कारपोरेट वर्ल्ड के भीतरी पन्ने सिमटे हैं एच आर डायरीज में ... Hindi Book Review by Mithilesh, HR Diaries


वास्तव में एच. आर. डायरीज मानव संसाधन विभाग की अनकही ही है. ओपन क्रेयॉन्स द्वारा प्रकाशित यह किताब ब्लॉग अड्डा के माध्यम से जब मुझे प्राप्त हुई, तभी से जल्दी पढ़ने का उत्साह मैं छिपा नहीं पाया. किताब की शुरुआत में ही लेखक हरमिंदर सिंह लिखते हैं कि...
"कभी-कभी लगता है कि मैं अनसुलझे सवालों को खोजने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता. मैंने हर किसी को नजरअंदाज किया है. दशक भर से ज्यादा हो गया, मैं ऐसा करता आ रहा हूं, शायद आज भी कुछ नहीं बदला. वही मैं, वही मेरी सोच और ख्यालात. उलझी हुई बातों की अधूरी दास्तानें जिन से किसी को फर्क नहीं पड़ता".

लेखक के इन शब्दों में देखेंगे तो कारपोरेट वर्ल्ड की हकीकत की रुपरेखा तैयार हो जाती है, जो आगे के अध्यायों में बेहतरीन ढंग से संजोयी गयी है. बेहतरीन छपाई और खूबसूरत पन्नों में छपी किताब अपने भीतर कुल 22 अध्याय समेटे हुए है, जिसमें मानव संसाधन के विभिन्न पहलुओं पर गहरी दृष्टि डाली गई है. यह दृष्टि तकनीकी न होकर मानवीय पहलुओं को ज्यादा छूती है. कहने को तो यह एक उपन्यास है, किंतु पढ़ने पर आपको यह अपनी कहानी लगेगी. चूंकि, ग्लोबलाइजेशन के दौर में लोग प्राइवेट नौकरियों की तरफ ही झुके जा रहे हैं और इस भाग दौड़ में उन्हें रुकने ठहरने का भी समय नहीं मिलता है, सुस्ताने का भी समय नहीं मिलता है. वह बस भागते रहते हैं ,ना किसी को देखने का समय, न सोचने का समय और इसी भागम-भाग में जिंदगी के कितने अनमोल पहलू छूट जाते हैं, पूरी किताब में इसी बात की चर्चा दिलचस्प अंदाज में की गई है. अपने किताब के दूसरे शीर्षक 'पहला दिन' में लेखक लिखते हैं...

पहले दिन कोई उत्साह नहीं था. मेरे मन में उथल-पुथल का संसार जरूर था, जो अपने ही अंदाज में बढ़ता जा रहा था. उम्मीद मैं दूसरों से अधिक लगाता नहीं और ना मैंने इस विषय पर अधिक माथापच्ची करने की कोशिश की... 

जब कोई व्यक्ति पहले दिन किसी नौकरी पर जाता है तो उसके मन में क्या सवालात होते हैं इस बात की अच्छी बानगी देखने को मिलती है इस अध्याय में. लेखक के ही शब्दों में...
एक नीले रंग के बोर्ड पर मानव संसाधन विभाग लिखा देखा, तो किसी से पूछने की जरूरत महसूस नहीं की. सीधा दरवाजा खोलकर प्रवेश कर गया, एक कदम की दूरी पर दूसरे दरवाजे से भी सामना हुआ जो पहले के बाद खुलता. दावे के साथ कहा जा सकता है कि आप जैसे-जैसे आगे पढ़ते जायेंगे इस किताब को, उसी अनुसार आप की समानांतर यात्रा भी चलती रहेगी.
ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट से प्रत्येक प्राइवेट कर्मचारी का सामना होता ही है और उसी की बानगी किताब में प्रस्तुत की गई है. तीसरे अध्याय 'व्यस्त लोग' में कारपोरेट वर्ल्ड की व्यस्तता के बारे में संजीदगी से बताया गया है कि किसी के पास टाइम नहीं होता है, किन्तु भावनाएं तो उमड़ती ही हैं. इसी बीच दोस्ती मित्रता की बातें भी लेखक ने सावधानी से उकेरी है और संजीव विजय का उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा है कि "उनकी दोस्ती पढ़ाई के दौरान हुई थी. उन की जोड़ी देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वह घनिष्टता कहाँ से पनपी होगी. इस तरह उपन्यास आगे बढ़ते हुए अपने चौथे अध्याय 'चश्मे वाली' लड़की में पहुंचता है. अक्सर सुकून के दो पल खोज रहे लोगों के एहसासों को छूते हुए एक के बाद एक अध्याय गुजरते रहते हैं और समर ट्रेनिंग, प्रार्थना, समय प्रबंधन, फुटबॉल का मैच जैसे अध्यायों में आप डूब से जाते हैं. तत्पश्चात, बरसात की सर्द रात के रूप में जब नौवें अध्याय पर पहुंचते हैं तो ऐसा लगता है कि मौसम के बदलाव के साथ आपके एहसास भी बदल गए हों!

लेखक द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियों को उद्धृत करें तो...
"सड़क के दूसरी और दो मजदूर बड़ी सुलगा रहे थे. मैं उन्हें पहचान नहीं सकता था क्योंकि उनकी दूरी काफी थी और बिजली केबल की रोशनी उतनी नहीं थी. मजेदार बात यह रही कि मैं अपने साथ खड़े उस व्यक्ति का चेहरा भी ढंग से देख नहीं पाया जो मेरे साथ करीब आधे घंटे से अधिक समय से था". 

किस तरह लोग वास्तविकता को, हकीकत को अनदेखा कर देते हैं एहसासों को अनसुना कर देते हैं, इस बात की कहानी कहती हुई यह किताब आपको भाव विभोर कर देगी. अगले अध्यायों में तेंदुए की अफवाह, चाय, नया तजुर्बा, मायाराम, सूप, खुला खत, नोट, छुछुंदर, एसी, हंसी-मजाक, ढाबा, मौत और निराशा जैसे अध्यायों में लेखक ने मानव संसाधन विभाग की अनकही कहानियों को ही संजोया है, इस बात में दो राय नहीं! और वास्तव में यह कहानियां अनकही जरूर हैं, लेकिन आज के समय में हर एक व्यक्ति द्वारा महसूस की जा रही है. जरूरत है भावों को बचाने की, भाव को संजोने की और यह सभी के लिए है ... 

उन नौजवान के लिए भी, जिन्होंने नई दुनिया में कदम रखा हो, वह दौड़ भाग में जिंदगी की पेचीदगियों को अपने तरीके से हल जरूर करें, किन्तु भावों को मारने न दें. निश्चित रूप से उनके जीवन में अनेक मोड़ आते हैं, वह हंसते हैं, रोते हैं, घबराते हैं, लेकिन रुकते नहीं और उनके इस जीवट की जितनी तारीफ़ की जाए, कम ही है. लेखक का यह कहना सही ही है कि 'नौकरी करना कोई बच्चों का खेल नहीं है'. वाकई, नौकरी करना आज के समय में पहाड़ तोड़ने से भी कठिन है, लेकिन अनवरत चलते रहना ही तो जिंदगी है और अन्यास्कार हरमिंदर सिंह की 'एच आर डायरीज' इस बात का जीता जागता प्रमाण है.

- मिथिलेश कुमार सिंह, 7 फ़रवरी 2017

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- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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