महाराष्ट्र: राजनीतिक सहयोगियों को स्पेस देना आवश्यक है!

महाराष्ट्र की राजनीति की चर्चा समूचे देश में है. लोग-बाग इस बात पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि एक समान हिंदुत्व की विचारधारा लेकर चलने वाली शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी दोनों अलग हो गए हैं.
दोनों इस अवस्था में अलग हुई हैं, जब केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार तो है ही, महाराष्ट्र में भी जनता ने इन दोनों को सरकार बनाने का पूर्ण बहुमत दे दिया था. आप आश्चर्य करेंगे कि ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि शिवसेना भारतीय जनता पार्टी से अलग राह लेने को मजबूर हो गई?

Political Space and Alliance Partners, NDA, Maharashtra Episode 2019 (Pic: huff...)

सच कहा जाए तो मुख्यमंत्री और पावर शेयरिंग का कोई ऐसा वादा चुनाव के पहले सामने नहीं आया जिस पर शिवसेना चुनाव के बाद दावा ठोक रही थी. एक तरह से भाजपा से गठबंधन तोड़ने का यह बहाना भर नज़र आ रहा था.
कई लोग कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना गठबंधन से पहले इसे शिवसेना की बचकानी हरकत मान रहे थे, खासकर तब जब अजित पवार के समर्थन से देवेंद्र फडणवीस को राज्यपाल महोदय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.
सब ने कहा कि न माया मिली न राम और शिवसेना नुकसान में रहेगी!

बहरहाल, इस प्रकार का विचार रखने वाले लोगों को यह समझना होगा कि यह शिवसेना के अस्तित्व की लड़ाई थी. महाराष्ट्र और गठबंधन में वर्चस्व तो वह पहले ही खो चुकी थी, केंद्र में और पिछली फडणवीस सरकार में जिस प्रकार से उसे दोयम दर्जा देकर रखा गया था उसने उसके अस्तित्व पर संकट ला खड़ा किया था. 2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पहली बार उसे भारतीय जनता पार्टी से कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ा. कहने वाले कह सकते हैं अगर गठबंधन तोड़ना ही था तो चुनाव से पहले ही शिवसेना को भाजपा से गठबंधन तोड़ लेना चाहिए था.

अब आइये 2019 के लोकसभा चुनाव में, जब भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना को फ्री हैंड देकर लगभग बराबर सीटों (25-23) पर चुनाव लड़ा था, क्योंकि उस वक्त भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में सत्ता में आना था तो उसने शिवसेना का साथ लिया और उस समय कॉमन अंडरस्टैंडिंग यह थी कि राज्य में शिवसेना को वरीयता नहीं तो बराबरी अवश्य दी जाएगी. 

भाजपा ने सीट बंटवारे में बराबरी का 'बिटवीन दी लाइन्स' मेसेज भी दिया, चूंकि केंद्र में सरकार गठित करने की उसकी ज़रुरत ज़्यादा थी. बाद में जब विधानसभा चुनाव की बारी आई तब शिवसेना पर दबाव की राजनीति आजमाई गई और शिवसेना साथ आने को मजबूर सी थी.

कहा जा सकता है कि शिवसेना में कॉन्फिडेंस विधानसभा चुनाव से पहले कम था और उसे यह डर था कि कहीं भारतीय जनता पार्टी खुद से बहुमत में ना आ जाए या अगर कम सीटें रहती हैं तो एनसीपी के साथ गठबंधन न कर ले.



बहरहाल, चुनाव के बाद जब शिवसेना ने यह देख लिया कि उसकी अहमियत के बिना भाजपा सरकार गठित नहीं कर सकती तो उसने अपनी शर्तें लगा दीं. शिवसेना ने इस बात को भी भांप लिया कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार इतनी आसानी से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन नहीं देंगे, क्योंकि चुनाव से पहले जिस प्रकार से एनसीपी को तोड़ने की कोशिश हुई थी और ईडी का डर दिखाकर एनसीपी को दबाव में लेने की कोशिश की गई थी उसे यह मराठा क्षत्रप इतनी आसानी से भूलने वाला नहीं था. बस फिर क्या था खिचड़ी पकने लगी और अंततः उद्धव सरकार गठित हो गई.

उधर एनसीपी के सामने भी अस्तित्व का संकट था. आपको याद होगा कि 2014 में जब शिवसेना ने इसी प्रकार से भाजपा से अपना समर्थन वापस लिया था तो एनसीपी ने बाहर से समर्थन लेकर फडणवीस की सरकार बचा ली थी. एनसीपी को यह आस ज़रूर रही होगी कि केंद्र से उसे वरीयता मिलेगी और राज्य में भी उसे लाभ मिलेगा... या फिर नुक्सान तो कम से कम नहीं ही मिलेगा!

