पॉल्यूशन पर हम किस मुंह से शिकायत कर रहे हैं?

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अक्सर मैं अपने लेखों में तीसरी दुनिया के देशों की चर्चा करता हूं. तीसरी दुनिया के देश... जहां आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं, जहां अपार गरीबी है - भुखमरी है, जहाँ एन्वायरमेंट के प्रति केयर नहीं है, जहां लोग अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक नहीं हैं और इस वजह से विकसित देशों के मुकाबले वहां समस्याएं ज्यादा हैं. इतनी ज्यादा कि दम घुटने लगता है!

ऐसे में आप ही हम भारतीयों को खुद का ख्याल करना चाहिए, जहाँ रोज खराब हवा से हमारा दम घुट रहा है!

छठ महापर्व की सुबह यानी 3 नवंबर को मैं यह लेख लिख रहा हूं और दिल्ली क्षेत्र में जो लोग छठ घाट पर सुबह-सुबह गए होंगे, उन्होंने अम्लीय वर्षा (एसिड रेन) का आनंद जरूर लिया होगा. इससे पहले दीपावली के दिन से ही एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI), हिंदी में वायु गुणवत्ता सूचकांक तकरीबन 500 से ऊपर तैर रहा है.
स्कूल बंद कर दिए गए हैं और इस प्रदूषण के कारण लोगों को छाती में दर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ होनी शुरू हो गई है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के लोग मरीजों की बढ़ती संख्या की पुष्टि करने लगे हैं और सलाह देने लगे हैं कि घर से बाहर ना निकलें और अगर निकल भी रहे हैं तो मास्क की सहायता जरूर लें.

पर इन सब चीजों से हमें क्या फर्क पड़ता है?हम तो मस्त हैं!

Pollution and our irresponsibilities, Article in Hindi

जिंदगी के अगर आखिरी कुछ साल कम हो गए हैं या हम बीमार पड़ भी जाएं, तो इससे भला क्या फर्क पड़ता है?
सच्चाई तो यही है कि हमारे कानों पर जूं तक नहीं रेंगती... और न ही रेंगने वाली है!!

दिवाली के दिन कि मैं अपनी बात बताता हूँ...
पोलूशन को लेकर मेरा पटाखे लाने का मन बिल्कुल भी नहीं था और दिवाली से 1 दिन पहले तक मैं पटाखे लाया भी नहीं था, लेकिन बाकी लोगों को अपने बच्चों के लिए पटाखे लाते देख मन में पटाखों के प्रति थोड़ा लालच जरूर था!
उस लालच को हवा दिया मेरी श्रीमती जी ने और बोला कि "दूसरों के बच्चे पटाखे चलाएंगे और हमारे बच्चे पटाखे नहीं चलाएंगे?"

बस सख्त लौंडा पिघल गया... और बच्चों के लिए यहां-वहां पटाखे ढूंढने लगा.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्णय के बाद आसपास पटाखे नहीं मिल रहे थे, लेकिन एक लाइसेंसी दुकान मिल ही गई. यूं उस दुकान पर भी एक नोटिस चिपका हुआ था कि-
"माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सिर्फ फुलझड़ी और अनार मिल रहे हैं."

वहां पहले ही काफी भीड़ लगी हुई थी. मैं भी लपक कर पहुंचा और वहां जाने पर पता चला कि पहले ही अनार खत्म हो गया है.
खैर, मैंने भी पोलुशन फैलाने और बच्चों समेत खुद की भावनाओं के बीच में फंसकर कुछ पैकेट फुलझड़ियां ले लीं. अनार होता तो प्रकाश-पर्व पर उसे भी ले ही लेता... आखिर प्रकाश फैलाना पुण्य का काम जो है!

बहरहाल, वह फुलझड़ियां मैंने जलाई और दिल्ली की हवा में धुएं का जहर भी घोला और अब, जब उसी शहर के गंदे धुएं में मेरे बच्चे सांस ले रहे हैं तो मैं भला किस मुंह से शिकायत करूं?सच्चाई तो यही है कि हम इसी धुएं के आदी हैं और इसीलिए मैं जब कहता हूं कि बेशक हम विकासशील देशों की पंक्ति में आगे खड़े हों, लेकिन हमारी मानसिकता वर्ल्ड वर्ल्ड कंट्री की ही है.

अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग कर जब हम सरकार की बात करते हैं तो चाहे मेट्रो हो, चाहे दूसरी जगहें, अपने कार्यों का बड़ा-बड़ा बखान करते हुए केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के कई सारे पोस्टर मिल जाएंगे... कैंपेन मिल जाएंगे. उसमें कोई स्कूलों की बिल्डिंग गिनवा रहा है तो कोई किसी ख़ास अवसर पर 551000 दीप जलाने को अपनी उपलब्धि बता रहा है, लेकिन प्रदूषण को लेकर सरकारों द्वारा ना कोई ठोस स्टेप लिया जाता है और ना ही कोई असरदार सरकारी जागरूकता-कार्यक्रम ही चलाया जाता है.

