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भारत माता की जय, किन्तु... Bharat Mata ki Jay, hindi article, mithilesh

अपने अनुभव से यह बात कह सकता हूँ कि किन्तु, परन्तु जैसे शब्द निश्चित रूप से किसी महत्वपूर्ण मामले में प्रयोग नहीं किये जाने चाहिए. विशेषकर जब यह देशभक्ति का सवाल हो, राष्ट्र का सवाल हो तब तो कतई नहीं! पर 'भारत माता की जय' के सन्दर्भ में अगर ये शब्द लगाई जा रहे हैं तो हमें स्थिति की गम्भीरता पर निश्चय रूप से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अगर एक तरफ हम अपने देश की महानता, उसके लोकतंत्र और उसके विश्व गुरु होने का दम भरते हैं और दूसरी ओर अगर 'भारत माता की जय' जैसी आधारभूत शब्दावली पर विवाद उत्पन्न करते हैं और उत्पन्न विवाद को बढ़ावा देते हैं तब यह स्थिति निश्चय ही शोचनीय हो जाती है. शोचनीय इसलिए, क्योंकि नेता और विवाद उत्पन्न करने वाले लोग तो विवाद उत्पन्न करके चले जायेंगे, किन्तु कच्चे मन के युवा और विद्यार्थियों को इन शब्दों से अंधभक्ति अथवा नफरत करने की सीख स्थायी रूप से दे जायेंगे! मैंने पहले विचार किया था कि इस मामले को अनदेखा किया जाना चाहिए और इस पर लेख इत्यादि नहीं लिखूंगा. कुछ ऐसी ही धारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी को भारत माता की जय बोलने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए, जिससे लोग खुद यह बोलें. हालाँकि, यह भी एक बिडम्बना ही है कि इस पूरे मामले में हालिया विवाद भी मोहन भागवत के बयान के बाद ही शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया था कि 'आज की युवा पीढ़ी को भारत माता की जय बोलना भी सिखाना पड़ता है.' हालाँकि, उनका बयान एक सामान्य बुजुर्ग जैसा ही था जो बच्चों को अच्छी आदतें सिखाना चाहता है, किन्तु उनके बयान के बाद बैटिंग करने वालों ने इस मुद्दे को गलत तरीके से तूल दिया और इस कदर तूल दिया कि खुद मोहन भागवत को ही इससे पीछे हटना पड़ा. आखिर कोई भी समझदार व्यक्ति देश को इन मुद्दों पर कैसे उलझा सकता है? 

इस मुद्दे का हालिया प्रभाव श्रीनगर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) में नजर आया, जहाँ 31 मार्च से कश्मीरी और ग़ैरकश्मीरी छात्रों के बीच तनाव बना हुआ है. हालाँकि, इसके पीछे तमाम दूसरी वजहें एवं विघटनकारी शक्तियों का प्रकोप भी है, लेकिन सच तो यही है कि इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने का 'गैप' छोड़ा गया है. व्यक्तिगत रूप से मुझे कतई नहीं लगता है कि 'भारत माता की जय' के मुद्दे को तूल देकर हम देशभक्तों की संख्या में बढ़ोत्तरी कर सके हैं, बल्कि इसके विपरीत नरेंद्र मोदी के विकास के अजेंडे को कहीं बड़ा झटका ही लगा है. सहिष्णुता-असहिष्णुता के बाद इस मुद्दे को सर्वाधिक चर्चा मिली है और ये बहस जैसे ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है! इसी कड़ी में, दारुल उलूम के मुफ़्तियों का फतवा सामने आया है जिसके मुताबिक ये कहा गया कि 'भारत माता की जय' बोलना इस्लाम के खिलाफ है, हालांकि दारुल उलूम से चले ऐसे फतवे पर इस्लामी दुनिया में ही सवाल खड़े होने लगे हैं. पहले भी जब असदुद्दीन ओवैसी ने बयान दिया था तब जावेद अख़्तर और कई दूसरे लोग उसके ख़िलाफ़ खड़े हो गए थे इस बार भी इस फतवे पर सवाल उठ रहे हैं. इस पूरे मुद्दे पर बीच की लाइन को गौर से देखना आवश्यक है. दारुल उलूम का कहना है कि ये नारा उनके लिए जायज़ नहीं है. हालांकि उनका साफ़ कहना है कि वो एक मज़बूत भारत और भारतीयता के हिमायती हैं लेकिन वो जिस तरह 'वंदे मातरम' नहीं बोल सकते उसी तरह 'भारत माता' की जय भी नहीं बोल सकते. इसके पीछे उन्होंने तमाम इस्लामी विद्वानों, मौलवियों के हवाले से तर्क भी प्रस्तुत करने की कोशिश की है. दारुल उलूम का मानना है कि 'इंसान ही इंसान को जन्म दे सकता है, धरती मां कैसे हो सकती है? ठीक है, सबकी अपनी बातें हैं और सबका अपना विश्वास है और अगर वह देश के कानून का पालन करते हैं तो बेवजह के विवाद से क्यों नहीं बचना चाहिए? मैं कई बार अति देशभक्ति दिखाने वालों से पूछता हूँ कि 'क्या देश का बहुसंख्यक हिन्दू ही इस बात से इत्तेफाक रखता है कि ऐसे मुद्दों पर उत्पात मचाया जाय!'  

