गन-कल्चर, इस्लामोफोबिया और रंगभेद से परेशान अमेरिका! - Gun culture in America, Islamophobia, apartheid, racism, Hindi article



दूर से देखने पर लोगों को शायद यही लगता होगा कि अमेरिका जैसे संपन्न और शक्तिशाली देश में भला कोई समस्या हो सकती है क्या, किन्तु जब वहां के 'गन-कल्चर' पर राष्ट्रपति बराक ओबामा चिंता जताते हैं तो साफ़ हो जाता है कि इस सुपर पावर देश में समस्याओं की जड़ कहीं ज्यादा गहरी है. देखा जाए तो यूएस मुख्य रूप से तीन आतंरिक समस्याओं का सामना कर रहा है. एक तो 'इस्लामोफोबिया', दूसरी समस्या है 'रंगभेद' की तो तीसरी समस्या जो बच्चों तक को अपनी जकड़ में ले चुकी है, वह है 'गन-कल्चर' की (Gun culture in America, Islamophobia, racism)! बराक ओबामा के राष्ट्रपति बन जाने के बावजूद, रंगभेद से यह देश बुरी तरह जूझ रहा है. इस क्रम में अगर हम बात करते हैं तो पाते हैं कि अमेरिका में रंगभेद और नस्लभेद कोई नयी बात नहीं है. गोरे लोगों के द्वारा अक्सर ही दूसरों का मजाक उड़ाना आम सी  बात है. इस क्रम में शारीरिक हिंसा भी अब लोगों की आदतों में शुमार हो गया है. हालाँकि, अब न केवल गोरे, बल्कि काले लोग भी हिंसक प्रतिक्रिया देने लगे हैं. इसी क्रम में, अभी ताजा मामला भी कुछ ऐसा ही है, जहाँ हिंसा गोरों पर ही हुयी है. 

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अमेरिका के डैलस में एक अफ़्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति के द्वारा अमेरिकी पुलिस पर गोली बारी की गयी है, जिसमें पांच पुलिस वालों की मौत हो गयी है तथा कई पुलिस वाले घायल हैं. ज्ञातव्य हो कि जब ये घटना हुयी, तब डैलस में अमेरिकी पुलिस के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन चल रहा था. इस प्रदर्शन के पीछे भी 'रंगभेद' की ही बातें थीं, क्योंकि कुछ दिन पूर्व ही मिनिपोलिस शहर में पुलिस ने एक काले व्यक्ति को गोली मार दी थी और ये प्रदर्शन अमेरिका  में पुलिस के अफ्रीकी अमरीकियों के खिलाफ जानलेवा हमलों को लेकर था. हालाँकि, पुलिस के एक काले व्यक्ति पर गोली चलाने के मामले पर राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गहरी चिंता जताई है और कहा कि इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि नस्लीय भेदभाव (Gun culture in America, Islamophobia, racism) अभी भी है और इस कारण पुलिस और समुदाय के बीच भरोसे की कमी है. साफ़ है कि बराक ओबामा संतुलन की बात करते हैं, किन्तु संतुलन की बजाय 'काले और गोरे' लोगों के बीच खाई इस घटना से और चौड़ी हो गयी है. जैसा हम जानते हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा खुद अश्वेत समुदाय से आते हैं और उन से बेहतर कौन समझ सकता है अश्वेतों के साथ होने वाले भेद-भाव को! इसीलिए वो अक्सर ही इन बातों की खिलाफत किया करते हैं, लेकिन गोरों की अंतरात्मा में बसी श्रेष्ठता को कैसे ख़त्म किया जाये शायद उन्हें भी नहीं पता! 

