इतिहास का काला अध्याय '1984

किसी शायर ने ठीक ही कहा है: 
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, 
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती !!
आखिर क्या मजबूरी रही होगी एक प्रधानमंत्री के समक्ष कि विकास की बात करते-करते, उसने अपनी एक रैली में कांग्रेस को 'सिक्ख दंगे' का काला अध्याय याद दिला डाला. आप बेशक, उस पर वोट-बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाएं या साम्प्रदायिक राजनीति करने का बहुचर्चित आरोप चस्पा कर दें... किन्तु, आप थोड़ा निष्पक्ष होकर सोचें तो यह जान जायेंगे कि उस प्रधानमंत्री के सामने कोई और विकल्प बचा था ही नहीं था? जिस प्रकार देश में एक चुनी हुई, पूर्ण बहुमत की सरकार को अस्थिर करने का प्रयत्न किया जा रहा है, ऐसे में वह व्यक्ति जनता के बीच अपनी बात न कहे तो कहाँ जाय? क्या वह चंद छद्म बुद्धिजीवियों के हाथों ब्लैकमेल हो जाए, जिन्हें विश्व के सबसे बड़े संगठन आरएसएस और दुनिया का खूंखार आतंकी संगठन 'इस्लामिक स्टेट' के बीच फर्क भी पता नहीं है! कभी-कभी विचार आता है कि अगर 1984 में सिक्ख-कम्युनिटी के बजाय, मुस्लिम-कम्युनिटी के खिलाफ दंगा हुआ होता तो उस समय ही इस देश को 'असहिष्णु' घोषित करने का प्रयास किया जाता या नहीं? प्रश्न उठता है कि तब देश की एकता और अखंडता पर खतरा मंडराता या नहीं? क्या तब भी कांग्रेस पार्टी की सरकार का रवैया दंगाइयों के प्रति वैसा ही होता, जैसी हीलाहवाली और टालमटोल उसने सिक्ख दंगे के दोषियों के साथ किया, उनको पुरस्कृत तक किया! 

इस मुद्दे को अगली पंक्तियों में उठाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के एक स्टैंड का रेफरेंस लेना चाहूँगा! यूं तो अरविन्द केजरीवाल की अनेक बातों को बुद्धिजीवी तबके द्वारा हवा में उड़ा दिया जाता है, लेकिन पिछले दिनों उन्होंने एक बात कही जो दिल तक पहुंची और लगा कि वास्तव में अगर 'न्याय' का डंडा सही दिशा में चला होता तो 19वीं सदी के आठवें दशक में ही कानून का राज हमेशा-हमेशा के लिए स्थापित हो जाता. दिल्ली सरकार की ओर से 1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए लोगों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये मुआवज़े के चेक बांटते समय, दिल्ली के तिलक नगर में आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दंगों की 31वीं बरसी पर कहा कि अगर 84 के दंगा पीड़ितों को न्याय मिला होता, तो 2002 के गुजरात दंगे और दादरी जैसी हिंसक घटनाएं नहीं होतीं. आज सहिष्णुता पर राष्ट्रपति से मिलने जा रहीं सोनिया गांधी और कांग्रेस को इस बात को मान लेना चाहिए कि उसने ही आने वाले राजनीतिक दलों को सम्प्रदायवाद की राजनीति की राह सुझाई! केजरीवाल के बयान के पहले हिस्से भर को लेते हैं तो काफी कुछ साफ़ हो जाता है और देश में सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी की नियत पर भी आप ही सवाल उठ जाता है. अब इसी सन्दर्भ में कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के एक पुराने बयान को याद कीजिये. उन्होंने सिक्खों के ज़ख्म को कुरेदते हुए यह बयान दिया था कि आज़ादी के समय मुसलमानों से सिक्खों ने लड़ाई लड़ी थी, उनको मारा था, उसी का परिणाम उन्हें 84 के दंगों में मिला. बावजूद इस बयान के वह कांग्रेस में बने रहे, कोई सफाई नहीं मांगी गयी! 

अब ज़रा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आकर सोचिये कि आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने वाले लोग सिर्फ मुस्लिमों के डर को ही क्यों उठाते हैं? क्या दुसरे किसी समुदाय का दर्द, दर्द नहीं है! उनके ज़ख्मों पर खुर्शीद जैसे नेता नमक छिड़कते हैं और आज असहिष्णुता का रोना रोने वाली कांग्रेस ऐसे ढोंगियों का तुष्टिकरण करती है, सफाई तक नहीं मांगी जाती. चूँकि, गुजरात दंगे का ज़िक्र किये बिना लेख की गरिमा पर सवाल उठाया जा सकता है, इसलिए यहाँ भी पूछा जाना चाहिए कि 'गोधरा' का ज़िक्र करने में इतनी हीलाहवाली क्यों? क्या हिन्दुओं का खून, सिक्खों का खून, उनका दर्द, दर्द नहीं ... !! उनका डर, डर नहीं !! उनके प्रति अन्याय, अन्याय नहीं...!! उनके प्रति अपराध करने वालों को इतनी ढील क्यों दी जाती है, उन पर कानून का शासन क्यों नहीं लगाया जाता है! दिल्ली के सीएम केजरीवाल की डोर पकड़कर ही आगे चलते हैं तो उनके ही शब्दों में,  'मुआवजा तो ठीक है, लेकिन जब हम सिक्ख दंगों के षड्यंत्रकारियों को खुले घूमते देखते हैं तो हमारा खून खौलता है. 