मैं ऐसे लोगों से पूछता हूँ कि कितनी मुश्किल और कई पीढ़ियों की तपस्या के बाद नरेंद्र मोदी जैसे नेता के चमत्कार से दक्षिणपंथी सत्ता में आ सके हैं. ऐसे में बीफ, सहिष्णुता, भारत माता की जय जैसे विकास से दूर के मुद्दों के कारण हिन्दू बिदक गया तो... ?? तो फिर 2019 के चुनाव में भाजपा केंद्र की सत्ता से बाहर हो जाएगी, फिर कैसे बनेगा 'हिन्दू राष्ट्र'! फिर कौन बोलेगा 'भारत माता की जय'? सच तो यह है कि भाजपा के कई नेताओं और समर्थकों को खुद ही देशभक्ति और भारत माता से मतलब नहीं है, नहीं तो वह कोरी बकवास करके जनता के बीच वैमनस्य फैलाने की बजाय ठोस कार्यों में लगे रहते! उन्हें इस बात का मलाल होना चाहिए कि वह दिल्ली और बिहार में क्यों हार गए? उन्हें इस बात का भी मलाल होना चाहिए कि अभी बंगाल, आसाम और पंजाब इत्यादि राज्यों के चुनावों में जनता उनके बारे में, उनकी नीतियों के बारे में क्या सोचती है? उन्हें इस बात की भी फ़िक्र होनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी की तमाम योजनाओं की जानकारी जनता तक कैसे पहुंचे, जो अभी हो नहीं रहा है और इसके बारे में मोदी कई बार खुलकर अपने नेताओं और सांसदों पर नाराजगी तक जाहिर कर चुके हैं! आखिर, देश भक्ति भी जबरदस्ती की चीज़ क्यों बनाई जा रही है? अगर देशभक्ति दिखानी है तो जुबान से नहीं अपने कर्म से दिखाओ. भारत माता का बार-बार नाम लेकर हम न भारत माता का सम्मान बढ़ाते हैं न भारत की शक्ति! फिर खोखली नारे बाजी से क्या फायदा? देश की जनता बखूबी देख रही है कि पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान के आईएसआई अफसरों को कैसे देश में घुसाकर भारतीय प्रतिष्ठान को नीचा दिखाया गया. वह तो शुकर है कि इस देश में विपक्ष के भीतर दम नहीं है, अन्यथा वह पठानकोट और पाकिस्तानी जेआईटी के मामले पर केंद्र और भाजपा की नाक में नकेल कस देते! किन्तु, भारत माता की जय बोलने का दिखावा करने वालों को यह नहीं समझना चाहिए कि देश की जनता को 'पठानकोट जैसे मामलों' की खबर या समझ ही नहीं है! है उसे समझ, किन्तु वह अपनी समझ का पिटारा समय पर खोलेगी.

