ओ रे किसान! Indian Farmers, Hindi Poem


ओ रे किसान!
अधिकार की बातें तेरी बेकार है
इतना तो तू समझदार है
जो जान सके
यह मान सके
पहचान सके
कि किसकी यहाँ सरकार है

ओ रे किसान!
तेरी तरह तेरे खेत भी बेकार हैं
कौड़ी के भाव तेरी पैदावार है
फिर क्यों रोता
भटकता
आँख की रौशनी खोता
जब न तेरा कोई पैरोकार है

ओ रे किसान!
तू खेल कुछ क्रिकेट जैसा जो जानदार है
या फिर सिनेमा में जा वह भी वजनदार है
लोग देखेंगे
तालियां पीटेंगे
भारत माता की जय बोलेंगे
यही वर्तमान हिन्दुस्तान का सार है

ओ रे किसान!
ओ रे किसान!

- मिथिलेश 'अनभिज्ञ' 

Indian Farmers, Hindi Poem
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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2 comments:

  1. Indian Farmer ke barein mein yeh kavita mujhe bahoot pasand aayee

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  2. बहुत अच्छी कविता.किसानो की समस्याओ का दर्पण.साधुवाद इस कविता के लिए

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