लोग कहेंगे, वोट की खातिर… Vote bank politics, Short Story, Election Time!




राधेश्याम जी हाल ही में आर्मी से रिटायर होकर गाँव आये थे कि कुछ उत्साही लोगों ने उनके सामने गाँव में माता-मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा. राधेश्याम जी सहर्ष तैयार हो गए और इसके लिए 21 हज़ार दान देने की घोषणा भी तत्काल ही कर दी... Vote bank politics, Short Story, Election Time
आनन-फानन में मंदिर निर्माण समिति का गठन हुआ और लोगों ने उन्हें ही इसका अध्यक्ष बनाकर मंदिर निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी सौंप दी. शुरू में तो राधेश्याम जी को सब बढ़िया लगा, लेकिन महीने और साल बीतते ही गाँव की राजनीति उनकी समझ में आने लगी, जब कुछ लोगों ने उनकी टांग खींचनी शुरू कर दी. वह बिचारे, आर्मी के आदेश मानने और देने वाली प्रवृत्ति के थे और किसी काम को हाथ में लिया तो उसे पूरा करने के लिए जी-जान लगाना ही उनका जीवन-मूल्य रहा था. कुछ लोग थोड़ा बहुत सहयोग जरूर कर रहे थे, किन्तु यहाँ तो कई लाख की जरूरत थी...
गाँव वालों से सहयोग की गति धीमा होते देख शहरों में कार्य करने वाले उनके पुत्रों ने सहयोग किया तो कार्य कुछ आगे बढ़ा, किन्तु इस पर गाँव में यह अफवाह फ़ैल गयी कि वह सार्वजनिक कार्य को अपने घर का बना रहे हैं...
बिचारे राधेश्याम, इतनी परेशानी तो उन्हें आर्मी में कई मोर्चों पर भी नहीं हुई थी...
संयोग से चुनाव आ गए थे और तमाम लोग वोट मांगने राधेश्याम जी के पास आने लगे. गाँव में शराब और साड़ियां बांटने की शुरुआत अब रफ़्तार में बदलने लगी थी ...
क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाने वाले सूर्यकेश जी इस चुनाव में भी खड़े थे और राधेश्याम जी से जब वह वोट मांगने पहुंचे, तब उन्होंने मंदिर में चंदे की अपनी मांग दुहरा दी...
भाई जी! मंदिर तो मैं बनवा देता... आज बनवा दूँ, लेकिन, लोग कहेंगे कि वोट की खातिर सूर्यकेश यह कर रहा है.. Vote bank politics, Short Story, Election Time
चुनाव जीतते ही... मैं... कर... ... ...
अच्छा! मंदिर में दान देने पर लोग आपको कहेंगे कि वोट की खातिर आप यह कर रहे हैं ... 
और जो दारू और साड़ियां आपने दक्षिण-बस्ती में कल बंटवाई, वह आपकी दरियादिली है क्या? 
राधेश्याम जी से इतना सपाट उत्तर सुनकर सूर्यकेश ने अपने चाटुकारों के साथ खिसकने में ही भलाई समझी!
इधर राधेश्याम जी ने मन ही मन निर्णय कर लिया था कि उनसे वोट मांगने जो आएगा उससे यही प्रश्न पूछेंगे कि 'वोट की खातिर'... ...

- मिथिलेश 'अनभिज्ञ'.





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