छोटा राजन की गिरफ़्तारी के मायने

अचानक और अप्रत्याशित रूप में अगर आपको पिछले 20 साल से फरार डॉन की गिरफ्तारी की ख़बर मिले तो एकबारगी आपको आश्चर्य जरूर होगा. तात्कालिक रूप से दो सवाल आपके मन में उठेंगे कि अब तक यह अपराधी सरकार को चकमा देने में सफल कैसे हुआ जबकि सीबीआई ने मुंबई पुलिस के अनुरोध पर जुलाई, 1995 में ही उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था. जाहिर है, इसके पीछे लम्बी कहानी रही है. अपराध से सम्बंधित फिल्मों में हम देखते हैं कि पुलिस और जांच एजेंसियां किस प्रकार दो गुटों को एक दुसरे के खिलाफ इस्तेमाल करके संतुलन साधने की कवायद करती हैं. बच्चे-बच्चे को पता है कि मुंबई समेत देश के अन्य हिस्सों में अपराधिक बिजनेस को संतुलित करने के लिए, पाकिस्तान द्वारा समर्थित और संरक्षित आतंकवादी दाऊद इब्राहिम के कड़े प्रतिद्वंदी के रूप में छोटा राजन का नाम लिया जाता रहा है. जिस प्रकार दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई का खुला समर्थन है, उसके खिलाफ अगर छोटा राजन आज तक अपना अस्तित्व कायम रख पाया है तो निःसंदेह रूप से भारतीय एजेंसियों द्वारा उसके सपोर्ट से इंकार नहीं किया जा सकता. इससे सम्बंधित घटनाक्रम को देखें तो काफी कुछ साफ़ भी हो जाता है. सीबीआई डायरेक्टर का कहना है कि इंटरपोल से अपील के बाद इंडोनेशिया के बाली में छोटा राजन को गिरफ्तार किया गया और उसको पूछताछ के लिए भारत लाने पर इंडोनेशिया से बातचीत हो रही है. इसी कड़ी में बाली पुलिस प्रवक्ता ने बताया कि ऑस्ट्रेलियन पुलिस ने इंडोनेशिया प्रशासन को छोटा राजन के पहुंचने की सूचना दी थी और उसके बाद पुलिस ने उसे एयरपोर्ट पर ही दबोच लिया. 

अब जरा गौर कीजिये, जिसमें इंडोनेशियाई पुलिस के मुताबिक, छोटा राजन की गिरफ्तारी ऑस्ट्रेलिया की वजह से ही मुमकिन हो सकी, जबकि भारतीय गृह मंत्रालय और सीबीआई सीधे इंडोनेशिया से संपर्क को राजन के गिरफ़्तारी की वजह मान रहे हैं, जिसमें ऑस्ट्रेलिया का ज़िक्र नहीं आया है. हालाँकि, ऑस्ट्रेलियाई पुलिस की मानें तो कैनबरा स्थित इंटरपोल ने छोटा राजन को लेकर कई जानकारी इंडोनेशिया को दी थी, तो सवाल यह भी उठता है कि खुद ऑस्ट्रेलिया ने राजन को अंदर करने की कोशिश क्यों नहीं की! इन तमाम फैक्ट्स के मद्देनजर बारीकी से देखें तो छोटा राजन की इंडोनेशिया में गिरफ़्तारी के लिए पूरी कहानी तैयार की गयी लगती है. ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि छोटा राजन को इंडोनेशिया से आसानी से भारत लाया जा सकेगा, क्योंकि इस देश के साथ हमारी प्रत्यर्पण संधि है और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने भी कह दिया है कि अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को भारत में लाए जाने के बाद राज्य सरकार उसे हिरासत में लेने के लिए केंद्र से अनुरोध करेगी. अब सिक्के के दुसरे पहलु को देखें तो भारत सरकार जिस प्रकार सऊदी अरब और दुसरे अन्य देशों से दाऊद इब्राहिम के आर्थिक साम्राज्य पर शिकंजा कस रही है, ऐसी स्थिति में छोटा राजन के लिए बहुत कुछ बचता ही नहीं था, क्योंकि दाऊद और राजन दोनों का आपराधिक व्यापार और उसका सोर्स काफी हद तक कॉमन ही था. 

निश्चित रूप से अपराधी को सजा देना प्रत्येक सरकार का कर्त्तव्य है, लेकिन जब परिस्थिति को व्यापक परिदृश्य में देखा जाता है तो आपके पास कम बुरे को चुनने का विकल्प सामने दिखता है. ऐसे में अगर भारत सरकार छोटा राजन को तमाम अपराधों में सरकारी गवाह बनने के लिए राजी कर पाती है तो दाऊद इब्राहिम के अनेक काले धंधों की जड़ खोदने में सहूलियत हो जाएगी. भारत के लिए अभी सबसे बड़ा अपराधी और आतंकवादी, जिसने मुंबई बम धमाके में सैकड़ों लोगों की जान लेने के अतिरिक्त, जाली नोट, आतंकियों को फायनांस करना और सबसे बड़ा राष्ट्र के लिए सीधी चुनौती बनकर हमारी जांच एजेंसियों को मुंह चिढ़ा रहा है, उस दाऊद इब्राहिम और उसके नेटवर्क का नेस्तनाबूत करना अति आवश्यक हो गया है और इसके लिए सरकार को तमाम श्रोतों का उपयोग करने में ज़रा भी हिचकिचाना नहीं चाहिए. 

एक तरफ हम आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं, तकनीकी रूप में दक्ष हो रहे हैं तो दूसरी ओर एक अपराधी हमारे लिए राष्ट्रीय चुनौती का विषय बना हुआ है. उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बिसात पर जल्द ही चेक और मेट का आखिरी दांव दिखेगा. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रिजिजू ने भी साफ इशारा किया है कि अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम भी जल्द ही भारत की गिरफ्त में होगा. जिसके लिए भारत सरकार कई प्रयास कर रही है. दाऊद को पकड़ने के लिए भारत ने अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों से जानकारी भी साझा की है. हालाँकि, जब तक परिणाम नहीं आ जाता तब तक संशय तो बना ही रहेगा और इस संशय को दूर करना निश्चित रूप से मोदी सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल भी होगा, ऐसा हर एक भारतीय को विश्वास है.


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