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भारत की मशहूर हस्तियों को भी यहाँ रंगभेद का शिकार होना पड़ा है. आपको याद होगी वो घटना जब टीवी शो 'बिग ब्रदर' में शिल्पा शेट्टी के ऊपर नस्लीय टिपण्णी की गयी थी. अभी अमेरिकी टीवी सीरियल में काम कर रहीं प्रियंका चोपड़ा ने भी स्वीकार किया है कि उनके साथ नस्लीय भेदभाव किया गया. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन मसलों को लेकर गोरे देशों में कोई खास करवाई नहीं होती है. हालाँकि, जब खुद पुलिस पर हमला हुआ है तब शायद सरकार इन समस्याओं की गम्भीरता समझ चुकी होगी और इसी क्रम में इस पर हल निकालने की कोशिशें भी उन्हें तेजी से करनी चाहिए,  अन्यथा सुपर-पावर को यह समस्याएं भीतर से खोखला बनाती जा रही हैं,  इस बात में दो राय नहीं! इसी सन्दर्भ में अगर हम थोड़ा पीछे नज़र घुमाते हैं तो पाते हैं कि एक 29 साल का अमेरिकी नागरिक पहले अमेरिकी इमरजेंसी हेल्पलाइन 911 पर फ़ोन करके बताता है कि वह IS से जुड़ा हुआ है और फिर वह एक सार्वजनिक जगह को अकेले बंधक बना कर मौत का खेल (Gun culture in America, Islamophobia, racism) खेलता है. इस घटना को दुनिया के सबसे ताकतवर देश में अंजाम दिया गया और वहां की एजेंसियां देखती रह गयीं. साफ़ तौर पर यह वाकया भी 'गन-कल्चर' से जुड़ा हुआ है, क्योंकि यूएस में कोई भी आसानी से किसी भी प्रकार का गन खरीदने के लिए स्वतंत्र है. 

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जी हाँ, अगर आप इस घटना को देखें जो कुछ दिनों पहले ही घटित हुई थी, जिसमें अमेरिका के ओरलैंडो शहर में एक नाईट क्लब के अंदर उमर मतीन नाम के एक आदमी ने गोलीबारी की जिसमे 50 लोगों की स्पॉट डेथ और 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए. गौरतलब है कि अमेरिका में पिछले साल ही समलैंगिकता को मान्यता मिली थी, जिसकी पहली वर्षगांठ को फ्लोरिडा के ओरलैंडो स्थित एक ‘गे क्लब’ में समलैंगिकता को सपोर्ट करने वाले एक जुट होकर खुशिया मना रहे थे. उनको इस बात का ज़रा भी 'इल्म' नहीं था कि अगले ही पल उनके साथ क्या होने वाला है. तभी एक भारी हथियारों से लैस हमलावर पहले क्लब के बाहर, उसके बाद अंदर अंधाधुंध गोलियां चला कर बेकसूरों को मौत की नींद सुला देता है. हालांकि हमलावर मारा जा चुका था, लेकिन उस हमलावर ने जाते-जाते कई सारे अनसुलझे प्रश्न छोड़ दिए. इसकी जिम्मेदारी खुद आईएस ने ली है और यह 9 /11 के बाद अमेरिका में हुआ एक बड़ा नरसंहार माना गया, जिसमे 100 से अधिक लोगों की मरने की बात कही गयी. अमेरिका में बढ़ते चरमपंथ को देखते हुए इसे चरमपंथी हमला ही माना गया, क्योंकि पिछले दो सालों में इस प्रकार की जितनी भी घटनाएं हुई हैं, वह अधिकतर एकल व्यक्तियों द्वारा ही किया गया है. 

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जाहिर है यह सारा काम 'गन-कल्चर' से भी जुड़ा हुआ है, जिससे ऐसे व्यक्ति आसानी से बंदूकें और आधुनिक हथियार हासिल कर लेते हैं. अमेरिका में यह घटना उस समय हुई जब यहां राष्ट्रपति का चुनाव होना है और चुनाव के इस माहौल में इस पर राजनीति होना कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी, राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत से ही अमेरिका में गैर अमेरिकी मुस्लिमों  (Gun culture in America, Islamophobia, racism) को यहां आने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए, ऐसा रूख अपना रखा है. ज़ाहिर है, अपने राजनीतिक लाभ के लिए अमेरिका में 'इस्लामोफोबिया' को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है. सोचने वाली बात यह है कि फ़ोर्ट हूड, सैन बर्नारडिनो और ऑरलैंडो की गोलीबारी में शामिल लोग पढ़े-लिखे थे, अमेरिका  में तरक़्क़ी कर रहे लोग क्यों चरमपंथ की ओर जा रहे हैं? 

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वहीं अमेरिका  में बहुत आसानी से कोई भी व्यक्ति बंदूक ख़रीद सकता है, जिस पर रोक के लिए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कई नाकाम कोशिशें की हैं, पर परिणाम 'ढाक के तीन पात' ही रहा है. नस्लभेद तो अमेरिका की पुरानी समस्या है ही. इस बात में दो राय नहीं की, अगर अमेरिका समय रहते इन तीन आतंरिक समस्याओं 'गन-कल्चर, इस्लामोफोबिया और रंगभेद' पर नियंत्रण नहीं पा सका तो इसका असर उसके 'सुपर-पॉवर-स्टेटस' पर निश्चित रूप से पड़ेगा.

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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