किसानों के साथ हमदर्दी या दिखावा देश के लिए घातक - Sympathy or something else with Indian Farmers


भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी को अगर किसी मुद्दे पर सरदर्द हुआ है तो वह निश्चित रूप से किसानों की बदहाली का ही मसला है. यदि यह बात कही जाए कि किसानों की यह हालत कोई एक दिन में नहीं हुई है तो कोई गलत नहीं होगा, किन्तु इसके साथ यह भी उतना ही सच है कि किसानों के मसले पर अपने एक साल के कार्यकाल में मोदीजी ने ध्यान नहीं दिया है. एक बार वह रेडियो पर बहुचर्चित 'मन की बात' में किसानों से मुखातिब जरूर हुए, लेकिन जिन्होंने वह प्रोग्राम सुना होगा वह जान गए होंगे कि उसमें कोरे दिलासे और घुमावदार बातों के अतिरिक्त कुछ नहीं था, बल्कि उल्टे 'भूमि-अधिग्रहण' के मुद्दे पर मोदी किसानों की चिंताओं का समाधान करने के बजाय उसमें उलझते ही जा रहे हैं. यह तो रही सरकार की बात, किन्तु अपनी बहुचर्चित छुट्टी से लौटे राहुल गांधी किसानों के मुद्दे पर खूब शोर मचा रहे हैं. अपने शस्त्रागार से राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए एक से बढ़कर एक हथियार निकाल रहे हैं. कभी कांग्रेस में ही रहे वर्तमान में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव को 'मिनी मोदी' कहते हुए राहुल ने अपनी तेलंगाना यात्रा के दौरान आरोप लगाया कि मोदी की तरह केसीआर भी किसानों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. राहुल ने अपनी हमदर्दी
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 सीरीज के अगले एपिसोड में कहा कि, 'जब ओलों, तूफानों और बेमौसम बारिश से किसान तबाह थे तब मोदीजी उनसे मिलने नहीं गए, तेलंगाना में 'मिनी मोदी' भी किसानों की बदहाली देखने नहीं गए.' अब भला कांग्रेस के युवराज को कौन समझाए कि पिछले 60 साल के दौरान उनकी पार्टी और उनके परिवार ने ही देश को नियंत्रित किया है और यदि किसानों की यह हालत है तो उसकी वास्तविक जिम्मेवारी के उत्तराधिकारी भी वही हैं. खैर, उनकी बेचैनी समझी जा सकती है. बिचारे की पार्टी तो सत्ता से बाहर है ही, उससे ज्यादा उन्हें अपने ऊपर लगी 'पप्पू' की इमेज से छुटकारा पाना ज्यादा जरूरी लगता है, लेकिन इस हमदर्दी और दिखावे के बीच किसानों की समस्याओं का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है. देश में अभी भी सर्वाधिक रोजगार देने वाले कृषि-क्षेत्र की हालत बद से बदतर होती जा रही है. देश के आम-ओ-खास सबने, मन ही मन यह मान लिया है कि खेती अब घाटे का ही सौदा है. हमारे देश के प्रधानमंत्री भी इस बात को मन ही मन स्वीकार कर चुके हैं, शायद इसीलिए वह 'मेक इन इंडिया' को लेकर उत्तेजना की हद तक छटपटा रहे हैं, जबकि किसानों की समस्याओं से उनकी सरकार ने पुराणों के रूख पर चलते हुए मुंह मोड़ रखा है. प्रश्न यह है कि यदि कृषि घाटे का सौदा बन चुकी है, तो उस पर अध्ययन कराकर यह सरकार एक श्वेत-पत्र क्यों नहीं जारी करती है कि किसान भाइयों! अब खेती छोड़ दो, क्योंकि इसमें तुम्हारी आजीविका और भविष्य नहीं है. इस घोषणा के साथ यह सरकार यह हल भी दे कि कृषि के बदले किसान भाइयों को 'मेक इन इंडिया' या इस जैसे अन्य 'स्किल-डेवलपमेंट' अभियानों में ही रोजगार मिलेगा. यहाँ दो बातें निकलती हैं, जिसे दुहराना जरूरी है कि यदि खेती घाटे का सौदा है तो 60 करोड़ से ज्यादा किसानों से उसे छोड़ने के लिए सरकार स्पष्ट कहे और उन सभी को दूसरी जगह एडजस्ट करे. आंकड़े सुनकर आप चौंक जरूर जायेंगे, किन्तु क्या किसी प्रोग्राम में इतनी कूवत है कि वह किसानों को किसी और क्षेत्र में एडजस्ट कर सके? तो इसका साफ़ जवाब है- नहीं!