जहाँ तक प्रश्न है भारत माता का तो हमें जरुरत है इस विषय में गहराई से सोचने और समझने की! आखिर, भारत माता एक आदर्श भारत की कल्पना ही तो है, एक ऐसे सुन्दर देश की, जिसमें कोई दुःख-तकलीफ , झगड़े-विवाद न हों, सबके पास रोजगार हो, कोई भोजन और जल के अभाव में न मरे, जैसा कि अभी हो नहीं रहा है! यदि ऐसा होता तो मुंबई हाई कोर्ट को आईपीएल और किसानों को जल के अभाव में तड़पने का प्रश्न नहीं उठाना पड़ता और न ही उसे तमाम धुरंधरों को फटकारना ही पड़ता! साफ़ है कि जब सामाजिक गैर बराबरी दूर होगी तो ऐसी 'माता तुल्य धरती' के लिए हर किसी के मुंह से जय निकलेगी, किसी से जबरन निकलवाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. आज देश के 30 प्रतिशत भूभाग पर नक्सलवाद फ़ैल चुका है, क्या उसके बारे में हम चिंतित हैं? कारण चाहे जो भी हो, किन्तु तथ्य यही है कि हमें सामाजिक, राजनीतिक रूप से अभी काफी लम्बा सफर तय करना है और इसके वगैर सिर्फ मुंह से 'भारत माता की जय' कहलवाने का कोई अर्थ भी है या नहीं, यह स्वयं ही विचार करने योग्य प्रश्न है. कभी कभी ऐसा लगता है कि समाज के बहुत बड़े तबके को "भारत माता की जय" नामक शस्त्र के सहारे उकसाया जा रहा है, जिसके पीछे तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ कहीं ज्यादे हैं. इसी पूरे वाकये को लेकर एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को एक राज्य की विधानसभा से सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया गया कि वह शख्स भारत माता की जय नहीं बोलना चाहता लेकिन वह 'जय हिन्द' बोल रहा है, लेकिन जय हिन्द से काम कहाँ चलने वाला आपको तो "भारत माता की जय" ही बोलना पड़ेगा, क्योंकि हम ऐसा चाहते हैं! ये कैसी देशभक्ति है, ऐसी खतरनाक देशभक्ति से समाज का क्या हाल होगा, यह विचारणीय प्रश्न हैं! एक तरफ असदुद्दीन जैसे लोग मुसलमानों को भड़काते हैं कि कोई गले पर छूरी भी रख दे तो 'भारत माता की जय' नहीं बोलना तो दूसरी ओर बाबा रामदेव और महाराष्ट्र के सीएम फड़नवीस कहते हैं कि भारत माता की जय नहीं बोलने वालों का गला काट देंगे या उसे इस देश में रहने नहीं देंगे! आखिर, इस तरह की चर्चा से हम क्या हासिल कर पा रहे हैं, सिवाय देश को पीछे धकेलने के, यह बात हर एक को समझनी चाहिए. 

अभी हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने सऊदी अरब जैसे कट्टर मुस्लिम राष्ट्र की यात्रा की और वहां उनकी मौजूदगी में मुस्लिम महिलाओं एवं पुरुषों ने "भारत माता की जय" के नारे लगाए, इसके लिए उन्हें बाध्य नहीं किया गया, बल्कि यह राष्ट्रगौरव स्वतः ही उनके भीतर उत्पन्न हुआ! भारत के भी आधे से अधिक मुसलमान यह मानने लगे हैं कि वह विश्व के अन्य मुसलमानों से सुखी और आज़ाद हैं, जो विश्व के अन्य मुसलमानों को नसीब नहीं है. साफ़ है कि इस तरह के विवादों से न प्रत्यक्ष रूप में कोई फायदा है और न ही विचारधारा के स्तर पर ही कोई बड़ा बदलाव किया जा सकता है, क्योंकि देश का बहुसंख्यक हिन्दू अपेक्षाकृत इस तरह के मुद्दों को नापसंद ही करता है. हिन्दू हितों और भारत माता की जय बोलने का आदेश देने वालों को पहले इस बात की ओर ध्यान देना चाहिए कि तमाम जातियों में बंटा देश किस तरह एकजुट हो! क्योंकि ऐसा होने के बाद ही भाजपा का अगले कुछ सालों तक सत्ता में रहना सुनिश्चित हो सकेगा, अन्यथा सत्ता हाथ से जाएगी और फिर व्यापक नेतृत्व से भाजपा और संघ को महरूम होना पड़ेगा. ऐसे में जल्दबाजी करके किसी भी बड़े बदलाव की अपेक्षा रखना उसकी 'भ्रूण-हत्या' के समान ही होगा. उम्मीद है 'भ्रूण-हत्या' का अर्थ 'भारत माता की जय' बोलने वाले जरूर ही समझते होंगे, आखिर हमारे देश में आज भी इसकी संख्या सर्वाधिक जो है!
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