कोरोना-संकट: प्रत्येक स्तर पर 'नवीन कार्य-प्रणाली' विकसित करने की जरूरत

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फिलहाल चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ कोरोनावायरस की ही बातें हैं. इसके अलावा ना किसी को कुछ सूझ रहा है, ना कोई कुछ ठोस करने की हालत में है.

भारत में तकरीबन महीने भर के लॉक डाउन के बाद अब लगभग सुनिश्चित हो चुका है कि यह समस्या कोई 1 दिन की नहीं है और महीनों तक कमोबेश यह यूं ही चलेगी. ऐसे में हमें इसका अभ्यस्त होना ही पड़ेगा. वस्तुतः यह हमारी परीक्षा की घड़ी भी है और नए ढंग से समस्याओं का सामना करने की चुनौती भी!

समझना मुश्किल नहीं है कि जब चुनौती दो-चार दिन की होती है तो हर कोई उससे जल्दबाजी में वगैर सिस्टम बनाए निपटना चाहता है, लेकिन जब चुनौती लंबी हो, तब कार्य-प्रणाली विकसित करके अभ्यास के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प शेष नहीं रहता है. खास बात यह है कि इसमें व्यक्ति से समष्टि तक, हर एक को नए सिरे से अभ्यास करने की आवश्यकता है.

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आइये देखते हैं कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार से तमाम बदलाव हमारे दृष्टिकोण के साथ-साथ बेहतर परिणाम दे सकने में सक्षम हो सकेंगे...

सरकारी स्तर पर

चूंकि आधुनिक दुनिया में सरकार सबसे बड़ी इकाई के तौर पर कार्य करती है तो उसका प्रभाव भी लोगों पर सर्वाधिक होता है. ऐसे में उसकी कार्यप्रणाली कई स्तर पर बदल रही है, तो कई जगह इसमें बदलाव की बड़ी आवश्यकता है.

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उदाहरण के तौरपर विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की बात करें तो वहां के राष्ट्रपति को लेकर यह बात सामने आई थी कि वह लापरवाही बरत रहे हैं. शायद बदलाव को न स्वीकारने के कारण ही अमेरिका विश्व में कोरोनावायरस का हब बन गया. इसे लेकर ट्रम्प प्रशासन की खासी आलोचना भी हुई.बहरहाल, अब अमेरिका से भी डोनाल्ड ट्रंप के बदले रवैये को लेकर तमाम खबरें आ रही हैं कि वह रात दिन समस्याओं को अलग-अलग सुलझाने के क्रम में इतने मशगूल हैं कि उन्हें लंच तक करने का टाइम नहीं मिल रहा है.
जाहिर तौर पर डोनाल्ड ट्रंप एक बिजनेसमैन भी हैं और वक्त के अनुसार खुद को बदलना जानते हैं.

भारत के संदर्भ में बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर दिन देशवासियों से संपर्क कर रहे हैं. यह संपर्क जनरल होने के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से स्पेसिफिक भी हो रहा है. इससे उनके पास काफी बड़ी मात्रा में डाटा इनपुट आ रहा है और नीतियां बनाने में वह इसका प्रयोग भी कर रहे हैं.

PM Modi in Video Conferencing with State Chief Ministers during Corona Crisis

पीएम मोदी की एक बात जो हम सबको गौर करनी चाहिए वह यह है कि वह लगातार कह रहे हैं कि कोरोना वायरस ने "काम करने का तरीका बदल दिया है". अब वह खुद भी घर से काम कर रहे हैं.जाहिर तौर पर पीएम ने काम रोकने की बात नहीं की, बल्कि तरीके में बदलाव की बात की है, जो खुद उनकी कार्यप्रणाली में भी दृष्टिगोचर हो रहा है.

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बात करें तो तमाम मुख्यमंत्रियों के बीच करोना क्राइसिस के दौरान वह एक उदाहरण के तौर पर उभरे हैं. पहले दिन से जब सड़कों पर मजदूरों के पैदल चलने की बात आई थी, योगी आदित्यनाथ ने उनके लिए बसें भेज कर उन्हें सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाया. उनका यह क्रम लगातार जारी रहा और राजस्थान के कोटा शहर से यूपी के सीएम ने इंजीनियरिंग, मेडिकल की तैयारी करने वाले बच्चों को उनके मां बाप तक सुरक्षित पहुंचाया.

भारत के अन्य राज्यों में फंसे उत्तर प्रदेश के तमाम मजदूरों को लेकर भी योगी सजग रहे हैं और इस तरह उनकी कार्यप्रणाली में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है.

