मराठा आरक्षण का लॉलीपॉप

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2019 में देश भर में आम चुनाव होने वाले हैं और महाराष्ट्र की बीजेपी गवर्नमेंट ने तकरीबन 30% मराठों को अपने पक्ष में करने के लिए आरक्षण का दांव चल दिया है. देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा में मराठों को आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित कर दिया है.

जाहिर तौर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का यह खुला उल्लंघन ही कहा जाएगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही अपने निर्णय में यह स्पष्ट कर रखा है कि किसी भी हाल में 50 फ़ीसदी से अधिक आरक्षण को मान्यता नहीं दी जाएगी. कहा जा सकता है कि यह एक तरह से मराठों को दिया गया 'चुनावी लॉलीपॉप' ही है.

इस सन्दर्भ में कुछ दिलचस्प पन्ने पलटने से 'मराठा आरक्षण लॉलीपॉप' के दांव को समझने में और भी आसानी होगी. अगर पिछले बिहार विधानसभा चुनाव आपको याद हो, तो उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का वक्तव्य भी आपको याद ही होगा. तब आरक्षण जाति के आधार पर खत्म करके आर्थिक आधार पर दिए जाने की वकालत की गयी थी. उस समय मोहन भागवत के इस बयान को काफी प्रचारित किया गया था और जब बिहार में भाजपा-गठबंधन हार गया तो भगवत के 'इसी बयान' के ऊपर ठीकरा फोड़ा गया था. समझना कठिन है कि जाति के आधार पर आरक्षण दिए जाने के विरोधी रहा 'आरएसएस नेतृत्व' ने महाराष्ट्र में मराठों को 16 फ़ीसदी आरक्षण दिए जाने को हरी झंडी किस प्रकार दिया है?

कुछ और पन्नों को पलटेंगे तो हरियाणा में जाटों के आंदोलन में हुई हिंसा और गैरकानूनी कार्यों की याद अभी भी कई दिलों में ताजा ही दिखेगी. बेहद कड़ी आलोचना हुई थी जाट आंदोलन के दौरान हुए उपद्रव पर.
राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के इतिहास को देख लीजिये. उसमें जिस प्रकार रेल की पटरियां उखाड़ी जाती थीं, उसकी याद भी धुंधली नहीं पड़ी है.

जाहिर है, चुनावी लाभ लेने के लिए मराठा-आरक्षण का जो दांव भाजपा सरकार ने महाराष्ट्र में चला है, उससे समूचे देश में 'आरक्षण के नाम पर उपद्रव' और उससे आगे बढ़कर 'आरक्षण के नाम पर राजनीति' करने को हरी झंडी मिल चुकी है.

जरा गौर कीजिए कि महाराष्ट्र में मराठों को आरक्षण देने का प्रस्ताव ज्योंहि पारित हुआ, ठीक तभी असदुद्दीन ओवैसी ने महाराष्ट्र में मुस्लिमों के लिए आरक्षण की मांग कर दी. इसके बाद तो 'सिलसिला' ही चल पड़ा!

महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण के पक्ष में भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना उतर गई. शिवसेना के विधायक सुनील प्रभु का बयान आया कि पिछड़े सभी... वह चाहे मुस्लिम ही क्यों ना हों, उन्हें आरक्षण देना चाहिए, उनको काम मिलना चाहिए, न्याय मिलना चाहिए!

सिर्फ मुस्लिमों को ही क्यों... गुजरात में ब्राम्हण--राजपूत को भी आरक्षण देने की मांग सामने आ गई. गुजरात में राजपूत कम्युनिटी के लीडर्स ने मांग कर डाली कि वे कुल जनसंख्या का महज 8 फ़ीसदी हैं और महाराष्ट्र में मराठों की तरह वह राज्य में 8 फ़ीसदी रिजर्वेशन की मांग करते हैं. इसी तरह गुजरात में ही ब्राह्मण समाज द्वारा ओबीसी आयोग को पत्र लिखकर उन्हें ओबीसी में शामिल करने के लिए सर्वे कराने की मांग कर डाली गयी.  बताया जाता है कि गुजरात में ब्राह्मण कुल आबादी का तकरीबन 9.5 फीसदी हैं.

कुल मिलकर लब्बो-लुआब यही है कि आरक्षण के नाम पर राजनीति करने वालों की 'चांदी' होने वाली है. यह देश का दुर्भाग्य ही है कि कल तक राम-मंदिर के नाम पर पूरे देश में होहल्ला हो रहा था, तो अब 'आरक्षण' के नाम पर देश भर के चैनल्स और मीडिया समूह खबरें देने में लग गए हैं.   

समझना मुश्किल है कि आखिर हम इस तरह के मुद्दों से हम कितनों का भला कर पाएंगे?

क्या वाकई सरकारी नौकरियों की इतनी संख्या है कि आरक्षण देने के बावजूद 'बेरोजगारी' पर ज़रा भी फर्क पड़ जायेगा?

और जब मराठा, जाट, गुज्जर, राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम और दूसरे तमाम समूहों को काम्पिटिशन करने का समान अवसर मिल रहा है तो फिर 'आरक्षण' का लॉलीपॉप क्यों दिखाया और चटाया जाता है?

देश और दुनिया जब आगे बढ़ रही है, तब हमारे नीति-निर्माता इसे पीछे धकेलने के प्रयास में क्यों लग जाते हैं, यह बात समझनी मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन-सी नज़र आती है! क्या वाकई चंद वोट और चुनाव जीतने की खातिर 'देश' को आरक्षण की तलवार से लगातार घायल करना जायज़ है?

कहाँ तक प्रत्येक 5 साल में जातिगत-आरक्षण की मात्रा कुछ फीसदी ही सही... घटाई जाती, 'क्रीमी लेयर' को आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाता और उसकी जगह 'आर्थिक और नए सामजिक पिछड़ेपन' को आरक्षण का आधार बनाया जाता... उसकी बजाय यहाँ तो और भी कुरेद-कुरेद कर 'आरक्षण के ज़ख्म' को गहरा किया जा रहा है!

पर यह 'ज़ख्म' देने वाले यह शायद ही समझ रहे होंगे कि ज्यादा दिनों तक ज़ख़्मी अंग 'कैंसर' का रूप धारण कर लेता है... लाइलाज 'कैंसर'!

कोई शक है क्या आपको कि 'आरक्षण के लॉलीपॉप' भी इसी ओर बढ़ रहे हैं... रोज एक कदम, कदम-दर-कदम... 'कैंसर की ओर'!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Maratha Reservations Issues Analysis in Hindi (Pic: loksatta)
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