आप ही क्यों 'पत्रकारिता' ही शर्मिंदा है ... बरखा जी !! Arnab Barkha War, Journalism, Hindi Article, Betrayal and Patriotism, Politics



केंद्र में जबसे नयी सरकार बनी है, तबसे कुछ और हुआ हो या न हुआ हो, किन्तु पत्रकार-बिरादरी में खलबली जरूर मची है. कुछ वरिष्ठ और साख वाले पत्रकार ऐसे भी थे, जो यह माने बैठे थे कि पत्रकारिता का असल मतलब 'भाजपा और संघ' का विरोध करना ही है. कभी-कभार, गाहे-बगाहे व्यंग्यात्मक तारीफ़ भी जरूर कर देते थे, किन्तु ऐसे लोगों को बड़ा झटका 2014 में लगा, जब कांग्रेस इतिहास के सबसे बुरे दौर में घुस गयी! न्यूज की दुनिया में गहरी-रुचि रखने वाले पाठक ऐसे बड़े नामों को बखूबी पहचानते हैं. शायद ऐसे कुछ पत्रकार  (Arnab Barkha War, Journalism, Hindi Article) नयी सरकार के साथ तालमेल भी बिठा लेते, किन्तु तभी आम आदमी पार्टी का धमाकेदार उदय हुआ और फिर ये अपनी आदत अनुसार 'भगवा-विरोध' का झंडा उठाये ही रहे, कुछ 'मौकाहारी-पत्रकार' तो इस नयी पार्टी में राल टपकाते घुस भी गए! इनको शायद राजनीतिक सहारा मिलता भी, किन्तु जल्द ही अरविन्द केजरीवाल अपने असली रंग में आ गए और 'आप' से बाकी लोग साइड कर दिए गए. अब ऐसे पत्रकार करें (Betrayal and Patriotism) तो क्या करें, इतने आगे बढ़ चुके थे विरोध में कि पीछे लौटना मुमकिन न था और अभी कोई राजनीतिक-सपोर्ट देने की हालात में कुछ ख़ास था नहीं. इसलिए कभी कन्हैया के नाम पर, कभी असहिष्णुता के नाम पर यहाँ तक कि आतंकी बुरहान वानी के नाम पर अजीब रिपोर्ट्स बनायीं और चलाई गयीं. 

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इस बात में भी कोई शक नहीं है कि कुछ पत्रकार 'मोदी-भक्ति' में भी आंकठ डूबे रहे, शुरू से ही क्योंकि उन्हें कांग्रेस से रार थी, कारण चाहे जो भी हो! इन दोनों पत्रकारों के बीच कुछ और युवा पत्रकार भी थे, जो शुरू में तो कंफ्यूज थे, किन्तु धीरे-धीरे उन्हें समझ आ गया कि पत्रकारिता के बड़े नाम के पीछे 'कोरी' और कई बार 'देश-विरोधी' राजनीति को भी अंजाम दिया जा रहा है. इस तरह के युवा-पत्रकारों की संख्या काफी ज्यादा थी, जो शुरू में तो सीनियरिटी के कारण वरिष्ठों के सामने मुंह खोलने से कतराते रहे, पर जल्द ही इनकी झिझक दूर हो गयी. जाहिर है, पत्रकार-जगत को दो फाड़ बंटना ही था और यह बखूबी बंटा भी! यूं तो अलग-अलग घटनाओं को लिखें तो एक किताब बन जाएगी, इसलिए यहाँ टाइम्स नाउ के अर्नब गोस्वामी और एनडीटीवी की बरखा दत्त  (Arnab Barkha War, Journalism, Hindi Article) की केस स्टडी कर लेते हैं. अर्नब ने अपने कार्यक्रम में मीडिया से जुड़े कुछ लोगों को छद्म उदारवादी करार दिया और कहा कि ऐसे पत्रकारों को खुद से पूछना चाहिए कि क्या वे करगिल युद्ध के शूरवीरों पर बोलने और लिखने के काबिल भी हैं? उन्होंने ये भी कहा कि मीडिया से जुड़े कुछ लोग जम्मू कश्मीर में काम कर रहे सेना के जवानों को भला-बुरा कह रहे हैं. साफ़ है कि अर्नब गोस्वामी ने अपने प्रोग्राम में 'देश-विरोधी' रिपोर्टिंग पर तथाकथित पत्रकारों की जम कर खिंचाई की तो बरखा दत्त भड़क गयीं और एक लंबी-चौड़ी फेसबुक पोस्ट लिख दिया, जिसमें उन्होंने इस बात के लिए शर्मिंदगी भी जताई कि 'अर्नब गोस्वामी जैसे लोग पत्रकार हैं.'  

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पर बरखा दत्त जी की शर्मिंदगी शायद थोड़ी देर से आयी, क्योंकि उनसे पहले फ़रवरी में ही उन्हीं के साथ रविश कुमार बकायदे अपनी टेलीविजन की स्क्रीन काली कर के इस पर शर्मिंदगी जतला चुके हैं. यह भी बतला दें कि उस कार्यक्रम में और चैनलों के पत्रकारों के साथ-साथ अर्नब गोस्वामी भी बकायदे मेंशन हुए थे. खैर, एक धैर्यवान पत्रकार की तरह वह उस वाकये को पचा गए, किन्तु आश्चर्य है कि उनके एक प्रोग्राम को बरखा पचा नहीं पायीं. वैसे भी,  आखिर, पत्रकार बिरादरी के लिए यह शर्म की बात तो है ही कि कई देश-विरोधी मुद्दों को वह सरकार-विरोधी मुद्दे (Arnab Barkha War, Journalism, Hindi Article) मानकर चलने लगी है. वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने अर्नब-बरखा मैटर पर ट्वीट किया कि "मैं अर्णब की कही ज़्यादातर बातों से सहमत नहीं हूं, पर जम्मू कश्मीर के मीडिया कवरेज के बारे में उनकी बात में कुछ सच्चाई है (Betrayal and Patriotism)." अब बरखा लाभ कहें, लेकिन उन जैसों के अर्नब-विरोध के पीछे 'लुटियन पत्रकारों' की मानसिकता भी काम कर रही है, जो सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए सरकारों से लाभ लेते रहे हैं. यह बात भी गौर करने वाली है कि मोदी के कार्यकाल में इस 'लुटियन-पत्रकारिता' पर चोट हुई है. बौखलाना जायज़ है, और एक-दूसरे पर शर्मिंदगी भी जायज़ हो सकती है, पर इस बीच खुद 'पत्रकारिता' भी इस तरह के वाकयों से खासी शर्मिंदा है. काश, इस पर कोई वरिष्ठ-कनिष्ठ पत्रकार गौर करता!!

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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