प्रधानमंत्री पद के सवाल से विपक्ष आखिर भाग क्यों रहा है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनैतिक मजबूती से विपक्ष का एक-एक नेता वाकिफ है. जिस प्रकार से 2014 में तमाम बाधाओं और छवि को तोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए थे, उसने भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था. पीएम के पीछे-पीछे गुजरात से उनके रणनीतिकार रहे अमित शाह भी इसी दौरान केंद्रीय राजनीति में आए और बीजेपी के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने एक-एक करके कई राज्य पार्टी की झोली में डाला और एकबारगी तो यह कहा जाने लगा कि मोदी-शाह की जोड़ी देश को 'कांग्रेस मुक्त' बना डालेगी!

हालांकि 2018 बीतते-बीतते हिंदी हार्टलैंड के 3 राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में मिले जबरदस्त झटके ने बीजेपी के सपने को एक तरह से रोक दिया. 3 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी तो तेलंगाना में केसीआर ने एकतरफा विजय हासिल की.
बीजेपी के सपने में ब्रेक लगने से विपक्षी सपने स्वाभाविक रूप से मजबूत होने शुरू हो गए. उनमें उड़ान की ताकत महसूस की जाने लगी. एक के बाद एक नेता दूसरे नेताओं से मिलने लगा, गठबंधन की खिचड़ी पकाने की संभावनाएं तेजी से टटोली जाने लगीं. 
उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश का गठबंधन हुआ तो कोलकाता में ममता बनर्जी के नेतृत्व में बड़ी रैली हुई जिसमें विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने शिरकत किया.

यूं विपक्ष की एकता में किसी प्रकार की कोई बुराई नहीं है और जब सामने नरेंद्र मोदी जैसा राजनैतिक पहाड़ खड़ा हो तो 'एकता' के सिवा चारा ही क्या है, लेकिन तमाम क्षेत्रीय दलों के महत्वाकांक्षी नेताओं की एक ही समस्या है कि वह पीएम पद के सवाल पर गोलमोल जवाब देते हैं.
चाहे कांग्रेस हो अथवा कोई भी विपक्षी क्षेत्रीय दल, प्रधानमंत्री की दावेदारी की चाह हर एक के मन में है, लेकिन वह पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से बड़ी खूबसूरती से बच निकलते हैं.

बिडम्बना देखिये कि यही विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी को इस बात के लिए पानी पी-पीकर कोसते हैं कि प्रधानमंत्री प्रेस-कॉन्फ्रेंस नहीं करते हैं.
अरे भई! आप लोग ही कौन सा पत्रकारों के असली सवालों का जवाब दे दे रहे हो?

आखिर देश की जनता के लिए इससे महत्वपूर्ण सवाल भला क्या हो सकता है कि उसका अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? उस जनता के लिए, जिससे आप वोट मांग रहे हो, उसके प्रश्नों की थोड़ी तो परवाह करो...

मध्य प्रदेश में एक लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने वर्तमान विपक्षी एकता को बिना "दूल्हे की घोड़ी' बता डाला है.
जाहिर है वर्तमान परिस्थिति में गठबंधन होना चाहिए और दिखना भी चाहिए. इसके पीछे तमाम विपक्षी नेता इस बात का दम भर रहे हैं कि उनका एकमात्र एजेंडा संविधान की रक्षा करना है और मोदी सरकार को सत्ता से हटाना है. उनके हिसाब से पीएम पद का कोई महत्व नहीं है और जब वक्त आएगा तो पीएम पद का नाम वह लोग तय कर लेंगे!

आप ध्यान से इस तर्क को देखेंगे तो इसमें विपक्षी नेताओं की 'धूर्तता और मजबूरी' नजर आएगी. साफ़ तौर पर सभी दल अपना विकल्प खोल के रखना चाहते हैं और अंततः प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा ही इस में छिपी हुई है. कांग्रेस चूंकि राष्ट्रव्यापी पार्टी है और हाल-फिलहाल उसने 3 राज्यों में जीत दर्ज की है जिससे 'ब्रांड-राहुल' की छवि मजबूत हुई है तो ऐसे में राहुल गांधी तो पीएम पद के एक स्वाभाविक दावेदार हैं ही.