यहां तक कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के पटाखों पर दिए गए आदेश को लागू करने में किस स्तर की हीला-हवाली हुई है, इसका अंदाज़ा लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है. सोचिये! अगर हीला-हवाली नहीं हुई होती तो दिल्ली भर में पटाखों की धूम धड़ाक नहीं मचती!

सच्चाई तो यही है कि अंदरखाने पटाखे जबरदस्त ढंग से बिके हैं. समझ में नहीं आता है कि इसी दिल्ली में जब प्रधानमंत्री जी की भतीजी का पर्स गुम हो जाता है, तब समस्त पुलिस बल मिलकर सीसीटीवी की फूटेज निकालकर, अपने दूसरे सोर्सेज के माध्यम से अपराधियों को धर दबोचने में सफल रहती है, लेकिन इसी दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद करोड़ों की संख्या में पटाखे फोड़े गए.

यहां तक कि दिवाली से अगले दिन भी बड़ी मात्रा में पटाखे फोड़े गए!!आखिर वह पटाखे कहां से आए?आखिर वह दिल्ली की सीमा में घुसे कैसे... यह जांच का विषय है और जांच जरूर होनी चाहिए क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उल्लंघन का मामला है.

दिल्ली सरकार को तो इस मामले में कुछ खास करना नहीं है. ऑड-इवन प्रोग्राम जारी करके वह पहले ही निश्चिंत हो गयी कि वह प्रदूषण कम करने में अपनी भूमिका अदा कर चुकी है. तमाम मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर वह दिल्ली को दुनिया के सर्वोत्तम शहरों में शुमार कर लेगी, ऐसा उसे लगता है... बल्कि उसे पुअर भरोसा भी है.
पिछले 5 साल लगातार शासन करने के बावजूद अगर दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 1000 से ऊपर पहुँच गया है तो उसमें भला मुख्यमंत्री केजरीवाल महोदय का क्या दोष हो सकता है? ज्यादा करेंगे तो आप दिल्ली सरकार से प्रश्न पूछेंगे... तो वह अपनी जिम्मेदारी पंजाब और हरियाणा गवर्नमेंट पर डाल के चुप हो जाएगी कि पराली जलाने से यह सारा संकट उत्पन्न हो गया है और भला दिल्ली सरकार इसमें कर ही क्या सकती है?

थोड़े और प्रश्न पूछेंगे तो वह केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को इस समस्या के प्रति लापरवाह बताएगी और फिर शुरू हो जाएगी 'गन्दी-राजनीति'!

मैं कहता हूँ राजनीति होनी चाहिए... ज़रूर होनी चाहिए, किन्तु समस्या से पहले यह राजनीति क्यों नहीं होती है?
मनीष सिसोदिया आज कह रहे हैं कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर इस मुद्दे पर तीन-तीन मीटिंग्स रद्द कर चुके हैं तो यही बात वह पहले क्यों नहीं उठा रहे थे?
उनके पास तो धरना करने का अपार अनुभव भी है... उन्होंने प्रकाश जावड़ेकर के ऑफिस के सामने बैठकर धरना क्यों नहीं दिया??

बहरहाल... अपनी और सरकार की जिम्मेदारियों के बाद आप आइये समाज के उन ठेकेदारों के पास, जिन्हें एनजीओ कहते हैं!

तमाम एनजीओ पर्यावरण के मुद्दों पर बड़े-बड़े कार्य करने, जागरूकता फैलाने के दावे करते हैं, लेकिन कॉर्पोरेट कंपनियों से सेटिंग करके, कुछ हिस्सा उन्हीं को वापस कर और बाकी सीएसआर फंड अपनी जेब में दबाकर वह अपने कार्यों की इतिश्री समझ लेते हैं और फिर शोर मचाते हैं कि वह देखो दिल्ली गैस चेंबर बन गई है!
वह देखो दिल्ली में कितना प्रदूषण है... वह देखो सरकार काम नहीं कर रही है... और वह देखो लोग बाग तो पटाखे छोड़ रहे हैं. लोग बाग तो सुधर ही नहीं सकते हैं.

प्रश्न अवश्य उठता है कि आखिर हम शिकायत करें भी तो किस मुंह से?
क्या वाकई हमें शिकायत करने का हक है?
वह चाहे कोई अकेला व्यक्ति हो, संस्थान हो, सरकार ही क्यों न हो, क्या वाकई उसको शिकायत करने का हक है?

पर शिकायत करनी पड़ेगी, नहीं तो शिकायत के लिए न हम होंगे और न हमारी आने वाली पीढ़ियां!
हमें शिकायत इसलिए करनी पड़ेगी, क्योंकि हमें सच्चाई नहीं पता या पता भी है तो आधी-अधूरी... अथवा हम सच्चाई को विस्मृत कर जाते हैं!

