पाकिस्तानी आईएसआई के जाल में कई 'गद्दार' दुर्भाग्य से भारतीय नागरिक ही हैं! Spying from Pakistan, ISI, Sleeper cell, Hindi Article New, betrayal, unfaithful, bad citizens, Public awareness, embassy, vienna convention



हमारे देश में हमेशा से आतंकी हमले हुए हैं, तो कई ऐसी वारदातें हुई है जिनमें सैकड़ों-हजारों निर्दोष लोगों की जानें गई हैं. यह आतंकी खतरा अब आंतरिक सुरक्षा से आगे बढ़कर सीमा सुरक्षा तक पहुँच गया है. जासूसी का कुचक्र रचकर सीमा सुरक्षा के प्रयासों को बड़ी चोट पहुंचाई जा रही है और हम भारतीयों के पास इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं दिख रहा है. यह कह देना बड़ा आसान है कि इन सभी वारदातों के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है, उसे ठीक करो, उसे ठीक करो! ठीक है, पाकिस्तान अपने कुप्रयास रचता है, पाकिस्तान भारत में अपना जासूसी-नेटवर्क फैलाता है, पर सवाल यहां हम भारतीय लोगों का है, भारत की सरकार का है, स्थानीय प्रशासन का है, नेताओं का है, तमाम संगठनों का है और इन सबसे बढ़कर जो सवाल जेहन में आता है वह जनता का है! आखिर सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश चंद गद्दारों को पहचानने में चूक क्यों कर देता है? क्या वाकई यह मुमकिन है कि हम सभी अपने आसपास नजर रखें, अपने सहकर्मियों की गतिविधियों पर नजर रखें, अपने पड़ोस में रहने वाले व्यक्तियों पर नजर रक्खें और फिर भी स्लीपर सेल के रूप में कार्य करने वाले तमाम पाकिस्तानी एजेंट हमारी आंखों से बच जाएँ? यकीन मानिए, अगर हमने आंतरिक रुप से यह सभी बीमारियां दूर कर लीं, जनता आतंक के खतरे के प्रति पूर्णतः जागरुक हो गई, तो कोई कारण नहीं कि आतंक के मुद्दे पर हमें बहुत बड़ी सफलता हासिल न हो! सच कहा जाए, तो बिना खुफिया सूचना के आतंकवादी कुछ कर ही नहीं सकते और इसलिए हमें आईएसआई के जासूसी नेटवर्क को ध्वस्त करने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए. पर दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है. पूर्व में ऐसे तमाम पाकिस्तानी जासूस पकड़े गए हैं, जो स्थानीय लोगों की मदद से, गद्दारों की मदद से भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को खतरे में डाल देते हैं. Spying from Pakistan, ISI, Sleeper cell, Hindi Article New, betrayal, unfaithful, bad citizens, Public awareness, embassy, vienna convention


