हिंदुत्व के पंच प्राण - Hindutv ke Panch Pran by Veer Savarkar!


स्वातंत्र्य वीर सावरकर जी की पुस्तक में हिंदुत्व एवं राष्ट्रीयता का उद्घोष (पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे विचार)
भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए वीर सावरकर कोई अपरिचित नाम नहीं हैं. एक तरफ इस नाम के त्याग और बलिदान के सदृश कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों के वक्तव्य विनायक सावरकर को अतिवादी कहकर उनपर निशाना साधने से नहीं चूकते हैं. हिंदी साहित्य सदन द्वारा प्रकाशित 'हिंदुत्व के पंच प्राण नामक पुस्तक में उनके कुछ संकलित लेखों को पढ़ने का सुअवसर मिला. अनुवादक विक्रम सिंह ने इन लेखों को अच्छे से सहेजा है. इस पुस्तक में वीर सावरकर के ९ लेख शामिल किये गए हैं, जो वीर सावरकर की हिन्दू समाज के प्रति गहन समझ का परिचय देते हैं.
इस पुस्तक को पढ़ने के उपरान्त इस बात में कोई संशय नहीं रह जाता है कि हिंदुत्व के महान विचारकों में वीर सावरकर का स्थान अक्षुण्ण है, विशेषकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेज़ों से लोहा लेने के अतिरिक्त आपने हिन्दू समाज को संगठित करने में अपनी समस्त बौद्धिक ताकत झोंक दी, जो उस दौर के मुस्लिम कट्टरपंथ से निपटने के लिए भी समयानुकूल था. 
एक तरफ महात्मा गांधी के प्रभामंडल से देश के बड़े जननेता अभिभूत होकर उनके सही-गलत कदमों का अंध समर्थन कर रहे थे, वहीं देशहित की खातिर आपने महात्मा गांधी तक की कटु आलोचना करने में कोई कोताही नहीं की. आपने महात्मा गांधी के कई सिद्धांतों की जमकर बखिया उधेड़ी है, जिनमें 'मुस्लिम तुष्टिकरण' और 'आत्यंतिक अहिंसा' प्रमुख है. आपकी तरह देश के अन्य देशवासी भी यह बात मानते हैं कि तमाम योगदानों के बावजूद देश बंटवारे, सांप्रदायिक हिंसा एवं अंग्रेजों के अत्याचारों में महात्मा गांधी की गलत नीतियां काफी हद तक जिम्मेवार रही हैं. इस ऐतिहासिक पुस्तक में आपने 'हिंदुत्व की व्यापक परिभाषा' देने के साथ राष्ट्रभाषा हिंदी, छुआछुत, हिन्दुओं की घटती संख्या, अहिंसा की गलत परिभाषा के कारण हिन्दुओं में पनप रही कायरता, धर्म का हृदय में स्थान एवं उसकी उपयोगिता, जाति-भेद पर कटु प्रहार एवं उससे होने वाले नुक्सान पर गहन दृष्टि डाली है.
Hindutv ke Panch Pran by Veer Savarkar, Book Review by Mithilesh

'हिन्दू' शब्द का अर्थ एवं उसकी व्याख्या करते हुए आपने इस सूक्ति को उद्धृत किया है-
आसिंधुसिंधुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका.
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै 'हिन्दु' रिति स्मृतः.

