अगर मीडिया चुप रहेगा, तो देश भी 'खामोश' हो जाएगा!

देश के बड़े काबिल अफसर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने हाल ही में एक बयान दिया था कि अगर आतंकवादी हमलों के बारे में मीडिया बोलना बंद कर दे तो आतंकवाद समाप्त हो जाएगा!
इसके लिए उन्होंने बकायदे बहुचर्चित पूर्व ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर मार्गरेट थैचर का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने अपने वक्तव्य में कभी यही बात कही थी.

Media Role and Terrorism (Pic: dnaindia)
निश्चित रूप से अजीत डोवाल को आतंक और आतंकियों की मानसिकता का गहरा ज्ञान है और उनका जीवन इन्हीं बारीकियों पर काम करते हुए गुजरा है. उनका वर्तमान बयान भी संभवतः मीडिया को अपनी जिम्मेदारियां ध्यान दिलाने के लिए दिया गया है, किन्तु फिर भी यह बयान बेहद आपत्तिजनक है. मूलतः एक ब्यूरोक्रेट द्वारा समूची मीडिया पर इस प्रकार की टिप्पणी अवांछनीय है. वैसे भी हाल-फिलहाल देश में मीडिया संस्थानों पर वैसे ही प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं, तमाम मीडिया संस्थानों के सरकार पर अनावश्यक रूप से मेहरबान होने की बात कही जा रही है, ऐसे में सरकार की सेवा में लगे एक ताकतवर ब्यूरोक्रेट का इस तरह से बयान देना अवश्य ही गहन चिंता का विषय है.

ज़रा गौर करें!
जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाई गई है और तकरीबन 2 महीने से अधिक समय हो चुका है. सरकार के इस निर्णय को देश भर में समर्थन मिला है, मीडिया से लेकर न्यायपालिका तक सरकार के इस फैसले में साथ खड़े रहे हैं, लेकिन ऐसी स्थिति अनंत काल तक नहीं बनाई रखी जा सकती है!

भारत की मीडिया अगर कुछ और दिन चुप रह भी जाए तो अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कतई चुप नहीं रहेगी.
ऐसी स्थिति में भारतीय मीडिया की साख भी दांव पर लग जाती है और उसे इस बात के लिए भर्त्स्ना झेलनी पड़ती है कि वह अपने ही नागरिकों पर लगे कर्फ्यू के बारे में लम्बे समय तक चुप बैठी रहती है.
क्या अजीत डोवाल साहब आतंकवाद के नाम पर हमेशा के लिए ही 'मीडिया की चुप्पी' का सन्देश दे रहे हैं?

हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का यह कहना एक हद तक जायज़ है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में धारणा प्रबंधन (Perception management) एक महत्वपूर्ण कड़ी है और मीडिया कयास लगाए, इसकी बजाय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ट्रांस्पेरेंट मीडिया पॉलिसी अपनाई जानी चाहिए.
जायज बात है कि मीडिया के प्रति सुरक्षा-एजेंसियां जिम्मेदार बनें और उसके प्रश्नों का ईमानदारी से सामना करें.
हालाँकि, खुद जब सरकार पर यह आरोप लग रहे हैं कि वह मीडिया-फ्रेंडली नहीं है तो फिर सुरक्षा एजेंसियों को डोवाल की यह सलाह कितनी व्यावहारिक है, इस बात पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है.

यह बड़ी पुरानी और अव्यवहारिक धारणा है कि आतंकवादी लोगों को डराते हैं और अगर मीडिया नहीं लिखेगा तो किसी को पता ही नहीं चलेगा. डोवाल ने यह अपने वक्तव्य में यह बड़ा अजीब उदाहरण भी दिया कि अगर स्कूल जाते वक्त किसी के बेटे का अपहरण और हत्या हो जाती है तथा मीडिया इसे नहीं छापता तो लोगों को पता नहीं चलेगा.'

अपने इसी वक्तव्य में डोवाल ने मीडिया को प्रशिक्षित करने और उसे 'सहयोगी' बनाने की बात भी कही, जो अपने आप में 'मीडिया की अवधारणा' के ही खिलाफ है!जहाँ तक रही बात मीडिया और दुसरे संस्थानों की राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी समझने की तो 21वीं सदी में वोट देने का अधिकार रखने वाले प्रत्येक नागरिक को उस 'बारीक लाइन' का पता अवश्य है और यह कश्मीर से 370 हटाने के बाद बखूबी दिखा है.

