कानून का 'विशिष्ट' मजाक

कानून की जिम्मेवारी जिनपर सबसे ज्यादा होती है, अगर वही कानून का उल्लंघन करने पर उतारू हो जाएँ तो कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि हमारी सामाजिक संरचना पर उसका क्या फर्क पड़ेगा! आखिर, कानून कोई आसमान से उतरी हुई किताब तो है नहीं कि आम लोग उसे ईश्वरीय आदेश मानकर उसका पालन करेंगे, बल्कि यह तो लोकतंत्र की लोकलाज पर आधारित संरचना है, जिसका पालन सभी को करना होता है. दिलचस्प बात यह है कि ऐसी कोशिशों में पहला नाम आता है उच्चतम न्यायालय के रिटायर्ड एवं बहुचर्चित न्यायाधीश श्रीमान मार्कण्डेय काटजू साहब का. यूं तो काटजू साहब तमाम विवादों में घिरते ही रहते हैं, लेकिन इस बार उनका प्रयास कानूनी वैधता से ज्यादा कानून के लोकलाज से चलने के ऊपर ही ऊँगली उठाता है. संजय दत्त निश्चित रूप से एक लोकप्रिय अभिनेता हैं और उनको सजा मिलने के दौरान भी इस बात पर तमाम चर्चा हुई थीं. लेकिन, एक बार कानून के तहत जब उनको सजा मिल गयी तो उसकी आलोचना या उसके विरुद्ध बार-बार प्रयास करना कानून के प्रति अनास्था ही सिद्ध करता है. पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने अपनी याचिका में महाराष्ट्र के राज्यपाल से अपील की थी कि संजय दत्त को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत माफ कर दिया जाये. इस माफ़ी के लिए उन्होंने संजय दत्त द्वारा भुगती जाने वाली तमाम परेशानियों का ज़िक्र करते हुए, यह सोचना भूल गए थे कि इस देश में कुल कैदियों की 75 फीसदी संख्या ऐसी है, जो अंडर-ट्रायल हैं. इस देश में ऐसे कैदियों की भरमार है, जो बेगुनाह होते हुए भी अच्छी कानूनी सुविधाओं के अभाव में जेलों में सड़ रहे हैं ... इस भरोसे पर कि कानून अंततः उनके लिए न्याय की उम्मीद लेकर आएगा! क्या काटजू जैसे लोगों को अंदाजा भी है कि उनकी ऐसी 'विशिष्ट हरकतों' से कानून की साख को कितना धक्का पहुँच सकता है. हालाँकि, मार्कण्डेय काटजू की याचिका को महाराष्ट्र के राज्यपाल सी विद्यासागर राव ने खारिज कर दिया है, जो कि निश्चित रूप से कानूनी लोकलाज के लिए संजीवनी का कार्य करेगी.
 