यह प्रश्न सदैव से उठता रहा है कि हिन्दु कौन? आपने उसकी स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा है कि असिन्धु-सिंधु जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों भारतवर्ष हो, वह हिन्दु कहलाने का अधिकारी है. तमाम भारतीयों के भ्रम को दूर करते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि हिन्दु शब्द की उत्पत्ति मुसलमानों या किसी अन्य द्वारा नहीं हुई है, बल्कि हिन्दु, हिंदुस्तान, हिन्द इन प्राकृत शब्दों का मूल उद्गम ऋग्वेदकालीन सप्तसिंधु नामक हमारे अपने प्राचीनतम राष्ट्रीय अभिधा में ही है.
ऋग्वेद में 'सप्तसिन्धवः' प्रयुक्त होने के साथ उस प्राचीन काल में हमारे निकटस्थ ईरान, बेबोलियन, प्राचीन अरब आदि राष्ट्र हमें हमारे 'सप्तसिंधु' इसी राष्ट्रीय अभिधा से जानते थे. 'पारसियों ने' ढाई हजार वर्ष पूर्व के उनके धर्मग्रंथों में हमारे राष्ट्र को 'हप्तहिन्दु' से ही सम्बोधित किया है. 
तत्कालीन प्राचीन 'बेबोलियन' ग्रंथों में हमारे देश से निर्यातित झीने तथा सुन्दर वस्त्रों को 'सिंधु' या 'सिन्धुव' कहा हुआ है. आगे हिन्दु शब्द पर प्रकाश डालते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि अलेक्जेंडर से दो सौ वर्ष पूर्व का ग्रीक इतिहासकार हेकाटेआस भी हमारे प्राचीन राष्ट्र को हमारे ही सिंधु शब्द के ग्रीक रूप Indu India इसी नाम से उल्लेख करता है. बुद्धकाल में हिन्दुस्थान में आये हुए 'चीनी' यात्री हुएनत्संग ने भी हमारे राष्ट्र को सिंधु शब्द का चीनी अपभ्रंश 'शिन्दु' इसी अभिधा से सम्बोधित किया था. यही नहीं, मुसलमानों के पैगम्बर मोहम्मद साहब के जन्म से पूर्व अरबी लोग जब शैव एवं शाक्त पंथ सदृश धर्म के अनुयायी थे तब भी हमारे राष्ट्र का वर्णन करे हुए हिन्द एवं हिन्दु नामों का उन्होंने गौरव से उच्चारण किया है. इसमें वर्णित एक पंक्ति देखिये-
अया मुवारकल अर्जे या शैयेनोहा मिनल हिंदे.
वा अरा दक्क़ला हो मइयो नज्जेला जिकतून.

इस लेख में हिन्दु शब्द के उल्लेखों का उदाहरण देते आप भविष्य पुराण के उद्बोधक श्लोकों का वर्णन करते हैं-
जानुस्थाने जैनुशब्दः सप्तसिंधु स्तथैव च.हप्तहिन्दुर्यावनीति पुनज्ञेया गुरुण्डिका.

इसी प्रकार शालिवाहन कुल के राजाओं की कथाओं का वर्णन करते हुए इसी पुराण में कहा गया है कि बाल्हिक, चीन, तार्तार आदि मलेच्छ शत्रुओं का समूल नाश करने के उपरान्त उस भूपति ने सिंध को अपने उत्तम आर्य राष्ट्र की सीमा निश्चित किया. सिंधु के इस ओर का जो प्रदेश है वह हमारा सिन्धुस्थान एवं उस ओर का जो प्रदेश है वह मलेच्छस्थान है, ऐसा सीमांकन किया, अटक उल्लंघन के निषेध नियम भी इसी समय में प्रचलित हुआ. 'नागन्तव्य त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके' इस भविष्यपुराण के श्लोकों में भी सिंधु उल्लंघन का बंधन उद्धृत है.
पृथ्वीराज चौहान के समकालीन चंदभाट के काव्य में भी हिन्दुस्थान शब्द का गौरवयुक्त प्रयोग किया गया है.
अटल थाट महिपाट अटल तारा गढ़ थानम्.अटल नगर अजमेर अटल 'हिंदव-अस्थानम्.