वैसे भी गांधी परिवार के बारे में कहा जाता है कि उसमें अगर किसी ने जन्म ले लिया तो वह पीएम जरूर बनेगा... चाहे आज बने चाहे कल बने! यह बात अब तक कमोबेश सही ही साबित हुई है, पर मुश्किल यह है कि राहुल गांधी दूसरे क्षेत्रीय नेताओं को स्वीकार नहीं हैं और कांग्रेस की अभी इतनी हैसियत नहीं दिख रही है कि वह विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर सके. 

ऐसे में पीएम पद की महत्वाकांक्षा आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू से लेकर तेलंगाना केसीआर और पश्चिम बंगाल की ममता से लेकर उत्तर प्रदेश की मायावती तक कुलांचे भर रही है. ऐसे में आखिर जनता इतनी महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं पर किस प्रकार भरोसा करे, यह बात समझ से परे नज़र आती है.

कोई मुंह फुलाकर भला कैसे हंस सकता है?
ढेर सारी बहुमुखी महत्वाकांक्षा और संविधान की रक्षा दोनों एक साथ किस प्रकार हो सकती है?

देखा जाए तो विपक्षी नेताओं के सामने एक अलग स्थिति है. संविधान की रक्षा तो बहाना है, सच यह है कि अगर भाजपा 2019 में पुनः केंद्रीय गद्दी पर काबिज़ हुई तो कई क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा होगा. इसमें न केवल विपक्षी पार्टियां, बल्कि खुद भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियां भी हैं. इसलिए अपना अस्तित्व बचाने को तमाम विपक्षी दल एक नाव पर सवार होने को मजबूर हुए हैं.

दूसरा मामला अवसरवादिता का है. तमाम क्षेत्रीय दलों के नेताओं को राजनीति में एक लंबा समय हो गया है और वह राजनीति के धुरंधर भी रहे हैं. वह जानते हैं कि चाहे भारतीय जनता पार्टी मजबूत हो या कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों को रास नहीं आ सकते हैं. क्षेत्रीय दल दिल से चाहते हैं कि दोनों पार्टियां ही कमजोर रहें और केंद्र में गठबंधन की सरकार बने. ऐसी स्थिति में क्षत्रपों के पीएम बनने का मौका भी आ सकता है.

ऐसा पूर्व में हुआ भी हैं!

आप चाहे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की सरकार देख लें जिसमें मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. उसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर इत्यादि पीएम बने. 1998 के आसपास देखें तो गठबंधन सरकार का ढाई साल का दौर चला जिसमें एचडी देवगौड़ा व इंद्र कुमार गुजराल पीएम बने, जिसकी संभवतः किसी को उम्मीद न थी.
संविधान की रक्षा और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले विपक्षी नेता क्या ईमानदारी से बोलेंगे कि वह भी अगला वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा या गुजराल नहीं बनना चाहते हैं?

वाकई अगर वह लोग मोदी सरकार को हटाने में इतने ही एक मत हैं तो बेहतर होता कि वह अपनी घोड़ी पर एक दूल्हा भी बिठा देते!
क्या समस्या है आखिर इस प्रश्न से?
सभी जानते हैं कि 'पीएम पद' का प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है. राजनीति में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा होती है और इस बात को प्रत्येक विपक्षी नेता को समझना होता कि इस प्रश्न का जवाब ने देने से जनता में गलत संदेश जा रहा है.

प्रधानमंत्री पद की लालसा पाले कुछ नेताओं को देश के बारे में भी सोच लेना चाहिए. मुमकिन है कि गठबंधन सरकार कुछ एक दिनों के लिए आ भी जाए कोई पीएम पद के लिए चुन भी लिया जाए, लेकिन फिर 6 महीने साल भर के बाद वही उथल-पुथल सामने नहीं आएगी, इसकी क्या गारंटी हैं?
अतीत में यही तो हुआ है.

बेहतर होता अगर एक नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन चुनाव लड़ते, देश के सामने एक रोडमैप प्रस्तुत करते, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को "संविधान की रक्षा" न सही, अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए ही सही... त्यागने की सोच दर्शाते, तो जनता भी उनके बारे में गंभीरता से विचार करती!

अभी तो जनता यही जानती और मानती है कि...

बताइये आप भी कमेंट-बॉक्स में कि जनता क्या सोचती है विपक्षी नेताओं के प्रधानमंत्री पद की लालसा के बारे में?

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.





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