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मार्क की पारिवारिक अहमियत के मायने - family, social, facebook zuckerberg donation of 99 percent shares, hindi article

'वसुधैव कुटुंबकम' मतलब सम्पूर्ण संसार ही हमारा परिवार है, का मन्त्र और तंत्र देने वाला हमारा भारत संसार से घटकर, असहिष्णु राजनीति (हालिया मुद्दे) , उससे घटकर असामाजिक तंत्र (जातिवादी, भीड़तंत्र मानसिकता), उससे घटकर संयुक्त परिवार विघटन और उससे भी घटकर एकल परिवार में तलाक जैसे मामलों के लगातार बढ़ने तक कब आ पहुंचा है, यह बात गहराई से सोचने पर हमारे सामाजिक दिवालिया होने की ओर मजबूती से ऊँगली उठती प्रतीत होती है. सोचने पर दिमाग कुंद हो जाता है कि रामायण के राम जैसा पारिवारिक नायक देने वाला हमारे समाज में आज 'पारिवारिक नायकों' का अकाल क्यों पड़ गया है? बदलते समय में तमाम अर्थशास्त्री तो उभर कर खूब सामने आ रहे हैं, किन्तु जिनके लिए यह अर्थशास्त्र है, वह व्यक्ति और वह पारिवारिक व्यवस्था कहाँ है? कहाँ हैं समाजशास्त्री जो बदलते दौर में परिवर्तनों के साथ व्यवस्था को प्रासंगिक बनाये रखने पर ज़ोर देते रहे हैं? आखिर, इस बात से किसे इंकार हो सकता है कि जब तक व्यक्ति ठीक नहीं होगा, तब तक कुछ भी ठीक नहीं! और यह बात भी उतनी ही तथ्यात्मक है कि व्यक्ति निर्माण की प्रथम इकाई परिवार है. बताना उचित होगा कि यह परिवार ऐसा शब्द है, जो आप ही 'संयुक्त' परिवार की ओर इशारा करता है. आज व्यक्ति कुंठित, दुखी, असामाजिक यहाँ तक कि आतंकवादी, उग्रवादी बन रहा है तो क्या हमें फिर से पारिवारिक अवधारणा की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है? दुनिया में बढ़ रही तमाम नकारात्मक ख़बरों के बीच कुछ खबरें सकारात्मक आती हैं, लेकिन बावजूद इसके, इसे सही नज़रिये से नहीं देखा जाना चिंता पैदा करता है. 

फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने जब यह घोषणा की कि वह पिता बन गए हैं तो उन्होंने एक और अहम घोषणा की. दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्क कंपनी के कर्ताधर्ता जकरबर्ग ने अपनी नवजात बेटी के जन्म के समय फेसबुक पेज पर एक लेटर पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि वह और उनकी पत्नी अपनी कंपनी के 99 फीसदी शेयर्स चैरिटी में दे देंगे. जी हाँ! 99 फीसदी की चैरिटी, जिसकी वर्तमान अनुमानित वैल्युएशन लगभग 45 बिलियन डॉलर है. हालाँकि, इस दान से आगे जो सन्देश मार्क ने दिया है, वह कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. जकरबर्ग ने इस मामले में साफ़ कहा है कि वह अफनी बेटी मैक्स और दूसरे बच्चों के लिए इस दुनिया को रहने के लिए बेहतर स्थान बनाना चाहते हैं और इसी कोशिश के तहत वह कंपनी के शेयर्स के बाबत यह फैसला ले रहे हैं. कहने को लोग इसे एक भावुक पिता का फैसला कह सकते हैं, किन्तु उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मार्क सेल्फ मेड अरबपति होने के साथ-साथ बेहद तेज दिमाग वाले शख्स के रूप में पहचाने जाते हैं, इसलिए उनका फैसला भावुकता की बजाय जिम्मेदारी से भरा ज्यादा दिखता है. यही नहीं, बल्कि जकरबर्ग ने अपने जीवन में परिवार के महत्व को रेखांकित करते हुए यह भी कहा कि उन्होंने अपने पहले बच्चे के जन्म पर दो महीने की छुट्टी लेने की योजना बनाई है. जकरबर्ग ने इस फैसले में कहा कि कामकाजी माता-पिता का अपने नवजात शिशु के लिए वक्त निकालना बच्चे और परिवार के लिए अच्छा होता है. समझना मुश्किल नहीं है कि अमेरिका के सबसे व्यस्त कार्यकारी के पारिवारिक जीवन पर दृढ़ता के क्या मायने हैं! 