जब आज के आधुनिकतम समय में हिन्दू शब्द की राष्ट्रीयता पर कुछेक लोग प्रश्न उठाने की धृष्टता करते हैं, तो समझा जा सकता है कि आज़ादी के समय मुस्लिम लीग और छद्म सेकुलरवादियों द्वारा बहुलता से हिन्दू शब्द को साम्प्रदायिक बताने की कोशिश हुई होगी. उन सभी पर प्रहार करते हुए वीर सावरकर उद्घोष करते हैं कि हिन्दू शब्द पूर्ण रूप से राष्ट्रीय है. इसे सिद्ध करते हुए वह कहते हैं कि- मैं आर्य हूँ, मैं भारतीय हूँ इस स्वतः की स्थिति से अनभिज्ञ होने वाले लाखों लोग मिल सकते थे पर मैं 'हिन्दू हूँ' यह भावना झोंपड़ी-झोंपड़ी में करोड़ों लोगों में जम चुकी थी. पूरे देश के आम जनमानस के साथ पंजाब में श्री गुरुगोविंद सिंह जी का जो जीवित कार्य था वह उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार वर्णित है-
सकल जगत में खालसा पंथ जागे.जगे धर्म 'हिन्दू' सकल भंड भाजे.
महाराष्ट्र के समर्थ रामदास जी को भी जो पीड़ा थी वह भी यही कि
'या भूमंडळाचे ठाई.हिन्दू ऐसा उरला नाहीं.(भावार्थ- इस भूमण्डल में मानो 'हिन्दू' तो बचा ही नहीं.)

गुरु तेगबहादुर के समान हजारों हुतात्माओं ने 'हिन्दू शब्द का परित्याग करो, नहीं तो प्राणत्याग हेतु तत्पर हो जाओ!' ऐसी शत्रु की धोंस पर प्राण त्याग दिए, पर इस 'हिन्दू' शब्द का परित्याग नहीं किया. पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी जातियां, सम्प्रदाय अपने को हिन्दू मानने और कहने में सदा से गर्व करती आयी हैं. हिन्दू शब्द के इतिहास से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह शब्द मूलतः तथा मुख्यतः देशवाचक एवं राष्ट्रवाचक है, किसी विशिष्ट पूजा-पद्धति भर का ही निदर्शक नहीं है.

अपनी किताब 'हिंदुत्व के पंच प्राण' में सावरकर जी स्पष्ट कहते हैं कि हिंदुत्व कोई धर्ममत नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीयता का द्योतक है. जिसकी पितृभू एवं पुण्यभू भारत है, वही हिन्दू है. पितृभू अर्थात केवल वह भूमि नहीं जहाँ अपने माता-पिता का जन्म हुआ हो, पितृभू तो उस भूमि को कहा जाता है जिसमें प्राचीन काल से एक परंपरा से हमारे पूर्वज निवास करते आये हैं. इसी प्रकार पुण्यभू का तात्पर्य उस भूमि से है जिस भूमि में किसी धर्म का संस्थापक, ऋषि, अवतार प्रकट हुआ, उसने उस धर्म को उपदेश दिया, उसके निवास से उस भूमि को धर्म क्षेत्र का पुण्यत्व प्राप्त हुआ, वह उस क्षेत्र की पुण्यभू है. हिंदुत्व की यह परिभाषा जितनी ऐतिहासिक है उतनी ही वर्तमान स्थिति के अनुसार भी है. वह जितनी सत्य है उतनी ही इष्ट भी. जितनी व्यापक है, उतनी ही व्यावर्तक भी.

