसे दुखद स्थिति तब हो जाती है, जब वहां से स्थाई रूप से प्रतिभा-पलायन हो जाता है. थोड़ा दुसरे शब्दों में कहा जाय तो जो सक्षम लोग हैं, यदि वही अपने गाँव, समाज, प्रदेश अथवा देश से भाग जायेंगे, तो उनकी मिटटी की रखवाली और उसकी सेहत का ध्यान कौन करेगा? इस भाव को प्रख्यात भोजपुरी नाटककार भिखारी ठाकुर ने भी अपने नाटक 'विदेशिया' में बड़ी सुंदरता से दर्शाया है. भोजपुरी साहित्य को थोड़ा भी प्यार करने वाले इस नाटक को जरूर पढ़ना चाहेंगे. इसके अतिरिक्त, अत्यधिक राजनीति भी हिंदी भाषी क्षेत्रों की एक समस्या बन चुकी है. चूँकि, बेरोजगारों के पास कोई काम नहीं है, इसलिए खाली समय में बेवजह की राजनीति करना इस क्षेत्र के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह में शुमार हो चुकी है. बिहार के नवोत्थान के लिए इन तीन चीजों जातिगत-सोच, प्रतिभा-पलायन और बेवजह की राजनीति से मुक्त होना अति आवश्यक हो गया है, तभी यह प्रदेश अपना पुराण गौरव फिर से प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा, और वगैर इस प्रदेश के नवोत्थान के भारतवर्ष का समग्र विकास भला कैसे हो सकता है. समग्र विकास का मतलब तो यही है कि प्रत्येक भाग विकास की दौड़ में समान रूप से सहभागिता करे. उम्मीद है आने वाले समय में, राजनेता और बिहार के प्रतिभाशाली लोग इस दिशा में कार्य करने की रफ़्तार को तेज़ गति देंगे.

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