अँधेरे में कूटनीतिक तीर - India China relations and world politics


प्रधानमंत्री की बहुचर्चित चीन यात्रा की बड़ी चर्चाएं हैं. चूँकि अब संघी ही सत्ता में हैं, इसलिए चीन के प्रति बड़े मधुर बयान देकर कूटनीति को साधने की कोशिश हो रही है. भाजपा तो खैर पीआर की कोशिशों में लगी ही है. इस कड़ी में यथार्थवादियों को कोई खास उम्मीद नहीं है और उसका कारण भी बड़ा स्पष्ट है, जो सरकारी अमले के अतिरिक्त पूरी दुनिया को दिखता है. वह कारण है चीन के सरकारी महकमों द्वारा लिए जाने वाले फैसले, वहां की सरकारी मीडिया द्वारा उकसावे वाली खबरें 'बेपरवाह' होकर छापना, भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में गहरी मगर नकारात्मक दिलचस्पी रखना और अरुणाचल प्रदेश को लेकर बेहद अव्यवहारिक रवैया अख्तियार करना. यह कुछ तार्किक कारण हैं, जिनसे साफ़ जाहिर होता है कि चीन अपने मजबूत पड़ोसी से दोस्ती को ज़रा भी राजनैतिक अहमियत नहीं देता है. थोड़ा और गहराई से संबंधों की पड़ताल की जाए तो चीन और भारत की जनता ही नहीं, बल्कि दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे को शत्रु ही मानती हैं और ऊपर से चाहे कितनी ही बयानबाजी क्यों न की जाय, सच यह है कि यह शत्रुतापूर्ण रवैया घटने की बजाय लगातार बढ़ ही रहा है. भारत के उप सेनाप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फिलीप कैम्पोस का वह बयान बिलकुल भी हैरान करने वाला नहीं है, 
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जिसमें उप सेनाप्रमुख ने कहा है कि इस सदी में कभी भी चीन और भारत के बीच जंग हो सकती है. यदि कारणों की पड़ताल की जाय तो, यह बयान कोई भावनात्मक बयान भी नहीं दिखता है. भारत का पारम्परिक शत्रु और इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान एक मूर्ख और अक्षम देश साबित हो चूका है. इस देश ने पिछले दशकों में कई आत्मघाती कदम उठाये हैं, ठीक किसी आत्मघाती हमलावर की ही तरह, जो विस्फोट में खुद को उड़ाकर यह भ्रम रखता है कि जन्नत में उसे कई हूरों के दर्शन होंगे. शीत युद्ध के समय और उसके बाद के काल में अमेरिका के चंगुल में यह देश रहा है. किन्तु सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका की सक्रियता इस देश में धीरे-धीरे कम हुई है और चीन की उतनी ही तेजी से बढ़ी है. थोड़ा अतिश्योक्ति से कहा जाय तो ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका, चीन को भारतीय उपमहाद्वीप में अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाने की खुली छूट दे चूका है. रणनीतिक लिहाज से ऐसा करना अमेरिका की मजबूरी भी हो सकती है. आखिर, वह भारत, पाकिस्तान या चीन के आपसी पचड़े में अपना नुक्सान क्यों करे? उसके आर्थिक हित जितने भारत के साथ हैं, उतने ही चीन के साथ. आखिर, एप्पल आईफोन की बिक्री पूरे विश्व में सर्वाधिक चीन में होने का रिकॉर्ड बना है. इसके साथ-साथ अमेरिका का चेहरा इस्लाम-विरोधी न बने, इसलिए पाकिस्तान का महत्त्व भी उसके लिए समाप्त नहीं हुआ है. अब उसने इन तीनों देशों के साथ एक सामान रणनीति अपना रखी है. भारत के नीति-निर्माता इस बात का भ्रम पाले बैठे हैं कि अमेरिका की वैश्विक गद्दी खतरे में है, इसलिए वह चीन के विरुद्ध भारत का खुलकर साथ देगा, जबकि यह सोचना सिरे से गलत है. न तो अमेरिका की सुपर-पावर स्टेटस पर कोई खतरा है और चीन अकेले तो क्या, रूस और भारत इत्यादि जैसे एशियाई गुट एक होकर भी पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ काम करें तो भी उस पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला. न तो आर्थिक रूप से, न सामाजिक रूप से और न ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से. चीन और भारत समेत एशियाई देश अभी कई मानकों पर बेहद पिछड़े हैं. यही कारण है कि उनके सामाजिक, राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक मुद्दे बेहद उलझी हुई स्थिति में हैं. ऐसे में वह वैश्विक नेतृत्व कहाँ से करने लगे? चीन में आतंरिक लोकतंत्र और लगभग सभी पड़ोसियों से दुश्मनी की स्थिति उसके वैश्विक चेहरे को झूठा साबित करती है, वहीं भारत की स्थिति भी कमोबेश यही है, सिवाय लोकतंत्र के. क्या कभी आपने कनाडा और अमेरिका के बीच राजनैतिक या दूसरी किसी बड़ी समस्या के बारे में सुना है? या फिर अमेरिका और मेक्सिको के बीच? या फिर उसके सहयोगी यूरोपीय राष्ट्रों के बीच? सच तो यह है कि अमेरिका की वैश्विक राजनीति और उसकी लॉबिंग इतनी मजबूत है कि जी-20 के सिडनी सम्मलेन में वह रूस जैसे मजबूत देश के राष्ट्राध्यक्ष पुतिन की खुलेआम बेइज्जती कराता है और कभी शीर्ष वैश्विक ताकत रह चुके रूस को सम्मलेन बीच में छोड़कर भागना पड़ता है. अमेरिका के इस सहित दुसरे तमाम वैश्विक क़दमों का विरोध करने का साहस चीन में भी नहीं है. हाँ! इतना जरूर है कि वह भारतीय उपमहाद्वीप में अपना प्रभाव बढ़ाने को लेकर अमेरिका को नजरअंदाज करने की स्थिति में पहुँच चुका है. अमेरिका का भी इस क्षेत्र में तनाव बना रहे, इसी में आर्थिक और वैश्विक हित छुपा हुआ है. इसीलिए राजनीति के नियमानुसार अमेरिका अभी चीन और भारत के बीच तनाव को और बढ़ावा देने वाला ही है. इस पूरे परिदृश्य में भारतीय नेतृत्व आज़ादी के बाद से ही बेबश रहा है, विशेषकर चीन के सन्दर्भ में. वस्तुतः भारत-पाकिस्तान विवाद और चीन के साथ 1962 की जंग ने भारतीय कूटनीति के लिए वैश्विक स्तर पर बहुत गुंजाइश छोड़ी ही नहीं है. इस बीच में भारत के ढुलमुल लोकतंत्र और स्वार्थपरक राजनीति ने उसके आर्थिक, सामाजिक, सैन्य और वैज्ञानिक प्रगति की संभावनाओं को पीछे ही धकेला है, जबकि इस दरम्यान चीन के सख्त सरकारी तंत्र ने इन मामलों में बेहद प्रगति करने में महत्वपूर्ण रोल अदा किया है. हालाँकि, भारतीय लोकतंत्र ने उसे शेष विश्व के साथ जोड़ा जरूर है, किन्तु दुःख की बात यह है कि शेष विश्व से हम एकतरफा संवाद ही कर पाये हैं और अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों ने हमारी क्रीम 'मानव संसाधन' का अपने लिए, बेहद चालाकी से इस्तेमाल ही किया है. प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के सम्बन्ध में चाहे जो भी कहा जाय, किन्तु यह तय है कि हाल-फिलहाल भारत और चीन आपस में लड़ते ही रहने वाले हैं. इसमें सर्वाधिक फायदा अमेरिका का है और वह भारत का साथ कतई नहीं दे सकता, यह भी लगभग तय है. इस कड़ी में वगैर लॉग-लपेट के कहा जा सकता है कि भीषण आर्थिक और सामाजिक प्रगति के साथ उच्चतम वैज्ञानिक प्रगति के वगैर चीन से मुकाबला कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है. अब प्रश्न यह है कि क्या मेहनतकश (?) भारतीय और भारतीय राजनीति इस मुकाबले के लिए तैयार है या वह व्यक्तिगत सक्षम होते ही अमेरिका और दुसरे यूरोपियन कंट्री में पलायन का दौर जारी रखेगी और राजनेता, स्वार्थप्रेरित राजनीति को जारी रखकर सामाजिक प्रगति को नुक्सान पहुंचाते रहेंगे या उनकी नीति बदलेगी? हालाँकि, वर्तमान भारतीय नेतृत्व ने कुछ आस जरूर जगाई है, किन्तु यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है. यकीन मानिये, यदि इन प्रश्नों से पार पा लिया गया तो न सिर्फ चीन के साथ, बल्कि शेष विश्व के साथ भी संबंधों में हम 'अँधेरे में तीर' चलाने वाली कूटनीति से पार पा जायेंगे.

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