सावरकर जी के लेखों में लिखी बातें काफी हद तक सत्य प्रतीत होती हैं. हिन्दू शब्द के बारे में भ्रम की स्थिति पर वह कहते हैं कि यदि हिन्दू की यह परिभाषा प्रारम्भ में ही उपलब्ध हो जाती तो 'हिन्दू' शब्द को किसी खास पूजा-पद्धति से जोड़ने की भ्रान्ति ही उत्पन्न नहीं होती. मुसलमान राजसत्ता ने स्वतः की सुविधा हेतु, धर्मान्धता के नशे में हिन्दुस्थान के करोड़ों लोगों को हिन्दू एवं मुसलमान इन दो टुकड़ों में बाँट दिया- इस प्रकार जो भी व्यक्ति मुसलमान नहीं था वह हिन्दू माना जाने लगा. इस कारण से मुसलमान जातियों के अतिरिक्त सभी जातियां एक ध्वज के नीचे संगठित हुईं और इससे यह साबित हुआ कि हिन्दू शब्द का अर्थ सिर्फ सनातनियों या आर्यसमाजियों के लिए ही नहीं था बल्कि इसमें समस्त भारत के लोग शामिल थे. हिन्दू शब्द को वेदनुयायियों से जोड़ने का कारण वह विचारक ही रहे जो हिंदुत्व की सर्वांगीण व्याख्या राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक आधार पर न करने के कारण उसके उन प्रमुख अंगों की ओर दुर्लक्ष्य होकर, उसकी धार्मिक परिभाषा को प्रतिपादित करने लगे और हिन्दू समाज के बहुसंख्यक लोग वेदानुयायी होने के कारण यह धारणा बलवती होती गयी.
यही कारण रहा कि सिक्ख, जैन, बौद्ध, आर्यसमाज, ब्रह्मोसमाज, देवसमाज आदि पंथ कई बार हिन्दू शब्द के सम्बन्ध में भ्रम पाल लेते थे. अपनी स्पष्टवादिता के कारण अंग्रेजों से लेकर कांग्रेसी सत्ता तक का दंश झेल चुके वीर सावरकर बिना किसी लाग-लपेट के खुल कर कहते हैं कि मुसलमान और ईसाई हिन्दू नहीं माने जा सकते क्योंकि धर्मपरिवर्तन से वह भ्रष्ट हो चुके हैं, उनकी पुण्यभू अरब स्थान, पैलेस्टाइन आदि हो चुके हैं, अतः उनकी निष्ठा बंट गयी है. 
इस प्रकार अपने विस्तृत लेख में जिस प्रकार हिन्दू, अहिन्दू की राष्ट्रीय व्याख्या वीर सावरकर जी ने स्पष्ट रूप में की है, वह कहीं अन्यत्र मिलना दुर्लभ है.
Hindutv ke Panch Pran by Veer Savarkar, Book Review
अपने अगले लेख में संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन करते हुए वीर सावरकर खास वर्ग के दोहरेपन की धज्जियां उड़ाने से चूके नहीं हैं. राष्ट्रीय विचारों के प्रति वह प्रखर रूप में सामने आते हैं, और ढोंगियों के तुष्टिकरण की जमकर खिंचाई करते हैं. एक उद्धरण देखिये: हम हिन्दुओं में एक ऐसा वर्ग है, जिसकी यह विचित्र धारणा है कि कोई भी 'राष्ट्रीय' आंदोलन तब तक राष्ट्रीय हो ही नहीं सकता जब तक कोई ऐरा-गैरा मुसलमान उसमें ला करके न बिठाया जाय.
वह सिर्फ आलोचना ही नहीं करते हैं, बल्कि महात्मा गांधी के द्वारा हिंदी के प्रति किये गए योगदान को सराहते भी हैं, लेकिन मुसलमानों के प्रति उनके झुकाव को राष्ट्र के प्रति विक्षिप्त धारणा बताने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. 
हिंदी को राजभाषा बनाने को लेकर जिस प्रकार मुसलमानों ने विरोध किया और देश के हिन्दुओं तो छोड़िये, अधिकाधिक मुसलमानों में भी न समझी जाने वाली उर्दू के लिए ज़िद्द की, वह इतिहास में दर्ज अध्याय है. महात्मा गांधी ने उनके दबाव में आकर हिंदी के साथ अन्याय भी किया. हिंदी की वकालत करते हुए वीर सावरकर जी कहते हैं कि किसी भी देश की राष्ट्रभाषा तो वह होती है, जिसमें उस राष्ट्र का सारा उच्च साहित्य होता है. मुसलमानों द्वारा फ़ारसी लिपि अपनाये जाने की वकालत करने पर वीर सावरकर ने नागरी लिपि के पक्ष में ज़ोरदार तर्क प्रस्तुत किये हैं. अपने तर्कों को वह भाषा में जातिक्रम से लेकर उर्दू की दरिद्रता और मुसलमानों की हठधर्मिता की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. यहाँ तक कि उर्दू का बंगाल के मुसलमानों ने भी खुल कर विरोध किया था, उसके बावजूद देश के कुछ मुसलमानों के साथ महात्मा गांधी हाँ में हाँ मिलाते रहे.
वीर सावरकर उर्दू के साथ अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में मिलाने के सख्त खिलाफ थे और उन्होंने स्पष्ट कहा कि 'संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही हम हिन्दुओं की राष्ट्रभाषा है एवं संस्कृतनिष्ठ नागरी लिपि ही हम हिन्दुओं की राष्ट्रलिपि है.'