सजगता के मामले में बात करें तो उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का भी कार्य करने का ढंग उन्हें भारतीय मुख्यमंत्रियों की पंक्ति में आगे खड़ा करता है.

मुख्यमंत्रियों की ही पंक्ति में आगे बात करें तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार, जो एक सुलझे हुए राजनेता समझे जाते हैं, उन्होंने कोरोना को लेकर अपेक्षाकृत कम गंभीरता दिखलाई है. न केवल न्यूनतम गंभीरता, बल्कि कई बार तो वह अनमने से दिखे हैं. अपने प्रदेश के निवासियों की सुरक्षा करने की बजाय, उन्होंने पिंड छुड़ाने की बयानबाजी कहीं ज्यादा की है. 

संभवतः वह यह आंकलन करने में विफल रहे हैं कि कोरोना संकट या लॉकडाउन कोई 1 दिन का मामला नहीं है.
इसी प्रकार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसे लेकर अपेक्षाकृत सजगता दिखलाने में विफल रही हैं. इस संकट काल में राजनीति की बजाय सेन्ट्रल टीम के साथ को-ऑर्डिनेशन कहीं ज्यादा आवश्यक है.


इस क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मुख्यमंत्रियों से समन्वय बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं और यह एक बेहद सार्थक कदम है, क्योंकि कार्यप्रणाली जब तक नए ढंग से विकसित नहीं होगी, तब तक भिन्न सरकारें अपेक्षाकृत सही परिणाम देने में विफल रहेंगी और अगर सरकारें विफल होती हैं तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

ज़ाहिर है कि इस दिशा में सकारात्मक प्रयास जारी रहने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है.

संगठन के तौर पर

सरकारों के बाद जो सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सबसे बड़ा प्रभाव होता है, वह सामाजिक-धार्मिक संगठनों का होता है.दिल्ली में जिस प्रकार से तबलीगी जमात का मामला सामने आया, उसने लोगों को हिला कर रख दिया. तबलीगी जमात के मामले के बाद, जिस प्रकार समाज में नफरत भरे संदेश फैलने लगे, उसने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनचाहे रूप से चर्चित किया.

हालांकि इन नफरत ही संदेशों को थामने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत सामने आए और उन्होंने साफ कहा कि किसी एक कम्युनिटी से दूरी बनाना ठीक विकल्प नहीं है. निश्चित रूप से संगठनों को अपनी पुरानी कार्यप्रणाली में बदलाव के प्रति सजग रहना चाहिए.

RSS Chief Mohan Bhagwat Appeal during Corona Crisis


खुद, संघ की ही अगर बात करें, तो उसने कुटुंब शाखा के कॉन्सेप्ट का प्रयोग किया, जिसमें करोड़ों लोग अपने घरों में संघ की प्रार्थना करते नजर आए.

इसी प्रकार तमाम दूसरे संगठनों को अपने अनुयायियों या अपने से जुड़े लोगों में ठीक ढंग से जागरूकता का प्रसार करना चाहिए. यह प्रसारण निश्चित रूप से पहले की तुलना में थोड़ा अलग होगा, लेकिन यही तो वह बदलाव है जिसे इंसान आसानी से अपना सकता है, जबकि धरती पर दूसरे प्राणी बदलाव को उस आसानी से नहीं अपना सकते हैं. शायद इसीलिए हमारा अस्तित्व भी बचा हुआ है.

यकीन मानिए, अगर तमाम संगठन, कोरोना क्राइसिस के बीच अपनी कार्यप्रणाली में सकारात्मक बदलाव लाते हैं, तो न केवल हम इस संकट से जल्दी पार पा लेंगे, बल्कि एक बेहतर रूप में सामने आकर तमाम विश्व के लिए प्रेरणा भी बन सकेंगे.


बिजनेस के स्तर पर

इस स्तर पर भी सोच में बदलाव की बड़ी आवश्यकता है.अभी हाल ही में खबर आई है कि चीन की एक कंपनी ने कोरोना टेस्टिंग किट भारत को निर्यात किया, जिसमें 145% का बड़ा प्रॉफिट मार्जिन कमाया गया है.

सिर्फ चीन ही क्यों, भारत में भी पिछले दिनों कई न्यूज़ सामने आई थीं, कि सैनिटाइजर में बड़ा प्रॉफिट कमाया जा रहा है, मास्क मेकिंग में बड़ा प्रॉफिट कमाया जा रहा है. इसे लेकर कांग्रेसी नेता राहुल गाँधी ने पीएम से अपील करते हुए साफ़ कहा है कि "आपदा के बीच मुनाफाखोरी भ्रष्ट मानसिकता है, जिस पर प्रधानमंत्री को  कार्रवाई करनी चाहिए.