मीडिया यह कार्य बिना किसी ट्रेनिंग के ही करती है और जिम्मेदारी के साथ करती रहेगी.
सजग होने, जिम्मेदार बनने की जिम्मेदारी सरकार की है, सुरक्षा-एजेंसियों की है और उस पर प्रश्न पूछने की जिम्मेदारी मीडिया की है.

इसलिए, यह बेहद हास्यास्पद बात है कि मीडिया सरकार और सरकारी-तंत्र की सहयोगी बन जाए!
कल को निर्दोषों पर अत्याचार हो, कल को फर्जी एनकाउंटर हों, कल को भ्रष्टाचार हो और मीडिया चुप रह जाए, वह सरकारी-तंत्र की सहयोगी बन जाए तब तो बच चुका 'लोकतंत्र'!

गौर करने वाली बात यह भी है कि तकरीबन एक दशक से गृह युद्ध में फंसा एक देश सीरिया, जहाँ गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न हुआ है, वहां से भी इंटरनेशनल मीडिया रिपोर्टिंग करती है और उसकी बातें दुनिया के सामने लाती है.

सच कहा जाए तो खबरें सामने आनी भी चाहिए!
कौन नहीं जानता है इसके अभाव में अकाउंटेबिलिटी समाप्त हो जाती है!

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सिर्फ आतंकवाद का नाम लेकर हम सरकारों को जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकते हैं और किसी चुनाव में किसी सरकार को बहुमत मिलने का मतलब यह भी नहीं है कि उस से पांच साल बाद ही सवाल पूछे जायेंगे, बल्कि मीडिया उस से पल-प्रतिपल, हर पल सवाल पूछ सकता है और उसे पूछना भी चाहिए.
इसके बगैर सरकारें, अफसरशाही निरंकुश हो जाती है और इतिहास इसका गवाह है.

आप इतिहास उठाकर देख लीजिए, दुनिया में मानवता का नुकसान जितना किसी अपराधी या आतंकवादी ने नहीं किया है, उससे ज्यादा निरंकुश सरकारों ने किया है.
आधुनिक समय का ही उदाहरण देख लें, दुनिया में 2 विश्व युद्ध हुए और उसका कारण कोई अपराधी-क्रिमिनल या आतंकवादी नहीं था, बल्कि निरंकुश सत्ताएं थीं.

खुद भारत में भी इमरजेंसी जैसा पीरियड जो आजाद भारत को कलंकित कर गया है, क्या उसके लिए क्या कोई आतंकवादी या कोई क्रिमिनल जिम्मेवार था?

इतिहास चीख-चीख कर कहता है कि निरंकुश सत्ता और सत्ता के गुरूर ने ही लोकतंत्र, मानवता और आम जनता को नुकसान पहुंचाया है.
यहां इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि आतंकवादी-संगठन या क्रिमिनल्स को बढ़ावा देना चाहिए.बिल्कुल नहीं!उन पर नियंत्रण बनाये रखना चाहिए और इसीलिए अपने टैक्स के पैसे से जनता द्वारा चुनी गई सरकार अजीत डोवाल जैसे अफसरों को तनख्वाह देती है, ताकि वह आतंकवाद पर नियंत्रण स्थापित किये रहे.

अगर किसी को ऐसा लगता है कि आतंकवाद पर पूर्ण नियंत्रण हो सकता है तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारें अपनी बेहतर पॉलिसीज के साथ, जनता से तालमेल करने का रास्ता ही अपना सकती हैं और इसके बाद कहीं आदर्श स्थिति सुलभ होती है.
और कोई दूसरा रास्ता नहीं और अगर है भी तो वह स्थाई कदापि नहीं!

इस प्रक्रिया के लिए भी हमें मीडिया की हर पल आवश्यकता है, क्योंकि सरकार अपनी पॉलिसीज ला सकती है, लेकिन जनता से तालमेल तो मीडिया के जरिये ही होगा.
इसके लिए हमें अकाउंटेबिलिटी के साथ सजग रखना चाहिए!

उम्मीद की जानी चाहिए कि लोकतंत्र में जनता के प्रति अकाउंटेबिलिटी हमेशा ही बनी रहेगी और तमाम सरकारें, चुनी हुई सरकारें जवाब देने से जरा भी कन्नी नहीं काटेंगी और ना ही अपनी जिम्मेदारी किसी अन्य संस्थान पर थोंपेंगी!

वह संसथान चाहे मीडिया हो, चाहे न्यायपालिका हो, चाहे मानवाधिकार आयोग हो, चाहे महिला आयोग हो या फिर कोई दूसरी संस्था!
हर एक संस्था अपना कार्य करे और तब ही आंतरिक संतुलन स्थापित होगा इस बात में दो राय नहीं.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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