'हिंदुत्व के पंच प्राण' पुस्तक को पढ़ते हुए आपको भी मेरी तरह लगेगा कि वीर सावरकर आपके सम्मुख आपसे बात कर रहे हों, प्रत्येक मुद्दे पर व्यवहारिक दृष्टिकोण लाजवाब है. जैसे- जाति-भेद पर वह सवर्णों को कड़ी फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि जिन निचली जातियों को तुम गले नहीं लगाते हो, वह मुसलमान, ईसाई बनकर तुम्हारे शत्रु बन जायेंगे. इसके लिए वह मुस्लिम और ईसाईयों को शुद्धिकृत करने का प्रयास भी करने को कहते हैं. लेकिन शूद्रों के साथ शुद्धिकृत हिन्दुओं को सवर्ण जातियों द्वारा भेदभाव का शिकार बनाये जाने पर उनका मन क्षोभ से भर उठता है. एक उद्धरण देखिये वीर सावरकर के ही शब्दों में-
एक बड़े ही प्रामाणिक शुद्धिकृत व्यक्ति से हमें एक पत्र प्राप्त हुआ है, उसमें वे लिखते हैं, मेरे हिन्दू धर्म-प्रवेश से किसी भी प्रकार रूष्ट न होते हुए मिशनरियों ने मुझे संक्रांति पर्व पर मुंह मीठा करने हेतु परम्परानुसार तिल-गुड भेजा है. मेरे पुत्रों को दस-दस रूपये की मिठाई भेजी है, हमसे दूर होते हुए भी वे प्रति सप्ताह मेरा कुशलमंगल पूछते रहते हैं, इन सब बातों का रहस्य मैं भली-भांति जानता हूँ;
परन्तु जब वे उनकी धर्मध्वजा के नीचे लाने के उद्देश्य से विधर्मियों से इतना मीठा बोल सकते हैं, तो हमारे हिन्दुधर्म की ध्वजा के नीचे जब हम सब खड़े हैं तब स्वजनों को परस्पर में एक दुसरे से तो मीठा बोलना चाहिए.! पर! जब मैं और मेरे पुत्र रास्ते से जाते हैं, तब मेरे ये हिंदुबंधु मेरी ओर तिरस्कार से हँसते हैं और दुसरे रास्ते से चले जाते हैं. 
किसी के बरामदे में अभी भी हम बैठ नहीं सकते. तीज-त्यौहार पर प्रेम से दो शब्द भी कोई नहीं बोलता. ऐसी अवस्था में केवल एक आत्मिक संतोष जो मुझे मेरे हिन्दू पूर्वजों के वास्तु में निवास करने से प्राप्त हो रहा है, के कारण ही विपक्ष के प्रलोभन एवं स्वपक्ष के तिरस्कार का कुछ भी प्रभाव नहीं लगता. मैं हिन्दू हूँ, इस भावना के सुख का उपभोग मैं कर सकता हूँ, इतना ही मेरे लिए पर्याप्त है.

