पानी रे पानी


पानी की महत्ता से भला कौन परिचित नहीं. चाहे शहरों में रहने वाले धनाढ्य वर्ग के लोग हों अथवा गाँव में रहने वाले किसान, सबके जून के महीने में जब तड़तड़ाती हुई गर्मी पड़ रही हो, तो पानी की किल्लत की खबरें विभिन्न जगहों से आती हैं. कई बार यह खबरें दुखी कर देती हैं, तो कई बार इनमें से प्रेरणा का भी जन्म होता है. इसी प्रकार की एक खबर झारखण्ड से पढ़ने को मिली. देश के अन्य भागों की तरह झारखंड के गढ़वा में भी  भीषण गर्मी पड़ रही है. यहां के सगमा प्रखंड की पंचायत कटहर कलां का एक गांव है पश्चिम टोला. इस टोले की पंचायत ने पानी की किल्लत से निबटने के लिए रोज़ाना नहाने पर पाबंदी लगा दी है. इस गांव में उरांव आदिवासियों के 80 घर हैं, जबकि गाँव में क़रीब 300 लोग रहते हैं. पानी के लिए पूरे गांव की निर्भरता सिर्फ दो हैंडपंपों पर है. कभी यहाँ 19 कुएं थे लेकिन अब वो सारे सूखे पड़े हैं. गाँव के बाशिंदों में हो रही रोज की लड़ाई से से निपटने के लिए बुजुर्गों की पंचायत में फैसला हुआ कि लोगों को रोज़ नहाने से रोका जाए. पंचों ने अपने व्यवहारिक निर्णय में कहा कि पहले हर घर में पर्याप्त पानी पहुंच जाए, ग्रामीणों और मवेशियों को पानी मिलने लगे. इसके बाद ही नहाने की बारी आएगी. इसकी निगरानी के लिए बाक़ायदा एक कमेटी भी बना दी गयी, साथ ही साथ रोज़ नहाने की कोशिश करने पर आर्थिक दंड का प्रावधान भी कर दिया गया. देखा जाय तो इस प्रकार की खबरें, आने वाले समय में पानी की किल्लत को जबरदस्त तरीके से रेखांकित करती हैं.इसी सन्दर्भ में देश की राजधानी दिल्ली का ज़िक्र करना सामयिक होगा, जहाँ जल माफिया की सक्रियता अपने चरम पर है. पानी के टैंकरों के लिए विभिन्न कालोनियों में किस प्रकार से लोग लड़ते हैं, आपको इससे सम्बंधित दृश्य हर रोज कहीं न कहीं देखने को मिल जाएगा. इसके अतिरिक्त बोतलबंद पानी की कालाबाजारी किस तरह से जोर पकड़ रही है, यह बात कोई छुपी हुई नहीं है. बोतलबंद पानी से आम जनमानस पर न सिर्फ आर्थिक बोझ पड़ रहा है, बल्कि रसायनों के घालमेल से कई तरह की बीमारियां भी लोगों को जकड रही हैं. यह बात कई अध्ययनों में साबित भी हो चुकी है. पीने के पानी की समस्या से मुंह मोड़कर सरकार एक तरह से जल माफियाओं को प्रोत्साहन ही दे रही है, जिनको पानी की किल्लत से करोड़ों-अरबों बनाने का मौका मिल रहा है. जल-संरक्षण और नदियों के पुनर्जीवन के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले जलपुरुष राजेंद्र सिंह इस समस्या के खिलाफ पिछले तीस सालों से लड़ रहे हैं, लेकिन उनके उपायों और प्रयासों को लेकर जन-जागृति फैलाया जाना बाकी है. हालाँकि, इस बार केंद्र सरकार ने नदियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन जब तक जल संरक्षण के विभिन्न उपाय, जल माफिया पर लगाम कसने के उपाय सहित दुसरे उपाय नहीं किये जाते हैं, तब तक झारखण्ड के गढवा जैसी समस्याएं सामने आती ही रहेंगी और हो सकता है कि जल को लेकर कोई बड़ा युद्ध ही हो जाय. शहरों में पीने के पानी से हटकर सोचा जाय तो, गाँव में किसान फसलों की सिंचाई के लिए आसमान की ओर देखते रह जाते हैं. इस समय धान के बीज खेतों में डाले जाने का समय है, किन्तु बरसात की अनहोनी आशा का संचार करेगी अथवा नहीं, इस बात पर कोई निश्चित बात नहीं कही जा सकती. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में ही नदियों को जोड़ने की शुरुआत करने की कोशिश हुई, लेकिन वह योजना ठन्डे बस्ते में धुल फांक रही है. ऐसे में कहीं बाढ़, कहीं सूखा आना स्वाभाविक ही है. सरकार से हटकर यदि आम जनमानस में जागरूकता की बात की जाय तो यहाँ भी निराशा ही हाथ लगती है. पीने के पानी को छोटे-छोटे प्रयासों से हम कितना बचा सकते हैं, यह बात स्कूल के प्रोजेक्ट में बच्चे तक जानते हैं, लेकिन उस पर अमल शायद ही होता हो. किचेन में, बाथरूम में, गाड़ी धोने में हम सावधानी से पानी का प्रयोग कर जल की बचत अवश्य ही कर सकते हैं. शहरों में कई लोग अपने घर के बाहर पानी के पाइप लगाकर बाकायदा पानी बर्बाद करते हैं, जिसे देखकर गहरा दुःख होता है. जरूरत है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकारी प्रयासों के साथ आम जनमानस भी पानी बचाने और उसका सदुपयोग करने की दिशा में आगे बढे, और झारखण्ड में गढवा के लोगों ने इस सन्दर्भ में सही उदाहरण पेश किया है.

लिए ही पानी एक समान रूप से आवश्यक है.
Water conservation article in hindi by mithilesh2020

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