क्यों न 'डिग्री विवाद' के बहाने शिक्षा पद्धति पर विचारें! College degree and Education system in India, Hindi Article, Mithilesh

पिछले कुछ सालों पर नजर डालें तो लगातार किसी न किसी नेता की डिग्री का विवाद सामने आ रहा है. कभी स्मृति ईरानी की डिग्री को लेकर मामला तूल पकड़ता है तो कभी दिल्ली के किसी विधायक को फर्जी डिग्री के चक्कर में जेल जाना पड़ता है! अभी ताजा मामला उठाया जा रहा है हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का! जी हाँ, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ये जानना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री ने बी.ए. किया भी है अथवा नहीं! हालाँकि इस मामले में राजनीति कहीं ज्यादा है, क्योंकि जिस तरह से केजरीवाल के 'कुनबे' को डिग्री के नाम पर कुरेदा गया, तो भला वह क्यों अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी को छोड़ दें? उनका और सबका हक़ बनता है कि प्रधानमंत्री की डिग्री की सत्यता जांचें, किन्तु जब जवाब मिल जाए तो झूठ-मूठ का शोर मचाने से क्या हासिल होने वाला है भला! हाँ, इस बीच यह बात जरूर सोचनी चाहिए कि हमारे देश में शिक्षा-पद्धति की दिशा और दशा क्या है? आखिर, जब डिग्री की बातें इतने ज़ोर शोर से हो रही हैं तो वह अवश्य ही कोई 'इम्पोर्टेन्ट' चीज होगी, लेकिन आंकड़ें तो ऐसी कहानी कह रहे हैं कि भारत में 'डिग्रीयों' से मोहभंग हो जाए! वैसे हमारे देश में एक दो राज्य जैसे हरियाणा और गुजरात को छोड़ दिया जाये और वहां भी नया नियम ही बना है, जो नेतागिरी और डिग्री की कहीं-कहीं बात उठाता है, नहीं तो किसी भी राज्य में राजनीति करने के लिए डिग्री की आवश्यकता नहीं है. फिर भी आये दिन नेताओं की डिग्री का मामला हाईलाइट होता ही रहता है तो ऐसा निश्चित रूप से 'राजनीति' के तहत ही होता है, इस बात में शक-ओ-सुबहा नहीं! सोशल मीडिया पर कई लोग यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि 'केजरीवाल' को कोई काम न धाम, बस करते रहो दूसरों को बदनाम! यह बात कुछ हद तक ठीक भी लगती है, क्योंकि किसी न किसी मुद्दे को लेकर हमेशा मीडिया में बने रहने वाले केजरीवाल इस मुद्दे पर कुछ ज्यादा ही सक्रीय दिखने की कोशिश कर रहे हैं. 

हालाँकि, नरेंद्र मोदी की डिग्री होने न होने के बारे में शायद ही किसी को रुचि हो, जबकि पिछले दो सालों में पीएम ने अपनी योग्यता साबित की है. लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि शिक्षा आवश्यक नहीं है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र अथवा समाज में शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण तथा सामाजिक व आर्थिक प्रगति का मापदंड होती है. शिक्षा के बिना किसी देश का विकास संभव ही नहीं है, किन्तु तब समस्या उत्पन्न हो जाती है जब 'डिग्री' और 'शिक्षा' में भिन्नता ही नहीं, बल्कि सिरे से अंतर दिखने लगता है. वहीं अगर हम भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बारे में बात करें तो आज़ादी के बाद से ही भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है जिसे सन् 1835 ई॰ में अंग्रेजों द्वारा ही लागू किया गया था. तब से लेकर आज तक भारत में शिक्षा का प्रारूप मूलरूप से वही है और उसमें कोई व्यापक बदलाव नहीं हुआ है. यहाँ यह बात समझनी आवश्यक हो चुकी है कि जिस तेज गति से भारत के सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक परिदृश्य में बदलाव आ रहा है उसे देखते हुए देश की शिक्षा प्रणाली की पृष्ठभूमि, उद्‌देश्य, चुनौतियों तथा संकट पर गहरे अध्ययन की आवश्यकता है. हमारी सामाजिक संरचना से वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संबंधों, पाठ्‌यक्रमों का गहन विश्लेषण तथा इसकी मूलभूत कमियों पर ध्यान न देने के साथ समय-समय पर इनका विश्लेषण न करने की वजह से ही आज हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर उंगली उठ रही है. यूं तो हमारे यहाँ हर दस वर्ष में पाठ्य-पुस्तकें तो बदल दी जाती हैं लेकिन शिक्षा का मूलभूत स्वरूप वही रहता है, उसी पैटर्न पर पढ़ाया जाता है तो विद्यार्थियों की योग्यता का आंकलन भी उसी घिसे-पिटे माध्यम से किया जाता है. 