अगले लेख में अपनी प्रखर शैली को जारी रखते हुए वीर सावरकर हिन्दुओं को अपनी संख्या एवं गुण दोनों को विकसित करने पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि संख्याबल सबसे बड़ी शक्ति है, इसलिए उसका संरक्षण एवं संवर्धन करो. मुसलमानों का उदाहरण देते हुए वीर सावरकर तब के सन्दर्भ में कहते हैं कि- दिल्ली की मुसलमानी परिषद के भाषणों और प्रस्तावों को देखो: मुहम्मद अली से लेकर छोटे-मोटे गुंडों तक प्रत्येक मुसलमान को कम से कम दस-बारह हिन्दुओं को तो भ्रष्ट करना ही चाहिए, इस प्रकार दहाड़ें मार रहे हैं- क्योंकि, हिन्दुस्थान में मुसलमानों की संख्या को हिन्दुओं से अधिक बनाना है. इसी के कारण हिन्दू स्त्रियों को बहला फुसलाकर एवं जबरदस्ती अपने साथ ले जाते हैं क्योंकि उन्हें मुसलमानों के संख्याबल को हिन्दुओं से ज्यादा बनाना है. ईसाइयों से भी हिन्दुओं को सचेत रहना पड़ेगा क्योंकि प्रतिवर्ष कम से कम दस लाख लोगों को ईसाई निगल जा रहे हैं, उनको ईसाई बना रहे हैं. ऐसे में हिन्दुओं को अपनी रक्षा के लिए बेहद सचेत होना पड़ेगा.
वीर सावरकर आगे कहते हैं कि सर्वप्रथम यह ध्यान में रखना चाहिए कि यदि समाज-जाति अस्ति'त्व में होगी तब ही तो उसमें गुणरूपी शक्ति बढ़ाने का प्रश्न उत्पन्न होता है, इसलिए "निरे संख्याबल में क्या रखा है, ऐसा कहने वाले धूर्तों को खरी-खरी सुनाओ एवं अपनी संख्या बढ़ाओ. हमें गुणबल तो आवश्यक ही है, पर संख्याबल भी हमें आवश्यक है. 
हमारा हिन्दुराष्ट्र हम संख्या के रूप में भी घटने नहीं देंगे, गुणों में भी घटने नहीं देंगे. गुणबल पंगु है तो अकेला संख्याबल अंध है, इस सामाजिक सत्य को हिन्दुओं को समझना पड़ेगा.

अपने अगले लेख में गांधी की अव्यवहारिक अहिंसा की धज्जियाँ उड़ाते हुए वीर सावरकर घोषणा करते हैं कि 'प्रतिघात का साहस हिन्दुओं में कूट-कूट कर भरा है'. हिंसा एवं अहिंसा के अर्थों की वर्तमान में गांधीजी जैसे पोंगापंडितों ने जो उधेड़बुन मचा रखी है, उससे वे वचन भले ही परस्पर विरोधी दिखाई देते हों, परन्तु हिन्दुधर्म के मर्मज्ञ आचार्य, पूर्व से ही इस शब्द का जो अर्थ बताते आये हैं, उसको ध्यान में लेने पर,
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय रितनिश्चयः
का गर्जन करते हुए अपना सुदर्शन-चक्र ऊँचा उठा कर कंस का मर्दन करने वाले कृष्ण एवं उनकी गीता ये दोनों ही हिन्दुधर्म एवं हिन्दुराष्ट्र के प्रमुखतम आराध्या देवता क्यों बने यह सबके समझ में आने जैसी बात है. इसके अलावा गांधीजी जिस युधिष्ठिर की बात निरी अहिंसा के लिए करते हैं, उन्होंने भी अट्ठारह दिनों तक युद्ध किया था. मुसलमानों से हिन्दुओं को अलग एवं बौद्धिक बताते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि हिन्दू मुसलमान की भांति विक्षिप्त कटटर नहीं, पर हिन्दू कटटर अवश्य है. हिन्दू मुसलमान की भांति धर्मोन्मत जानवर नहीं, पर हिन्दू धर्मवीर अवश्य है. इसलिए ऐ खडग, तेरी विजय हो! गुरु गोविंदसिंह जी ने स्वतः की तलवार के सम्बोधन में रचे हुए काव्य में भी कुछ ऐसा ही कहा है-
सुखसंताकरणम् दुर्मतिहरणम् खलदलदलनम् जयतेग्रम.
वीर सावरकर की 'हिंदुत्व के पंच प्राण' पुस्तक को पढ़कर, एक से बढ़कर एक रोचक प्रसंग, उदाहरण, उद्धरणों को समझकर इस स्वातंत्र्य वीर के प्रति श्रद्धा में सिर आप ही झुक जाता है. और मन गा उठता है-
'तेरा वैभव अमर रहे माँहम दिन चार रहें न रहे'
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- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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