इसी कड़ी में दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती भी शामिल हो गए हैं. हाल, फिलहाल उनके कृत्यों से पूरा देश परिचित हो चुका है. यहाँ तक कि उनके करीबी रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप-सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल ने भी उनको सरेआम फटकार लगाते हुए कहा कि 'सरेंडर नहीं करके सोमनाथ भारती अपने परिवार और पार्टी के लिए शर्मिंदगी का कारण बन रहे हैं, उन्हें जेल जाने से डरने की बजाय सरेंडर करना चाहिए'. दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मलीवाल ने भी सोमनाथ भारती को सरेंडर करने की सलाह दी है, लेकिन क्या मजाल जो दिल्ली के इस पूर्व कानून मंत्री और वर्तमान विधायक को कानून के पालन का ज़रा भी ख़याल आया हो. सोमनाथ भारती इनदिनों दिल्ली पुलिस से लुकाछिपी का दिमागी खेल खेलने में दिलचस्पी ले रहे हैं. कभी दिल्ली का कानून मंत्री रहा ये शख्स अब खुद ही कानून के शिकंजे में जकड़ता जा रहा है, और उस पर यह कहावत पूरी तरह फिट बैठ रही है कि 'जाको प्रभु दारुण दुःख दीन्हा, ताकी मति पहले हर लीन्हां'. उनकी पत्नी लिपिका मित्रा द्वारा लगाए गए घरेलू हिंसा के आरोपों के बाद आम आदमी पार्टी का यह सैनिक 'भगोड़ा' सिद्ध हो रहा है. लिपिका ने पुलिस से शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके पति उनसे मारपीट करते हैं और वो जब गर्भवती थीं, तब उनके ऊपर कुत्ता छोड़ देते थे. लिपिका ने अपनी शिकायत में यह भी कहा था कि वह और उनके बच्चे पति सोमनाथ भारती से मानसिक, शारीरिक और मौखिक प्रताड़ना एवं यातना का सामना कर रहे हैं और उनके अपने पति और उनके समर्थकों से उन्हें जान को खतरा है. अपने आरोपों में लिपिका ने आगे यह भी कहा है कि जब वह तीसरी बार गर्भवती हुईं तब भारती ने उन्हें गर्भपात के लिए बाध्य किया और इस तरह के निरंतर उत्पीड़न से परेशान होकर उन्होंने एक बार अपनी कलाई काट लेने की कोशिश की थी. अब जरा सोमनाथ के ऊपर लगे आरोपों की गंभीरता पर गौर कीजिये. पुलिस ने सोमनाथ पर घरेलू हिंसा की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया, जिसमें उन पर धारा 307- जानलेवा हमला, धारा 313- गर्भवती महिला पर हमला, धारा 511- गर्भपात के लिए दबाव, धारा 506- जान से मारने की धमकी, धारा 324- हथियार से मारना, धारा 498 A- पत्नी पर जुल्म ढाना, धारा 406- रिश्ते में धोखाधड़ी, धारा 417- चिटिंग, धारा 420- धोखाधड़ी, धारा 34- आपराधिक नीयत से पीटना आदि लगाई गई है. हालाँकि, इन आरोपों से सोमनाथ के ऊपर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा और उन्हें अपने 'विशिष्ट' अदालती दांव-पेंचों पर पूरा भरोसा था. लेकिन, उनका भरोसा तब टूट गया जब एक के बाद एक अदालतों ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी. सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी उनको कोई राहत नहीं दी है, लेकिन वह लुका-छिपी का खेल बड़े जोश-ओ-खरोश से खेल रहे हैं. दिल्ली पुलिस का यह कहना अपने आप में मामले की गंभीरता बयान करता है कि सोमनाथ भारती पेशेवर अपराधी की तरह व्यवहार कर रहे हैं और लगातार अपनी लोकेशन भी बदल रहे हैं. सवाल यही उठता है कि ऐसी लोगों में आखिर यह हिम्मत कहाँ से आ पाती है कि वह अपने अपराधिक कृत्यों को करने के बाद भी कानून के हाथ से सुरक्षित रह सकते हैं. सोमनाथ भारती जैसों को सहलाने और सपोर्ट करने वालों को इस प्रश्न की जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए.
 
इन दो विशिष्ट मामलों के अलावा हम तीसरे मामले की ओर भी देख लेते हैं, जो देश के एक बड़े उद्योगपति नवीन जिंदल का है. कोयला घोटाले में आरोपी नवीन जिंदल ने अपनी पेशी से छूट मांगने की अपील दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने सही टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के सामने गरीब अमीर सब एक सामान हैं और नवीन जिंदल को सभी सुनवाइयों में खुद उपस्थित रहना पड़ेगा. ख़ुशी की बात यह है कि उपरोक्त तीनों मामलों में कानून ने अंततः सही रूख अपनाते हुए 'विशिष्टता' के भाव को जबरदस्त झटका दिया है, लेकिन इस मानसिकता के लोगों को समझ आएगी या वह कानून का विशिष्ट मजाक बनाने का उपक्रम दुहराते ही रहेंगे, यह आने वाले समय में ही बेहतर पता चल सकता है.
 
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