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बैंकिंग-व्यवस्था में 'भरोसे का गंभीर-संकट'

भारत में बैंक हमेशा से विश्वास का पर्याय माने जाते रहे हैं. साहूकारी, ब्याजखोरी से भारतीय-व्यवस्था को मुक्त करने का श्रेय निश्चित रूप से भारतीय बैंकिंग को ही जाता है.

इससे आम जनमानस को चहुंओर लाभ हुआ. बैंकों पर लोगों का इतना अधिक भरोसा रहा है कि आज भी शेयर मार्केट और म्यूचुअल फंड वाले चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि बैंकों में ब्याज दरें कम हैं और अगर अपने पैसे को कोई तेजी से बढ़ाना चाहता है तो उसे म्यूचुअल फंड में, शेयर मार्केट में या दूसरे निवेश के तरीके आजमाना चाहिए.

Crisis in Banking Sector (Pic: ET)

इतनी धुआंधार अपील के बाद भी आखिर क्या मजाल कि अधिकांश भारतीय जनता बैंकों पर भरोसा करना कम तो कर दे?
उन्हें कम ब्याज लेना मंजूर है, उन्हें कम फायदा लेना मंजूर है, लेकिन उन्हें विश्वास के संकट का सामना करना कतई मंजूर नहीं है!

ऐसा विश्वास कोई आज नहीं जमा है, बल्कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद से ही यह उम्दा विश्वास भारतीय बैंकों ने जीता है.

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प्रश्न उठता है कि हाल-फिलहाल ऐसी क्या बात हो गई है कि बैंकों में लगातार एनपीए संकट की बात हो रही है, लगातार घोटालों की बात हो रही है, लोगों का पैसा असुरक्षित-सा दिखने लगा है और इसके केंद्र में सीधे-सीधे सरकारों पर आरोप लगने लगे हैं!
कभी बैंकों में बैड लोन की बात होती है तो कभी पीएमसी जैसे घोटाले सामने आ जाते हैं. तात्पर्य है कि पिछले दशक-भर से बैंक अच्छी खासी चर्चा बटोर रहे हैं और दुर्भाग्य से यह चर्चा नकारात्मक ज्यादा है.

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रहे और आईएमएफ में प्रमुख भूमिका निभा चुके जाने-माने अर्थशास्त्री रघुराम राजन भी बैंकिंग कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं और यह मायने इसलिए भी रखता है क्योंकि वह खुद भी रिजर्व बैंक के प्रमुख का दायित्व निभा चुके हैं.

हाल ही में जारी आईएमएफ की रिपोर्ट में भी भारत में आर्थिक विकास का अनुमान घटाकर 6.1 कर दिया गया है और इसके जवाब में वित्त मंत्री साहिबा रट्टा-अंदाज़ में यही कह रही हैं कि तुलनात्मक रूप से भारत की अर्थव्यवस्था अधिक मजबूती से आगे बढ़ रही है.

हालाँकि, आईएमएफ ने इस आंकलन के बारे में स्पष्ट करते हुए साफ़ कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की कमज़ोरी एवं उपभोक्ता व छोटे-मध्यम दर्जे के व्यवसायों के कर्ज़ लेने की क्षमता पर पड़े नेगेटिव असर के कारण आर्थिक विकास दर के अनुमान में कमी आई है.
जाहिर है 'प्रत्यक्ष को प्रमाण' की भला क्या आवश्यकता है?

साफ़-साफ़ कहा गया है कि वित्तीय क्षेत्र में बैंकिंग सेक्टर, विशेष रूप से गैर बैंकिंग संस्थाओं को लेकर सुधार किए जाने की ज़रूरत है.

वैसे वर्तमान गवर्नमेंट की अर्थशास्त्र के मोर्चे पर खासी किरकिरी हो रही है, तमाम सेक्टर में मंदी को लेकर उसकी आलोचना हो रही है और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अलग-अलग समय पर अलग-अलग बयान देकर चर्चा में बनी रहती हैं. "अभी हाल ही में उन्होंने बयान दिया है कि वर्तमान में बैंकों की हालत ज्यादा सुदृढ़ है, रघुराम राजन और मनमोहन सिंह के कार्यकाल से तुलना करने पर!"

सवाल उठता है कि अगर हालत इतनी ही सुदृढ़ है तो पीएमसी जैसे घोटाले क्या आसमान से आ रहे हैं? लाखों खाताधारक अगर वर्तमान में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं तो क्या वह आसमान से आ रहे हैं? 

जाहिर तौर पर पिछले कई सालों से बैंकिंग व्यवस्था नकारात्मकता से जूझ रही है और आईएमएफ ने भी इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाया है.

प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में मूलभूत बैंकिंग-नीतियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है या फिर आधुनिक-युग में सामने वाली चुनौतियों से रिजर्व बैंक नहीं निपट रहा है?

 Is this RBI failure? (Pic: HT)

जन-धन योजना जैसी बड़े पैमाने पर बैंकिंग से लोगों को जोड़ने की जो शुरुआत हुई, उससे लोग भी जुड़े हैं, लेकिन सवाल उठ खड़ा हुआ है किक्या उतने ही बड़े पैमाने पर बैंकिंग पर लोगों का भरोसा बना हुआ है और उससे भी ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या आने वाले दिनों में बैंकिंग पर लोगों का भरोसा बना रहने वाला है?
यह ऐसा प्रश्न है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक रणनीति तय करने की कोशिश करेगा और इस मूल प्रश्न पर तमाम नीति निर्धारकों को अवश्य ही ध्यान देना चाहिए.

अगर ऐसा नहीं होता है तो वित्तीय-क्षेत्रों की साख लगातार गिरेगी, जिसे थामना अत्यंत ही मुश्किल होगा और ऐसे में मुसीबतें बढ़ेंगे ही, साथ ही बढ़ेगी आम लोगों के जीवन में आने वाली कठिनाई भी!

इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, कमेंट-बॉक्स में अवश्य बताएं.


- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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