पर हमें सच्चाई पता होनी चाहिए!
हमें पता होना चाहिए कि राजस्थान में पिछले 50 वर्षों का औसत तापमान बढ़ गया है!
हमें पता होना चाहिए कि मानव गतिविधियों से जलवायु परिवर्तन बुरी तरीके से प्रभावित होता है और दुनिया भर के सैकड़ों वैज्ञानिक संगठनों ने इस बात को एक सुर में मान लिया है.
हमें यह भी पता होना चाहिए कि समुद्र में माइक्रो प्लास्टिक के पार्टिकल आकाशगंगा में मौजूद स्टार्स से 500 गुना ज्यादा हैं... तकरीबन 51 ट्रिलियन के आसपास.

सिर्फ दिल्ली के पटाखे ही क्यों... जो प्लास्टिक की बोतल हम यूज करते हैं... उस एक बोतल से 80 ग्राम से अधिक कार्बन फुटप्रिंट उत्पन्न होता है. 80 ग्राम का मतलब तो आप समझते ही होंगे. अगर कभी सब्जी-मार्केट में गए होंगे तो 100 ग्राम लहसुन और 100 ग्राम धनिया से इसके वजन का आपको अंदाजा लग जाएगा और अगर आपको यह कम लग रहा है तो आप यह जान लीजिए कि सिर्फ अप ही एक बोतल यूज़ नहीं करते हैं बल्कि बात उन सभी लोगों की है, उन कंपनियों की है, उन सरकारी पॉलिसीज की है जो अनावश्यक रूप से इसके इस्तेमाल की इजाजत देती हैं.

इंवॉल्वमेंट को लेकर हमारी जागरूकता कितनी है यह बात हम क्या कभी समझ सकेंगे... इस बात में बड़ा क्वेश्चन मार्क है!

क्या हम समझते हैं कि ना केवल हम ग्रीनहाउस गैस बड़े लेवल पर रिलीज करते हैं, बल्कि वनों की कटाई में भी हमारा प्रमुख स्थान है. दुनिया भर में यातायात के साधन अकेले 15% से अधिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित करते हैं. इसी प्रकार भोजन को बर्बाद करने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है, जिससे भयंकर रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित होती है.

इस्लामिक स्टेट के बगदादी को मारकर अपनी पीठ अमेरिकी प्रेजिडेंट थपथपा लेते हैं, किन्तु पेरिस में हुआ जलवायु समझौता और 2 डिग्री सेल्सियस तापमान कम करने का सपना... सपना ही रह जाता है, क्योंकि अमेरिका को ग्रेट बनाने का नारा देने वाले डोनाल्ड ट्रंप इसे फिजूल मानते हैं!

यकीन मानिये, हम हद दर्जे के बेकार लोग हैं, क्योंकि बिजली की खपत हम बेतहाशा करते हैं. हमें शायद यह नहीं पता है कि वह बिजली जिस कोयले से और दूसरे गैसेज से उत्पन्न होती है उससे भारत में 65% से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्पन्न होती है.
पर हम बिजली का संरक्षण क्यों करें?

दिल्ली में तो बिजली फ्री है... और फ्री-चीज का भी कहीं संरक्षण किया जाता है क्या?

और हम पैसे कमाते हैं... इसलिए हम बिजली की खपत खूब करेंगे और जलने देंगे कोयला और लोगों की सांसो में जहर घुलने देंगे.

जलवायु परिवर्तित होती है तो हो जाए... समुद्र का जलस्तर बढ़ता है तो बढ़ जाए... इससे हमें क्या?
लोगों को तमाम बीमारियां होती हैं तो हो... हमें तो नहीं हो रही हैं ना... हम तो सुरक्षित हैं और जब होगी तब की तब देखी जाएगी.

रूकिये... जाइये नहीं, क्योंकि हमारे साथ काम कर चुकीं, एक्स-कलीग पूजा यादव ने इसी विषय पर दो लाइनें लिखीं हैं. बाद में तो आप सो ही जायेंगे, पर अभी तो सुनते ही जाइए...

हम सांस ले रहे हैंदिल्ली में प्रदूषण है
हम जानते हैं
हम महसूस कर रहे हैं
फिर भी बेफिक्र हैं
दफ्तर आ रहे हैं
चर्चा कर रहे हैं
की-बोर्ड पीट रहे हैं
हम सांस ले रहे हैं
राख की चादर हैहम ये भी जानते हैं
हम महसूस कर रहे हैं
जिसे हम ओढ़े हुए हैं
हर सांस के साथ ये
भेद रही है शरीर को
फिर भी बच्चे स्कूल जा रहे हैं
किताबें पढ़ रहे हैं
ख़ाली कागज़ भर रहे हैं
हम सांस ले रहे हैं
मिर्ची की तरह लगने वाला धुआं है
हम जानते हैं
हम महसूस कर रहे हैं
हर रोज़ की तरह खाना खा रहे हैं
पानी पी रहे हैं और ले रहे हैं धुएं की कश
एक ऐसी कश, जो बर्बादी की शुरुआत हैऔर हम सब जानकार भी अनजान है…..
हम सांस ले रहे हैं............
(कविता: पूजा यादव के फेसबुक से, साभार)

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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Web Title: Pollution and our irresponsibilities, Article in Hindi

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