आज जब पारिवारिक जीवन की महत्ता घटती जा रही है, संबंधों को लालच और कुटिलता से रौंदा जा रहा है, महत्वाकांक्षा और वासना ने पवित्र पारिवारिक रिश्तों पर ग्रहण लगा दिया है, ऐसे में अगर ज़ुकरबर्ग ने उदाहरण पेश करने का साहस किया है तो इसे सराहना और प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि यह पहला अवसर है, जब ज़ुकरबर्ग ने अपने पारिवारिक चेहरे को आगे किया है, बल्कि पिछले दिनों जब नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे और फेसबुक ने उनके लिए प्रश्नोत्तरी सेशन का आयोजन किया था, तब ज़ुकरबर्ग के अपने माता-पिता के प्रति सम्मान को दुनिया ने देखा. तब नरेंद्र मोदी का अपनी माँ के लिए रोना भी काफी चर्चित रहा था. बहरहाल, भारत जैसे देश, जहाँ के संयुक्त परिवार प्रणाली को पूरी दुनिया में एक आदर्श दर्जा हासिल था, वह तो टूट ही रही है, साथ ही साथ एकल परिवार पर भी बात-बेबात तलाक की समस्याएं आम हो चुकी हैं, ऐसे में ज़ुकरबर्ग  का कदम उन एक्जीक्यूटिव्स के लिए प्रेरणादायक हो सकता है, जो ज़िन्दगी की भागदौड़ में परिवार को काफी पीछे छोड़ देते हैं. और अंततः उनके हाथ पछतावे के अतिरिक्त कुछ नहीं आता. आज भारत में शीना-इन्द्राणी जैसे मामले क्यों बढ़ रहे हैं और विदेशों में ज़ुकरबर्ग जैसे लोग पारिवारिक अहमियत की ओर सोचने और करने में आगे आ रहे हैं, इस बाबत भारतीय समाज और समाजशास्त्रियों (अगर हैं तो...) को सोचना ही होगा! यह बात स्वच्छ जल की तरह साफ़ है कि अंततः आप परिवार के बिना कुछ हो नहीं, शायद आपके पास जीने की वजहें भी कम पड़ जाएँ, इसलिए बदलती परिस्थितियों से तालमेल करना ही सर्वोत्तम विकल्प है. 

ठीक वैसे ही, जैसा तालमेल ज़ुकरबर्ग ने बिठाया है. ज़ुकरबर्ग के पारिवारिक दृढ़ता के कदम को थोड़ा और स्पष्ट करें तो यह साफ़ दिखता है कि वह एक अच्छे पिता की तरह दिखना चाहते हैं और अच्छे पिता का मतलब यही है कि वह अपने बीवी-बच्चों के लिए समय निकाले, अपने माँ-बाप का सम्मान और सेवा करे और इससे बढ़कर समाज के लिए कुछ करे, ताकि उसके बच्चे अपने सहपाठियों के बीच गर्व महसूस कर सकें! जाहिर है, परिवार को ध्यान और समाज की सामर्थ्यपूर्वक सेवा ही आपको एक बेहतर इंसान बनाती है, बाकि धन कमाना, उसका उपयोग या दुरूपयोग करना सब आप ही सीख जाते हैं! उम्मीद करना चाहिए कि जब पारिवारिक मूल्यों का लगातार क्षरण हो रहा है, ऐसे में ज़ुकरबर्ग के पारिवारिक फैसलों को एक सनसनी के तौर पर न देखकर 'एक प्रेरणा' के रूप में लिया जायेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक बेहतर दुनिया में सांस ले सकें ... ज़ुकरबर्ग के ही शब्दों में!

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