लोढ़ा कमिटी के फैसले का मतलब क्या?

देश में यदि पिछले कुछ सालों में सर्वाधिक चर्चित टॉपिक्स को ढूँढा जाय तो उनमें निश्चित रूप से 'इंडियन प्रीमियर लीग' भी शामिल होगा. ललित मोदी से लेकर लोढ़ा कमिटी तक और धोनी से लेकर गावस्कर के रास्तों से होते हुए यह आईपीएल राजीव शुक्ला, शरद पवार और अरुण जेटली तक को खुद में समेटे हुए है. इससे जुड़ी सकारात्मक खबरें तो कम हैं, किन्तु नकारात्मक मुद्दों की संख्या कहीं ज्यादे है. सकारात्मक खबर के रूप में आप देश में प्रतिभावान खिलाडियों के विकास को मान सकते हैं, साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर क्रिकेट में भारत की बादशाहत को शामिल कर सकते हैं तो नकारात्मक रूप में सबसे बड़ी खबर इस पर स्पॉट फिक्सिंग का गहरा दाग लगना है. इससे सम्बंधित लोढ़ा कमिटी ने आईपीएल के 2013 सेशन से जुड़े सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग मामले में दो फ्रैंचाइजी टीमों-चेन्नै सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स को दो साल के लिए टूर्नामेंट से निलंबित करने की सिफारिश क्या की, क्रिकेट जगत में तूफ़ान आ गया. इसके साथ चर्चित और शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा और आईसीसी के अध्यक्ष श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन भी आजीवन बैन हुए हैं, परन्तु इनका बैन होना क्रिकेट जगत के लिए उतनी चिंता की बात नहीं है, जितनी आईपीएल की साख! राज कुंद्रा ने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया भी दे दी कि उनके खिलाफ सबूत न होने के बावजूद उन्हें दोषी करार दे दिया गया और वह निर्दोष हैं. हालाँकि, इसके विपरीत इस जांच की विश्वसनीयता क्रिकेट के बड़े दिग्गज सुनील गावस्कर ने साबित करते हुए कहा कि लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों पर शक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें एक से अधिक वरिष्ठतम न्यायाधीश जुड़े हुए हैं. वैसे गावस्कर महेंद्र सिंह धोनी और 'आईपीएल-ब्रांड' को लेकर ज्यादे चिंतित थे, इसलिए उनकी प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार थी, आईपीएल में वह ताकत है कि वह इन सब विवादों से निकल जाएगा लेकिन धोनी के बगैर आईपीएल की कल्पना करना बहुत कठिन है. उम्मीद है कि यह मुद्दा जल्द सुलझ जाएगा और आईपीएल के बगैर धोनी की कल्पना करना, उसी तरह है जैसे धोनी के टॉप करियर के समय उसके बिना इंडियन टीम की कल्पना करना. इसके अतिरिक्त कुछ और रोचक बयानों पर गौर करना दिलचस्प रहेगा, जिनमें आईपीएल के कमिश्नर राजीव शुक्ला ने बड़े विश्वास से कहा कि वह हमेशा आइपीएल को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं और इसलिए आईपीएल का अगला संस्करण और भी बड़ी सफलता हासिल करेगा, क्योंकि आइपीएल एक मजबूत टूर्नामेंट है और ये फैसला (टीमों का निलंबन) आइपीएल को एक उत्पाद के तौर पर नुकसान नहीं पहुंचा सकता. क्या गजब का विश्वास है शुक्ला साहेब का! इसकी दाद तो देनी ही चाहिए, किन्तु दुःख की बात यह है कि शुक्ला साहेब यही विश्वास पहले क्यों नहीं व्यक्त कर पाये और 'फिक्सिंग-प्रकरण' को घटित होने से रोक क्यों नहीं पाये? यदि स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आ भी गया तो उन्होंने अपने स्तर से जांच करके पहले ही यह कार्रवाई क्यों नहीं कर दी, जिससे