वरीयता को तो छोड़ ही दीजिए, एनसीपी को एक तरह से भारतीय जनता पार्टी ने हजम करने की कोशिश की. वस्तुतः महाराष्ट्र में भाजपा की कोशिश जल्द से जल्द शिवसेना से छुटकारा पाने की थी और इसी रणनीति के तहत अलग-अलग पार्टियों, खासकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से झोली भर भर के नेता तोड़े-फोड़े गए. यह मेसेज दिया गया कि एनसीपी तो अब ख़त्म ही है!

ऐसे में राजनीतिक रूप से इन पार्टियों को भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक होकर खड़ा होना पड़ा और बना महा अघाड़ी गठबंधन.

आप ध्यान दें कि राजनीति में सहयोगियों को स्पेस देना कितना आवश्यक है, यह महाराष्ट्र के घटनाक्रम से स्पष्ट रूप से पता चलता है. सच कहा जाए तो इस पूरे वाकए से अगर कोई सबसे ज्यादा खुश होगा तो वह बिहार के नीतीश कुमार होंगे!
कहा तो यह भी गया है कि शिवसेना के मन मस्तिष्क में जदयू के उपाध्यक्ष और पॉलिटिकल कंसलटेंट प्रशांत किशोर ने पावर-शेयरिंग का कीड़ा घुसेड़ा था.

बहरहाल, लालू प्रसाद यादव से गठबंधन तोड़कर बिहार में पुनः भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद से ही नीतीश कुमार एक तरह से बैकफुट पर थे और भाजपा भी उन्हें कुछ ख़ास भाव नहीं दे रही थी, लेकिन शिवसेना एनडीए से जैसे ही बाहर निकली वैसे ही जदयू, भाजपा को सलाह देने की स्थिति में आ गई. टेलीविजन पर उसके एक प्रवक्ता कहते सुने गए कि "ऐसा क्या हो गया कि 30 साल का गठबंधन सहयोगी अलग राह पकड़ने को मजबूर हो गया"?
ज़ाहिर तौर पर जदयू नेता एनडीए, खासकर भाजपा को गठबंधन-धर्म का सबक सिखा रहे थे.

इतिहास देखें तो यही स्थिति कभी कांग्रेस की थी. जब वह अपने शबाब पर थी तब क्षेत्रीय पार्टियां और क्षत्रपों को उभरने का मौका नहीं देती थी. नतीजा यह हुआ कि एक-एक करके उसके पाए खिसकने लगे और अब हालत ऐसी है कि वह किसी क्षेत्रीय पार्टी से अधिक अहमियत नहीं रखती है.

भारतीय जनता पार्टी को समझना होगा कि बेशक प्रधानमंत्री मोदी की देश भर में अपार लोकप्रियता है, लेकिन सिर्फ इसी लोकप्रियता के आधार पर वह अपने रास्ते लंबे समय तक मेंटेन नहीं कर सकती. केंद्र सरकार को लेकर बेशक मोदी का विकल्प जनता को नजर नहीं आ रहा हो, लेकिन राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है!
वस्तुतः पब्लिक अब मोदी-वेव से बाहर आने लगी है, खासकर राज्य स्तरीय और निकाय चुनाव में!
ऐसे में अगर भाजपा तमाम राज्यों में अपना सिक्का जमाया रखना चाहती है तो उसे राजनीतिक सहयोगियों को स्पेस देना ही होगा. उसे राजनीतिक गणित की बजाय केमिस्ट्री पर काम करना होगा.

गणित के हिसाब से महाराष्ट्र पर देखा जाए तो भाजपा के पास जरूर 105 सीटें थी और मुख्यमंत्री उसी का होना चाहिए था, क्योंकि शिवसेना के पास मात्र 56 सीटें थीं, लेकिन राजनीतिक केमिस्ट्री इससे अलग है. राजनीतिक केमिस्ट्री यह कहती है कि अगर सेंटर में सरकार बनाने के लिए शिवसेना पूरी तरह से सहयोग देती है तो राज्य में उसका अस्तित्व बनाए रखने में भारतीय जनता पार्टी को भी सहयोग करना चाहिए. उम्मीद है कि पिछले कुछ दिनों में कई राज्यों में सरकारें खोने के बाद भारतीय जनता पार्टी सहयोगियों को राजनीतिक स्पेस देने पर मंथन अवश्य करेगी.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.






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