गणतंत्र दिवस की सच्ची सार्थकता - 68th Republic Day of India, Hindi Essay


68th Republic Day of India, Hindi Essay, New Article
आज हम अपना 68वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 में लागू हुआ था, इसलिये हम इस दिन को हर साल गणतंत्र दिवस के रुप में मनाते हैं. गणतंत्र का सीधा अर्थ है 'अपना तंत्र'. मतलब हर तरह की अपनी व्यवस्था जिसके अन्तर्गत देश में रहने वाले लोगों की भलाई की जा सके. इसमें नागरिकों के विकास और देश के नेतृत्व के लिये अपना नेता स्वयं चुनने की आज़ादी भारतीय संविधान द्वारा दिया गया सर्वोच्च उपहार है. यह उपहार हमें आसानी से और मुफ्त में नहीं मिला है, बल्कि इसके लिए लाखों-करोड़ों महापुरुषों ने अपनी जान की बाजी लगाई है. अंग्रेजों के लंबे गुलामी काल से मुक्ति दिलाने और  भारत में “पूर्ण स्वराज” के लिये हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने बहुत संघर्ष किया, जिसके बारे में समझ पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है. उन्होंने अपने प्राणों की आहूति दी, जिससे आने वाली पीढ़ी आज़ादी की हवा में सांस ले सके और देश को आगे लेकर जाए. यह उन्हीं का बलिदान है कि भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसके पास अपना संविधान है. कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अगर चंद्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे नरम गरम सेनानियों ने आज़ादी आंदोलन को नेतृत्व नहीं दिया होता तो हम आज आराम से बैठने की बजाय किसी अँगरेज़ के घर उसका टॉयलेट साफ़ कर रहे होते! न केवल गुलामी काल में, बल्कि आज़ादी के बाद डॉ. अम्बेडकर, सरदार पटेल जैसे हमारे महापुरुषों ने जिस सार्थकता से हमारे देश को राह दिखाई, वह स्वयं में अद्वितीय है. हमारे संविधान ने हमें इतने अधिकार दिए हैं, जिससे यहाँ रहने वाले सवा अरब नागरिकों का भविष्य सुरक्षित रहे. 

हालांकि, इतनी सुविधाओं के बाद हमने क्या किया, यह सोचने पर बेहद अजीब अनुभूति होती है! आजादी के इतने साल गुजर जाने के बाद संविधान की सुविधा होते हुए क्या हमें अपने कार्यों पर गर्व करना चाहिए? शायद नहीं! बल्कि हमें तो शर्म आनी चाहिए कि जिन वीरों ने भारत देश के लिए प्राण न्यौछावर करने में एक बार भी न सोचा, उस देश की हालत हमने क्या कर दी है? हम अभी भी अपने देश में अपराध, भ्रष्टाचार और हिंसा (आतंकवाद, बलात्कार, चोरी, दंगे, हड़ताल आदि के रुप में) से बुरी तरह पीड़ित हैं. इससे भी बड़ी शर्मिंदगी यह है कि समाज के लोग इन अपराधों पर चुप्पी साधे बैठे रहते हैं! अच्छे लोगों की चुप्पी से अपराधियों का हौंसला बढ़ता जाता है और नतीजा यह होता है कि हम एक बदनाम देश के रूप में कुख्यात हो जाते हैं. अभी थोड़े दिन ही हुए, जब बैंगलूरु में हमने 'मानवता, संस्कार और बहादुरी' की ऐसी भद्दी मिशाल पेश की, जिसको सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ! किस तरह नए साल के अवसर पर सरेआम लड़कियों को छेड़ा गया और लोगबाग चुप्पी साधे रहे, यह देखकर आश्चर्य होता है कि हम उन्हीं भगत सिंह के वंशज हैं, जिन्होंने हमारे लिए फांसी का फंदा अपने गले में सहर्ष डाल लिया था. वैसे भी ये कोई अनोखी घटना नहीं है, बल्कि अब तो यह आम सा हो चला है. हम भूल चुके हैं कि एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण तभी संभव होगा, जब उसमें रहने वाले लोग मन से सुन्दर होंगे, चरित्रवान होंगे. और लोगों को चरित्रवान बनाने का काम एक स्कूल या किसी संस्था मात्र के द्वारा ही संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होना होगा. परिवार में बच्चे के पैदा होने से लेकर हर जगह उसे महिलाओं का सम्मान करना सिखाना होगा, तभी हम सर उठाकर दुनिया में चल सकते हैं. 

हमारे महान राष्ट्रपति रहे डॉ. अब्दुल कलाम का कहना था कि मनुष्य के चरित्र निर्माण में तीन लोगों की अहम भूमिका होती है, पिता, माता और गुरु! यह बात अक्षरशः सत्य है. इसके साथ ही समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भी जागरूक होना पड़ेगा, जहाँ कहीं भी कुछ गलत होता दिखे, उसका मिलकर विरोध करना होगा. चाहे वो मामला किसी महिला से छेड़छाड़ का हो, किसी गरीब के हक़ का हो या फिर हमारे नेताओं के द्वारा किया जाने वाला अनैतिक कार्य ही क्यों ना हो. भारतीय नागरिक होने के नाते, हम भी अपने देश के प्रति पूरी तरह से जिम्मेदार हैं. अगर कुछ गलत होता है, तो यह बात प्रत्येक नागरिक को समझ लेनी चाहिए कि गलत करने वाले का सीधा अपराध तो होता ही है, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से हमारा अपराध भी कुछ कम नहीं होता! हमें गलत तत्वों से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार रहना पड़ेगा. हमें अपने आपको नियमित बनाना चाहिये, ख़बरों को पढ़ें, समझें और देश में होने वाली घटनाओं के प्रति जागरुक रहें कि क्या सही और गलत हो रहा है. ऐसे में, हमें अपने पूर्वजों के द्वारा किये गए अनमोल बलिदानों को बेकार नहीं जाने देना चाहिए और फिर से देश को भ्रष्टाचार, अशिक्षा, असमानता और दूसरे सामाजिक भेदभाव का गुलाम नहीं बनने देना है. हमें अपने देश के वास्तविक प्रगति के प्रति जागरूक रहना चाहिए, तो इसके नियमित उत्थान, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय चरित्र के प्रति भी उतना ही सजग रहना चाहिए. शायद तभी, हमारे गणतंत्र की सही मायने में सार्थकता होगी.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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