तो फिर यह बड़ा क्षेत्र अनदेखा क्यों? एक तरफ विदेशी-संबंधों को मजबूत करने के लिए विश्व में शायद नरेंद्र मोदी सर्वाधिक सक्रीय राजनेता हैं और उद्योग-धंधे लगाने के लिए तमाम उद्योगपतियों, सरकारों से बातचीत भी कर रहे हैं, किन्तु कृषि-क्षेत्र को लेकर उनकी नीतियों में 'शून्यता' क्यों है, इस बात का जवाब ढूंढें नहीं मिलता है. क्या अपनी विदेश-यात्राओं में प्रधानमंत्री देश की कृषि में भी इन्वेस्टमेंट और वैज्ञानिकता को आमंत्रित कर रहे हैं, या उन पर लगा यह आरोप कुछ हद तक सच है कि वह उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं. लगता है गुजरात के विकास और समृद्धि की क्रेडिट लेने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने वहां की समृद्धि के कारणों को ठीक से समझा नहीं है, अन्यथा वहां डेयरी-उद्योग और सहकारी व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने के लिए कोई मेक इन इंडिया जैसा ही 'रिवाईव द एग्रीकल्चर' जैसा कोई अभियान छेड़ते, जिसमें किसानों का हित निश्चित होता. किसानों की समृद्धि के लिए क्या सरकार अपने स्तर पर और व्यापारियों पर दबाव बनाकर कालाबाजारी पर लगाम नहीं लगा सकती है अथवा सप्लाई-चेन को दुरुस्त करने का मजबूत फैसला क्यों नहीं ले सकती है. लघु-उद्योग और स्वदेसी के पैरोकार बाबा रामदेव भी शायद मोदी महाशय को समझा नहीं पा रहे हैं कि जैसे उनके पतंजलि ने मार्केटिंग और पैकिंग से लम्बा-चौड़ा साम्राज्य खड़ा किया है, वैसी पैकिंग और मार्केटिंग यूनिट, किसानों के लिए प्रत्येक जिले में क्यों नहीं स्थापित की जा सकती है, जो किसी मैगी, कुरकुरे, पेप्सी इत्यादि को टक्कर दे सके. स्किल डेवलपमेंट पर ज़ोर देने वाले प्रधानमंत्री कृषि से सम्बंधित विशिष्ट पाठ्यक्रमों को शुरू करने की सम्भावना पर विचार क्यों नहीं कर सकते. वैसे भी उनकी टीम पर शिक्षा में भगवाकरण करने का आरोप लगता ही रहता है तो वह क्यों नहीं विश्वविद्यालओं के पाठ्यक्रमों में कृषि और उनके उत्पादों से सम्बंधित विषय शुरू कराने की पहल करते हैं. आखिर, सर्व शिक्षा अभियान या पल्स-पोलियो की तरह ऐसा कोई अभियान क्यों नहीं चलाया जा सकता, जिसमें युवा पीढ़ी का कुछ भाग ही सही, कृषि-क्षेत्र में अपना भविष्य 
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देखे. आखिर, आज ऐसे कितने रिसर्च संस्थान हैं या प्राइवेट इंस्टिट्यूट हैं जो कृषि पर रिसर्च करते हैं. यदि यह सारा कार्य मोदी सरकार नहीं कर सकती तो नई दिल्ली स्थित आरपीजी फाउंडेशन थिंक टैंक के अध्यक्ष डी.एच.पाई का आंकलन सही होगा, जिसमें उन्होंने कहा है कि, 'ऐसी धारणा बन रही है कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में पैदा संकट से निपटने के लिए बहुत ही धीमी प्रतिक्रिया दे रही है. स्थिति से सही ढंग से अगर नहीं निपटा गया तो संकट पैदा होगा और आर्थिक सुधारों की योजना पर पानी फेर देगा.' हालांकि भारत की 2000 अरब डॉलर की इकॉनमी में कृषि क्षेत्र का हिस्सा महज 15 फीसदी ही है, लेकिन इससे हिंदुस्तान के 60 फीसदी लोगों को आजीविका मिलती है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा. एक साल पहले मोदी सरकार ने जिस विपक्षी कांग्रेस पार्टी को बुरी तरह शिकस्त दी थी और इस शिकस्त के बाद कांग्रेस पार्टी राजनीतिक पटल से करीब-करीब गायब हो गई थी अब कांग्रेस पार्टी के युवराज इसका फायदा उठाने में जी-जान से जुट गए हैं. लेकिन, राजनैतिक असर से ज्यादा नुक्सान समग्र भारत के विकास पर पड़ना तय है और यदि किसानों की समस्याओं को समय रहते हल करने की कोशिश नहीं की गयी, तो भारत शायद 'तीसरी दुनिया का देश' ही बना रहेगा और पश्चिमी देश उसके राजनीतिक, व्यापारिक और सामाजिक कर्णधारों पर हँसते रहेंगे और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के माध्यम से कहते रहेंगे कि देखो! यह भारत का नेता है, उद्योगपति है, जहाँ 40 करोड़ लोग एक समय भूखे सोते हैं या वह यह कहकर इन आकाओं को शर्मिंदा करेंगे कि इस गरीब देश में लोग आजीविका के लिए हज़ारों की तादात में आत्महत्या करते हैं. फिर, प्रधानमंत्री जी! आप देश को सुपर-पावर बनाते रहिएगा और काला चश्मा पहनकर चीन की टेराकोटा आर्मी को निहारते हुए गौरवान्वित होते रहिएगा, उससे असली भारत या किसानों को भला क्या फर्क पड़ेगा!!
Sympathy or something else with Indian Farmers
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