पुराने समय में संभवतः इस कार्यप्रणाली को लोग अपनाते थे, लेकिन वर्तमान में यह न केवल अमानवीय है, बल्कि बिजनेस के लिहाज से नुकसानदायक भी है. जरा कल्पना कीजिए कि अगर एक बार आपकी कंपनी की इस तरह की कोई न्यूज़ आ जाती है कि आप मुनाफाखोरी कर रहे हैं, तो यह खबर वायरल होने में जरा भी देर नहीं लगेगी. फिर आप अपने बिजनेस को उठाने की कोशिश ही करते रह जाओगे और वह बैठ जाएगा.
इतना ही नहीं, बल्कि आपकी व्यक्तिगत साख भी दांव पर लग जाएगी.

New Business Practices required to fight with Corona Viruses


एम्प्लायर के नजरिये से बात करें तो एक बिजनेसमैन के तौर पर आपको पहले काफी ऑप्शन उपलब्ध होते थे, जो आपके ऑफिस के बार आकर नौकरी के लिए खड़े रहते थे, लेकिन फिलहाल आपके पास महीनों तक सीमित ऑप्शन होंगे. सीमित इसलिए, क्योंकि अब काम करने का तरीका बदल रहा है और नए तरीकों से सामंजस्य बिठा सकें, ऐसे बहुत कम लोग शुरूआती दौर में उपलब्ध होंगे.


इसीलिए आप अपनी ट्रेनिंग देने के तौर-तरीकों में बदलाव करें और यही आपके व्यापार को बचा सकता है तो उसको उचित मात्रा में आगे भी बढ़ा सकता है.

व्यक्तिगत स्तर पर

वर्क फ्रॉम होम का अनुभव हम सब कर ही रहे हैं, पर अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो इस संकट को 1 दिन का संकट मानकर समय काटने में लगे हैं! यकीन मानिए, यह 1 दिन का संकट नहीं है, बल्कि कई महीनों तक आपको अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा. इसीलिए कार्य टाइमपास समझकर नहीं कीजिए, बल्कि नई कार्य प्रणाली के विकास में खुद को पूरी तरह से झोंक दीजिये.

ध्यान रहे, अब कार्य करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नई कार्य प्रणाली में एफिशिएंसी भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर है. बेहतर से बेहतर रिजल्ट देना जब आपकी प्राथमिकता होगी तो लॉकडाउन का असर काफी हद तक कम करने में आप व्यक्तिगत रूप से सक्षम हो पाएंगे. 

इसी प्रकार बात करें तो भारत में तमाम पुरुष अभी घर पर हैं और इस बीच एक दुखद आंकड़ा सामने आया है कि घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है. यकीन मानिए, अगर 1 महीने के लॉक डाउन में इस तरह की खबरें आती हैं, तो यह काफी चिंताजनक है. क्योंकि यह स्थिति लंबी खिंच सकती है. ऐसे में आपको एडजस्टमेंट की प्रक्रिया जल्द से जल्द अपना लेनी चाहिए और नए सिरे से खुद के रोल को डिफाइन करना चाहिए. वह चाहे घरेलू कार्य में हाथ बंटाने की बात हो, चाहे बच्चा संभालने की बात हो, या फिर घर में रहकर समय प्रबंधित करने की बात ही क्यों न हो!

Personal Awareness, Alertness and Motivation is Must. Develop a new way to work, exist


देखा जाए तो इस चुनौती से पार पाने में हम खुद की काफी मदद कर सकते हैं. अगर सरकार-प्रशासन के साथ-साथ धार्मिक-सामाजिक संगठन और उनके साथ व्यापारिक प्रतिष्ठान इस कार्य में तल्लीनता से लग जायें तो बड़े बदलाव के वाहक बनने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता.


इसी प्रकार, व्यक्तिगत स्तर पर हम खुद जागरूक होकर अपनी कार्य प्रणाली में सार्थक बदलाव स्वीकार करके बदली परिस्थिति को आसान बना सकते हैं. तब यह कोई बड़ी बात नहीं होगी कि इस संकट का असर हम अधिक से अधिक कम कर सकेंगे, इसे नियंत्रित कर सकेंगे.

जरा सोचिए इसके अलावा कोई विकल्प है क्या हमारे पास?
कमेंट बॉक्स में अपने विचार व्यक्त करना न भूलियेगा.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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