आखिर लोकसभा, राज्यसभा है ही किसलिए? Discussion in Lok Sabha, Rajya Sabha, Hindi Article, Winter Session 2016



जी हां, लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले हमारे संसद के दोनों सदन अब इस बात के लिए ज्यादा जाने जाते हैं कि उनमें अधिकांश समय हंगामा ही किया जाता है. जितना ज्यादा हंगामा, जितनी ज्यादा कार्यबंदी, कार्यवाही को स्थगित करने की ज्यादा से ज्यादा घोषणा हो, तो लोकसभा और राज्यसभा उसी से चर्चा में आते हैं. वैसे तो यह परिपाटी काफी पुरानी है, किन्तु हाल फिलहाल हमने देखा कि जीएसटी का बहाना लेकर पिछले 2 साल तक संसद की कार्यवाही में व्यवधान पड़ता रहा, तो अब की बार नोटबंदी की आड़ लेकर पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ा दिया गया है. लालकृष्ण आडवाणी सदन के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं, तो संसदीय परंपरा का उन जैसा लंबा और समृद्ध अनुभव शायद ही किसी और के पास वर्तमान में हो, किंतु इस हंगामे से वह इस कदर व्यथित हुए कि उन्हें कहना पड़ा कि "वह सोचते हैं कि लोकसभा से उन्हें इस्तीफा ही दे देना चाहिए." कई विश्लेषक इस टिप्पणी को आडवाणी जी की नरेंद्र मोदी से नाराजगी के रूप में देख रहे होंगे, किन्तु सच तो यही है कि लोकतंत्र के जिस मंदिर में जनता के हितों की आरती होनी चाहिए, देश की समस्याओं के हल का भजन होना चाहिए, उस मंदिर में केवल शोरगुल ने संसदीय परंपरा के इस पुराने पुजारी को व्यथित ही करना था. ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे व्यक्तित्व ने पूर्व में कभी भी संसद में इस प्रकार के गरिमा विहीन एवं जन विरोधी आचरण को सराहा हो, बेशक उनकी अपनी पार्टी भाजपा ही शोर शराब क्यों न करे, उन्होंने हमेशा ही विरोध जताया है! संभवतः तभी वह अपनी पार्टी के लोगों पर भी इस बार बरस पड़े. खैर, आडवाणी जी का दर्द और पीड़ा अपनी जगह है किन्तु यह बड़ा विचित्र दृश्य था कि एक ओर विपक्ष के राहुल गाँधी सत्ता पक्ष पर आरोप लगा रहे थे कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी जनसभा में आरोप लगाते नज़र आये कि उन्हें संसद में विपक्ष बोलने नहीं दे रहा है. बेहद अजीब तर्क या कुतर्क कह लीजिये, इसे सब उचित प्रतीत होगा! नोटबंदी जैसे महत्वपूर्ण और पूरे देश को प्रभावित करने वाले निर्णय पर देश संसद और सांसदों की बहस सुनने से वंचित रह गया तो प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि "आखिर लोकसभा, राज्यसभा है ही किसलिए?" Discussion in Lok Sabha, Rajya Sabha, Hindi Article, Winter Session 2016

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सब यहाँ वहां गाल बजाते रहे, किन्तु दोनों सदन जिस प्रकार इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा होने से भाग खड़े हुए, वह हमारी लोकतान्त्रिक गरिमा पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है. आखिर, कई सारी भ्रांतियां थीं इस बार में, उसका जवाब लोगों को अब कहाँ से मिलेगा? कैसे पता चलेगा कि इस नोटबंदी के निर्णय पर सदन क्या सोचता है? इससे क्या और कितना फायदा हुआ तो किधर और किस मात्रा में नुक्सान हुआ, इसका आंकड़ा अब कहाँ से मिलेगा? सत्ता पक्ष के तर्क को विपक्ष किस प्रकार काटता है और विपक्ष के हमले पर सत्ता पक्ष किस मजबूती से इस निर्णय का बचाव करता है, इसे जनता भला कैसे देख सकेगी? हर बार जब सदन नहीं चलता है तो लेखक/ विश्लेषक तर्क देते हैं कि सदन को करोड़ों का नुक्सान हुआ, इतने घंटे नष्ट हुए, यह-वह बिल पारित नहीं हुआ, किन्तु "नोटबंदी" पर सरकार का चर्चा से भागना और विपक्ष के पास चर्चा कराने का नैतिक बल न होना अपने आप में संविधान की धज्जियां उड़ाना है. कांग्रेस, ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसों ने सरकार के नोटबंदी के निर्णय का बाहर खूब विरोध किया, किन्तु सदन के अंदर आखिर क्यों इनके सांसदों ने मिलकर चर्चा का नोटिश नहीं दिया? अरविन्द केजरीवाल सरकार के इस निर्णय को बाहर 'असंवैधानिक' बताते रहे तो राहुल गाँधी 'भूकंप' लाने की बात कहते रहे, किन्तु इन पार्टियों के सांसद लोकतंत्र की गरिमा बचाने को ज़रा सा भी आगे नहीं आये! इसके साथ लेफ्ट जैसी पार्टियां जो इस निर्णय का विरोध कर रही थीं, वह कहाँ थीं? बाद में विपक्षियों ने राष्ट्रपति से मिलकर खानापूर्ति जरूर की, जिसका सत्र समाप्त होने के बाद भला क्या अर्थ रह जाता है? सच तो यही है कि चाहे जो भी वजहें रही हों, किन्तु विपक्ष शीतकालीन सत्र में 'नोटबंदी' पर चर्चा से दूर ही भागता रहा! जहाँ तक बात सरकार की है, तो नरेंद्र मोदी का किसी जनसभा में यह कहना कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है, अपने आप में हास्यास्पद है! आखिर, एक पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया को बोलने से भला कौन रोक सकता है? प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल सहित समस्त सत्ता पक्ष को समझना चाहिए था कि नोटबंदी के बड़े डिसीजन के लगभग 35 दिन गुजर जाने के पश्चात् देश के मन में कई कन्फ्यूजन हैं, और संसद के माध्यम से उन पर विस्तृत चर्चा अगर की जाती तो काफी हद तक धुंधलापन क्लियर होता. Discussion in Lok Sabha, Rajya Sabha, Hindi Article, Winter Session 2016


