कांग्रेसियों की सलाह लें राहुल, जब तक ...

राजनीति में राहुल गांधी ने कुछ बड़ा किया हो या नहीं, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत के सबसे चर्चित राजनीतिक हस्तियों में शामिल रहे हैं. अपने ऊपर लगे निष्क्रियता के आरोपों को उन्होंने अपनी सक्रियता से काफी हद तक कम भी किया है. आखिर, 44 सांसदों के बल पर एक पूर्ण बहुमत की सरकार के खिलाफ सदन की कार्रवाई का एक पूरा सत्र रोके रखना कोई मामूली बात तो है नहीं. खैर, कई दिनों से संसद में हो रहा व्यवधान अब एक मुकाम की ओर बढ़ता नजर आ रहा है. पहले सुलह और बातचीत की गुंजाइश ढूंढ रही भाजपा ने सुषमा स्वराज के नेतृत्व में कांग्रेस पर जोरदार हमला किया है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस का क्लीन-बोल्ड होना भी कह रहे हैं. ललितगेट मुद्दे पर लगे आरोपों का संसद में जवाब देते हुए स्वराज ने कहा कि ‘‘राहुलजी को शौक है छुट्टियां मनाने का और इस बार यदि वह छुट्टी मनाने विदेश जाएं तो एकांत में अपने परिवार का इतिहास पढ़ें. क्वात्रोच्चि और बोफोर्स घोटाला से लेकर शहरयार (गांधी परिवार के कथित मित्र) तक अपने परिवार के काले कारनामों के बारे में भी जानकारी ग्रहण करें. ...और अपनी मां से जरूर पूछें कि मम्मा! क्वात्रोच्चि मामले में हमने कितना पैसा लिया था? मम्मा! 15 हजार लोगों के हत्यारे एंडरसन (भोपाल गैस त्रासदी के गुनहगार) को डैडी ने क्यों छुड़वाया था?’ राहुल गांधी की हालिया सक्रियता के बाद भाजपा द्वारा किया गया यह सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है. इस हमले से कांग्रेस अभी सकते में ही थी कि अरुण जेटली ने राहुल पर हमले की अगली कड़ी पेश करते हुए कहा कि राहुल के आरोप न केवल तर्कहीन हैं, बल्कि वह 'एक्सपर्ट विदाउट नॉलेज' हैं. देखा जाय तो एक्सपर्ट विदाउट नॉलेज का टर्म राहुल गांधी पर फिट भी बैठता है. इस बात में कोई शक नहीं राहुल गांधी ने अपने ऊपर लगे 'पप्पू' के तमगे से छुटकारा पाने के लिए काफी प्रयत्न किया है. वह न केवल सक्रिय दिखने का प्रयत्न कर रहे हैं, बल्कि कई जगह पर कांग्रेस को फ्रंट फुट से लीड भी करते दिख रहे हैं. इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहीRahul gandhi super activeness is harmful for congress, hindi article by mithilesh कांग्रेस में अपने नेता को सक्रीय देख कुछ साहस का संचार जरूर होता होगा, मगर विरोध कहाँ करना है और कितना करना है, किसलिए करना है और किसलिए चुप रहना है, इसकी राजनीतिक समझ से कांग्रेसी युवराज कोसों दूर दिखते हैं. समय के साथ शायद उनमें इसकी समझ आये, किन्तु वर्तमान में उनकी अति सक्रियता और ज़िद्द कांग्रेस को लगातार नुकसान ही पहुंचा रही है. सुषमा स्वराज के मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा अति विरोध और इस्तीफे की मांग के चलते संसद को लगातार ठप्प करने से न केवल जनमानस में कांग्रेस विरोध मजबूत हो रहा है बल्कि सपा, तृणमूल, जदयू, राजद जैसी पार्टियों ने भी कांग्रेस के इस रूख की खुलेआम आलोचना की है. मुलायम सिंह यादव द्वारा कांग्रेस का साथ छोड़ देने की धमकी के बाद भी राहुल गांधी टस से मस नहीं हुए और उन्होंने विरोध की चिल्लाहट को जारी रखना ठीक समझा. नतीजा यह हुआ कि भाजपा के नेता कांग्रेस का कच्चा-चिटठा खोलने को मजबूर हो गए. यह कच्चा चिटठा ललित मोदी के देश से भागने से लेकर क्वात्रोची और एंडरसन के रास्ते आगे तक भी पहुंचेगा, इस बात की सम्भावना बढ़ गयी है. कांग्रेस चाहे जितना शोर मचाये, किन्तु सच यही है कि उसने सुषमा स्वराज पर लगे आरोपों के साथ साथ राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के शिवराज पर व्यापम के छींटे से मिलने वाले राजनीतिक माइलेज को बड़ा नुकसान पहुँचाया है. जिस दिन कांग्रेस के 25 सांसद सदन से बर्खास्त किये गए, उसके अगले दिन का अखबार उठकर आप देख Rahul gandhi super activeness is harmful for congress, hindi article by mithilesh kumar singhलीजिये, अधिकांश में आपको कांग्रेस के अति विरोध के खिलाफ ही लिखावट मिलेगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अपने अध्ययन को जारी रखेंगे, जिससे वह एक्सपर्ट बन कर अरुण जेटली के आरोपों का जवाब दे सकें और तब तक कांग्रेस के दुसरे विशेषज्ञों की सहायता लेकर कांग्रेस को और कमजोर होने से बचाने की परिपक्वता का परिचय देंगे. आखिर, कांग्रेस में राजनीतिक धुरंधरों की कमी थोड़े ही है, जो राहुल इतने घबराये हुए हैं...  !! इस मामले में यह बात उद्धृत करनी आवश्यक है कि कांग्रेस द्वारा विरोध करना अलग बात है और अपने लिए जनता में विश्वास पैदा करना बिलकुल अलग बात. कांग्रेस के राहुल गांधी को यदि सचमुच अपनी पार्टी की खोयी ज़मीन वापस पानी है तो उन्हें इन दोनों मुद्दों पर अलग-अलग प्रयत्न करना होगा. अभी हालत यह है कि भाजपा से जनता नाराज हो या खुश, लेकिन हालिया कांग्रेसी शासनकाल से जनता की नफरत दूर नहीं हुई है. जनता को अभी २-जी, कोयला और कामनवेल्थ घोटाले जैसी शब्दावलियाँ बड़ी साफ़ याद हैं. इन सब बातों को लेकर कांग्रेस उस कबूतर की तरह व्यवहार न करे, जो बिल्ली को देखकर आँखें मूँद लेती है, बल्कि वह इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अपनी विश्वसनीयता के थोड़े हिस्से को ही पाने का दोबारा प्रयत्न करे और वह निश्चित रूप से 'एक्सपर्ट विदाउट नॉलेज' से नहीं होगा. सुन रहे हैं न राहुल जी ... !!
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