हमें न्याय चाहिए!' उन्होंने कहा, 'आज जब कोई ऐसी घटना घटती है, तो सरकार हर (पीड़ित) परिवार के लिए 50 लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान कर देती है, लेकिन यहां देखें, 31 सालों की पीड़ा और अब भी कोई इंसाफ नहीं मिला.' ... पहले की बात छोड़ दे कांग्रेस, वह आज इस बात का जवाब दे  दे कि उसकी पार्टी का सिक्ख दंगों पर और इस सन्दर्भ में राजीव गांधी के शर्मनाक बयान पर क्या रूख है ? प्रश्न यह भी उठता है कि आज एक अख़लाक़ की हत्या पर जवाब मांगने वाले, कांग्रेस पार्टी से क्यों नहीं जवाब मांगते हैं? वही खानदान है, उन्हीं के वारिश हैं... जिन्होंने सिक्खों के कातिलों को राजनीतिक संरक्षण दिया. खुद सोनिया गांधी के नेतृत्व में जिन्हें लोकसभा का टिकट मिला, कांग्रेस में पद और प्रतिष्ठा मिली (शायद मंत्रिपद भी). .. तब तो कोर्ट का निर्णय कह कर पल्ला झाड़ लिया जाता है और एक अख़लाक़ की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या पर नरेंद्र मोदी को फांसी देने के लिए सब अपना-अपना फंदा फेंक देते हैं! क्या यही न्याय है? क्या यही बुद्धिजीविता है? क्या यही सहिष्णुता है? अगर हाँ! तो जनता इसे नहीं मानती, और इसे उसने 2014 के आम चुनावों में खुलकर साबित भी कर दिया है... उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार चुनाव में वो इसे एक बार फिर साबित करेगी और ढोंगियों के मुंह पर करारा तमाचा मारेगी! 

अगर निष्पक्ष रूप से आंकलन किया जाए तो सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारतवर्ष को आज़ादी के बाद 'तुष्टिकरण' के जाल में फंसाकर जनता के बीच वैमनस्य पैदा करने वाली कांग्रेस ही है, इसलिए उसे सहिष्णुता पर कोई प्रश्न पूछने का हक़ ही नहीं बनता है! अगर वह सच में सहिष्णुता पर गंभीर है तो उसे सिक्ख दंगों पर हिसाब देना ही चाहिए! 
रही बात सहिष्णुता की मूर्ति तथाकथित 'बुद्धिजीवियों' की तो उन्होंने बेशक '84 के समय अपने पुरस्कारों को नहीं लौटाया हो, किन्तु आज जब उन पर देश के प्रधानमंत्री को जानबूझकर निशाना बनाने का आरोप लग रहा है तो क्यों नहीं वह एक 'स्टेटमेंट' जारी करके कांग्रेस और राजीव गांधी की आलोचना करते हैं? वह अपनी गलती सुधार सकते हैं और तब उन्हें यह नैतिक हक होगा कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बुलावे पर वह जाएँ और सहिष्णुता के विभिन्न पक्षों को संवाद के रास्ते पर ले आएं! सरकार ने खुले रूप में अगर इन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया है तो वह भी माहौल को भांप रही है. 

उसे भी अहसास है कि उसकी पार्टी के बयानबाजों ने तमाम निष्पक्ष लोगों को भी नाराज करने का कार्य किया है, संघ भी काफी हद तक नरम हुआ है. इसे अवश्य ही सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की असली बादशाह भारतीय जनता हालातों पर बारीकी से गौर किये हुए है. अगर नरेंद्र मोदी के पक्ष में जनता की आवाज बनी हुई है तो विरोधियों को उसका सम्मान करना चाहिए और प्रशासनिक मुद्दों को वह अपनी लेखनी के जरिये, सरकार से बातचीत के जरिये हल कर सकते हैं, जो उन्हें निश्चित रूप से करना भी चाहिए! हाँ! अगर कुंठा ही निकालनी है तो उन्हें नरेंद्र मोदी के 'अलोकप्रिय' होने का इन्तेजार करना ही होगा  ...  !!

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