भारतीय क्रिकेट कम से कम शर्मसार होने से तो बच जाता और आईपीएल का ब्रांड भी अक्षुण्ण बना रहता, बल्कि उसमें बृद्धि ही होती. लेकिन, इन प्रशासकों की बेशर्मी देखकर यही प्रतीत हो रहा है कि बहुत कुछ बदलाव आने वाला है नहीं, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल के चेयरमैन पद पर एन श्रीनिवासन जमे हुए हैं, तो दूसरी ओर बीसीसीआई, लोढ़ा कमिटी की रिपोर्ट से सीख लेने की बजाय, फैसलों पर लीपापोती करने में लग गयी है. मीडिया ख़बरों के अनुसार इस 'लोढ़ा प्रतिबन्ध' के प्रभाव से बचने के लिए, बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है, जिसमें विचार चल रहा है कि बीसीसीआई दो साल तक दो टीमों को चला सकता है और प्रतिबंध काल समाप्त होने के बाद मूल मालिक वापसी कर सकते हैं. दूसरा विकल्प दो नई टीमों के लिए नई सिरे से बोली लगाना है क्योंकि कई कॉर्पोरेट्स ने आईपीएल टीम खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है. इसके अतिरिक्त बीसीसीआई की उलझन इस बात को भी लेकर है कि प्रसारक मल्टी स्क्रीन मीडिया के साथ उसका करार 60 मैचों के कार्यक्रम को लेकर है, और वगैर आठ टीमों के हुए यह पूरा हो नहीं सकता, इसलिए आठ टीमों की बहाली सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इस पूरी गहमागहमी में सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट के 'कारोबारी मॉडल' की ओर देखा जा रहा है, जबकि इसके नैतिक और राष्ट्रीय पहलू को हमेशा की तरह तिलांजलि दे दी गयी है. प्रश्न जस का तस है कि देश में धर्म कहा जाने वाले क्रिकेट क्या सिर्फ बिकाऊ 'कारोबार' ही रहेगा या इसकी हालत परिवर्तित हो सकती है? जगमोहन डालमिया से लेकर एन श्रीनिवासन, शरद पवार और तमाम दुसरे राजनेता आखिर इसके राष्ट्रीय स्वरुप से मुंह क्यों मोड़ रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि 'बीसीसीआई' में 'भारत' शब्द के इस्तेमाल होने से और 'टीम इंडिया' कहे जाने से इस संस्था पर राष्ट्रीय हक़ आप ही साबित हो जाता है, इसलिए यदि इस पर रंच मात्र भी दाग लगता है तो यह सीधे सीधे राष्ट्रीय सम्मान को ठेस पहुँचाने जैसा बन जाता है. प्रश्न सिर्फ आईपीएल का ही हो तो बात कुछ और होती, लेकिन प्रश्न तो यहाँ क्रिकेट की अकूत सम्पदा का है, जिसे 'देश' का नाम इस्तेमाल करके इकठ्ठा किया गया है, लेकिन उसका उपयोग कुछ व्यवसायी, राजनेताओं की सहभागिता से बखूबी कर रहे हैं. शायद इसीलिए, पिछली सरकार में खेल मंत्री ने क्रिकेट को भी 'खेल मंत्रालय' के तहत लाने की राय व्यक्त की थी. हालाँकि, उनकी उस राय को मजबूत क्रिकेट लॉबी के सामने भला कितनी देर टिकना था! लोढ़ा कमिटी द्वारा आईपीएल पर जो रिपोर्ट आयी है, यदि उसकी ऐसी ही मनमानी और कारोबारी व्याख्या ही की जाती रही तो इस खेल को खेल मंत्रालय के आधीन लाने पर विचार करना जरूरी हो जायेगा! कम से कम सरकारी मंत्रालय में घोटालों पर जनता जवाब तो मांग सकेगी और यह आरटीआई के आधीन तो आ सकेगा, क्योंकि अभी तो यह बीसीसीआई और आईपीएल किसी के प्रति जवाबदेह दिखता नहीं है... या है .... ? यदि हाँ! तो लोढ़ा कमिटी के फैसले को उसी सन्दर्भ में ले, जिस सन्दर्भ में यह फैसला दिया गया है और न सिर्फ आईपीएल से बल्कि, पूरे क्रिकेट से भ्रष्टाचार को दूर करने का गंभीर प्रयत्न करे.
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