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http://editorial.mithilesh2020.com/2016/12/discussion-at-all-india-radio-delhi.html

पर सच तो यही है कि सरकार खुद असमंजस में थी और शीतकालीन सत्र में उसके रवैये से यही लगा कि वह खुद ही "नोटबंदी" पर चर्चा नहीं चाहती है. क्या बिडम्बना है यह! अगर इतने बड़े और व्यापक मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष चर्चा नहीं करेंगे तो फिर "लोकसभा, राज्यसभा है ही किसलिए"? चूंकि सत्र चलाने और स्थगित करने की खानापूर्ति सदन ने दिखलाई तो हम भी इस लेख में खानापूर्ति करके बता देते हैं कि सदन में उपरोक्त बड़े नुक्सान के अतिरिक्त दुसरे छोटे नुक्सान क्या-क्या हुए! इन्हें छोटे-मोटे नुक्सान इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि यह तो हर बार ही होते हैं. खैर, इस बार सत्र के दौरान लोकसभा में 21 बैंठको में मात्र 19 घंटे ही कार्यवाही हुई, जबकि व्यवधान के कारण 91 घंटे 59 का समय नष्ट हुआ. लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन के अनुसार 'इस सत्र में महत्वपूर्ण वित्तीय, विधायी और अन्य कार्यो का निपटान किया गया, तो वर्ष 2016-17 के अनुदान की अनुपूरक मांगों के दूसरे बैच और 2013-14 के अतिरिक्त अनुमदान की मांगों पर संयुक्त चर्चा हुई और इसके बाद मांगों पर मतदान हुआ और संबंधित विनियोग विधेयक पारित हुए'. हालाँकि, महाजन जी ने सारांश बताते हुए 'नोटबंदी पर चर्चा' का ज़िक्र नहीं किया, जिससे साफ़ जाहिर होता है कि सरकार की ओर से उन्हें क्या निर्देश रहे होंगे! खैर, सदन में बवाल से इस बात की आशंका भी बलवती हो गयी है कि  जीएसटी को आगे बढ़ाने के लिए सरकार अध्यादेश का सहारा ले. आदर्श रूप में जीएसटी एक अप्रैल 2017 से लागू होना चाहिए, तो नए कानून को अप्रैल और 16 सितंबर के बीच प्रभावी होना संवैधानिक अनिवार्यता है. खैर, इस बार जैसे सबने मिलकर सदन नहीं चलाया, वैसे हो सकता है कि अगली बार सब मिलकर चला भी लें! आखिर, सत्र के अंतिम दिन राहुल गाँधी से मिलने के बाद पीएम ने मुस्कुराते हुए कहा भी कि 'हमें मिलते रहना चाहिए'! वैसे भी सुना है कि राजनीतिक दलों को पुराने नोट जमा करने में इनकम टैक्स से छूट मिली है. तो मितरों, चलते रहना चाहिए यह खेल और सदन  ... सदन भला चर्चा करने की जगह थोड़े ही है, वहां तो कैंटीन में गपशप होनी चाहिए! ठीक वैसे ही, जैसे कॉलेजों में पढ़ाई की बजाय कैंटीन में गपशप होती है. पर इस बीच माननीय सांसदों को इस बात पर गौर अवश्य करना चाहिए कि वर्तमान सत्र के दौरान लोक सभा में किए गए कार्य की उत्पादिता 17.39% और राज्य सभा की 20.61% ही रही. सुना है बच्चों का पासिंग मार्क भी 33% होता है, यहां तो ...  ... !!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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