आज जब प्रायोगिक ज्ञान का ज़माना आया है तब भी हम 'रट्टू तोते' की तरह विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान देकर ही संतुष्ट हो लेते हैं जबकि दुनिया आज कहाँ से कहाँ छलांग लगा चुकी है. अब वक्त आ गया है इसे बदलने की और रोजगार परक शिक्षा बनाने की, क्योंकि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली गैर-तकनीकी छात्र-छात्राओं की एक ऐसी फौज तैयार कर रही है जो अंत में अपने ही परिवार तथा  समाज पर बोझ बन कर रह जाती है. एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया (एसोचैम) की हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में एमबीए करने वालों में महज़ सात फ़ीसदी लोग ही नौकरी के लायक़ हैं तो आईटी इंडस्ट्री में भी यही हालत है. नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनी (नैस्कॉम) के आंकड़ों के मुताबिक़ 90 फ़ीसदी स्नातक और 75 फ़ीसदी इंजीनियर प्रशिक्षण हासिल करने लायक़ नहीं हैं. साफ़ है कि हमारी विश्व्विद्यालई डिग्रीयां 'कूड़े का ढेर' बनती जा रही हैं. मोदी सरकार द्वारा अवश्य ही 'स्किल इंडिया' जैसे कुछ प्रोग्राम शुरू किये गए हैं, किन्तु निश्चित रूप से यह नाकाफी ही है, क्योंकि इसमें व्यापक तौर पर शिक्षा-नीति में बदलाव की जगह 'शार्ट टर्म कोर्सेज' पर ही ध्यान दिया गया है. वह भी सरकारी बाबुओं की गिरफ्त से निकलकर ज़मीन पर किस हद तक उतर पाती है, इस बात में बड़ा प्रश्नचिन्ह पहले ही लगा हुआ है. साफ़ है कि इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, एमबीए जैसी महंगी पढाई का कुछ खास फायदा समाज को नहीं मिल पा रहा है. 

विद्यार्थी जब पढ़ लिख कर भी रोजगार हासिल नहीं कर सकते, तब फिर सोचने पर विवश हो जाना पड़ता है कि हमारी शिक्षा नीति की दशा और दिशा क्या है? साफ़ है कि सिर्फ किताबी बातें पढ़ने का कोई मतलब तब तक नहीं है, जब तक ज़माने के साथ कदम दर कदम प्रायोगिक ज्ञान न हासिल किया जाए. जब हम असल जिंदगी में उतरते हैं तब पता चलता है कि हमारे पास तो कोई योग्यता ही नहीं ,क्यों जो हमने अपने स्कूल-कॉलेज में पढ़ा था वह डिग्री तो 'फाइलों' में ही दबी रह गयी है. मोदी, केजरीवाल और दूसरे अन्य राजनेताओं को अब इन बातों को अगली पीढ़ी के लिए कम से कम ध्यान में अवश्य ही रखना चाहिए, क्योंकि 'शिक्षित समाज ही विकास और सच्ची प्रगति' का आधार हो सकता है. चूंकि आज की शिक्षा से 'योग्यता' नहीं मिल रही है, इसलिए आरक्षण के लिए समूचे देश में 'खून-खराब' हो रहा है. अगर इन समस्याओं से हमें सचमुच निजात पानी हो तो एक ही रास्ता है और वह है 'ऐसी शिक्षा दी जाय, जिससे विद्यार्थी योग्यताधारी बनें, बजाय सिर्फ 'डिग्रीधारी' बनने के!

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