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अभी चंद रोज पहले भारत में जासूसी करने और सीक्रेट रक्षा दस्तावेज चुराने के आरोपी पाकिस्तानी उच्चायोग के एक कर्मचारी को भारत सरकार ने देश छोड़ने का आदेश दिया. बेहद आश्चर्य की बात है कि दिल्ली पुलिस ने इस पाकिस्तानी जासूस को रंगे हाथों पकड़ा! इस संबंध में हमारी फॉरेन मिनिस्ट्री ने पाकिस्तानी अम्बैसडर अब्दुल बासित को तलब किया और उन्हें यह सूचना दी कि इस तरह की गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएगी! पर कहाँ तक यह आतंकी राष्ट्र अपनी गलती मानते, बजाय इसके वह किसी कुत्ते की दुम की तरह भारत में अपने राजनयिक अधिकारी को हिरासत में लेने और दुर्व्यवहार करने की निंदा कर रहा है. जबकि इस मामले में सिर्फ पूछताछ ही हुई है. अब कोई विदेशी आकर हमारे देश में जासूसी करे और अगर उससे पूछताछ हो, तो उसे वियना समझौते का उल्लंघन बता दिया जाए, यह बात अपने आप में हजम नहीं होती. पाकिस्तान इस तथ्य से लगातार इंकार करता रहा है, किंतु दिलचस्प बात यह है की पुलिस ने राजस्थान के 2 लोगों को भी इसी आरोप में गिरफ्तार किया है. इस मामले में ₹50000 की रिश्वत के बदले जासूसी करने की बात कही जा रही है. आधार कार्ड तक इस मामले में नकली बना लिए गए थे. मामला सिर्फ इस बार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि 2015 में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े आर्मी और एयरफोर्स के कुछ लोगों सहित दस-12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, और तब हंगामा भी खूब मचा था. इस बार, इससे भी बड़ी बात यह देखिए कि पाकिस्तानी जासूस के देश छोड़ने के आदेश के कुछ ही समय बाद समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद मुनव्वर सलीम के निजी सहायक फरहत खान को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. दिलचस्प बात यह भी है कि मुनव्वर सलीम का यह सहायक पिछले 20 सालों से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी कर रहा था. Spying from Pakistan, ISI, Sleeper cell, Hindi Article New, betrayal, unfaithful, bad citizens, Public awareness, embassy, vienna convention
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सांसद महोदय अब इस मामले में अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर रहे हैं, किन्तु मामला बेहद गंभीर है. इस मामले में अगर थोड़ा बेरूखी से कंटेंट को देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि कई सांसद विधायक अपने देश के गद्दारों को जानते हैं और जानबूझकर अपने आस्तीन में देश के गद्दारों को पालते भी हैं. निश्चित रूप से इससे जुड़े सांसद महोदय की भी कड़ाई से जांच की जानी चाहिए. बताते चलें कि फरहत खान 1996 से लेकर वर्तमान तक 4 सांसदों के साथ काम कर चुका है, जिनमें कई सांसद पार्लियामेंट्री कमेटी के मेंबर तक रह चुके हैं. यह बात भी सामने आयी है कि फरहत खान को जासूसी के बदले, देश से गद्दारी के बदले 10000 से 100000 रुपए तक आईएसआई के माध्यम से मिलते थे. दिलचस्पी वाली बात यह देखिये कि वियना समझौते की आड़ लेने वाला पाकिस्तानी दूतावास इस मामले में संदर्भित सांसद के पीए से लगातार संपर्क में था. जरा गौर कीजिए, एक तरफ तो देश की सीमा पर हमारे नौजवान अपनी जान दे रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे ही देश के कुछ गद्दार प्रशासन की लापरवाही से, जनप्रतिनिधियों की लापरवाही से और जनता की लापरवाही से देश की सुरक्षा की धज्जियां उड़ा रहे हैं. यही हाल कुछ दिन पहले उरी अटैक में सामने आया था, तो पठानकोट अटैक में एसपी रैंक के अधिकारी की जासूसी की बात सामने आई थी. निश्चित तौर पर इन जासूसी प्रकरणों को हलके में नहीं लिया जा सकता है और इसलिए सरकार को इस मामले में बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए. इसके साथ-साथ स्लीपर सेल की खोजबीन के लिए एक अलग और डेडिकेटेड डिपार्टमेंट गठित किया जाना चाहिए, क्योंकि अब यह खेल ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है. इस सम्बन्ध में अगर जरा भी शक संदेह होता है तो किसी व्यक्ति से पूछताछ और उसके फॉलोअप से संकोच नहीं किया जाना चाहिए और खासकर जिन जनप्रतिनिधियों की या अधिकारियों की खुफिया जानकारी तक पहुंच है उन पर बारीक और लगातार निगाह रखी जानी चाहिए. शायद तभी हम अपने देश को आंतरिक और बाहरी खतरों से सुरक्षित कर सकते हैं, अन्यथा शोरगुल मचा कर मामला सिर्फ शोरगुल तक ही सीमित रह जायेगा, ठोस परिणामों की उम्मीद नहीं की जा सकती. 

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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